शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026


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👉 सन्तोष की साँस लें आशावान् रहें।

यह संसार अपूर्ण है। उसके सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि वह अपूर्णता से पूर्णता की ओर चल रहा है। मनुष्य भी अपूर्ण है और उसकी क्रमिक प्रगति पूर्णता की दिशा में हो रही है। इतना मानकर ही संतोष किया जा सकता है और आगे बढ़ने का उत्साह संजोये रखा जा सकता है।

प्रकृति मनुष्य से बड़ी है और पुरानी भी। फिर भी उसे पूर्णता का सौभाग्य प्राप्त नहीं है। हर साल वर्षा आती है और धरती को हरी भरी बनाकर चली जाती है किन्तु ग्रीष्म आते आते वह सारी हरीतिमा सूख जाती है जिसे वर्षा ने जमीन पर कोमल कालीन की तरह बिछा दिया था। वर्षा एक हाथ से जमीन को देती है दूसरे हाथ से उसकी मिट्टी और खनिज सम्पदा को बहा कर समुद्र में धकेल जाती है। धरती यदि वर्षा के अनुदानों को सौभाग्य मानती होगी तो सुखी रहती रहेगी और यदि उसने उपकार वाले पक्ष को प्रधानता दी तो फिर उसका रोना कल्पना बन्द नहीं हो सकेगा।

सुखी मनुष्य वह है जो अपनी वर्तमान उपलब्धियों पर सन्तोष करके ईश्वर को धन्यवाद देता है और साथ ही अधिक पाने तथा अधिक बढ़ने के लिए खिलाड़ी जैसे प्रयत्न जारी रखता है। कौन ऐसा है जिसे सदा सफलता ही मिलती हो? कौन ऐसा है जिसे प्रियजनों का विछोह न सहना पड़ा हो। किस की सब मनोकामनाएँ पूरी हो सकी है? चैन की जिन्दगी किसने काटी है? जीवन का स्वरूप ही ऐसा है कि उसमें खोने और पाने का सिलसिला चलता बने। अगला कदम आगे बढ़ता है तो पीछे वाला अपनी जगह खाली करता है। इसे खोने और पाने की ही गति कहते हैं। लम्बी मंजिलें इसी तरह पूरी होती हैं। जिसे पाने की खुशी मनाने की आदत नहीं-जो गया उसी पर पश्चाताप करना जिसे आता है, वह प्रगति के हर कदम पर अपेक्षाकृत खिन्न ही होता चला जाएगा ।

भविष्य के गर्भ में क्या है? कौन जानता है? विपत्ति के पहाड़ टूट सकते हैं और सफलताओं के सुख साधन भी जुट सकते हैं। जब सब कुछ अनिश्चित ही है तो भयानक विभीषिकाओं की कल्पना करके उद्विग्न रहने की क्या आवश्यकता? फिर सुखद सम्भावनाओं के सपने गढ़ने में ही क्या हानि है? उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशावान् रहना, यही है सुख का सबसे बड़ा स्त्रोत। वर्तमान की समीक्षा करते समय यदि उसे करोड़ों से अच्छा अनुभव कर सके तो वह यथार्थता ही सदा मुसकान बनाये रह सकती है। इसके विपरीत यदि सर्वतोमुखी होने पर शान्ति पाने के लिए आकुल रहेंगे तो खिन्नता और उद्विग्नता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगेगा।

कुरूपता से तुलना करने पर ही सौंदर्य की उत्कृष्टता प्रकट होती है। सर्दी के कारण ही गर्मी की-महत्ता का बोध होता है, अभावों के कारण भावों का सुख मिलता है। रात्रि से तुलना करने पर दिन का आनन्द मिलता है। विछोह के कष्ट की अनुभूति ही मिलन को सरस बनाती है। असफलताओं की स्मृति में ही सफलता के महत्व का पता चलता है। यदि प्रतिकूलता और अनुकूलता में से एक ही रह जाय तो फिर यहाँ सरसता और आनन्द जैसी कोई वस्तु शेष न रह जायगी।

श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा रखें, प्रगति की आशा करें, प्रभात की कल्पना करें, उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास रखें तो ही जीवन को सुखी बनाने वाली किरणें उमंगों को जीवित रख सकेंगी। निराशा तो मृत्यु है। वर्तमान को दुःखपूर्ण और भविष्य को अंधकारयुक्त मानकर हम केवल दुःख पाते हैं, विनाश को न्यौता देते हैं और आग्रहपूर्वक अकाल मृत्यु के मुख में घुसते हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1977 

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👉 प्रेम के अभाव ने ही हमें प्रेत पिशाच बनाया है। (भाग 1)

प्रेम के अभाव में हमारी सत्ता पृथक और अकेली रह जाती है मानव अपने को निस्सहाय महसूस करते हैं। अहं का भाव उभरकर प्रधान बनता है। स्वार्थ का विकास होने लगता है। वह अपने तक ही सीमित रहता है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में बन्द हो जाता है। इस प्रकार की संकीर्णता की गति मृत्यु की ओर अग्रसर होती है। जीवन तो पारस्परिकता में है संबंधों में है जितनी पारस्परिकता एवं आत्मीयता बढ़ेगी उतना ही जीवन खिलेगा विकसित होगा उत्कृष्ट होगा।

प्रेम का तत्व सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है किन्तु कही अधिक और कही कम। अपनत्व सभी में स्थित है पशु पक्षी मानव आदि सभी अपने का प्यार कतरे है। डाकू दूसरों की हत्या करता है किन्तु अपनी तथा अपने बाल बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखता है। हिंसक सिंह भी पशुओं का भक्षण करता है। किन्तु अपनी सिंहनी के प्रति प्रेम का ही व्यवहार करता है विकराल सर्प दूसरों के लिए काल है किन्तु अपनी नागिन के लिये प्रेम विह्वल है। यदि प्रेम या निजत्व न हो तो सृष्टि ही नष्ट हो जावे।

आत्मा और परमात्मा एक ही है तुलसीदास जी ने कहा है ईश्वर अंश जीवन अविनाशी “समुद्र की लहर समुद्र से भिन्न नहीं है, छटाकाश आकाश से भिन्न नहीं है। वैसे ही आत्मा परमात्मा से भिन्न नहीं है। आत्मा से ही आत्मीयता शब्द बना है जो आत्म का भाव वाचक नाम है। इसी को निजत्व अपनत्व कहते हैं यही प्रेम है। यदि दूसरे शब्दों में कहें तो इस प्रकार कह सकते हैं कि मैं सर्व सत्ता से पृथक और अन्य नहीं हूँ आत्मा परमात्मा सर्वव्यापक है। यह हम भूल जाते है और अपने को पृथक अकेला रात लेते हैं। लहर अपने को समुद्र से पृथक कहे तो यह उसका अज्ञान ही है। जो व्यक्ति आत्म सर्वभूतेषु देखता है वही समझदार और पण्डित है। जब वह आत्मनः प्रतिकूलानि न समाचरेत्। का व्यवहार करता है वही प्रेम का प्रकाशन है। जितनी प्रेम की व्यापकता में वृद्धि करता जायेगा उतना ही अहं अथवा मैं का घेरा कम होता जाएगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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