Book गुरुगीता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Book गुरुगीता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 23 जून 2018

👉 महान् योगी अनन्ता बाबा

🔷 गुरूभक्त साधक महान् योगी अनन्ता बाबा का मार्मिक प्रंसग है। जिस समय बाबा ने अपना यह प्रंसग सुनाया ,वह एक आदिवासी गाँव में रहते थे। आदिवासी उन्हें अपने देवता मानकर पूजते थे, श्रद्धा करते थे। बाबा उनके लिए माता- पिता ,एवं भगवान् थे। बाबा भी इन ग्रामवासियों का ध्यान अपने बच्चों की तरह रखते थे। बहुत पढ़े- लिखे न होने पर भी उन्होंने इन भोले गाँववासियों को शिक्षा का संस्कार देने की कोशिश की थी। अपने साधारण ज्ञान एवं असाधारण आध्यात्मिक ऊर्जा के द्वारा वह इन सरल ग्रामीण का कल्याण करते रहते थे।

🔶 उनके पास आश्चर्यकारी शक्तियाँ थीं। एक बार जब किसी ने उनसे पूछा कि उनको ये अद्भुत विद्याएँ कहाँ से मिलीं? तो उन्होंने अपने पुराने झोले से एक फटी हुई पुस्तक निकाली। यह पुस्तक गुरूगीता की थी। उन्होंने इस पुस्तक को अपने माथे से लगाया। ऐसा करते हुए उनकी आँखें भर आयीं। वह अपने अतीत की यादों में खो गये और जब उबरे, तब उनकी आँखों में गुरूभक्ति का प्रकाश था। समूचे मुख पर श्रद्धा की अनोखी दीप्ति थी। अपनी स्मृतियों को कुरेदते हुए उन्होंने कहा कि- बचपन से ही प्रभु ने मुझे अपना रखा था। शायद तभी उन्होंने मुझे संसार में रमने नहीं दिया। एक के बाद एक अनेक कष्ट मेरे जीवन में आते चले गये।

🔷 छोटा ही था, तब घाघरा नदी की बाढ़ में सब कुछ बह गया था। माता- पिता, स्वजन- परिजन मुझे अपने कहने वाला कोई न था। बाढ़ मुझे भी बहा ले गयी थी ,पर मुझे जब होश आया, तब मैंने स्वयं को एक सुनसान स्थान में बने शिव मंदिर में पाया। मेरा सिर एक वृद्ध महात्मा की गोद में था और वे बड़े प्यार से मेरे माथे पर हाथ फेर रहे थे। मेरे आँखें खोलने पर उन्होंने मेरी स्थिति जानी कुछ हलवा खाने को दिया। कई दिन बाद जब मैं स्वस्थ हुआ, तो उन्होंने मुझे पढ़ाना शुरू किया। संस्कृत व हिन्दी का साधारण ज्ञान देने के बाद एक दिन उन्होंने मुझे गुरूगीता की पोथी थमायी और बोले -बेटा! इसी ने मेरा कल्याण किया है और यही तुम्हारा भी कल्याण करेगी। मेरा कोई शिष्य नहीं है, तुम भी नहीं हो सकते। भगवान् भोलेनाथ सबके गुरू हैं, उन्हें ही अपना गुरू एवं ईश्वर मानो। गुरूगीता उन्हीं की वाणी है, इसकी साधना से उन सर्वेश्वर को प्रसन्न करो।

🔶 इसी के साथ उनहोंने बतायी गुरूगीता की पाठविधि। साथ ही उन्होंने कहा कि कोई साधना कठिन तप एवं पवित्र भावना के बिना सफल नहीं होती। उन महान् सन्त के सान्निध्य में यह साधना चलती गयी। अंतःकरण के कोनों में आध्यात्मिक उजाले की किरणें भरती गयीं। गुरूगीता की कृपा से सब कुछ स्वतः प्राप्त होता गया। समय के साथ अंतस् की संवेदना इतनी व्यापक होती गयी कि सभी कुछ मिलता गया। जब उन महान् सन्त ने अपना शरीर छोड़ा ,तब मैं वहाँ से चलकर यहाँ आ गया और जीव सेवा को ही शिव सेवा मान लिया। प्रभु की कृपा से मुझे सब कुछ सहज प्राप्त है। गुरूगीता के अंतर रहस्यों को जो भी जान लेगा, उसे भी ऐसा ही दिव्य अनुदान मिल जायेगा।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 195

मंगलवार, 12 जून 2018

👉 गुरुगीता (भाग 128)

👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना

🔶 विष्णु शंकर सामान्य गृहस्थ थे। उनकी जीवन यात्रा सामान्य जनों की भाँति साधारण चल रही थी। घर- परिवार की मामूली उलझनों के साथ सब कुछ ठीक था। थोड़े बहुत उतार- चढ़ाव तो आते थे, पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिसे अघटित कहा जा सके। पर दैव का कोप कहें या दुर्विपाक, एकाएक सब कुछ उलट- पुलट गया। समय का फेर जिन्दगी में होता है, ऐसा लगने लगा। ग्रहों की क्रूर दशा साफ नजर आने लगी। खेती, घर, काम- काज, रिश्तों का संसार, सब कहीं टुटन- दरारें नजर आने लगी। हानि, षडयन्त्र और अपमान से विष्णु शंकर का जीवन घिर गया। वह क्या करें, कैसे करे, कहाँ जाय कुछ भी नहीं सूझ रहा था।

🔷 यहाँ तक कि हमेशा शांत एवम् स्वस्थ रहने वाले विष्णु शंकर चिड़चिड़े ,अन्यमनस्क, उदासीन एवं अवसादग्रस्त रहने लगे। विपरीत परिस्थितियों का प्रचण्ड वेग उन्हें असहाय बनाने लगा। ऐसी असहायता में उन्हें यदा- कदा आत्महत्या के विचार घेर लेते। अकेले बैठेकर वह फुट- फुटकर रोते रहते। कभी- कभी शिवालय जाकर भगवान शिव की लिंगमूर्ति के सामने बिलख उठते, परंतु उपाय नदारत था। अब तो असहा आर्थिक हानि के कारण भुखे- मरने की नौबत आ पहुँची थी। परन्तु कोई उपाय न था।

🔶 पर उस दिन सोते समय उन्होंने सपने में देखा कि एक श्रेव्त केश दाढ़ी एवं देदीप्यमान चेहरे वाले ऋषि उन्हें सान्त्वना देते हुए कह रहे है -धैर्य रखो पुत्र! यह पुर्वजन्म के कर्मों के कारण आया दुर्विपाक है। इस जीवन में तुमने ऐसे कोई काम नहीं किए, जिसका तुम्हें इतना कठोर दण्ड मिलता। पर कर्म तो कर्म होते है, इस जीवन के हों या पिछले जीवन के, भोगने तो पड़ते ही है, धैर्य रखो और कठिन तप में अपने को प्रवृत करो। तुम्हारे कठोर तप के प्रभाव से यह अंधेरा छिन्न- भिन्न हो जाएगा, पर तप का आधार क्या हो? अंतस में यह अनुगूँज उठी। यह अनुगूँज देर तक रहती इसके पहले ही ऋषि ने कहा- गुरुगीता भगवान शिव की वाणी है। शिवमुख से उच्चारित होने के कारण यह परम मंत्र है। इसमें असीम ऊर्जा समायी है। इसे ही अपने तप का आधार बनाओ।

🔷 उस दिव्य स्वप्र में ही उन ऋषि ने उन्हें तप की प्रकिया समझा दी। चन्द्रायण व्रत, नियमित गायत्री जप और गुरुगीता जप और गुरुगीता का पाठ अनुष्ठान, उन ऋषि ने मस्तक पर हाथ रखा। उनके दिव्य स्पर्श से विष्णुशंकर के मन का अवसाद जाता रहा। निद्रा से जगकर उन्हें चैतन्यता लग रही थी। मन हल्का था और उनमें तप का उत्साह संचारित हो रहा था। अगले दिन गुरुवार था। गुरुवार- गुरुचेतना के स्मरण का पुनीत क्षण है। ऐसा समझते हुए उन्होंने इस पावन क्षण में जो पुष्य नक्षत्र से भी जुड़ा था। ऐसे गुरुपुष्य योग में विष्णु शंकर ने अपनी तप साधना आरम्भ कर दी।

🔶 हालांकि परिस्थितियों में अभी भी अपमान, षड़यंत्र ,हानि एवं कुचक्रों के प्रबल झंझावात उठ रहे थे। पर अब मन:स्थिति भिन्न थी, उसमें तप के लिए प्रबल उत्साह था और दैवी सहायता पर प्रबल विश्वास भी। इसी विश्वास की पूँजी के साथ तप की अंतर्धारा बह चली। दिवस, मास बीतने लगे। छ: महीने तक तो परिस्थितियों में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया, परन्तु छह महीने बाद घने अँधेरे में प्रकाश की किरणें फुटने लगी। इतना हुआ कि भूखे मरने की नौबत समाप्त हुई। बाहर अपमान एवं व्यंग के अवसर कम होने लगे सघन अँधेरे में यह उजाले की वृष्टि बढ़ती गयी। गुरुगीता ने उन्हें आश्रय, आश्र्वासन एवं सुफल सभी कुछ दिया। अब वह अनुभव कर रहे थे कि गुरुगीता दुष्कर संकटों का सार्थक समाधान है, जो संकटों के पाश से पाश से मुक्त कर गुरुभक्ति ईश्वरनिष्ठा का वरदान देती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 193

शुक्रवार, 8 जून 2018

👉 गुरुगीता (भाग 127)

👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना

🔶 इस गुरू रहस्य कथा के अन्य आयाम प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव कहते हैं-

अनेन प्राणिनः सर्वे गुरूगीता जपेन तु। सर्वसिद्धिं प्रान्पुवन्ति भुक्तिं मुक्तिं न संशयः॥ १६६॥
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्म्यं सांख्यं मयोदितम्। गुरूगीतासमं नास्ति सत्यं सत्यं वरानने॥ १६७॥
एको देव एकधर्म एकनिष्ठा परं तपः। गुरोः परतरं नान्यत् नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥ १६८॥
माता धन्या पिता धन्यो धन्यो वंशः कुलं तथा। धन्या च वसुधा देवि गुरूभक्तिः सुदुर्लभा॥ १६९॥
शरीरमिन्द्रियं प्राणश्चार्थस्वजनबांधवाः। माता पिता कुलं देवि! गुरूरेव न संशयः॥ १७०॥

🔷 गुरूगीता के जप अनुष्ठान से सारे प्राणी सभी सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं, भोग एवं मोक्ष पाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥ १६६॥ भगवान् सदाशिव पूरी दृढ़ता से माता पार्वती से कहते हैं- हे वरानने ! यह मेरे द्वारा प्रकाशित धर्मयुक्त ज्ञान है। यह सत्य ,सत्य और पूर्ण सत्य है कि गुरूगीता के समान अन्य कुछ भी नहीं है॥ १६७॥ एक ही देव है, एक ही धर्म है, एक ही निष्ठा और यही परम तप है कि गुरू से परे कोई भी तत्त्व नहीं है, गुरू से श्रेष्ठ कोई तत्त्व नहीं है, गुरू से अधिक कोई तत्त्व नहीं है॥ १६८॥ हे देवि! गुरूभक्त गुरुभक्त को धारण करने वाले माता- पिता, कुल एवम् वंश धन्य होते है, क्योंकि गुरुभक्त्ति अति दुर्लभ है। हे देवि! शरीर- इन्द्रिय, प्राण, धन, माता सभी सदगुण की चेतना का ही तो विस्तार है, इसमें कोई संशय नहीं है।

🔶 भगवान् सदाशिव के ये वचन अकाटय है। कोई भी व्यक्ति इन्हें अपने जीवन में परख सकता है। बस ,बात गुरुगीता की साधना करनें की है। युँ तो साधनाएँ बहुत है, हर एक का अपना महत्त्व है। सभी के अपने- अपने विधान एवं अपने सुफल है, लेकिन लेकिन इन सब की सीमाएँ भी है। प्रत्येक साधना अपना अभीष्ट पुरा करके चुक जाती है। परन्तु गुरुगीता का विस्तार व्यापक है, इससे काम्य अभीष्ट तो पुर्ण होते है, साथ ही वृत्तियाँ भी निर्मल होती है। अंत में सदगुरु एवम् परमात्मा दोनों की प्राप्ति होती है। यह बात इतनी खरी है कि जब कोई जहाँ चाहे इसे आजमा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 192

गुरुवार, 7 जून 2018

👉 गुरुगीता (भाग 126)

👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना
🔷 गुरूगीता की मंत्र साधना सर्वसंकट हारिणी है। जिसने भी गुरूगीता का पाठ अनुष्ठान किया, उन सभी के अनुभव आश्चर्यकारी रहे हैं। गुरूगीता की मंत्र माला, गुरूतत्त्व का बोध, शिष्य प्रबोध एवं तत्त्व चर्चा के साथ अनेकों मांत्रिक रहस्य भी हैं। जो इन रहस्यों को जानकर उनका प्रयोग करना सीख जाता है, वह कभी भी दुस्तर संकट के जाल में नहीं उलझता, कु्रर ग्रहों की पीड़ाएँ उसे कभी नहीं सतातीं। दुःख और दुर्भाग्य उसे छू तक नहीं पाते। गुरू चेतना है ही सारे आश्चर्यों ,चमत्कारों व अलौकिक शक्तियों का घनीभूत पुञ्ज। बात बस केवल अनुभव की है। अब तक ये अनुभव अनेकों ने किए हैं और अनगिनत अभी कर सकते हैं। अनुभवी साधकों के मध्य यह बहुत ही सुप्रचलित वाक्य है कि जब गुरूगीता है, तब भला अन्य शास्त्रों व साधनाओं के विस्तार से क्या लाभ?

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इस साधना रहस्य के कई गूढ़ संकेत किए गए हैं। इसमें बताया गया है कि समुद्र में जिस तरह से जल, दुग्ध में दुग्ध ,घृत में घृत, घड़े का आकाश घड़े के फूट जाने से घड़े में मिल जाता है, उसी तरह से आत्मा परमात्मा में लीन हो जाता है। गुरूगीता की साधना से जीवात्माएँ जिस एकता का अनुभव करती हैं, वह उन्हें दिन- रात आनन्द में विभोर रखती है और वह जीवन मुक्ति का आनन्द उठाता है। ऐसी महनीय विभूतियों की जो भाव- भक्ति करता है, वह सन्देह रहित होकर सभी आध्यात्मिक -लौकिक सुख प्राप्त करता है, वह सन्देह रहित होकर सभी आध्यात्मिक -लौकिक सुख प्राप्त करता है, उसे भोग एवं मोक्ष मिलते हैं, उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 190

बुधवार, 6 जून 2018

👉 गुरुगीता (भाग 125)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी
🔶 ऐसा ही अनुभव दक्षिण भारत में कृष्ण नदी के किनारे बसे गाँव त्र्यंगम के निवासी मुरली कृष्णन को हुआ। मुरली कृष्णन जन्म से ब्राह्मण थे। उनकी शिक्षा सामान्य ही हो पायी थी। परिवार में गरीबी थी, उस पर शत्रुओं का आतंक। पिताजी बचपन में ही चल बसे थे। घर में अकेली माँ और दो बहनें थीं, जिन पर गाँव के जमीदार की कुदृष्टि थी। असहाय, अकेलापन, न कोई मार्गदर्शन और न कोई राह बताने वाला। कहाँ जायें, किसके पास जायें। जो राह मिली भी, वे दुष्कर थी। किसी ने उन्हें किसी ज्योतिषी के पास जाने को कहा, किसी ने तांत्रिकों के पते बताए। मुरली कृष्णन की माँ काफी समय तक इधर- उधर भटकती फिरीं। परन्तु मिला कुछ नहीं उलटे घर की हालत और बिगड़ती गई और शत्रुओं का आतंक बढ़ता गया।

🔷 एक दिन शाम के समय मुरली कृष्णन ने अपनी माँ से कहा- माँ भगवान् सद्गुरू हैं, वे सभी का मार्गदर्शन करते हैं- क्यों न हम उन्हीं की शरण में जायें? प्रभु जो चाहेंगे- वही अच्छा होगा। ऐसा निश्चय करके मुरली कृष्णन ने पूर्णिमा की तिथि से गायत्री महामंत्र के जप के साथ गुरूगीता के पाठ का निश्चय किया। नियमित सन्ध्योपासना, अल्पाहार, अस्वादव्रत के साथ मुरली कृष्णन की साधना चलने लेगी। गायत्री महामंत्र के जप की ग्यारह मालाएँ पूरी करने में उसे लगभग एक घण्टे का समय लगता। पूजा के विधान सहित गुरूगीता के पाठ में भी लगातार एक घण्टा लग जाता।

🔶 इस क्रम से प्रातः सायं उसकी साधना चलने लगी। प्रारम्भ में तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। शत्रु और शत्रुता ज्यों के त्यों बने रहे। लेकिन तीन महीने के बाद गुरूगीता की पाठ- साधना के प्रभाव स्पष्ट दिखने लगी। लोगों की बढ़ती उपेक्षा कम होने लगी। गाँव के कई प्रभावी लोग उनके पक्ष में खड़े हो गए । माँ की मेहनत एवं पुरखों के खेती में आय से घर का सामान्य खर्च चलने लगा। आतंक की छाया, शान्ति की शीतलता में बदलने लगा। अब तक मुरली कृष्णन का मन भी साधना में रमने लगा।

🔷 साधना के तीन वर्ष पूरे होते- होते न केवल स्थितियों में सुखद परिवर्तन हुआ, बल्कि मनः स्थितियों में भी आध्यात्मिक भाव उभरने लगा। अन्तश्चेतना में भगवान् सदाशिव एवं जगदम्बा पार्वती की झलकियाँ मिलने लगी। एक दिन ध्यान की गहनता में उसने स्वयं को भगवान् भोलेनाथ के समीप पाया। उसने अनुभव किया कि प्रभु स्वयं उसे स्वीकार करते हुए कह रहे हैं, वत्स ! मैं ही वह गुरूतत्त्व हूँ जो जगती पर भिन्न- भिन्न नाम रूपों में प्रकट होता है। भगवान् की यह वाणी सुनकर मुरली कृष्णन के अन्तस् से बस यह स्वर निकले- मुझे अपना लें प्रभु ! और उसे लगा- भगवान् कह रहे हैं कि गुरूगीता को जो अपनाता है, उसे मैं स्वभावतः अपना लेता हूँ। प्रभु का यह आश्वासन प्रत्येक साधक के साथ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 188

👉 गुरुगीता (भाग 124)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी

🔷 गुरूगीता के विगत क्रम में कुछ ऐसे ही मांत्रिक महत्त्व की चर्चा की गयी है। इसमें बताया गया है कि गुरूपुत्र सब तरह से वरण के योग्य है गुरूगीता के महामंत्र संसार के मलों को धोकर भवपाशों से छुटकारा दिलाते हैं। जो गुरूगीता के जल से स्न्नान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होता है। वह जहाँ भी रहता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है। यही नहीं वहाँ पर सभी देवशक्तियाँ निवास करती हैं। गुरूगीता का पाठ करने वाला पवित्र ज्ञानी पुरूष प्रत्येक अवस्था में विशुद्ध होता है, किसी भी अवस्था मे उसका दर्शन कल्याणकारी है।

🔶 इस तत्त्वकथा का विस्तार करते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

समुद्रे च यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। भिन्ने कुम्भे यथाकाशः तथात्मा परमात्मनि॥ १६२॥
तथैव ज्ञानी जीवात्मा परमात्मनि लीयते। ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशम् ॥ १६३॥
एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्त्तते बुधः। तस्य सर्वप्रयत्नेन भावभक्तिं करोति यः॥१६४॥
सर्वसंदेहरहितो मुक्तो भवति पार्वति। भुक्तिमुक्तिद्वयं तस्य जिह्वाग्रे च सरस्वती॥१६५॥

🔷 समुद्र में जिस तरह से जल ,दुग्ध में दुग्ध ,घृत में घृत, घड़े का आकाश घड़े के फूट जाने से बाह्याकाश में मिल जाता है, उसी तरह से आत्मा परमात्मा में मिल जाती है॥ १६२॥ इसी तरह से ज्ञानी जीवात्माएँ परमात्मा चेतना में लीनता का अनुभव करती हैं। इस एकता के कारण ही ज्ञानी दिन- रात आनन्द में निमज्जित रहता है॥ १६३॥ इस तरह सक ज्ञानी सदा जीवन मुक्त होकर वास करता है, जो साधक प्रयत्नपूर्वक उसकी भावभक्ति करता है, वह सन्देह रहित होकर मुक्त होता है। उसे भोग एवं मोक्ष दोनों ही मिलते हैं, उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है॥ १६४- १६५॥

🔶 भगवान् सदाशिव के इन वचनों में न केवल गुरूगीता के पाठ का महत्त्व है, बल्कि पाठ करने वाले को भी महत्त्वपूर्ण बताया गया है। जो गुरूगीता की शरण में है, उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रहती। बस सद्गुरू की मूर्ति, चित्र के सामने पंचोपचार पूजन के पश्चात् पाठ करने की आवश्यकता है। इस पाठ से सभी संकटों का नाश होता है। आपत्तियाँ दूर होती हैं। सद्गुरू की कृपा मिलती है एवं चित्त में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश होता है। यह कथन केवल शाब्दिक नहीं है, बल्कि इसमें अर्थ की गहनता समायी है। जो भी गुरूगीता की साधना करते हैं, अथवा करेंगे, उन्हें इसकी अनुभूति होने में कोई सन्देह नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 187

रविवार, 3 जून 2018

👉 गुरुगीता (भाग 123)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी

🔶 गुरूगीता के महामंत्रों के मनन से शिष्य का त्राण होता है। इसका विधानपूर्वक पाठ करने से साधक के अस्तित्त्व में मंत्रयोग की सम्पूर्ण प्रक्रियाएँ घटित होती हैं। और फिर प्रारम्भ हो जाती है- अन्तस् के रूपान्तरण की आध्यात्मिक प्रक्रिया। यह सच उनको सहज में समझ आने योग्य है, जो मंत्र के वैज्ञानिक महत्त्व से परिचित हैं। मंत्र में प्रधान महत्त्व शब्दों के गुँथे होने की रीति का है। इसके अर्थ की भावना श्रेयस्कर तो है, पर इसके बिना भी मंत्र अपना चमत्कार दिखाए बिना नहीं रहते। वैसे यदि मंत्र रटन के साथ अर्थ चिन्तन जुड़ जाए, तो सोने में सुगन्ध वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। हालाँकि ऐसा न होने पर भी अकेली मंत्ररटन अपने चमत्कारों की सुनहरी चमक को बरकरार रखती है।

🔷 मंत्रों को रटने या मन ही मन उच्चारित करने से इसके सूक्ष्म कम्पन न केवल देह, प्राण व स्न्नायुमण्डल की प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं, बल्कि अस्तित्व की गहनता भी इनसे प्रेरित व परिवर्तित होती है। यह ऐसा अनुभव है, जो उन सभी को प्राप्त होता है, जो मंत्र के साधक हैं। इस साधना की प्रगाढ़ता में चित्त की वृतियाँ मंत्र की चेतना में विलीन होने लगती हैं और फिर क्रमिक रूप से चित्त मंत्र तदाकार होता है। बाद में यह तादात्म्य मंत्र के अधिदेवता से होते हुए मंत्र की सामर्थ्य के अनुसार परमात्म चेतना से हो जाता है। शाबर, डामर आदि क्षुद्र मंत्रों की बात छोड़ दे, तो गायत्री महामंत्र के साथ इस प्रक्रिया को घटित होते हुए अनुभव किया जा सकता है।

🔶 गुरूगीता- माला मंत्र है। माला मंत्रों का पाठ किए जाने की परम्परा है। इस पाठ करने से साधक के अन्तरतम में पहले गुरूतत्व की अनुभूति होती है। जिन्हें अभी तक गुरू की प्राप्ति नहीं हुई है, वे इसकी साधना से अपने सद्गुरू को पहचान सकते हैं, पा सकते हैं। जिन्हें सद्गुरू तो मिले हैं, परन्तु जो अभी अपनी देह में नहीं हैं, गुरूगीता की पाठ साधना उन्हें उनके गुरू से संवाद सुलभ करा सकती है। विधानपूर्वक यदि सहस्त्र पाठ भी हो सके, तो भी ऐसा करने वाले साधक की चेतना सूक्ष्म संकेत अवतरित होने लगती है। साधना सतत बनी रहे ,, तो साधक न केवल गुरूतत्त्व का साक्षाकार करता है, बल्कि उसे गुरूतत्त्व एवं परमात्मतत्त्व की एकरसता का भी बोध होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 186

बुधवार, 30 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 122)

👉 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

🔷 ऐसा ही एक अनुभव भक्तिमती नारी गंगाबाई का है। गंगाबाई भगवान् के परम भक्त लाखाजी की बेटी थी। भक्त लाखाजी विशेष पढ़े तो नहीं थे, परन्तु गुरूगीता उन्हें कंठस्थ थी। भगवान् में उनका अगाध विश्वास था। इनकी दो सन्ताने थी- एक पुत्र, एक कन्या। पुत्र का नाम देवा और कन्या का नाम गंगाबाई था। पुत्र के विवाह के दो साल बाद उन्होंने कन्या का विवाह कर दिया। लाखाजी नियम से गुरूगीता के ११ पाठ एवं शिव सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। उनके पुत्र एवं कन्या को भी गुरूगीता से प्रगाढ़ अनुराग हो गया था।

🔶 न मालूम प्रारब्ध के किस संयोग से कैसे दिन बदल जाते हैं? गंगाबाई के पति को सर्प ने काट लिया। सर्प के काटने से उसकी तत्क्षण मृत्यु हो गयी। पुत्री के जीवन की इस त्रासदी की खबर लाखाजी को लगी। उन्होंने यह बात अपनी पत्नी, पुत्र व पुत्रवधु को बतायी। सभी इस शोक समाचार को सुनकर व्याकुल हो गए। लाखाजी ने सभी को सम्भाला और पुत्री को सान्त्वना देने के लिए उसकी ससुराल पहुँचे। ससुराल पहुँचने पर उन्हें भारी अचरज हुआ। बात भी अचरज की थी। उन्होंने देखा कि उनकी भक्तिमती पुत्री बड़े शान्त एवं स्थिर भाव से अपने सास- श्वसुर को प्रबोध दे रही है। उसकी इन बातों से सास- ससुर शान्त चित्त हो रहे थे।

🔷 गंगाबाई की यह स्थिति देखकर लाखाजी ने पूछा -बेटी! तेरी ऐसी स्थिति देखकर मैं चकित हूँ। मैं तो यहाँ तरह- तरह के विचार करके आया था कि तुझे धीरज बंधाऊँगा। परन्तु तेरे ज्ञान ने तो मुझे चकित कर दिया है। तुझे यह ज्ञान आया कहाँ से?

🔶 गंगाबाई ने कहा- पिता जी यह सब आपकी दी हुई सीख का फल है। आप के सान्निध्य में मैंने गुरूगीता कंठस्थ कर ली थी। बचपन से ही गुरूगीता का पाठ, इसके विधिवत अनुष्ठान मेरा नियम बन गया था। इस साधना को मैंने कभी भी नहीं छोड़ा। इसी का प्रभाव है कि आपके जामाता की मृत्यु के तीन दिन पहले भगवान् ने मुझे स्वन्प में दर्शन देकर कहा- बेटी! तेरे पति की आयु पूरी हो चुकी है, यह मेरा भक्त हे। तेरे साथ उसका पूर्वजन्म का संयोग शेष था। इसी से उसने जन्म लिया था। अब इसे तीन दिन बाद साँप डसेगा। उस समय तू उसे गुरूगीता सुनाती रहना। ऐसा करने से इसका कल्याण होगा। मैं तुझे सच्चा वैराग्य और ज्ञान प्राप्त होगा।

🔷 पिताजी इतना कहकर भगवान् भोलेनाथ अन्तर्ध्यान हो गए। मैं जाग पड़ी, मानों उसी समय से मुझे ज्ञान का परम प्रकाश मिल गया। मैं सारे शोक- मोह छोड़कर पति के कल्याण में लग गयी। मैंने व्रत धारण किया और रातो जागकर पति को गुरूगीता एवं शिव सहस्त्रनाम सुनाती रही। तीसरे दिन जब पतिदेव सूर्य को अर्ध्य दे रहे थे, उसी समय अचानक एक कालसर्प ने आकर उनके पैर को डस लिया। देखते- देखते उनके प्राण पखेरू उड़ गए। मैंने देखा कर्पूरगौर भगवान् सदाशिव उनके सम्मुख विद्यमान हैं। इस दृश्य ने गुरूगीता पर मेरी आस्था बढ़ा दी। अब आप मेरी सहायता कीजिए कि भगवान् सदाशिव की भक्ति कर सकूँ। पुत्री के इस अनुभव को सुनकर पिता को रोमांच हो आया। सचमुच ही गुरूगीता से सच्चा ज्ञान सहज सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 184

मंगलवार, 29 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 121)

👉 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

गुरूपुत्रो वरं मूर्खस्तस्य सिद्ध्यन्ति नान्यथा। शुभकर्माणि सर्वाणि दीक्षाव्रततपांसि च॥ १५६॥
संसारमलनाशार्थं भवपाशनिवृत्तये। गुरूगीताम्भसि स्न्नानं तत्त्वज्ञः कुरूते सदा॥ १५७॥
स एव च गुरूः साक्षात् सदा सद्ब्रह्मवित्तमः। तस्य स्थानानि सर्वाणि पवित्राणि न संशय॥ १५८॥
सर्वशुद्धः पवित्रोऽसौ स्वभावाद्यत्र तिष्ठति ।। तत्र देवगणाः सर्वे क्षेत्रे पीठे वसन्ति हि॥ १५९॥
आसनस्थः शयानो वा गच्छंस्तिष्ठन् वदन्नपि। अश्वारूढो गजारूढः सुप्तो वा जाग्रतोऽपि वा॥ १६०॥
शुचिमांश्च सदा ज्ञानी गुरूगीता जपेन तु। तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६१॥

🔶 गुरूपुत्र मूर्ख होने पर भी वरण के योग्य है। इससे भी कराए गये दीक्षा- तप आदि व्रत एवं अन्य शुभ कर्म सिद्ध होते हैं, वृथा नहीं होते ॥ १५६॥ गुरूगीता के महामंत्रों से स्न्नान संसार के मल को धोने वाला है, इससे भवपाशों से छुटकारा मिलता है॥ १५७॥ जो गुरूगीता के जल से स्न्नान करता है, वह सभी ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ एवं सदागुरू होता है। वह जिस किसी स्थान में निवास करता है, वह स्थान पवित्र होता है, इसमें कोई संशय नहीं है॥ १५८॥ सर्वशुद्ध एवं पवित्र गुरूदेव जहाँ भी स्वाभाविक रूप से निवास करते हैं, वहाँ सभी देवों का निवास होता है॥ १५९॥ गुरूगीता का जप करने वाला पवित्र ज्ञानी पुरूष बैठा हुआ, सोया हुआ, जाता हुआ, खड़ा हुआ, बोलता हुआ, अश्व की पीठ पर आरूढ़, हाथी पर आरूढ़, सुप्त अथवा जाग्रत् सर्वदा विशुद्ध होता है। किसी भी अवस्था में उसका दर्शन करने से पुनर्जन्म नहीं होता॥ १६०- १६१॥

🔷 भगवान् शिव की इस अमृतवाणी में गुरूगीता के अनुष्ठान का महत्त्व है। गुरूगीता का जप- पाठ साधक को सच्चा शिष्य और सच्चे शिष्य को गुरूपद पर आरूढ़ करता है। ऐसा साधक हमेशा ही गुरूकृपा, ईश्वरकृपा के सान्निध्य में रहता है। उसके अन्तःकरण में भगवद्कृपा हिलोरे लेती है। गुरूगीता का यह महत्त्व केवल सिद्धान्त ,विचार या कल्पना न होकर सारभूत अनुभव है। इसे उन्होंने पाया, जिन्होंने गुरूगीता की साधना की। जो इसकी कृपा छाँव में बैठकर तप करते रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 183

👉 गुरुगीता (भाग 121)

👉 गुरूगीता से मिलता है ज्ञान का परम प्रकाश
🔷 गुरूगीता के महामंत्रों का अवतरण जिसके अन्तस् में हुआ, समझो वहाँ आध्यात्मिक प्रकाश की धाराएँ बरस गयीं। उसे सद्गुरू कृपा व ईश्वर कृपा का वरदान मिल गया। जिनके अन्तःकरण में आध्यात्मिक भावों का उदय होता है, उनमें यह चाहत भी जगती है कि सद्गुरू का सान्निध्य मिले ,ईश्वर की कृपा मिले। पर कैसे? इसकी विधि उन्हें नहीं मालूम होती। इस विधि के अभाव में पल्ले पड़ती है, तो सिर्फ भटकन ,उलझन और संत्रास। परन्तु जो गुरूगीता के आध्यात्मिक प्रभावों की समझ रखते हैं, वे बड़ी ही आसानी से इससे उबर जाते हैं। गुरूगीता की कृपा जिन्हें प्राप्त है, उन्हें भटकन, उलझन के कंटक नहीं चुभते। इसके अनुष्ठान से उनकी सभी आध्यात्मिक उलझने अन्तःकरण में स्वयमेव फूट पड़ते हैं।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी महत्त्व को बताया गया है। इसमें कहा गया है कि गुरूगीता का जप- पाठ ,अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु, शिव सभी के उपासकों को सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है। भगवान् शिव ने माता से कहा- हे सुमुखि! अब मैं तुम्हें गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है। भगवती का मंदिर ,गौशाला अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गए हैं ।। पवित्र निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप अनुष्ठान करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 182

शुक्रवार, 25 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 120)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔷 इस प्रसंग में बड़ी भक्ति पूर्ण कथा है। यह कथा दक्षिण भारत के प्रभु भक्त वेंकटरमण की है। भक्त वेंकटरमण तुंगभद्रा तट पर बसे रंगपुरम के रहने वाले थे। बचपन से ही उन्हें भगवत् चरणों में अनुराग था। यज्ञोपवीत संस्कार के समय उन्हें गायत्री मंत्र मिला। यह मंत्र उन्हें उनके कुलगुरू ने दिया था। हालाँकि उन्हें तलाश थी उन आध्यात्मिक गुरू की, जो उन्हें ईश्वर साक्षात्कार करा सके। मन की यह लगन उन्होंने बड़ी विनम्रता पूर्वक अपने कुलगुरू को कह सुनायी। बालक वेंकटरमण की बात सुनकर कुलगुरू कुछ समय तो शान्त रहे, फिर बोले -वत्स यह कार्य तो क केवल सद्गुरू प्रदान कर सकते हैं। तुम्हें उनकी प्राप्ति के लिए गुरूगीता का अनुष्ठान करना होगा। वेंकटरमण ने कुलगुरू की इन बातों पर बड़ी आस्था से कहा- आचार्य! यदि हम पवनपुत्र हनुमान को अपना गुरू बनाना चाहें तो क्या यह सम्भव है। अवश्य वत्स! कुलगुरू ने बालक की श्रद्धा की सम्बल दिया।

🔶 बस, उस दिन से बालक वेंकटरमण हनुमान जी की मूर्ति के सामने गायत्री जप एवं गुरूगीता के पाठ में तल्लीन हो गया। नित्य प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठना, स्नान, संध्या, तर्पण से निश्चित होकर हनुमान् जी की मूर्ति के सामने गायत्री मंत्र का जप एवं गुरूगीता का पाठ करना। वेंकटरमण का सह क्रम नित्यप्रति छः घण्टे चलता रहता। कभी- कभी वेंकटरमण चाँदनी रात में तुंगभद्रा के तट पर एकान्त में बैठकर गुरूगीता के श्लोकों का पाठ करने लगते, तब ऐसा मालूम होता कि उनके रोम- रोम से ही गुरूगीता मंत्रों की किरणें निकल रही हैं। इस प्रकार इस कठिन साधना में उनके ग्यारह वर्ष बीत गये।

🔷 बारहवें वर्ष के चैत्र शुक्ल पूर्णिमा की आधी रात तुंगभद्रा के बालुकामय तट पर बासन्ती बयार के झोंके के बीच में, वन्य पुष्पों के पराग की मधुरता के बीच वेंकटरमण रामभक्त हनुमान् का ध्यान करते हुए गुरूगीता का पाठ करने लगे। पाठ करते- करते उन्हें समाधि लग गयी। समाधि में उन्होंने देखा कि असंख्य वानरों की सेना के साथ हनुमान् जी आ रहे हैं। धीरे- धीरे वे सभी वानर पता नहीं कहाँ अदृश्य हो गये, बस रह गये केवल हनुमान् जी। उन्होंने बड़ी स्नेह भरी दृष्टि से वेंकटरमण को देखा और उसके चरणों में गिर गये और तभी उन्हें लगा श्री हनुमान् जी उनके हृदयपट पर अपनी तर्जनी अंगुली से स्वर्णाक्षरों में गायत्री मंत्र लिख रहे हैं और कह रहे हैं- उठो वत्स! मैं ही तुम्हारा गुरू हूँ। सचमुच गुरूगीता में क्या कुछ सम्भव नहीं। असम्भव को सम्भव करने वाली है इसकी महिमा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 180

👉 गुरुगीता (भाग 119)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव माता जगदम्बा से कहते हैं-

जपेत् शाक्तश्च सौरश्च गाणपत्यश्च वैष्णवः। शैवश्च सिद्धिदं देवि सत्यं सत्यं न संशयः॥१५१॥
अथ काम्यं जपे स्थाने कथयामि वरानने। सागरे वा सरित्तीरेऽथवा हरिहरालये॥ १५२॥
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे। वटे च धात्रिमूले वा मठे वृंदावने तथा॥ १५३॥
पवित्रे निर्मले स्थाने नित्यानुष्ठानतोऽपि वा। निवेदनेन मौनेन जपमेतं समाचरेत् ॥ १५४॥
श्मशाने भयभूमौ तु वटमूलान्तिके तथा। सिध्यन्ति धत्तूरे मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ॥ १५५॥

🔷 गुरूगीता का जप- पाठ अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु ,शिव के उपासकों को भी सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है इसमें कोई संशय नहीं है॥ १५१॥ भगवान् शिव माँ से कहते हैं- हे सुमुखि! अब मैं तुमसे गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है॥ १५२॥ भगवती का मंदिर, गौशाला, अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गये हैं॥ १५३॥ पवित्र, निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप- अनुष्ठान करना चाहिए॥ १५४॥ इस अनुष्ठान के लिए श्मशान, भयानक स्थान ,बरगद, धूतर या आम्रव़ृक्ष के नीचे का सुपास भी श्रेष्ठ कहा गया है॥१५५॥

🔶 भगवान् शिव के इन वचनों में गुरूगीता अनुष्ठान के विविध रहस्य हैं। इन रहस्यों में प्रमुखता है- साधना भूमि का अपना वातावरण होता है। अच्छा हो कि यह वातावरण साधना के लक्ष्य के अनुरूप हो। सात्विक लक्ष्य के लिए नदी, सागर उपयुक्त है, तो वैराग्य के उन्मेष के लिए ठीक है। इनमें से किसी स्थान का चयन साधक को अपनी मनोभूमि और अपने लक्ष्य के अनुसार करना चाहिए। स्थान उपयुक्त हो, लक्ष्य स्पष्ट हो, तो गुरूगीता की साधना साधक के सभी मनोरथों को पूरा करने वाली है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 179

बुधवार, 23 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 118)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔷 गुरूगीता के मंत्र गीत शिष्यों की प्राणचेतना में गूँजते हैं। प्राणों में निरन्तर होती इनकी अनुगूँज से उन्नयन, विकास एवं रूपान्तरण की अनेकों प्रक्रियायें घटित होती हैं। हालाँकि ये चमत्कारी प्रक्रियायें एवं परिणतियाँ होती उन्हीं के जीवन में हैं, जिनके अंतःकरण में शिष्यत्व का भाव बीज अंकुरित हो रहा है। अथवा जिनके अंतस् में किसी न किसी रूप में इसकी अवस्थिति व उपस्थिति है। बीज के सच को, इसके यथार्थ को हम सभी जानते हैं। कंकरीली- पथरीली जमीन की तहों में दबा हुआ बीज मौसम आने पर अंकुरित हुए बिना नहीं रहता। यह बीजांकुर भले ही कितना कोमल और नाजुक हो, फिर भी बड़ी आसानी से उस कंकरीली- पथरीली जमीन को भेदकर खुली हवा और सूर्य के उजाले
में अपने अस्तित्व की अमिट पहचान बताता है।

🔶 ठीक यही स्थिति शिष्य के बीज की है। शिष्य की अंतर्चेतना में, उसकी चित्त भूमि में इसकी उपस्थिति यदि है, तो समझो कि आध्यात्मिक जीवन की सम्भावनाएँ भी हैं। फिर भले ही यह बीज चित्त की कितनी ही गहरी तहों या परतों में क्यों न दबा हुआ हो। कामना, वासना अथवा लालसाओं के कितने ही कुसंस्कार इसे क्यों न घेरे हुए हों, परन्तु सही काल आने पर इसका अंकुरण सुनिश्चित है। इसी के साथ उन कुसंस्कारों की कालिमा का मिटना भी अनिवार्य है, जो इसे बाँधे है। श्रीमद्भगवद्गीता के महानायक परमगुरू योगेश्वर श्री कृष्ण का वचन- 'न मे भक्तः प्रणश्यति' मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता- त्रिकाल सत्य है। सतयुग त्रेता, द्वापर अथवा कलयुग के कालक्रम का इस पर कोई फर्क नहीं होता। सच्चा गुरूभक्त, सच्चा शिष्य अपने गुरू की कृपा से जीवन के परम लक्ष्य को पा ही लेता है।

🔷 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी यथार्थ की चर्चा की गयी थी। इसमें बताया गया था कि भोग हो या मोक्ष अथवा फिर आपदा निवारण गुरूगीता के अनुष्ठान से सब कुछ सम्भव है। आयु- आरोग्य, अचर सौभाग्य, दुःख, भय, विध्न एवं शापों का नाश गुरूगीता की साधना करने वाले को स्वयमेव मिलते हैं। इसकी साधना सभी बाधाओं का शमन करके धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष देने वाली है। यहाँ तक कि साधक जो- जो भी इच्छा करता है, वे सभी इच्छाएँ इससे निश्चित ही पूरी होती हैं। गुरूगीता का पाठ कामना पूर्ति के लिए कामधेनु है, कल्पनाओं की साकार करने वाला कल्पतरू है। यह चिंताओं को दूर करने वाली चिंतामणि है। इससे सभी तरह का मंगल होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 177

👉 गुरुगीता (भाग 117)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔶 यह कथा पंजाब प्रान्त के सन्त बाबा लाल के बारे में है। बाबा लाल बड़े पहुँचे हुए फकीर थे। उनकी अलौकिक शक्तियों एवं यौगिक विभूतियों के कारण न केवल सामान्य जन, बल्कि पीर- फकीर एवं शाहजादे, बादशाह भी अभिभूत रहते थे। शाहजहाँ का बड़ा बेटा दाराशिकोह भी उनका भक्त था। इस बात से कम लोग वाकिफ हैं कि वह अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मिलने के पहले से वह बाबा लाल जी से मिला था। वह इन्हें लालपीर जी कहा करता था।

🔷 शाहजादा दाराशिकोह का मन सूफियाना था। उसे परमात्मा से सच्ची लगन थी। बाबा लाल से मिलकर उसने अपनी ख्वाहिश बयान की कि आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिए। बाबा लाल जी ने उसकी ओर देखा और बोले -दारा! तुझे तेरे मुर्शीद मिलेंगे। इसके लिए गुरूगीता का पाठ किया कर। दाराशिकोह उन दिनों उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कर रहे थे। उन्होंने बाबा लाल की बात मान कर गुरूगीता का पाठ प्रारम्भ किया। इसके प्रभाव से उन्हें अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मुलाकात हुई। दारा एवं सरमद जैसे एक- दूसरे के लिए बने थे। हालाँकि सरमद से मिलने के बाद भी दारा ने बाबा लाल की भक्ति नहीं छोड़ी। ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि दाराशिकोह ने बाबा लाल से सात बार मुलाकातें कीं। इन मुलाकातों में उन्होंने बाबा लाल से अनेकों सवाल किये। दाराशिकोह द्वारा किये गये प्रश्न एवं बाबा लाल द्वारा दिये गये जवाब वास्तव में आध्यात्मिकता का खजाना है। जिन्हें शाहजहान में वजीर राय मुंशी चन्द्रभान विरहमनज् ने फारसी में लिपिबद्ध करने का महान् कार्य किया। जो इसरारे मार्फत या इसरारे गुलजार या नादिरूलनुकात के नाम से प्रसिद्ध है।

🔶 इतिहास इस बात की गवाही देता है कि औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा के साथ बड़ा ही बर्बर एवं अमानवीय बर्ताव किया। और अंत में उन्हें और उनके बेटे का कत्ल करा दिया। यहाँ तक कि उसने सूफी फकीर सरमद को भी मरवा दिया। इसके बाद वह अपने अहं एवं अकड़ के साथ बाबा लाल जी से मिलने गया। बाबा लाल जी उसे देखकर मुस्कराये। औरंगजेब ने उन्हें व्यंग्यपूर्वक प्रणाम् किया और पूछा- महराज वैसे तो आप कई सिद्धियों के मालिक हैं, फकीर सरमद के बारे में लोग कुछ ऐसा ही कहा करते थे। परन्तु किसी ने दाराशिकोह की मदद नहीं की। आपकी कोई सिद्धि और साधना उसके काम नहीं आयी। बेचारा बेमौत मारा गया!

🔷 बाबा लाल जी औरंगजेब की बात सुनकर हँसे और बोले- औरंगजेब तू मगरूर है और अंधा भी। तेरा भाई दारा दरवेश था, उसे किसी भी राज्य की कोई इच्छा नहीं थी। वह तो बस अपने पिता की रक्षा करना चाहता था। तूने जो उसके साथ बर्बरता का व्यवहार किया है, उसकी सजा तो तू उम्र भर भोगेगा। जिस तरह साँप अपनी केंचुली को छोड़कर यह नहीं सोचता कि उसकी केंचुली का क्या किया जायेगा, उसी प्रकार सच्चा दरवेश अपने बाहरी जीवन की चिंता नहीं किया करते। दारा ने भी अनेक कष्ट एवं यातना सहकर महातप किया और आज वह खुद की रहमतों फरिश्तों का बादशाह है। तू देखना चाहता है तो देख- ऐसा कहते हुए बाबा लाल ने औरंगजेब को स्पर्श किया। इस स्पर्श के साथ औरंगजेब रूहानी दुनिया में पहुँच गया और उसने दारा के आध्यात्मिक वैभव को देखा। उसे अपने किये पर बड़ी शर्म आई। आँख खुलने पर उसने बाबा लाल जी से माफी माँगी। लेकिन प्रत्युत्तर में बाबा ने कुछ नहीं कहा। क्रूर औरंगजेब को अपने मन के कोने में कहीं इसका अहसास जरूर हुआ होगा कि गुरूभक्ति एवं साधना कर्म निरर्थक नहीं होती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 175

मंगलवार, 22 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 116)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔷 इस प्रकरण को विस्तार देते हुए भगवान् भोलेनाथ पराम्बा माँ भगवती से कहते हैं-

आयुरारोग्यमैयश्वर्यपुत्रपौत्रप्रवर्धनम्। अकामतः स्त्री विधवा जपान्मोक्षमवान्पुयात् ॥ १४६॥
अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि। सर्वदुःखभयं विध्नं नाशयेच्छापहारकम्॥ १४७॥
सर्वबाधाप्रशमनं धर्मार्थकाममोक्षदम्। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्॥ १४८॥
कामितस्य कामधेनुः कल्पनाकल्पपादपः। चिन्तामणिः चिंतितस्य सर्वमङ्गलकारकम्॥१४९॥
मोक्षहेतुर्जपेत् नित्यं मोक्षश्रियमवाप्नुयात्। भोगकामो जपेद्यो वै तस्य कामफलप्रदम्॥१५०॥

🔶 गुरूगीता के विधिपूर्वक अनुष्ठान से आयु आरोग्य ऐश्वर्य एवं पुत्र- पौत्रों की वृद्धि होती है। विधवा स्त्री यदि निष्काम भाव से इसका पाठ करे, तो उन्हें मोक्ष मिलता है॥१४६॥ यदि वे सकाम भाव से पाठ करें, तो उन्हें अगले जन्म में अचल सौभाग्य की प्राप्ति होती है। गुरूगीता के पाठ से सभी दुःख, भय, विध्न एवं शापों का नाश होता है॥ १४७॥ इसकी साधना सभी बाधाओं का शमन करके धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष देने वाली है। यहाँ तक कि साधक जो- जो भी इच्छा करता है, वे सभी इच्छाएँ इससे निश्चित ही पूरी होती है।। १४८॥ यह गुरूगीता का पाठ कामना पूर्ति के लिए कामधेनु है। कल्पनाओं को साकार करने वाला कल्पतरू है। यह चिुंताओं को दूर करने वाली चिंतामणि है। इससे सभी का सब तरह से मंगल होता है॥१४९॥ मोक्ष की इच्छा से जो इसका पाठ करता है, उसे मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। भोग की इच्छा से पाठ करने वाले को मनवांछित भोग मिलते हैं॥१५०॥

🔷 भगवान् शिव के इन वचनों में गहरी सार्थकता एवं रहस्यमयता है। कई बार सामान्य जन इसकी रहस्यमयता के कारण गुरूगीता की साधना की सार्थकता नहीं समझ पाते। उन्हें लगता है, जो साधना में तत्पर है, उन्हें भला इतने कष्ट क्यों मिलते हैं। गुरूभक्त शिष्यों पर इतनी अधिक विपत्तियाँ क्यों आती हैं? सत्पथ पर चलते हुए उन्हें इतने ज्यादा संकटों का सामना क्यों करना पड़ता है? जबकि दुर्गुणी -दुराचारी लोगों को उनकी तुलना में ज्यादा सुख- भोग उठाते देखा जाता है। इन बातों के अटपटे रहस्यों का भेद करने में इन साधारण लोगों की बुद्धि हतप्रभ रह जाती है। उन्हें इस आध्यात्मिक उलटबासी में न कोई सार्थकता नजर आती है और न कोई यथार्थता। ऐसे लोग सदा- सदा अपने बौद्धिक प्रपंचों में उलझे रहकर साधना, तपस्या एवं सत्कर्मों से दूरी बनाये रखते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 174

रविवार, 20 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 115)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔶 गुरूगीता के गायन से शिष्यों को मन चाहे वरदान मिलते हैं। लेकिन जो शिष्य है, उसके मन में केवल एक चाहत जगती है- अपने सद्गुरू से मिलन की चाहत। जिसे सांसारिक कामनाएँ ,वासनाएँ एवं लालसाएँ छूती हैं, समझो वह अभी शिष्य नहीं ।। हाँ, इतना जरूर है कि इस पाप पंक में फँसे हुए लोगों पर भी गुरू भक्त शिष्यों का दया आती है। दयावश वे इनकी मदद भी करते हैं। परन्तु सांसारिक कामनाओं के कीचड़ में वे कभी भी फँसना- उलझना नहीं चाहते हैं। यही वजह है कि कई बार ऐसे सांसारिक लोग इन सच्चे गुरूभक्तों को असफल मान लेते हैं। वे इनकी आध्यात्मिक विभूतियों को समझ ही नहीं पाते। उन्हें अनुमान ही नहीं हो पाता कि गुरूगीता का गायन करने वाले इन गुरूभक्त शिष्यों के आध्यात्मिक रहस्य क्या है और कितने हैं? यदि उनके जीवन में साधनाओं के साथ परेशानियाँ भी हैं तो इनके कारण क्या हैं?

🔷 गुरूगीता गाथा के पिछले क्रम में इस सत्य का सांकेतिक उल्लेख किया गया है। इसमें बताया गया है कि गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी प्राणियों को छुटकारा मिलता है। इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है, गुणों में बढ़ोत्तरी होती है। गुरूगीता की यह साधना दुरूकर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है। इस साधना से सभी असाध्य कार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वप्नों का फल नष्ट होता है, बन्ध्या स्त्री भी इस साधना से पुत्रवती बनती है। इस साधना के द्वारा स्त्रियाँ अपने सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 173

शनिवार, 19 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 114)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔷 एक बड़ी ही प्यारी अनुभूति कथा है। समर्थ गुरू रामदास के शिष्य स्वामी कल्याण गोदावरी नदी से कुछ कोस दूर एक गाँव में ठहरे हुए थे। अपने सद्गुरू के नाम की अलख जगाते हुए सत्प्रवृत्तियों का प्रसार करना उनका व्रत था। जय- जय रघुवीर समर्थ, को उच्चस्वर से पुकारते हुए जब वह ग्राम वीथियों से गुजरते ,तो लोग बरबस उन्हें घेर लेते। उनके पास आश्चर्यजनक सिद्धियाँ तो नहीं थीं, पर गुरूकृपा का बल था। अपने गुरू पर उनका सम्पूर्ण विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी। उनकी भक्तिपूर्ण बातें लोगों में चेतना की नयी लहरें पैदा करती।

🔶 ग्रामवासी स्वामी कल्याण के वचनों से आह्लादित थे। उन्हें जीवन की नयी दिशा मिल रही थी। परन्तु रूढ़िवादी साधु और कई तांत्रिक उनकी इन बातों से प्रसन्न नहीं थे, क्योंकि कल्याण स्वामी के वचनों ने जन जीवन में इतनी जागृति पैदा कर दी थी कि इन सभी का व्यवसाय बन्द होने लगा था। कर्म के सिद्धान्त पर विश्वास करने लगा जन- जीवन सत्कार्यों में प्रवृत्त होने लगा था। चमत्कारों की ओछी बाजीगरी से उसे उकताहट होने लगी थी। जन मानस की यह स्थिति अपने को सिद्ध कहने वाले तांत्रिकों को रास नहीं आयी। उन्होंने कल्याण स्वामी के प्रति अनेकों षड्यंत्र रचने शुरू कर दिये। वे सब मिलकर किसी भी तरह जन- जीवन की नजर में उन्हें अप्रमाणिक एवं अयोग्य साबित करना चाहते थे।

🔷 जब उनके सामान्य उपक्रम असफल साबित हुए, तो उन्होंने अपनी चमत्कारी सिद्धियों का सहारा लिया। इन सिद्धियों के बल पर उन्होंने गाँव के तालाबों, कुआँ, बावड़ियों का जल सुखा दिया। इस तांत्रिक अत्याचार से सामान्य जनता पानी के लिए तरसने लगी। मनुष्य एवं पशुओं का जीवन बिना पानी के विपन्न हो गया। बिलखते बच्चे ,परेशान गृहणियों की जिन्दगी दूभर हो गयी। परेशान गाँववासी कल्याण स्वामी के यहाँ गये। पर वे करते भी क्या? उनके पास ऐसी कोई सिद्धि नहीं थी, जिससे समस्या का हल हो सके। इधर इन कु्रर तांत्रिकों ने उनका और उनके गुरू का अपमान करना प्रारम्भ कर दिया। गाँव वालों को जितना सम्भव था।

🔶 कल्याण स्वामी के लिए स्वयं के अपमान का तो कोई मोल नहीं था, पर गुरू का अपमान उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ। ग्रामीण जनों की दुर्दशा भी उनसे देखी न गयी। आखिर में उन्होंने गुरूगीता एवं गुरूमंत्र का आश्रय लेने की सोची। ग्रामवासियों के कल्याण के लिए उन्होंने कठिन उपवास करते हुए गायत्री महामंत्र से सम्पुटित करके गुरूगीता का अनुष्ठान प्रारम्भ किया। प्रगाढ़ तप में उनके दिन बीतते ।। प्रार्थना में उनकी रातें व्यतीत होतीं। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। एक रात प्रार्थना करते समय उनकी भाव चेतना समर्थ सद्गुरू के चरणों में विलीन होने लगी। उनके हृदय में बस एक ही आर्त पुकार थी, हे सद्गुरू! इन निर्दोष ग्रामीण जनों की रक्षा करो।

🔷 भक्त की पुकार गुरूदेव अनसुनी न कर सके। उनकी परावाणी कल्याण स्वामी की अंतर्चेतना में गूँज उठी, चिंता न कर, माँ गोदावरी से प्रार्थना कर, उनको मेरा संदेश देना, उन्हें कहना मेरे गुरू ने आपको ग्रामीण जनों के कल्याण के लिए आमंत्रित किया है। समर्थ गुरू का यह विचित्र सा संदेश कल्याण स्वामी को ठीक से समझ नहीं आया। फिर भी वे अपने गुरूभक्ति की धुन में माँ गोदावरी के पास गये और उन्होंने गुरू का संदेश सुनाते हुए ग्रामवासियों का जल संकट दूर करने के लिए प्रार्थना की। इतना ही नहीं गोदावरी से एक लकीर खींचते हुए गाँव में आ गये।

🔶 उनके उस कार्य का तांत्रिकों ने बड़ा मजाक उड़ाया। लेकिन सबको आश्चर्य तो तब हुआ, जब उन्होंने देखा कि पानी से खाली गाँव कुएँ, तालाब, बावड़िया फिर से पानी से भर गये हैं। माँ गोदावरी प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं बहती रही, किन्तु उनकी अंतर्धारा ने गाँव आकर सबका कष्ट दूर कर दिया। गाँव वालों ने गुरूभक्ति का यह प्रत्यक्ष चमत्कार देखा और उन सबने स्वीकार किया, किसी भी मांत्रिक- तांत्रिक सिद्धि से गुरूभक्ति की सिद्धि बड़ी है। गुरूभक्ति से बड़कर न तो कोई सिद्धि और न शक्ति।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 171

शुक्रवार, 18 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 113)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् शिव माँ भगवती से कहते हैं-

🔷 मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवराजप्रियकरं सर्वलोकवशं भवेत्॥ १४२॥
सर्वेषां स्तम्भनकरं गुणानां च विवर्धनम्। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्मसिद्धिदं भवेत्॥१४३॥
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयावहम्। दुःस्वप्रनाशनं चैव सुस्वन्पफलदायकम्॥ १४४॥
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वंध्यासुपुत्रदम्। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं सदा॥१४५॥

🔶 गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी बन्धनों से छुटकारा मिलता है इससे देवराज की प्रीति मिलती है और सभी लोकों के प्राणी वश में होते हैं॥१४२॥ इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है। गुणों की अभिवृद्धि होती है। गुरूगीता की यह साधना दुष्कर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है॥ १४३॥ इस साधना से असाध्यकार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वन्पों का फल नष्ट होता है, सुस्वप्नों का सुफल मिलता है॥ १४४॥ इस साधना से नित्य सभी प्रकार की शान्ति होती है, वन्ध्या स्त्री इस साधना के द्वारा पुत्रवती बनती है। स्त्री इस साधना द्वारा अपने वैधव्य का निवारण करके सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती है॥ १४५॥

🔷 भगवान् शिव के ये वचन संसार के असह्य कष्टों से संतप्त जनों के लिए गुरू उपदेश के समान है। इनके अनुसरण से मनुष्य न केवल स्वयं विपत्तियों से छूट सकता है, बल्कि औरों की भी सार्थक सहायता कर सकता है। बस गुरूगीता की सुखद् छाँव में आश्रय लेने भर की बात है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 170

गुरुवार, 17 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 112)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔷 गुरूगीता गुरूभक्त शिष्यों के लिए कल्पतरू है। इसकी छाँव तले सांसारिक सुख- सम्पदाएँ, आध्यात्मिक ऐश्वर्य, मोक्ष सभी कुछ मिलता है। गुरूगीता के सविधि अनुष्ठान से बड़े से बड़े दुस्तर संकट कटते हैं। असहनीय पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है। श्रद्धा हो, शिष्यत्व हो, सद्गुरू का आश्रय हो, तो गुरूगीता से असम्भव- सम्भव बन पड़ते हैं। विन्घ- बाधाएँ सांसारिक हों या आध्यात्मिक गुरूगीता से सभी का निराकरण ,समाधान सम्भव है। इसी कारण सभी महासिद्धों, सत्पुरूषों ने इसे चमत्कारों का सारभूत पुंज कहा है। जो इसका आश्रय लेते हैं, उनके जीवन में निराशाएँ हटती हैं एवं आशाओं की किरणें झिलमिलाती हैं।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी सत्य की सार प्रस्तुति की गयी है। भगवान् सदाशिव ने गुरूगीता के मर्म को बताने के साथ भगवती जगदम्बा को अनुष्ठान में आसन की महिमा से अवगत कराया है। शिव वचनों के अनुसार वस्त्रासन पर साधना करने से दरिद्रता आती है। पत्थर पर साधना करने से रोग होते हैं। धरती पर बैठकर साधना करने से दुःख होते हैं, काष्ठासन पर की गयी साधना निष्फल होती है। जबकि काले हरिण के चर्म पर साधना करने से ज्ञान मिलता है, व्याघ्र चर्म पर की गयी साधना मोक्षदायक है। कुश का आसन ज्ञान को सिद्ध करता है, जबकि कम्बल पर बैठकर साधना करने से सर्वसिद्धियाँ मिलती हैं। इस कथन के साथ ही भगवान् भोलेनाथ का उपदेश यह है- अपना कल्याण चाहने वाले साधक को गुरूगीता का अनुष्ठान कुश, दूर्वा अथवा श्वेत कम्बल के आसन पर बैठकर करना उचित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 169

👉 गुरुगीता (भाग 111)

👉 साधना से सिद्धि में आसन व दिशा का भी महत्त्व

🔶 गुरूगीता के इन मंत्रों की रहस्य वाणी उनके लिए अति उपयोगी है, जो साधना विज्ञान पर विशेष अनुसंधान के उत्सुक हैं। इसकी वैज्ञानिकता को वे अपने प्रयोगों से चरितार्थ कर सकते हैं। इस संदर्भ में महाराष्ट्र के संत वामन पण्डित का प्रसंग बड़ा ही मर्मस्पर्शी है। वामन पण्डित समर्थ रामदास के समकालीन थे। इनका जन्म बीजापुर में हुआ था एवं विद्याध्ययन काशी में। काशी में रहते ही भगवान् विश्वनाथ की कृपा से इनकी साधना रूचि तीव्र हुई। परन्तु साधना की तीव्र इच्छा के बावजूद इनका संकल्प बार- बार टूट जाता था। मन भी सदा अशान्त रहता। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? कई बार तो ये अपनी स्थिति से इतना खिन्न हो जाते कि अंतस् हताशा से भर जाता। मन सोचता कि जो जीवन उद्देश्य प्राप्ति में निरर्थक है, उसे रखकर ही क्या करें। इस निराशा के कुहासे में कोई मार्ग न सूझता था। जप तो करते, पर मन न लगता, साधना बार- बार भंग हो जाती। लिए गये संकल्प दीर्धकाल न चल पाते। एक- दो दिन में ही इनकी इतिश्री हो जाती। कुछ प्रारब्ध भी विपरीत था और कुछ निराशा का असर इनका शरीर भी रोगी रहने लगा। आखिर एक दिन इनका धैर्य विचलित हो गया और इन्होंने सोचा कि आज अपने आपको माँ गंगा में समर्पित कर देंगे।

🔷 इस निश्चय के साथ ही वे गंगा के मणिकर्णिका घाट पर आ विराजे। बस, अंधकार की प्रतीक्षा थी कि अँधेरा हो और चुपके से देह का विसर्जन कर दें। अपने इन चिंतन में डूबे वे भगवान् से प्रार्थना कर रहे थे- हे प्रभो! मैं चाहकर भी इस देह से तप न कर सका। हे प्रभु ! अगले जन्म में ऐसा शरीर देने की कृपा करना, जो साधना करने में समर्थ हो। ऐसा मन देना हे मेरे स्वामी ! जिसकी वृत्तियाँ तप में विध्नकारी न हों। श्री वामन पण्डित अपनी प्रार्थना के इन्हीं भावों में लीन थे। उनकी आँखों से निरन्तर अश्रुपात हो रहा था। सूर्यास्त कब अँधेरे में बदल गया, उन्हें पता ही न चला। उनकी चेत तो तब आया, जब एक वृद्ध संन्यासी ने उन्हें सचेत किया।

🔶 उन संन्यासी महाराज के चेताने से इनकी आँखें खुलीं। आँखें खुलने पर इन्होंने देखा कि उन वयोवृद्ध संन्यासी का दाया हाथ इनके सिर पर था और वे कह रहे थे कि धैर्य रखो वत्स ! साधना में बाधाएँ आना स्वाभाविक है, पर तुम्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें बीजमंत्र का उपदेश देता हूँ। इसका नियमित जप करो। परन्तु यह जप तुम्हें कुश के आसन पर बैठकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना होगा। इस तरह से जप करने से न केवल तुम्हें शान्ति मिलेगी, बल्कि ज्ञान की प्राप्ति भी होगी। श्री वामन पण्डित ने उन संन्यासी महाराज के निर्देश के अनुसार साधना प्रारम्भ की। शीघ्र ही उनकी साधना सिद्धि में बदल गयी। उन्होंने अध्यात्म तत्त्व पर अनेक ग्रंथों का सृजन किया। अंतस् के सभी विक्षेप स्वतः ही गहन शान्ति में बदल गये। उन्हें साधना के उपचार की महत्ता के साथ गुरू के महत्त्व का बोध हो गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 167

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...