बुधवार, 8 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग १)

सुख-शाँति की उपलब्धि हो सकती है, यह ध्रुव सत्य है। जो लोग यह मान्यता बनाये बैठे है कि यह संसार तो दुःखों का आगार है, यहाँ पर सुख दुर्लभ है, नहीं मिल सकता-वे निश्चय ही भूल पर है। ऐसे लोग संसार के नाम से अपने मनोयोग का ही कथन करते है। चूँकि उनका अपना मानस जीवन शोक-संतापों और असन्तोष, अशान्ति से भरा होता है, इसलिए उन्हें यह सारा संसार ही दुःख का आगार आभासित होता है। जबकि वास्तविक बात यह है कि संसार में दुःख की अपेक्षा सुख की मात्रा अधिक है।

यदि ऐसा न होता तो यह संसार अब तक मनुष्यों से रिक्त हो चुका होता। दुःख और कष्टों में कोई जीता ही न रह पाता। इसके विपरीत बराबर देखा जाता है कि लोग उत्साहपूर्वक जी रहे है। संसार से मनुष्यों को प्यार है। वे इसकी अधिकाधिक उन्नति के लिए प्राणपण से प्रयत्नरत है। यदि उन्हें इस संसार में सुख-शाँति और आनन्द न मिलता तो क्यों तो वे इसमें जीना पसन्द करते और क्यों इसको सजाने का प्रयत्न करते। जिया तो सुख और आनंद के लिए जाता है, न कि दुख और शोक सन्ताप के लिये। हर मनुष्य के पास उसका एक सुख है, जो उसे मिलता है। अब यह भिन्न बात है कि वह उसको समझ न पाये और अपने किन्हीं भ्रमों और अज्ञान से आहत उल्टा अनुभव करे अथवा अपनी गलतियों से अपने सुख में आग लगाता रहे। मनुष्य निश्चय ही कतिपय सुधारों के आधार पर अपने सुख के भाग को स्थायी अधिक तथा निरापद बना सकता है। और उसे बनाना भी चाहिये।

किन्तु सुख भाग योंही सुरक्षित न हो जायेगा। उसके लिए कुछ प्रयत्न करना होगा। प्रयत्नों में सबसे पहला प्रयत्न है मन का परिष्कार। सुख दुख वस्तुतः और कुछ नहीं। वे मन की दो दिशाओं के भिन्न-भिन्न नाम मात्र है। इनका जन्म बाह्य संयोगों से न होकर मन से ही होता है। इसलिये सुख और दुःख को मनुष्य का मानस पुत्र कहा गया है। पिता स्वस्थ होता है सन्तान भी स्वस्थ होती है। पिता सज्जन होता है, सन्तान भी सज्जन होती है। पिता रोगी होता है, सन्तान भी वैसी होती है। पिता दुष्ट होता है, सन्तान का सज्जन होना कठिन है। इसी प्रकार मन यदि सुन्दर दशा में है, उससे तदनुरूप सुख का जन्म और यदि मन की दशा अच्छी नहीं है तो उससे दुःख का ही जन्म होना है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं। (भाग २ )

मन का, मस्तिष्क का नाश करने में अप्रसन्नता से बढ़कर और कोई घातक वस्तु नहीं है। जिसका चित्त किसी न किसी कारण से दुखी ही बना रहता है, जो आशंका, भय, असफलता से चिन्तित रहते हैं, जिन्हें द्वेष, कुढ़न, शोक, आवेश, उद्वेग घेरे रहते हैं, जो अहंकार से गरदन फुलाये रहते हैं, सीधे मुँह किसी से बात करना जिन्हें सुहाता नहीं, ऐसे बदमिजाज आदमी अपने दुःस्वभाव के कारण अपनी मानसिक शक्तियों का सत्यानाश करते रहते हैं। उनमें से अधिकाँश को तरह तरह की सनक सवार हो जाती है। कितने अर्ध विक्षिप्त होते हैं और कई तो बिल्कुल पागल हो जाते हैं। ऐसे लोगों को अनिद्रा, मधुमेह, बवासीर दस्त साफ न होना, जिगर बढ़ जाना, मुँह से बदबू आना, दांतों में मवाद जाना, रक्त की कमी, दिल की धड़कन, खुश्की, खुजली, मुँह में छाले जैसे रोग हो जाते हैं और कितना ही इलाज करने पर भी जड़ से नहीं जाते। मानसिक उद्वेगों के कारण रक्त के श्वेत कीटाणु अशक्त हो जाते हैं। फलस्वरूप शरीर की रोग निरोधक शक्ति में शिथिलता आ जाती है। हड्डियों के भीतर की मज्जा सूख जाती है, नसें सख्त पड़ जाने के कारण पैरों में हड़फूटन होती रहती है।

अप्रसन्न, रहने वाले, मानसिक अशान्ति से घिरे रहने वाले लोगों का वीर्य निःस्वत्व हो जाता है। उन्हें सुसंतति प्राप्त करने का सौभाग्य नहीं मिलता या तो संतान होती ही नहीं, होती है तो निर्बल, रोगग्रस्त, अपूर्ण होती है। इनमें भी पुत्र की अपेक्षा कन्याएं ही अधिक होती हैं। इन बालकों को सूखा, पीलिया, दस्त अधिक होना, पेट बढ़ जाना, आँखें दुखना जैसे निर्बलता जन्य रोग घेरे रहते हैं। वे बहुत दिन में खड़े होने और बोलने की सामर्थ्य प्राप्त कर पाते हैं। ऐसे बालक बहुधा बचपन में ही मर जाते हैं, अगर किसी प्रकार माता मसानी पर से बच भी गये तो बड़े होने पर मूर्खता, आलस्य, व्यसन आदि दुर्गुणों से घिरे रहते हैं। चिन्ताग्रस्त, खिन्न मानस, माता पिता को सुसंतति से प्रायः वंचित ही रहना पड़ता है।

इस प्रकार मानसिक असंतुलन में अपना शरीर घुलता है और भावी संतति का ह्रास होता है। परन्तु जो लोग प्रसन्न रहते हैं, हंसमुख एवं खुशमिज़ाज रहते हैं वे सहज ही इन आपत्तियों से बच जाते हैं। इतना ही नहीं उनका स्वास्थ्य दिन दिन अच्छा होता रहता है। एक आदमी एक एक गज रोज नीचे उतरे और दूसरा आदमी एक एक गज रोज ऊपर चढ़े तो उन दोनों में नित्य की चाल की अपेक्षा दूना अन्तर होता जायगा। अप्रसन्न रहने वालों और प्रसन्न रहने वालों के बीच में नित्य दूना अन्तर पड़ता जाता है। एक दिन दिन नीचे गिरता है, दूसरा दिन दिन ऊपर चढ़ता है। प्रसन्न रहने वाले की मानसिक शक्तियाँ-जिज्ञासा, कल्पना, इच्छा, व्यवस्था, आशा एवं श्रद्धा शनैः शनैः मजबूत होती जाती है और वह प्रतिदिन अधिक मनस्वी बनता जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1947

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 08 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 08 July 2026



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