शुक्रवार, 1 मई 2026

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 2)

सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता है। औरतों में हिस्टीरिया, मिर्गी, पागलपन, त्वचा रोग हो जाते हैं। पुरुष गन्दी गालियाँ देते हैं। इस भावना का उदात्तीकरण ही उचित है। उच्च साहित्य के अध्ययन, भजन कीर्तन, पूजन, काव्य-निर्माण, चित्रकारी, समाज सेवा के नाना कार्यों द्वारा वृत्ति को तृप्त किया जा सकता है।

वह लड़का, जो छोटे जानवरों को पीटने या सताने में आनन्द लेता है, वास्तव में अपने छिपे पौरुष और शासन करने के भाव को गलत तरीके से प्रकट कर रहा है। इस मार्ग पर चलते-2 संभव है वह एक मारने पीटने वाले दुष्ट व्यक्ति के रूप में पनप जाये। इसके विपरीत यदि वह अपनी इन्हीं भावनाओं को सुनियंत्रण करे, तो एक नेता, सैनिक, सर्जन बन सकता है। जो बच्चे छोटे-2 खिलौने या खेलने के नए-2 आविष्कार करते रहते हैं, वे उन्हीं भावनाओं का विकास कर अच्छे इंजीनियर या वैज्ञानिक बन सकते हैं।

मान लीजिए एक युवक का विवाह उसकी प्रेमिका से तय हो चुका है। उसे उसमें नई प्रेरणा मिली है और वह नए जोश से अपना काम करने में लगा हुआ है। अक्समात वह सम्बन्ध टूट जाता है। उसे भारी निराशा का धक्का लगता है। संभव है आवेश में आकर वह आत्म हत्या कर डाले या किसी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति में लग कर प्रतिशोध लेने पर उतारू हो जाय। यह भाव का गलत विकास है। इससे स्वयं उसके भी मस्तिष्क और शरीर को क्षति होगी। उसे किसी प्रिय कार्य में पूरी तरह प्रवृत्त होकर, तन्मय होकर आत्म-विस्मृति करनी चाहिए। भावात्मक शक्ति को उत्पादक मार्ग देना चाहिए जिससे स्वयं उनका और समाज का कुछ हित हो सके। महाकवि तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, प्रेम दिवानी मीराबाई, भावविह्वल भक्त कबीर, गुरु नानक आदि की भावनाएँ शाश्वत कवि के रूप में प्रवाहित हुई जिनसे युग दिव्य प्रेरणाएँ आज भी ले रहा है। तुलसी का प्रेम ईश्वरीय शक्ति के यशोगान में लगा, सूर के भजनों में आज भी उनकी आत्मा के दर्शन मिलते हैं। ये महामानव स्वयं अपने कार्य से ही प्रेम करने लगे थे। इन्होंने रुके हुए गुप्त भावों को प्रकट होने का स्वस्थ रूप दिया। हम स्वयं भी अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए मनोनुकूल इच्छानुरूप, माध्यम ढूँढ़ सकते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मार्च

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👉 उत्तम जीवन व्यवहार ही हमारा धर्म है। (अंतिम भाग)

इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि जो धर्म अथवा दर्शन आधुनिक विज्ञान के विरुद्ध होगा, उसकी गिनती आज दंभ और पाखंड में ही की जायगी। यदि मानव जाति को प्रगति और कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करना है तो विज्ञान तथा धर्म और राजनीति तथा धर्म के बीच पाई जाने वाली सब प्रकार की विसंगतियों (परस्पर विरोधी बातों) का अंत कर देना चाहिये। इसी से मनुष्यों में ऐक्य की स्थापना होकर शाँति का प्रसार हो सकता है। सौभाग्यवश भारतवर्ष का दर्शनशास्त्र अत्यंत प्राचीन होने पर भी विज्ञान के बहुत कुछ अनुकूल है। उस धर्म मूलक दर्शन शास्त्र से जो नीति शास्त्र विकसित हुआ है, वह बहुत न्यायपूर्ण है और उसके आधार पर आध्यात्मिकता की रक्षा करते हुये समाज का उचित आर्थिक और राजनैतिक संगठन किया जा सकता है। विदेशी लोगों को यह बात कुछ आश्चर्य जनक जान पड़ती है, पर इसमें संदेह नहीं कि विकास के सिद्धान्त और नीतियुक्त शासन का निरूपण हिंदू धर्म में पहले ही कर दिया गया है। हिंदू धर्म के मुख्य आधार वेदान्त में परमात्मा की जो परिभाषा की गई है, वह किसी ऐसे परमात्मा से सम्बन्ध नहीं रखती जिसे मनुष्य की कल्पना ने उत्पन्न किया हो। गीता में ईश्वर की चर्चा जिन शब्दों में की गई है और उसके जो लक्षण बतलायें गये हैं उनसे वैज्ञानिक भी विरोध नहीं कर सकते। नौवें अध्याय में एक जगह स्पष्ट कह दिया गया है-

“सब चराचर सृष्टि मुझ में स्थिति है, और फिर आश्चर्य की बात यह है कि मैं उससे अलग हूँ और प्रकृति अकेली ही काम किया करती है। प्रकृति ही मेरे हस्तक्षेप बिना, चर और अचर सृष्टि को उत्पन्न करती है।”

उपनिषदों में स्पष्ट शब्दों में यह घोषित कर दिया गया है कि आदि शक्ति का क्रम से जो विकास हुआ है, उसी से विश्व की उत्पत्ति हुई है। यही बात आज कल के वैज्ञानिक भी कह रहे हैं। विज्ञान पिछले कुछ वर्षों में अणु और परमाणुओं द्वारा जगत के निर्माण के जिस सिद्धान्त पर पहुँचा है, वह भी हिंदू दर्शन में ज्यों का त्यों हजारों वर्ष पहले से मिलता है।

पर इन बातों से आगे बढ़कर उपनिषदों ने यह भी प्रतिपादित किया है कि प्रकृति से उत्पन्न होने पर भी मनुष्य को आत्मा की ही भक्ति और खोज करना चाहिये। क्योंकि आत्मा ही सत्य है और जो व्यक्ति उससे विमुख होकर केवल भौतिक उन्नति पर ही ध्यान देते है वे अंत में भ्रष्टाचार और कपट के कैद में फँस जाते हैं।

व्यक्तिगत लाभ का उद्देश्य न रख कर केवल समाज के हित की दृष्टि के काम करना ही भगवत् गीता में जीवन का मार्ग बतलाया गया है। उसमें सब कामों को समान रूप से प्रतिष्ठा के योग्य बतलाया गया है, और प्रत्येक कार्य को निर्लिप्त भाव से सच्चाई के साथ करने पर जोर दिया गया है। वास्तव में गीता एक अनोखी रीति से धार्मिक दृष्टि कोण से समाजवादी विचारधारा का प्रतिपादन करती है। गीता में कहा गया है कि “अपने नियत कर्मों को उचित रीति से पूरा करते रहना ईश्वर की बहुत बड़ी उपासना है।”

वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार समाज-संगठन का उचित मार्ग यही है कि कुछ लोगों को विशेष अधिकार प्राप्त कर लेने के बजाय समस्त कामों का बँटवारा जनसाधारण के हित की दृष्टि से बुद्धिमत्ता पूर्वक किया जाय। यदि हम चाहते हैं कि समाज व्यक्तिगत जीवन का इस प्रकार नियंत्रण करें कि प्रत्येक व्यक्ति सुविधापूर्वक जीवन निर्वाह कर सके, तो यह कार्य केवल कानून, पुलिस और फौज के द्वारा नहीं हो सकता। इसके लिये हमको जनता के विचारों में आध्यात्मिकता का समावेश करना पड़ेगा, जिससे हम अपना निर्धारण कर्तव्य आनंदपूर्वक करते रहें और समस्त समाज के हित का ध्यान रखें।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (अंतिम भाग)

इच्छाओं के त्याग का अर्थ यह कदापि नहीं कि मनुष्य प्रगति, विकास, उत्थान और उन्नति की सारी कामनाएँ छोड़कर निष्क्रिय होकर बैठ जाये। इच्छाओं के त्याग का अर्थ उन इच्छाओं को छोड़ देना है जो मनुष्य के वास्तविक विकास में काम नहीं आतीं, बल्कि उलटे उसे पतन की ओर ही ले जाती हैं। जो वस्तुऐं आत्मोन्नति में उपयोगी नहीं, जो परिस्थितियाँ मनुष्य को भुलाकर अपने तक सीमित कर लेती हैं मनुष्य को उनकी कामना नहीं करनी चाहिये। साथ ही वाँछनीय कामनाओं को इतना महत्व न दिया जाये कि उनकी अपूर्णता शोक बनकर सारे जीवन को ही आक्रान्त कर ले।

मनुष्य का लगाव इच्छाओं से नहीं बल्कि उनकी पूर्ति के लिये किये जाने वाले कर्म से ही होना चाहिए। इससे कर्म की गति में तीव्रता आयेगी और मनुष्य की क्षमताओं में वृद्धि होगी जिससे मनोवाँछित फल पाने में कोई सन्देह नहीं रह जायेगा। इसके साथ ही केवल कर्म से लगाव होने पर यदि कोई प्रयत्न में लग जायेगा। असफलता उसे प्रभावित नहीं कर पायेगी। इच्छा के प्रति लगाव रहने से प्रयत्न की असफलता पर मनोवाँछा पूरी न होने से उसका जी रो उठेगा। वह अपनी कामना के लिए तड़पने और कलपने लगेगा। अपेक्षित फल न पाने से उसे कर्म के प्रति विरक्ति होने लगेगी, प्रयत्नों से घृणा हो जायेगी और तब कर्म का अभाव उसको निष्क्रिय बनाकर घोर निराशा की स्थिति में भेज देगा। अस्तु, मनुष्य को मनोवांछाएं प्राप्त करने और निराशा के भयानक अभिशाप से बचने के लिये अपना लगाव इच्छाओं के प्रति नहीं बल्कि उनके लिये आवश्यक प्रयत्नों के प्रति ही रखना चाहिये।

मनुष्य की वे ही वासनायें उपयुक्त कही जा सकती हैं जो उसके विकास में सहायक हों। सम्पत्ति की कामना तभी उपयुक्त है जब वह कोई महान कार्य सम्पादित करने में काम आये। सम्पत्ति की कामना इसलिये करना ठीक नहीं-कि लोग हमें धनवान समझें समाज में प्रभाव बढ़े, संसार की हर चीज प्राप्त की जाये, भोगों के अधिक साधन संग्रह किये जायें। लोग सन्तान की वासना करते हैं, ठीक है सन्तान की कामना स्वाभाविक है, किन्तु सन्तान को केवल इसलिए चाहना कि मैं पुत्रवान समझा जाऊँ सम्पत्ति का कोई उत्तराधिकारी हो जाये, बहुत उपयुक्त नहीं। देश को अपने प्रतिनिधि के रूप में एक अच्छा नागरिक देने के लिये सन्तान की कामना महान एवं उपयुक्त है। लोग जीवन में कीर्ति चाहते हैं, अपनी ख्याति चाहते हैं और उसके लिये न जाने कौन-कौन से उपाय प्रयोग किया करते हैं। ख्याति इसीलिए चाहना ठीक नहीं-कि समाज में प्रभाव बढ़ेगा उससे हजार प्रकार के काम निकलेंगे, लोग आदर करेंगे, चाटुकारी करेंगे, प्रतिष्ठा बढ़ेगी। मनुष्य को कीर्ति कामी होना चाहिए, किन्तु यह तभी ठीक होगा कि वह कीर्ति का उपार्जन अपने सत्कर्मों से करे, अन्याय और धूर्तता से नहीं।

इस प्रकार की उपयुक्त कामनाएं रखने वाला व्यक्ति कभी भी उनकी असफलताओं से दुःखी नहीं होता और न कभी निराशा की स्थिति में पहुँचता है। अपने व्यक्तिगत सुखभोग के लिए विषयों की कामना परिणाम में ही नहीं प्रारम्भ में भी दुःखदायी होती है। आत्म विकास और समाज कल्याण के लिये की हुई कामनायें आदि एवं अंत दोनों में ही सुखदायी एवं कल्याणकारी रहती है। जीवन में निराशा से बचने के लिये मनुष्य को कम से कम कामनाएँ रखना ही ठीक है। कामनाओं की अधिकता ही निराशा और पतन का कारण होती है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 01 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 01 May 2026



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सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता ह...