रविवार, 3 सितंबर 2017

👉 आज का सद्चिंतन 3 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Sep 2017


👉 ब्रह्म साक्षात्कार क्यों नहीं होता? (भाग 2)

🔵 पूजा, उपासना, नियम, साधना के पथ पर दृढ़ता रखकर बढ़ने वाले अनेकों साधक मिला जायेंगे जो कठोरतम चेष्टाएँ जारी रखते है किन्तु अपने आपका समर्पण करने वाले साधक बहुत ही कम दिखाई देते है। यह ही ब्रह्म साक्षात्कार के पथ का रहस्य है। अक्सर मनुष्य उस प्रियतम, परमात्मा के मिलन पथ में भी कृपणता करता है और अपने आपको स्वयं के हाथों में ही रखना चाहता है। दूसरों के-उस विराट के हाथों में नहीं देना चाहता? कठोर साधनाओं और व्रत पालन में वह प्राण पण चेष्टा जारी रखता है अपनी साधना का हिसाब लगाकर एक विशेष अभिमान पूर्ण आनन्द के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का मूल्यांकन करता है।

🔴 तुच्छ मनुष्य केवल अपनी शक्ति, सामर्थ्य साधना के बल पर उस विश्वात्मा के साथ व्यापार नहीं कर सकता। उस अनन्त अखण्ड, सर्वव्यापक को नहीं जान सकता और न उसकी अनुभूति हो प्राप्त कर सकता हैं इनके साथ-साथ उसे अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसके लिए निवेदित, उत्सर्ग करना ही पड़ेगा। बिना इसके सिद्धि प्राप्त नहीं होगी और तभी प्रभु मिलन का पथ सहज सुगम और लघु बन जायेगा। उसकी दिव्य अनुभूति, हमारे हृदय में उसी तरह आलोकित हो उठेगी जैसे प्रातः होते ही सूर्य की प्रकाश किरणों से विश्व भुवन प्रकाशित हो उठता है। उसके लिए तब कोई कठिन साधना नहीं करनी पड़ती है।

🔵 ब्रह्म प्राप्ति के लिए हमें अपने आपको देना होगा। उन्होंने तो अपने आपको दे डाला। सर्वव्यापी प्रभु सर्वदा सर्वत्र ही हमारे भीतर बाहर व्याप्त है। हमारे अन्दर अभाव है, हम संकीर्णता का बना पहने हुए है, मैं और ममत्व की रंगीन ऐनक लगाये हुए हैं इसी लिए उनके पुण्य मिलन से हम दूर है। हमने नाना प्रकार के स्वार्थ अहंकार, क्षुद्रता के कठिनतम घेरों में अपने आपको आबद्ध कर लिया है जहाँ अपनी स्वतन्त्र सत्त को देखते है, किन्तु प्रभु मिलन के मार्ग को यही तो कठिन बनाये हुए है और हमें उस की अनुभूति से वंचित रखते है। इसी कमी के कारण हम कठिन साधनाएँ करते हुए भी देर तक विश्वात्मा, ब्रह्म की झलक नहीं पाते।

🌹 क्रमशः
🌹 श्री स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1961 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/April/v1.11

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