गुरुवार, 25 अक्तूबर 2018

👉 आज का सद्चिंतन 25 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 28)

👉 आश्वासन एवं अनुरोध  
    
🔶 अस्सी वर्ष जी लेने के उपरान्त और अधिक जीने की इच्छा तो तनिक भी नहीं है; पर अपनी मर्जी से तो न जीना हो सका और न मरना हो सकता है। नियंता की मर्जी ही प्रमुख है। इतने पर भी यह निश्चित है कि शरीर के बिना भी बहुत कुछ करते बन पड़ेगा। इसका पूर्वाभ्यास इन दिनों चल रहा है। एकान्त सेवन के साथ जुड़ी हुई निष्क्रियता दीख पड़ने पर भी यह जाँचा जा रहा है कि स्फूर्तिवान शरीर से लदे रहने पर जितना कुछ करते बन पड़ा करता था, अब उसमें कुछ कमी तो नहीं आ गई है।

🔷 निष्कर्ष यही निकल रहा है कि इस स्थिति में सीमित को असीम बनाने में समर्थता का अधिक बढ़-चढ़ कर परिचय देने में सहायता ही मिल रही है। इस आधार पर विश्वास परिपक्व हो गया है कि जीवित रहने की अपेक्षा शरीर न रहने पर समर्थता एवं सक्रियता और भी अधिक बढ़ जाती है। इसी मान्यता के आधार पर प्रज्ञा परिजनों से विशेष रूप से कहा जा सकता है कि आँखों से न दीख पड़ने पर तनिक भी उदास न हों और निरन्तर यह अनुभव करें कि हम उन्हें अधिक प्यार, अधिक उत्कर्ष और अधिक समर्थ सहयोग दे सकने की स्थिति में तब भी होंगे, जब यह पंच भौतिक ढकोसला मिट्टी में मिल जाएगा। जो पुकारेगा, जो खोजेगा उसे हम सामने खड़े और समर्थ सहयोग करते दीख पड़ेंगे।
  
🔶 अदृश्य अध्यात्म की सामर्थ्य दृश्यमान विज्ञान की तुलना में कम तो नहीं है, इस असमंजस को इतने दिनों जीकर, अभीष्ट प्रयोग की दिशा में निरत रहकर यह भली-भाँति जान लिया है कि आत्मबल संसार के समस्त बलों की तुलना में अधिक सामर्थ्यवान है। विज्ञान की पहुँच मात्र जड़ पदार्थों तक है, जबकि अध्यात्म जड़ ही नहीं, चेतना को भी प्रभावित, परिष्कृत करने में समर्थ है। उसका अमृत, पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु आदि के नामों से आलंकारिक सम्बोधन किया जाता है। वह कथानक प्रकारान्तर से सच्चाई के साथ जुड़ा हुआ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 32

👉 Significance of Symbolism & Customs of Indian Culture (Part 2)

In (Bio) chemical sciences, line-diagrams or networks of lines and circles with syllables of atom-names are used as schematic representations of molecular structures. A more evolved and structured coding system (in terms of geometric designs/symbols, or specific objects) was devised by the Vedic sages (the founders of Indian Culture) to represent transcendent and manifested elements and energy current/fields existing in Nature. These symbols (matrikas and yantras) have multiple meanings in terms of physical, mental and spiritual expressions and effects. Prominent among these symbols are outlined below (details in [5]).

🔷 ॐ (Oam): The symbol of self-existent, omnipresent element of the ‘sound’ of the evolutionary vibration of Brahm; concise representation of the combined spiritual energy fields of the divine forces of trinity gods Brahma, Vishnu, and Shiva. Researchers of yoga-science and spiritual healing have found, and millions of yoga-practitioners across the world have experienced, significant soothing and rejuvenating effects of meditative chants of “Oam”.

🔶 (Swastika): The symbol of the manifested energy (of Brahm) subtly spread in all cosmic directions that accounts for auspiciousness and wellbeing.

🔷 Sikha (Hair knot, tied at centre of the head) and Sutra (sacred thread or yagvopavita hanged from left shoulder till the navel: Sikha symbolizes the presence of discerning intellect, farsightedness and the deity of knowledge upon our head. It is like a flag hoisted at the suture (the central junctions of all major nerves) of dignified values and virtues of humanity. Awareness of righteousness, moral responsibilities and social duties of human life are worn on our shoulders and kept attached to our hearts in symbolic form as the Sutra.

To be continued...

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 4)

🔶 बाहरी, दैवी और संसारी सहायताएँ मिलती तो हैं, पर उन्हें पाने के लिए पात्रता की अग्नि-परिक्षा में गुजरते हुए अपनी प्रामाणिकता का परिचय देना पड़ता है। उतना झंझट सिर पर उठाने का मन न हो- सहज ही कुछ इधर-उधर की ‘हथफेरी’ करके भौतिक सम्पदाएँ, आत्मिक विभूतियाँ पाने के लिए जी ललचाता भर हो तो कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व को महामानवों के स्तर पर गठित करना और उसके फलस्वरूप उच्चस्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त कर सकना एक प्रकार से असम्भव ही है। उत्तर नकारात्मक समझा जा सकता है।

🔷 ‘हाँ’ उस स्थिति में कहा जा सकता है जबकि साधक में यह विश्वास उभरा हो कि वह अपना स्वामी आप है- अपने भाग्य का निर्माण कर सकना उसके अपने हाथ की बात है। दूसरों पर न सही अपने शरीर और मन पर तो अपना अधिकार है ही और उसका अधिकार का उपयोग करने में किसी प्रकार का कोई व्यवधान या हस्तक्षेप कहीं से भी नहीं हो सकता। मन की दुर्बलता ही है जो ललचाती, भ्रमाती और गिराती है। तनकर खड़ा हो जाने पर भीतरी और बाहरी सभी दबाव समाप्त हो जाते हैं और अभीष्ट दिशा में निर्भयता एवं निश्चिन्तता के साथ बढ़ा जा सकता है। समुद्र की गहराई में उतर कर मोती ढूँढ़ने में विशिष्ट प्रकार के साधन एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

🔶 जीवन समुद्र की गहराई में उतर कर एक से एक बहुमूल्य रत्न ढूँढ़ लाना सरल है। इसमें किसी बाहरी साधन या उपकरण की जरूरत नहीं- मात्र प्रचंड संकल्प शक्ति चाहिए। प्रचंड का तात्पर्य है धैर्य और साहस का उतनी मात्रा में समन्वय जिससे संकल्प के डगमगाते रहने की बाल बुद्धि उभर आने की आशंका न हो। स्थिर बुद्धि से सतत् प्रयत्न करते रहने और फल प्राप्ति में देर होते देखकर अधीर न होने की- वरन् दूने उत्साह से प्रयत्न करने की सजीवता जहाँ भी होगी वहाँ सफलता पैर चूमने के लिए सामने हाथ जोड़े- वहाँ सिर झुकाये खड़ी होगी। ऐसे मनस्वी व्यक्ति अपने को, अपने वातावरण को यहाँ तक कि; अपने प्रभाव क्षेत्र को काया-कल्प की तरह बदल सकने में सफल हो सकते हैं। जीवन परिष्कार की भविष्यवाणी करते हुए ऐसे ही लोगों की सफल सम्भावना को ‘हाँ’ कहकर आश्वस्त किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.4