सोमवार, 22 जनवरी 2018

👉 चाबी का गुच्छा

🔷 रेवती जैसी बहू पा कर मनोरमाजी निहाल हो गई थीं। रूप, गुण, व्यवहार में अव्वल रेवती ने सहर्ष घर की बागडोर थाम ली थी। लेकिन उसे अपनी अलमारी की चाबी का गुच्छा देते हुए आखिर क्यों मनोरमाजी का दिल दहल उठता और दिल में तरहतरह के विचार उठने लगते थे?

🔶 मनोरमाजी अलसाई सी उठीं। एक जोरदार अंगड़ाई ली, हालांकि उठने में काफी देर हो गई थी जबकि वे भरपूर नींद सोई थीं। बेटे की शादी हुए 2 ही दिन हुए थे। महीनों से वे तैयारी में लगी थीं और अभी भी घर अस्तव्यस्त सा ही था। सोचा, उठ कर चाय बना लें। बहू को अपने हाथों से चाय पिलाने की इच्छा से जैसे उन के अंदर चुस्ती आ गई। वे किचन की ओर बढ़ी ही थीं कि ट्रे में चाय के कप को सजाए बहू आती दिखी। साथ में प्लेट में बिस्कुट भी रखे थे।

🔷 ‘‘चलिए मम्मी, साथ बैठ कर चाय पीते हैं। कितनी थकीथकी सी लग रही हैं।’’ पलभर को तो मनोरमाजी अवाक् रह गईं। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि शादी के 2 दिन बाद बहू स्वयं रसोई में जा कर चाय बना लेगी और उन्हें साधिकार पीने को भी कहेगी। चाय पीतेपीते उन्हें याद आया कि आज तो बहू पगफेरे के लिए मायके जाएगी।

🔶 ‘‘बेटा, कितने बजे आएंगे तुम्हारे भाई तुम्हें लेने?’’ ‘‘मम्मी, शाम तक ही आएंगे। आप बता दीजिए कि क्या बनाना है? और मम्मी, मायके भी तो कुछ ले कर जाना होगा।’’ ‘‘ठीक है, देखते हैं। तुम चिंता मत करो। मैं सब तैयारी कर दूंगी। तुम जा कर तैयार हो जाओ। अभी 2 दिन हुए हैं तुम्हारी शादी को, अभी से काम की टैंशन मत लो। आसपड़ोस की औरतें और रिश्तेदार भी आएंगे तुम्हारी मुंह दिखाई करने। कम से कम हफ्तेभर तो यह सिलसिला चलेगा,’’ मनोरमाजी ने अपनी बहू रेवती से कहा।

🔷 थोड़ी देर बाद रेवती तैयार हो कर आ गई। ‘कितनी सुंदर लग रही है,’ मनोरमाजी ने मन ही मन सोचा। नैननक्श, गठन और स्वभाव सब नपेतुले हैं। लगता ही नहीं कि उसे 2 ही दिन हुए हैं इस घर में आए, कितनी जल्दी घुलमिल गई है सब से। ‘‘मम्मी, जरा चाबी तो देना। खाने का सामान, नई क्रौकरी वगैरह निकालनी है। मैं चाहती हूं कि भैया के आने से पहले ही सारी तैयारी कर लूं, ताकि फिर आराम से बैठ कर गपें मारी जा सकें,’’ रेवती ने बहुत ही सहजता से कहा।

🔶 सुनते ही मनोरमाजी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। आते ही उन के चाबी के गुच्छे पर अधिकार जमाना चाहती है पर प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोलीं। मना भी नहीं कर सकती थीं, इसलिए चाबी दे दी। जब से वे इस घर में ब्याह कर आई थीं, पहली बार उन्होंने किसी को चाबी दी थी। मन में तरहतरह के विचार आने तो स्वाभाविक थे।

🔷 ‘‘अब आप निश्ंिचत हो कर बैठिए। मैं सब मैनेज कर लूंगी। शादी की वजह से कितनी थक गई हैं आप,’’ रेवती ने चाबी का गुच्छा उन से लेते हुए कहा। रसोई से खटरपटर की आवाजें आती रहीं। बीचबीच में रेवती पूछती भी जाती कि फलां चीज कैसे बनेगी या फलां चीजें कहां रखी हैं। वे अपने कमरे में बैठीबैठी जवाब देती रहीं, पर जब देखा कि बहू की मदद करने बेटा भी रसोई में पहुंच गया है तो उन्हें वहां जाना ही पड़ा।

🔶 बहू ने 10-12 डिश बनाने के लिए सामान निकाला हुआ था। उन के सब से कीमती क्रौकरी और कटलरी सैट टेबल पर लगे हुए थे। यहां तक कि अपने सामान से उस ने टेबल मैट्स निकाल कर भी सजा दिए थे। उन का नया कुकर, कड़ाही और करछियां भी धोपोंछ कर करीने से रखे हुए थे। किचन के स्लैब पर भी सामान बिखरा हुआ था। इतना फैलाव देख कर उन्हें पलभर को कुढ़न तो हुई पर रेवती के चेहरे पर छाई खुशी और जोश को देख कर वे कुछ बोली नहीं।

🔷 चाबी का गुच्छा बहू की कमर में लटक रहा था। उन का मन हुआ कि वे उसे मांग लें, पर हिम्मत ही नहीं हो रही थी। इतनी सारी चीजें बनातेबनाते दोपहर के 3 बज गए थे।
‘‘मम्मी, अब आप जा कर थोड़ी देर आराम कर लीजिए और हां, ये आप की चाबियां,’’ रेवती ने जैसे ही उन्हें चाबियों का गुच्छा थमाया, उन्होंने उसे ऐसे पकड़ लिया मानो कोई बहुत कीमती चीज उन के हाथ में आ गई हो। शाम को रेवती का भाई, भाभी, बच्चे, उस की छोटी बहन सब आए। हर थोड़ीथोड़ी देर बाद वह उन से चाबी मांगती, ‘‘मम्मी, जरा यह निकालना है, चाबी दीजिए न…फलां चीज तो निकाली ही नहीं, निकाल देती हूं। मेरी ससुराल में भैया पहली बार आए हैं, उन पर अच्छा इंप्रैशन पड़ना चाहिए।’’ वे चाबी का गुच्छा अवश्य उसे देतीं पर जब तक उन्हें वापस नहीं मिल जाता, उन का सारा ध्यान उसी पर अटका रहता।

🔶 सेवासत्कार में शाम हो चली थी। रेवती अपने भैया के साथ मायके के लिए प्रस्थान कर गई। अगले दिन उन का बेटा नीरज रेवती को उस के मायके से ले आया। वह उन से गले लग कर ऐसे मिली मानो उन से पलभर की जुदाई बरदाश्त न हो। मनोरमाजी को रेवती का उन पर इस तरह स्नेह उड़ेलना बहुत अच्छा लग रहा था। पर भीतर से उन्हें यह बात भी तंग कर रही थी कि कहीं रेवती उन के चाबी के गुच्छे पर अधिकार कर उन की सत्ता को ही चुनौती न दे दे।

🔷 रेवती का यों खुले मन से इस घर को अपनाना उन्हें बहुत खुशी दे रहा था लेकिन एक तरफ जहां उन्हें रेवती का चुलबुलापन और उस की स्मार्टनैस अच्छी लग रही थी वहीं दूसरी ओर डरा भी रही थी। कितने ही घरों में वे ऐसा होते देख चुकी थीं कि बहू के आते ही बेटा तो पराया हो ही जाता है साथ ही, बहू सास को भी बिलकुल कठपुतली बना देती है।

🔶 मार्केट में उस दिन कांता ने भी तो उन्हें सतर्क किया था, ‘संभल कर रहना, मनोरमा, अब बहू आ गई है। आजकल की ये लड़कियां बिलकुल मीठी छुरी होती हैं, लच्छेदार बातों में फंसा कर सब हथिया लेती हैं। तुम तो वैसे ही इतनी सीधी हो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हें वह घर से ही बाहर कर दे।’
मनोरमाजी जब भी रेवती को देखतीं या उस के व्यवहार से खुश होतीं, उन का दिल यह सब मानने को तैयार नहीं होता था। रेवती उन का बहुत ध्यान रखती थी और उचित मानसम्मान देती थी।

🔷 ‘‘मम्मी, आज शाम को घूमने चलेंगे,’’ सुबह ही रेवती ने उन्हें बता दिया था। उन्हें लगा कि कहीं पिक्चर वगैरह या डिनर का प्रोग्राम होगा इसलिए पिं्रटेड सिल्क की साड़ी पहन वे तैयार हो गईं। ‘‘अरे मम्मी, यह साड़ी नहीं चलेगी। हम लोग डिस्को जा रहे हैं। चलिए, मैं देखती हूं कौन सी साड़ी ठीक रहेगी।’’

🔶 ‘‘लेकिन मैं डिस्को में जा कर क्या करूंगी। तुम लोग चले जाओ,’’ मनोरमाजी बोलीं। ‘‘ऐसे कैसे नहीं चलेंगी, मम्मी। एक बार चल कर तो देखिए, आप खूब ऐंजौय करेंगी।’’
‘‘हांहां, मम्मी, आप और पापा दोनों चलिए न। रेवती इतने प्यार से कह रही है तो मान लीजिए न,’’ नीरज ने भी जब कहा तो ना करने का सवाल ही नहीं उठता था।

🔷 ‘‘देखिए, यह नैट वाली साड़ी ठीक रहेगी। लेकिन इस के ब्लाउज की फिटिंग तो सही नहीं लग रही है। जरा स्टोर की चाबी तो दीजिए, मैं सिलाई मशीन निकाल कर इसे ठीक कर देती हूं।’’

🔶 रेवती ने फटाफट ब्लाउज ठीक कर दिया। सचमुच फिटिंग एकदम बढि़या हो गई थी। मनोरमाजी को बहुत अच्छा लगा, पर उस ने चाबी वापस नहीं की है, यह बात उन्हें खटक गई। डिस्को में जाने का मनोरमाजी का हालांकि यह पहला अनुभव था पर उन्होंने ऐंजौय बहुत किया। बीचबीच में उन्हें यह खयाल परेशान करने लगता कि बहू के पर्स में चाबी है।

🔷 घर लौट कर भी दिमाग में इसी परेशानी को ले कर वे सोईं। सुबह का चायनाश्ता सब रेवती ने तैयार कर दिया और वह भी बिना किसी गलती या देरी के। वे लगातार यही सोचती रहीं कि आखिर चाबी का गुच्छा मांगें कैसे, पता नहीं बहू उन के बारे में क्या सोचेगी या कहीं बेटे के ही कान न भर दे। अगली सुबह उन के कमरे में आ कर रेवती उन की अलमारी खोल कर बैठ गई।

🔶 ‘‘मम्मी, आप का आज वार्डरोब देखा जाए। जो बेकार साडि़यां हैं उन्हें हटा दें और जो ब्लाउज ठीक करने हैं वे भी ठीक कर के रख देती हूं।’’ मनोरमाजी उसे हैरानी से देखती रहीं। कहतीं भी तो क्या? कुछ देर खटरपटर करने के बाद वह बोली, ‘‘मम्मी, बहुत थक गई हूं, जरा चाय पिला दो।’’

🔷 चाय बना कर वे लौटीं और टे्र को कौर्नर टेबल पर रख दिया। चाबी का गुच्छा वहीं रखा हुआ था। उसे देखते ही उन की आंखों में चमक आ गई लेकिन सवाल यह था कि वे उसे उठाएं कैसे? तभी रेवती का मोबाइल बजा और वह बात करने के लिए अपने कमरे में चली गई। मनोरमाजी ने तुरंत चाबी का गुच्छा उठा लिया। अपनी अलमारी को ताला लगा दिया और निश्ंिचत हो काम में लग गईं। चाबी का गुच्छा हाथ में आते ही उन्हें लगा मानो जंग जीत ली हो।

🔶 उस के बाद से मनोरमाजी थोड़ा ज्यादा सतर्क हो गईं। रेवती चाबी मांगती तो वे चाबी देने के बजाय खुद वहां जा कर ताला खोल देतीं या उस के पीछेपीछे जा कर खड़ी हो जातीं और खुद आगे बढ़ कर ताला बंद कर देतीं। रेवती के प्यार और अपनेपन को देख मनोरमाजी का मन यह तो मानने को तैयार नहीं था कि वह उन का दिल दुखाने या अपमान करने का इरादा रखती है, इस के बावजूद जबजब वह उन से चाबी का गुच्छा मांगती, उन के अंदर एक अजीब सी बेचैनी शुरू हो जाती। फिर उसे मांगने का बहाना तलाशने लगतीं।

🔷 ‘‘बेटा, स्टोर से कुछ सामान निकालना है, जरा चाबी देना।’’ रेवती झट से कहती, ‘‘मम्मी, आप क्यों तकलीफ करती हैं। बताइए, क्या निकालना है, मैं निकाल देती हूं।’’ वह इतने भोलेपन से कहती कि मनोरमाजी कुछ कह ही नहीं पातीं।

🔶 एक दिन मनोरमाजी को कुछ काम से बाहर जाना पड़ा और जल्दीजल्दी में वे चाबी का गुच्छा अलमारी में ही लगा छोड़ आईं। सारा वक्त उन का दिल धड़कता रहा कि अब तो रेवती उसे निकाल कर अपने पास रख लेगी। जब वे घर लौटीं तो देखा अलमारी बंद थी और गुच्छा नदारद था। वे सोचने लगीं, न जाने मेरे पीछे से इस लड़की ने क्याक्या सामान निकाल लिया होगा? वैसे भी तो जबतब उन की ज्वैलरी निकाल कर वह पहन लेती थी।

🔷 ‘‘मम्मी, शाम को क्या खाना बनेगा? मैं और नीरज तो आज डिनर पर जा रहे हैं। आप का और पापाजी का ही खाना बनेगा,’’ रेवती मुसकराती हुई उन के सामने खड़ी थी।
‘‘रोटी, सब्जी ही बनेगी। तुम परेशान मत हो, मैं बना लूंगी,’’ मनोरमाजी ने कहा। पर उन की आंखें चाबी के गुच्छे को ढूंढ़ रही थीं। उस की कमर पर तो नहीं लटका हुआ था। फिर कहां है? आखिरकार रख ही लिया न इस ने। उन के मन में विचारों का तांता चल रहा था। पति ने पानी मांगा तो वे रसोई में आईं। देखा, स्लैब पर चाबी का गुच्छा पड़ा हुआ है।

🔶 जैसे ही उन्होंने अलमारी खोली तो उसे देख कर वे दंग रह गईं। अलमारी पूरी तरह व्यवस्थित थी। 5-6 मौडर्न ड्रैस, 4 लेटैस्ट डिजाइन की साडि़यां व स्वरोस्की और जरदोजी वर्क के 3 सूट करीने से हैंगर पर टंगे हुए थे। उन के गहने के डब्बे लौकर में एक लाइन से रखे हुए थे। अलमारी में परफ्यूम और डियो व कौस्मेटिक्स की नई रेंज भी रखी हुई थीं। सब से नीचे की दराज खोली तो देखा 2 जोड़ी नई चप्पलें रखी हैं।

🔷 ऐसा लग रहा था कि रेवती ने अपनी महीनों की कमाई से ये सारा सामान खरीदा था और उन की अलमारी की कायापलट की थी।

🔶 मनोरमाजी वहीं बैठ कर फूटफूट कर रोने लगीं। सब लोग घबरा कर उन के पास दौड़े आए। वे रोए जा रही थीं। पर किसी को बता नहीं सकती थीं और रेवती उन से ऐसे चिपक गई, मानो उस से ही कोई भूल हो गई हो। वह समझ ही नहीं पा रही थी कि अलमारी ठीक कर के उस से ऐसी कौन सी भूल हो गई कि मम्मी रोए जा रही हैं।
‘‘मैं बता नहीं सकती, मैं बता नहीं सकती…’’ मनोरमाजी लगातार यही कह रही थीं और उन का चाबी का गुच्छा एक कोने में पड़ा था।

👉 अपनी समस्याएँ आप सुलझायें

🔷 शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती, वरन् उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य नाश के यह प्रधान हेतु हैं जो लोग तन्दुरूस्ती पर अधिक ध्यान देते हैं, स्वास्थ्य के नियमों का ठीक तरह पालन करते हैं, वे मजबूत और निरोग बने रहते हैं। यूरोप अमेरिका के निवासियों के शरीर कितने स्वस्थ एवं सुदृढ़ होते हैं। हमारी तरह वे भाग्य का रोना नहीं रोते, वरन्ï आहार-विहार के नियमों का सख्ती के साथ पालन करते हैं, बुद्धि ओर विवेक का उपयोग निरोगता के लिए करते हैं, जिससे वे न तो बहुत जल्द बीमार पड़ते हैं, न दुर्बल होते हैं और न अल्पायु में मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं।
  
🔶 मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्द्वन्द रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है। किन्तु खेद है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकार-ग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ और आवेगों का भूकंप उसे अस्त-व्यस्त बनाये रहता है। स्थिरता, प्रसन्नता और सदाशयता का कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होता। ईर्ष्या, द्वेष और रोष, क्रोध की नष्टïकारी चिताएँ जलती और जलाती ही रहती हैं। लोग मानसिक विकारों, आवेगो और असद्विचारों से अर्ध विक्षिप्त से बने घूम रहे हैं। यदि इस प्रचंड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मन:शांति का महत्त्व समझने और नि:स्वार्थ निर्लोभ एवं निर्विकारता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते चलें, तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ सकते हैं।
  
🔷 भोगवाद की बढ़ती अतृप्त लालसा ने जन मानस को विशृंखलित बना दिया है। विकसित एवं विकासशील देशों में आये दिन होने वाली आत्महत्याओं और विभिन्न अपराधों में वृद्धि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आत्महत्या में अमेरिका व कनाडा का पहला स्थान है जबकि जापान दूसरे नम्बर पर है। विश्लेषण करने वाले कई प्रकार से इसका विवेचन कर सकते हैं, किन्तु यह सुनिश्चित है कि भोगवादी जीवन अध्यात्मवाद से परे होने के कारण कई प्रकार के संत्रास, विक्षोभ, तनाव एवं कष्ट सभी के लिए लाया है। आत्महत्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं, किन्तु विशेष कारणों में निराशा, पारिवारिक कलह, आर्थिक कठिनाई, शराब तथा अनीश्वरवाद की गणना की जाती है।
  
🔶 कहना न होगा कि यह सब कारण भौतिक भोगवाद की ही देन हैं। इतने कारोबारी तथा शक्ति संपन्न देश में निराशा का क्या कारण? क्या कारण है कि इन्हीं देशों में आत्महत्या करने के एक सौ पचास उपाय बातने वाली  ‘फाइनल एक्जीट’ नामक पुस्तक सर्वाधिक बिक्री वाली पुस्तक है। स्पष्ट है कि भोगवाद का अंत निराश में ही होता है। भोगवादी शीघ्र ही मिथ्या एवं नश्वर सुखों में अपनी सारी शक्तियाँ नष्ट कर डाला करते हैं, जिससे अकाल ही में खोखले होकर निर्जीव हो जाते हैं। ऐसी दशा में न तो उनके लिए किसी वस्तु में रस रहता है और न जीवन में अभिरुचि। स्वाभाविक है उन्हें एक ऐसी भयानक निराशा आ घेरे जिसके बीच जी सकना मृत्यु से भी कष्टकर हो जाये। पर मुसीबत यह कि उनके आसपास का भोगपूर्ण वातावरण उन्हें अधिकाधिक इष्र्यालु, चिंतित तथा उपेक्षित बनाकर जीने योग्य ही नहीं रखता और वे अनीश्वरवादी होने से, आत्मा-परमात्मा को भूले हुए कोई आधार न पाकर आत्महत्या के जघन्य पाप का ही सहारा लेते हैं।
  
🔷 भोगवाद, पूँजीवाद व साम्यवाद की मृगमरीचिका के टूटने के बाद अब अध्यात्मवाद ही एक मात्र मार्ग रह गया है, जो जन-जन के मनों को शांति दे सकता है। अध्यात्मवाद जीवन जीना सिखाता है। भोग करते हुए कैसे त्याग वाला जीवन जियें, इसके सूत्र हमें देता है। अच्छा हो हम समय रहते सँभलें, पाश्चात्य सभ्यता के आक्रमण से स्वयं को बचायें व अपनी संस्कृति के मूल तत्त्व अध्यात्म को जीवंत बनाए रखें।
  
🔶 आज की सारी समस्याओं का एक सामान्य हल है अध्यात्मवाद। यदि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये और अपना दृष्टिकोण सर्वथा आध्यात्मिक बना लिया जाये, तो सारी समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 Jan 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Jan 2018

🔶 अधिकांश मनुष्यों की मानसिक बनावट ऐसी होती है कि वे अपने आपको हर बात में निर्दोष मानते हैं। अपनी बुराइयां उसी प्रकार सूझ नहीं पड़ती जिस प्रकार अपनी आंख में लगा हुआ काजल दिखाई नहीं देता। कोई दूसरा व्यक्ति यदि अपनी गलती सुझावे भी तो मन इस बात के लिए तैयार नहीं होता कि उसे स्वीकार करे। हर आदमी दूसरे के दोष ढूंढ़ने में बड़ा चतुर और सूक्ष्मदर्शी होता है, उसकी आलोचना शक्ति देखते ही बनती है, पर जब अपना नम्बर आता है तो वह सारी चतुरता, सारी आलोचना शक्ति न जाने कहां गायब हो जाती है। जैसे खोटा व्यापारी खरीदने और बेचने के बांट तोल में घटे बढ़े बना कर अलग-अलग रखता है और बेचने के समय घटे बांटो को और खरीदने के समय बढ़े बांटो को काम में लाता है, उसी प्रकार दूसरों की बुराइयां ढूंढ़ने में हमारी दृष्टि अलग तरीके से और अपनी बात आने पर और तरीके से काम करती है। यदि यह दोष हटा दिया जाय और दूसरों की भांति अपनी बुराई भी देखने लग जायें, दूसरों को सुधारने की भी चिन्ता करने की भांति यदि अपने सुधारने की भी चिन्ता करने लगें तो इतना बड़ा काम हो सकता है जितना सारी दुनिया को सुधार लेने पर ही हो सकना संभव है।

🔷 जीवन लक्ष की पूर्ति के लिये भी सबसे प्रथम अनिवार्य रूप से आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार ही करना पड़ता है। भगवान का नाम स्मरण करने, जप-तप, पूजा-पाठ के अनुष्ठान करने का उद्देश्य भी यही है कि मनुष्य भगवान को सर्वव्यापी एवं न्यायकारी होने की मान्यता को अधिक गहराई तक हृदय में जमा ले ताकि दुष्कर्मों से डरे और सत्कर्मों में रुचि ले। ईश्वर उसी से प्रसन्न होता है जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, उसकी पूजा एवं प्रार्थना को वह सुनता और स्वीकार करता है। आत्मा पर चढ़े हुए मल आवरणों को हटाने के प्रयत्न का नाम ही तप साधना है उसे निर्मल निर्विकार बनाने में जितनी सफलता मिलती जाती है उतना ही देवत्व अन्दर बढ़ता जाता है और परमात्मा की समीपता निकट आती जाती है। विकारों से पूर्ण निर्मल हो जाने पर ही आत्मा जीवन-मुक्त होकर परमात्मा स्वरूप बन जाता है। आत्मोन्नति की यही एक मात्र प्रक्रिया है जिसे विभिन्न धर्म शास्त्रों ने, विभिन्न मार्ग दर्शकों ने देश काल के अनुसार विभिन्न रूपों में उपस्थित किया है।

🔶 अपने आपको सुधारने का प्रयत्न करना, अपने दृष्टिकोण में गहराई तक समाई हुई भ्रान्तियों का निराकरण करना मानव जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। हमें यह करना ही चाहिए। वरन् सबसे पहले सबसे अधिक इसी पर ध्यान देना चाहिए। अपना सुधार करके न केवल हम अपनी सुख-शान्ति को चिरस्थायी बनाते हैं वरन् एक प्रकाश स्तम्भ बन कर दूसरों के लिये भी अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित करते हैं। इस प्रयत्न को किसी भी बड़े पुण्य परमार्थ से, किसी भी जप-तप से कम महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 4)

🔷 उपर्युक्त कतिपय बातें तो अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व निर्वाह के सम्बन्ध में हैं। अब सबसे विस्तृत क्षेत्र आता है व्यवहार जगत। इस क्षेत्र में तो मनुष्य को अधिकाधिक सावधान तथा संयमित रहना चाहिए। यही वह क्षेत्र है जिसमें मनुष्य के असभ्य व्यवहारी होने की सबसे अधिक सम्भावना रहती है। आजकल विश्वासघात, दगाबाजी और वचनाघात अर्थात् कुछ कहना, कुछ करना, जो कुछ कहना उसे पूरा न करना एक सामान्य-सा चलन बन गया है। विश्वासघात अथवा वचनघात को पाप के स्थान पर चतुरता मानी जाने लगी है। लोग दूसरे के साथ विश्वासघात कर अपने को होशियार समझने लगे हैं। सोचते हैं कि काम बनाने को लोगों को इसी प्रकार बेवकूफ बनाया जाता है, जबकि अपने दिये वचन का पालन न करना, विश्वास देकर पूरा न करना बहुत ही भयानक पाप है।

🔶 सभी धर्मों और सभी शास्त्रों में इसकी घोर निन्दा की गई है। आचार्यों ने धर्म का मूल सत्य को ही माना है। विश्वास की रक्षा और वचन का पालन न करने वाले चाहे सौ जन्मों तक धर्म करते रहें तब भी वे उन्नति अथवा विकास की ओर एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकते। सत्य निष्ठा ही वह प्रथम सोपान है जिस पर चढ़कर ही कोई व्यक्ति धर्म की ओर, उच्चता और श्रेष्ठता की ओर, अध्यात्म तथा ईश्वर की ओर बढ़ सकता है। सत्य, लोक से लेकर परलोक तक के सारे धर्मों का मूल है। हर विषय, हर बात और हर व्यवहार में वास्तविक रूप में सच्चे रहने वाले व्यक्ति ही किसी दिशा में अपना यथार्थ आत्म-निर्माण कर सकते हैं।

🔷 सत्य और ईमानदारी जीवन की सर्वोपरि उत्तम नीति है। इसकी सर्वोपरिता का कारण यह है कि इसमें निष्ठा रखने वाले लोगों के लिये न तो भय होता है और न शंका। सत्यनिष्ठ पुरुषों के चरित्र में दीनता, दयनीयता और हीनता जैसे दुर्गुण नहीं आते। जो सच बोलता है, सत्य व्यवहार करता है, यथार्थ सोचता है और सबके प्रति ईमानदार रहता है, उसके लिये किसी भी प्रकार का डर हो भी कैसे सकता है? सत्यनिष्ठ पुरुष संसार में निर्भयतापूर्वक विचरण करता और सबसे असंदिग्ध व्यवहार करता हुआ आनन्द मनाया करता है। उसे न किसी से डरने की आवश्यकता होती है और न दबने की।

🔶 जो न किसी को धोखा देता है न किसी प्रकार की चोरी करता है, जितना जो कुछ कहता है उसे पूरा करता है। विश्वासघात और दगाबाजी जैसे जघन्य पापों से जिनकी आत्मा मुक्त है, जो न तो किसी के लिये दुर्भाव रखता है और न किसी को वंचित करने का प्रयत्न करता है। ऐसे सत्पुरुष को संसार में किसी भी देव, दानव अथवा मनुष्य से डरने का कारण भी क्या हो सकता है। डर का निवास तो असत्य और मिथ्यात्व में होता है। सत्यनिष्ठ सिंह पुरुष सदैव निर्भय और निर्भीक ही रहा करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.17

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

👉 Amrit Chintan 23 Jan

🔷 Scholars, what you can not achieve by long process of programming or lot of money you can earn do by elevating the emotional status of persons by your conduct  and behaviour. It is very important that the people should know the power of unity effect and sincerily to their duty must be attained at all cost. That is the key of success in life.
Our all collective efforts and advertisement of any level will not bring any positive result till the emotions don’t operate behind.
 
🔶 It is not only the civilization on earth which men have created, but he has also developed a world of his own inside virtues and higher values. Human life like love, service compassion, friendship devotion, worship and spiritual development is his creation which changes his personality in to devine entertainment. Comfort and luxury all he has developed for his happiness in life. And with all this a new world of bliss he can reach.

🔷 Most of the people living on this earth live with the materials in this life. Their satisfaction is of beastile nature. The life given to human being is the finest gift of the creator, and that is for attaining the honour of the superman of high ideality and emotions for the others.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 4)

🔷 प्राचीनकाल में ऋषि अपने आश्रम में लोगों को बुलाते थे और सत्संग की प्रेरणा देते थे, शिक्षा की प्रेरणा देते थे। सत्संग और शिक्षा की प्रेरणा के पश्चात् यही किया करते थे कि उनके शिष्यों की शिक्षा को परिष्कृत और परिपक्व किया जाय। व्यायामशाला में सिखाने के पश्चात् लोगों को अखाड़े में भेज दिया जाता है। अखाड़े में से निकलने के पश्चात् दंगल में भेज दिया जाता है। दंगल में कोई आदमी जाये ही नहीं, तो उसको मैं क्या कहूँगा? मिलिट्री का प्रशिक्षण किस तरह का होता है, आप जानते हैं क्या? मिलिट्री का प्रशिक्षण किसी आदमी को दिया जाय और वह यह कहे कि हम तो यहीं पर, इसी स्थान पर रहेंगे और दिन भर मिलिट्री की ट्रेनिंग दिया करेंगे। क्योंकि हमको छावनी में भर्ती किया गया है, इसलिए हम छावनी में ही निवास करेंगे। हम लड़ाई पर नहीं जायेंगे। छावनी में रहना आपको कैसे मंजूर होगा। आप छावनी में क्यों रहेंगे। छावनी में हमने आपको इसलिए रखा था और बंदूक चलाना आपको इसलिए सिखाया था कि लड़ाई के मोर्चे पर जब आवश्यकता होगी, तो आप लड़ाई के मोर्चे पर चले जायेंगे और लड़ना शुरू कर देंगे। लड़ाई के मोर्चे पर जाने के लिए हमको छावनी छोड़नी पड़ती है और बंदूक चलाना सिखाना पड़ता है।

🔶 मित्रो! स्थान विशेष पर जिनको हम संतों के आश्रम कहते हैं, जिनको हम गुरुकुल कहते हैं, जिनको हम सत्संग भवन कहते हैं, जिनको हम साधना भवन कहते हैं। उन स्थानों पर जाने और रहने की आवश्यकता केवल इसलिए है कि हम वहाँ से प्रेरणा लें और प्रकाश वितरित करें। वहाँ से प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करने के पश्चात् सारे समाज में चले जायें और वहाँ ज्ञान का प्रकाश फैलाएँ। मित्रो! हमें आपके लिए उसी प्राचीनकाल की परम्परा की पुनः स्थापना करनी पड़ रही है, उसे पुनः जाग्रत करना पड़ रहा है। हम ऐसे स्थान और आश्रम बनाने में यकीन नहीं करते, जहाँ आदमी को घर छोड़ करके बुला लिया जाय और वानप्रस्थाश्रम बना दिया जाय, सत्संग आश्रम बना दिया जाय और लोगों से यह कहा जाय कि अब आप जिंदगी भर यहीं रहिए। क्यों साहब! जिंदगी भर रह करके आप यहाँ क्या करेंगे? ज्ञान सीखेंगे। तो ज्ञान का क्या करेंगे? ज्ञान को कर्मयोग में परिणत कीजिए। ज्ञानयोग की सार्थकता इसी में है। ज्ञान अगर कर्मयोग में परिणत नहीं किया जाता है तो ज्ञान निरर्थक है। उस ज्ञान के परिणत नहीं किया जाता तो ज्ञान निरर्थक है। उस ज्ञान का कोई मतलब नहीं रह जाता।

🔷 साथियो! हमने आपको जो थोड़े समय तक शिक्षण दिया है, उस शिक्षण को आपको कर्तव्य रूप में परिणत करना चाहिए और क्रियारूप में परिणत करना चाहिए। अब आप यहाँ से विदा हो रहे हैं। जब भी हमको आवश्यकता होगी हम आपको दुबारा बुला लेंगे। इस समय हम जो आपको विदा कर रहे हैं, उसका एक ही उद्देश्य है—पीड़ा और पतन का निवारण। इसने समूची मानव जाति को तबाह कर डाला है। इसने सारे-के संसार को मूर्ख बना दिया, अंधकार में डुबो दिया है। इसे हमें मिटाना है। इस अंधकार और दर्द को, दुःख और पाप को मिटाना है। इसने भगवान के वरिष्ठ राजकुमार मानव जाति को पशुओं से भी गया-बीता, पापियों से भी गया बीता बना दिया है। अब करना यह पड़ेगा कि हम आपको वहाँ भेजेंगे जहाँ भूकम्प आया हुआ है। जहाँ बाढ़ आयी हुई है। जहाँ पतन छाया हुआ है। मैंने आपको हजार बार कहा है और लाख बार फिर कहूँगा कि मनुष्य के सामने जो गुत्थियाँ दिखाई पड़ती हैं, जो कुछ भी अशांति दिखाई पड़ती है, जो कुछ भी अभाव दिखाई पड़ता है और जो भी कुछ दुःख दिखाई पड़ता है, उसका और कोई कारण नहीं है। उसका एक ही कारण है कि मनुष्य अपनी विचारधारा को विकृत बना चुका है। विकृत विचार धारायें ही पतन का मुख्य कारण हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 21)

👉 समर्पण-विसर्जन-विलय

🔷 इन महामंत्रों  के प्रत्येक अक्षर से गुरु महिमा प्रकट होती है। इस महिमा में अपने को घुला-मिलाकर ही साधक की साधना सफल होती है। साधनामय जीवन की सर्वोच्च कक्षा की व्याख्या प्रस्तुत करनी हो, तो उसका सार यही होगा; साधक का सद्गुरु में समर्पण-विसर्जन-विलय। अनन्य चिंतन की निरन्तरता साधक के सद्गुरु में समर्पण को सुगम बनाती है। समर्पण की परमावस्था में साधक का समूचा अस्तित्व ही विलीन हो जाता है और तब आती है—विलीनता की अवस्था। इस भावदशा में शिष्य साधक का काय-कलेवर तो यथावत् बना रहता है, पर उसमें उसकी चेतना अनुपस्थित होती है। वहाँ उपस्थित होती है—उसके सद्गुरु की चेतना । वह दिखते हुए भी नहीं होता। होता है केवल उसका सद्गुरु।
  
🔶 जो गुरुभक्ति की डगर पर चलने का साहस करते हैं, उन्हें दो-चार कदम आगे बढ़ते ही बहुत से साधना सत्यों का साक्षात्कार होता है। वे जानते हैं कि सद्गुुरु ही साधक हैं, वही साधना है और अन्त में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं। यह कथन पहली बार में कबीर वचनों की उलटबाँसी जैसा भले ही लगे, पर थोड़ा सा ही चिंतन करने पर सब कुछ ठीक-ठीक समझ में आ जाता है। इस तत्त्व का सत्य बोध कुछ यूँ है-सद्गुरु ही साधक है, इस वाक्य का अर्थ यह है कि सामान्य देहधारी मनुष्य जब सद्गुरु की कृपा छाँव में आता है, तब वह शिष्य बनता है। उस शिष्य में गुरु जब अपने एक अंश को प्रतिष्ठित करते हैं, तब साधक के रूप में उसका नवसृजन होता है। इस तरह अपने शिष्य के काय-कलेवर में दरअसल सद्गुरु ही साधक के रूप में अवतार लेते हैं।
  
🔷 ‘सद्गुरु ही साधना है’ - इस वाक्य का भाव यह है कि साधना का परम दुर्गम पथ पार करना सद्गुरु की कृपा शक्ति के बिना सम्भव नहीं है। सद्गुरु की कृपा शक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। उसी के सहारे वह अपने साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सद्गुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है और तब उसे इस सत्य का बोध होता है कि सद्गुरु ही साध्य है; क्योंकि सद्गुुरु और इष्ट दो नहीं; बल्कि एक हैं। अपने गुरु ही गोविन्द हैं। वही सदाशिव और परमशक्ति हैं। ये सभी साधना के सत्य निरन्तर और लगातार सद्गुरु के अनन्य चिंतन से प्राप्त होते हैं।
  
🔶 प्रयत्नपूर्वक सद्गुरु की आराधना के सिवा शिष्य को कुछ भी करने की जरूरत नहीं। मन से सद्गुरु का चिंतन-स्मरण, हृदय से अपने गुरु की भक्ति, वाणी से उनके पावन नाम का जप और शरीर से उनके आदेशों का निष्ठापूर्वक पालन करने से समस्त दुर्लभ आध्यात्मिक विभूतियाँ, शक्तियाँ, सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाती है। गुरु ही ब्रह्म हैं, उनके वचनों में ही ब्रह्मविद्या समायी है। इस सत्य को जो अपने जीवन में धारण करता है, आत्मसात् करता है, अनुभव करता है, वही शिष्य है-वही साधक है। गुरु तत्त्व से भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है। इसे अनुभव करने के उपाय गुरु गीता के अगले मंत्रों में वर्णित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 39

👉 सत्य-तप और वैराग्य का समन्वय

🔶 सत्य की प्राप्ति-तपस्वी ही कर सकता है। शारीरिक और मानसिक प्रलोभनों से बचने में जिस तितीक्षा और कष्ट सहिष्णुता की-धैर्य और संयम की आवश्यकता पड़ती है, उसे जुटा लेने का नाम ही तप है। अकारण शरीर के सताने का नाम ही तप नहीं है। सताना तो किसी का भी बुरा है फिर शरीर को व्यथित और संतप्त करने से ही क्या हित साधन हो सकता है। तपस्या वह है जो सत्यमय जीवन लक्ष्य निर्धारित करने के कारण सीमित उपार्जन से निर्वाह करने की स्थिति में- गरीबी अथवा मितव्ययिता अपनानी पड़ती है। इसे प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार और शिरोधार्य करने का नाम तप साधना ही है।

🔷 सत्य रूप नारायण को प्राप्त करने का मूल्य है वैराग्य। वैराग्य का अर्थ घर परिवार को छोड़, विचित्र वेश बनाना या भिक्षाटन करना नहीं है वरन् यह है कि जिस राग-द्वेष की धूप छाँह में सारा जगत हँसता, रोता, अशान्त और उद्विग्न रहता है उस विडम्बना से बचते हुए महान लक्ष्य की ओर अनवरत गति से चलते जाना। सत्य निष्ठ व्यक्ति इस असत्य मग्न संसार को एक विचित्र प्राणी लगता है। उसे भी अज्ञान के अन्धकार में भटकती दुनिया दयनीय लगती है। दोनों का तालमेल नहीं बैठता। यह विसंगति कहीं कटुता उत्पन्न करती है, कहीं तिरस्कार उलीचती है, कहीं अवरोध उत्पन्न करती है, कहीं त्रास देती है। इसे उपेक्षापूर्वक देखना वैराग्य है और इस पर भी जो त्रास सहने पड़े उन्हें सन्तोष पूर्वक सहने का नाम तप है।

🔶 वैराग्य और तप के डाँडों के सहारे विवेकवान व्यक्ति अपनी साधना की नाव खेते हैं और सत्य के परम लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।

✍🏻  पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-मई 1972 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.1

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...