रविवार, 10 मई 2026

👉 इस अस्थिर संसार में सुख ढूँढ़े दुःख होय।

कल तक जिस पिंगला के यौवन और सौंदर्य की चर्चा घर-घर हुआ करती, धनाढ्य युवक उसकी कृपा की एक किरण पर लाख-लाख स्वर्ण मुद्रायें न्यौछावर कर दिया करते थे, आज उस नगर वधू के भव्य-भवन में एक भी तो अतिथि नहीं आया।

रात का प्रथम प्रहर बीत गया। अब सड़कों पर कहीं-कहीं ही कोई दृष्टिगोचर होता था। सारा नगर निद्रा देवी की गोद में जा चुका था, पर पिंगला की आँखें पथरा गई थीं, नींद भी उसे त्याग कर चली गई लगती थी।

एक क्षीण सी आशा लिये वह पुनः दुआरी पर आकर खड़ी हो गई। राज-पथ पर उसने दूर तक दृष्टि दौड़ाई। कुछ लोग उधर ही चले आ रहे थे। कोई सम्पन्न व्यक्ति लगते थे। निराशा आशा में बदलने लगी। निश्चय ही लोग मेरे पास आ रहे हैं। रंग-मंच सजेगा, पाँव थिरकेंगे और उसके बाद धन, विलासिता के सब सुख एक-एक कर शृंखलाबद्ध एक क्षण में पिंगला की आँखों के आगे नाच गये। कल्पना का सुख भी क्या अजीब है, मनुष्य को कहाँ-कहाँ की सैर करा लाता है। पिंगला की देह में हलकी सी सिहरन उठी, पर जैसे ही दूसरी दृष्टि पुनः राजपथ की ओर घूमी कि अब तक की आशा फिर निराशा में बदल गई, वह जो उधर आ रहे थे, जिन्हें पिंगला अपना अतिथि समझ रही थी वह किसी गली की ओर मुड़ चुके थे, अब उधर से कुछ कुत्तों के भौंकने की आवाज ही आ रही थी, मानो वे धिक्कार रहे हों पिंगला की आसक्ति को, पर उसे इस “दर्शन” से क्या सम्बन्ध। वह तो अब भी किसी प्रेमी की प्रतीक्षा में काष्ठवत् खड़ी क्षणिक सुख की कल्पना में डूबी हुई थी।

दासी शाँता पास आई और बोली-”मालकिन! बुरा न मानें तो एक बात कहूँ।” कह शान्ता कुछ तू ही कह-उदास शब्दों में आज्ञा तो दे दी, पर उसकी दृष्टि अब भी राजपथ पर ही अटकी हुई थी।

फिर वह चौंकी, बोली-यह क्या शान्ता तू तो कुछ कह रही थी, अब यह दर्पण क्यों दिखा रही है।”

अमृतवाणी:- आत्मबोध के सिद्धांत | Aatambodh Ke Siddhant | https://youtu.be/LQ42gL7ryNg?si=9BkokxKsO7T78Xgx

“मुझे जो कुछ कहना है वह इस दर्पण में लिखा है, देवी! किंचित् उसमें अपनी मुखाकृति डालकर तो देखें” शान्ता ने बहुत कोमल शब्द कहे और वहाँ से चुपचाप पीछे हट गई।

पिंगला ने दर्पण में देखा-आज न तो वह रूप था, न सौंदर्य, यौवन था न आकर्षण जो कभी युवा प्रेमियों को गली-गली से खींच लाता था, उसे पहली बार लगा कि जैसे वह शरीर, यह सौंदर्य और तरुणाई सब चार दिन के नाशवान् मेहमान हैं, उसी प्रकार संसार के सुख-भोग, वासनाओं का आनन्द भी कितने दिन भोगा जा सकता है। आज पहली बार उसे सुख और संसार से विरक्ति हुई। उसके हृदय में पहली बार आत्मग्लानि उठी और मन पश्चाताप से भर गया। जिस जीवन को मुक्ति जैसे महान् लक्ष्य में नियोजित किया जा सकता था, उसे थोड़े से सुख के लिये खोखला कर देने की बात वह जितनी ही सोचती उतना ही हृदय दुःख से भर जाता।

एक दृष्टि फिर उठी। उसने देखा भिक्षुओं की टोली आ रही है। महापुरुष बुद्ध उसके आगे हैं, शिष्यगण “बुद्धं शरणं गच्छामि” “धर्म शरणं गच्छामि” कहते हुये आ रहे हैं। पिंगला का गुबार आँखों से बह निकला। यही तो वह सत्य है, जिसे मनुष्य जान नहीं पाया। “धर्मं शरणं गच्छामि” का मंत्रोच्चारण करती हुई वह नीचे उतरी और तथागत के चरणों पर लेट गई उसके मुँह से इतना ही निकला प्रभु! नारकीय जीवन की इन यन्त्रणाओं से उबारो और प्रकाश दो। अब मैं भूलकर भी उस सुख की कल्पना न करूं जिसमें सुख के नाम पर दुःख ही दुःख भरा है।

📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (अंतिम भाग)

अपने विकारों को दूर कर देने पर नव जीवन, दीर्घ आयु, महान प्रतिभा, विवेक, सामर्थ्य की प्राप्ति होती है जैसा कि वेद मंत्र में आया है। “आत्म निरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बनकर अपनी अशुद्धि और मल को दूर करते हैं और नया दीर्घ जीवन धारण करते हैं।” यह निभ्रांति सत्य है कि निर्विकार शुद्ध बुद्ध, दोषरहित बन जाने पर मनुष्य को दीर्घ आयु, व नवजीवन की प्राप्ति होती है। वह शक्ति और सामर्थ्य का केन्द्र बन जाता है, उत्साह और साहस उसमें फूट-फूट कर निकलता है। सिद्धि सफलता उसके समक्ष हाथ जोड़े खड़ी रहती है।

वेद मन्त्र में आगे आया है कि “तत्पश्चात् हम धन और प्रजा के साथ अभ्युदय को प्राप्त होते हुए अपने घर में सुगन्धि रूप बनकर रहें।” आत्मनिरीक्षण द्वारा अपने दोषों को दूर कर देने से आत्मा का शुद्ध परिष्कृत सत् चित् आनन्द स्वरूप विकसित हो उठता है, उसमें जब सात्विकता, सौंदर्य, शक्ति, साहस, स्फूर्ति, सौजन्य की कलिकायें विकसित होती हैं तो एक मधुर गन्ध यत्र-तत्र फैल उठती है जिसके प्रभाव से धन सत्सन्तति, ऐश्वर्य, वैभव आदि एकत्रित हो जीवन में स्वर्गीय वातावरण का निर्माण करते हैं। अभ्युदय, प्रगति, उत्थान, विकास का सहज क्रम तीव्र हो उठता है। आत्म पवित्रता की मधुर गंध से लोक मानस आकर्षित हो उठता है और अपना अगुवा मान कर पीछे-पीछे चलने में अपना सौभाग्य मानता है।

वेदमन्त्र से प्रेरणा लेते हुए सूक्ष्म आत्म निरीक्षण करके अपने विकारों, दोषों, बुराइयों को ढूंढ़ना चाहिए और उन्हें दूर करना चाहिए। जब इससे जीवन परिष्कृत शुद्ध-बुद्ध स्वरूप बन जाता है तो परमात्मा का दिव्य प्रकाश स्वतः सहज रूप से प्रस्फुटित हो उठता है और लोक एवं परलोक में कल्याण की प्राप्ति होती है। ऋषियों के बताते हुये उक्त मार्ग पर चलकर ही मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 3)

यदि भय और आशंकाओं का सम्बन्ध मनुष्य की हृदय-स्थिति से न होता और उनका निवास प्रसंग अथवा परिस्थितियों में होता तो वह उस स्थिति में सभी मनुष्यो...