शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

👉 अनीति से हानि

🔴 गौरा ग्राम में एक देवतादीन नामक ब्राह्मण रहते थे। वे बचपन में तो बहुत ही दरिद्र घर में उत्पन्न हुए थे। पर जब बड़े हुए तो लेन-देन के व्यापार में रुपये वाले हो गये। जिस गरीब भाई को एक रुपया भी कर्ज में दे आते, तो उसका बीसों वर्ष तक पीछा नहीं छोड़ते। उस रुपये का सूद बढ़ा कर उसको गड़बड़ी में डाल देते और बदले में बेगार करवाते, हल जोतवाते, उनके बच्चों से पशु चरवाते इसी प्रकार आस पास के गाँवों में प्रायः करके दीन-दरिद्र लोगों को ही अपना ऋणी बनाते, जिससे कि उनके साथ वंचकता करने में कुछ भी कठिनाई नहीं पड़ती थी। इस व्यवसाय के द्वारा बहुतों का तो घर छीन लिया, अनेकों की डिगरी करा कर माल व बगिया ले लिये, बहुतों के खेतपात लेकर निहत्था कर दिया। इसी प्रकार कुछ वैभव बढ़ जाने पर गाँव के मुखिया बन बैठे। अब इनके यहाँ पुलिस और रियासत के हाकिमों की सगे रिश्तेदारों की सी सेवा-सुश्रूषा होने लगा। इससे इनका शासन दीन-दुखियों पर और भी अधिक बढ़ गया। जिसको चाहते उस को निरपराध ही पकड़वा कर मनमाना अत्याचार करते।

🔵 परमात्मा अनीति को अधिक नहीं बढ़ने देता। पूर्व सुकर्मों का फल समाप्त होते ही करनी आगे आने लगी। तीन साल तक लगातार प्रति वर्ष अग्नि-काण्ड होते रहे, जिससे बहुत सम्पत्ति स्वाहा हुई। अठारह वर्ष का विवाहित लड़का चिरस्थायी राजरोग का शिकार बना, जिस पर बहुत धन व्यय हुआ। दूसरा लड़का 12 वर्ष का था, उसकी झूला पर से गिरने के कारण जीभ कट गई। देवतादीन को आम वात ने घेरा, एक वर्ष तक चारपाई सेवन करके काल के गाल में चले गये। कुछ ही दिन बाद बड़ा लड़का जो राजरोग से पीड़ित था, मर गया। तत्पश्चात् छोटा लड़का भी संप्रहणी रोग से पीड़ित होकर पंचत्वगामी हो गया।

🔴 सम्प्रति उनके घर की यह हालत है कि जिन चौपालों में बैठ कर वे मित्रों के साथ माँ बाप मदिरा का पान करते थे वेश्याएं नचाते थे उन की दीवारें गिरी हुई पड़ी हैं। जिस द्वार पर नौबत बजती थी, वहाँ पर अब कुत्तों के चबाने से बचे हुए हाड़ दृष्टिगोचर हो रहे हैं। घर की औरतें फटे पुराने कपड़े पहन कर मजदूरी का काम करने जाती है।

🔵 ऐसी घटनायें ढूँढ़ने पर हर जगह मिल सकती हैं, पर वैभव के मद में अंधे हुए मनुष्य उस ओर से आंखें बन्द कर के अन्याय का मार्ग ही पकड़े रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के गले पर छुरी चलाते रहते हैं। यदि यह लोग अनीति से होने वाले हानिकर परिणामों पर सोचें, तो निस्सन्देह उन्हें अपना हाथ रोकना पड़ेगा।

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 145)

🌹  इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है

🔵 प्रतिभाहीनों की बात जाने दीजिए, वे तो अपनी क्षमता और बुद्धिमत्ता को चोरी, डकैती, ठगी जैसे नीच कर्मों में लगा सकते हैं, पर जिनमें भावना भरी हो, वे अपने साधारण पराक्रम से समय को उलटकर कहीं से कहीं ले जा सकते हैं। स्वामी दयानंद, श्रद्धानन्द रामतीर्थ जैसों के कितने ही उदाहरण सामने हैं जिनकी दिशाधारा बदली तो वे असंख्यों को बदलने में समर्थ हो गए।

🔴 इन दिनों प्रतिभाएँ विलासिता में, संग्रह में, अहंकार की पूर्ति में निरत हैं। इसी निमित्त वे अपनी क्षमता और सम्पन्नता को नष्ट करती रहती हैं। यदि इनमें से थोड़ी सी भी ढर्रा बदल दें, तो वे गीता प्रेस वाले जय दयाल गोयंदका की तरह ऐसे साधन खड़े कर सकती हैं, जिन्हें अद्भुत और अनुपम कहा जा सके।

🔵 कौन प्रतिभा किस प्रकार बदली जानी है और उससे क्या काम लिया जाना है, यही निर्धारण उच्च भूमिका से होता रहेगा। अभी जो लोग विश्व युद्ध छेड़ने और संसार को तहस-नहस कर देने की बात सोचते हैं, उनके दिमाग बदलेंगे तो विनाश प्रयोजनों मे लगने वाली बुद्धि, शक्ति और सम्पदा को विकास प्रयोजनों की दिशा में मोड़ देंगे। इतने भर से परिस्थितियाँ बदलकर कहीं से कहीं चली जाएँगी। प्रवृत्तियाँ एवं दिशाएँ बदल जाने से मनुष्य के कर्तृत्व कुछ से कुछ हो जाते हैं और जो श्रेय मार्ग पर कदम बढ़ाते हैं, उनके पीछे भगवान् की शक्ति सहायता के लिए निश्चित रूप से विद्यमान रहती है। बाबा साहब आम्टे की तरह वे अपंगों का विश्व विद्यालय, कुष्ठ औषधालय बना सकते हैं। हीरालाल शास्त्री की तरह वनस्थली बालिका विद्यालय खड़े कर सकते हैं। लक्ष्मीबाई की तरह कन्या गुरुकुल खड़े कर सकते हैं।

🔴 मानवी बुद्धि की भ्रष्टता ने उसकी गतिविधियों को भ्रष्ट, पापी, अपराधी स्तर का बना दिया है। जो कमाते हैं, वह हाथों-हाथ अवांछनीय कार्यों में नष्ट हो जाता है। सिर पर बदनामी और पाप का टोकरा ही फूटता है। इस समुदाय के विचारों को कोई पलट सके, रीति-नीति और दिशाधारा को बदल सके, तो यही लोग इतने महान् बन सकते हैं, ऐसे महान् कार्य कर सकते हैं कि उनका अनुकरण करते हुए लाखों धन्य हो सकें और जमाना बदलता हुआ देख सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.164

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 2)

🔴 एक बात तो मुझे आपसे यही कहनी थी। दूसरी बात यह कहनी थी कि जब महाभारत हुआ था, तब अर्जुन यह कह रहा था कि हम तो पाँच पाण्डव हैं और कौरव सौ है और उनके पास विशाल सेना भी है, जबकि हमारे पास सेना भी नहीं है, थोड़े-से पाँच-पचास आदमी हैं। ऐसे में भला युद्ध कैसे हो सकता है? हम मारे जाएँगे। इसलिए वह इसलिए वह बार-बार मना कर रहा था और कह रहा था कि महाराज हमें लड़ाइए मत, इसमें हमको सफलता नहीं मिल सकती। आप हिसाब लगाइए कि इनसे लड़कर हम फतह कैसे पा सकेंगे? जीत कैसे सकेंगे?
   
🔵 तब भगवान ने उससे कहा था कि देखो अर्जुन, इन सबको तो मैंने पहले से ही मारकर रखा है। और तुम्हारे लिए सिंहासन सजाकर रखा है। तुम पाँचों को सिंहासन पर बैठना पड़ेगा, राज्य करना पड़ेगा, ये तो सब मरे-मराए रखें हैं, तुम तो खाली तो खाली तीर-कमान चलाओगे। इसी तरह जो काम मेरा था सो मैंने करके रखा है। इस युग को बदलने के सम्बन्ध में जो महत्त्वपूर्ण कार्य करने हैं, उनके सम्बन्ध में आपको श्रेय तो भर लेना है। जीतना किससे है और हरना किससे है? न किसी से हारना है, न किसी से जीतना है। न किसी को मारना है और न कोई पुरुषार्थ करना है।

🔴 आपको तो जो विजयी होने का श्रेय मिलना चाहिए और वही श्रेय आपको प्राप्त करना है। अर्जुन ने भी प्राप्त किया था। इससे पहले जब वह ज्यादा बहस करने लगा था कि मेरे बाल-बच्चे हैं, मेरा काम हर्ज हो जाएगा, फलाना हो जाएगा, मुझे टाइम नहीं है, तब कृष्ण भगवान झल्ला पड़े थे और उन्होंने एक हुक्म दिया-‘तस्मात् युद्धाय युजस्व’ लड़, दुनिया भर के बहाने मत बना, लड़ाई कर। भगवान् हमारा क्या होगा? यह पूछने पर श्रीकृष्ण ने कहा था कि तेरी जिम्मेदारी हम उठाते हैं, तू युद्ध कर।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 Oct 2017

🔵 सदा किसी को अनुकूल ही अनुकूल अवसर मिलते रहें, प्रिय व्यक्ति, प्रिय आदर्श और प्रिय परिस्थितियाँ ही सदैव बनी रहें, यह आशा करना भी दुराशा मात्र ही है। जब हम सदा शुभ ही शुभ विचार और कार्य नहीं करते, जब हमारे मन से दुर्भाव और शरीर से दुष्कर्म होते रहते ही हैं तो उनके फलस्वरूप कष्ट, हानि, विछोह, शोक एवं विपत्ति भोगनी ही पड़ेगी। शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोगना निश्चित है। जो हमने किया है उसका भोग मिलना ही ठहरा। जब शुभ कर्मों के सुखद फल हम भोगते हैं तो अशुभ कर्मों के दुखद दुष्परिणामों को भोगने के लिये भी हमें ही तैयार रहना होगा।

🔴 संसार में सज्जनता की तथा आनंददायक परिस्थितियों की कमी नहीं है पर यह भी मान लेना चाहिए कि दुष्टता और विपत्ति भी साथ ही पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। हमें दोनों से ही निपटना होगा। केवल श्रेष्ठता, सुन्दरता, भलाई और आनन्द की ही हम इस दुनिया में आशा करें और नीचता, कुरूपता, बुराई और दुःख से सर्वथा बचे रहना चाहें तो यह इच्छा कदापि, पूर्ण न हो सकेगी। हमें अपनी मनोभूमि को दुःखों के सहने और बुराइयों से निपटने के लिये भी उसी तरह सुनिश्चित करना पड़ेगा, सधाना पड़ेगा, जिस प्रकार वह सुखों के लिए सज्जनता से सान्निध्य के लिये खुशी-खुशी तैयार रहती है। धूप और छाँह की भाँति, रात और दिन की शाँति प्रिय ओर अप्रिय दोनों ही प्रकार के संयोग हमारे जीवन में आते रहने वाले हैं।

🔵 दुनिया में जो काँटे-कंकड़ फैले हुए हैं उन्हें बीन कर अपने सभी यात्रा के मार्गों को हम निरापद बनाने का प्रयत्न करें तो इसमें सफलता मिल सकना कठिन है क्योंकि काँटे, कंकड़ों की संख्या अधिक है। विभिन्न रास्ते जिन पर हमें समय-समय पर चलना पड़ता है उनकी लम्बाई भी हजारों मील बैठती है। काँटे बीनने के लिए हम खड़े भी हों तो जीवन की अवधि भी इतनी लम्बी नहीं है कि जब तक सब काँटे बीने जा सकते हों तब तक जीवित रहें, फिर यदि जीवित भी रहें तो इसका भी कोई निश्चय नहीं कि जब तक यह बीने जाने की प्रक्रिया पूर्ण होगी, तब तक फिर और नये काँटे उस मार्ग पर न बिखर जाएंगे। इन परिस्थितियों में यही उचित प्रतीत होता है कि काँटे बीनने की प्रक्रिया को सीमित करके हम अपने पैरों में जूते पहनने का उपाय पसंद करें। यह अपेक्षाकृत सरल और सीधा उपाय है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दाम्पत्य जीवन की सफलता का मार्ग (भाग 2)

🔴 अनुदार स्वभाव के स्त्री-पुरुष कट्टर, एवं संकीर्ण मनोवृत्ति के होने के कारण यह चाहते हैं कि हमारा साथी हमारी किसी भी बात में तनिक भी मतभेद न रखे। पति अपनी स्त्री को पतिव्रत पाठ पढ़ाता है और उपदेश करता है कि तुम्हें पूर्ण पवित्रता, इतनी उग्र पतिव्रता होना चाहिए कि पति की किसी भी भली-बुरी विचारधारा, आदत, कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप न हो। इसके विपरीत स्त्री अपने पति से आशा करती है कि पति के लिए भी यह उचित है कि स्त्री को अपना जीवनसंगी, आधा अंग समझ कर उसके सहयोग एवं अधिकार की उपेक्षा न करे। यह भावनाएं जब संकीर्णता और अनुदारता से संमिश्रित होती हैं तो एक पक्ष सोचता है कि मेरे अधिकार का दूसरा पक्ष पूर्ण नहीं करता। बस यहीं से झगड़े की जड़ आरम्भ हो जाती है।
 
🔵 इस झगड़े का एकमात्र हल यह है कि स्त्री पुरुष को, और पुरुष स्त्री को, अपने मन का अधिकाधिक उदार भावना से बरते। जैसे किसी व्यक्ति का एक हाथ या एक पैर कुछ कमजोर, रोगी, या दोषपूर्ण हो तो वह उसे न तो काट कर फेंक देता है न कूट डालता है और न उससे घृणा, असंतोष, विद्वेष आदि करता है अपितु उस विकृत अंग को अपेक्षाकृत अधिक सुविधा देने और उसके सुधारने के लिए, स्वस्थ भाग की भी थोड़ी उपेक्षा कर देता है। यह नीति अपने कमजोर साथी के बारे में बरती जाय तो झगड़े का एक भारी कारण दूर हो जाता है।

🔴 झगड़ा करने से पहले आपसी विचार विनिमय के सब प्रयोगों को अनेक बार कर लेना चाहिए। कोई वज्रमूर्ख और घोर दुष्ट प्रकृति के मनुष्य तो ऐसे हो सकते हैं जो दंड के अतिरिक्त और किसी वस्तु से नहीं समझते। पर अधिकाँश मनुष्य ऐसे होते हैं जो प्रेम भावना के साथ, एकान्त स्थान में सब ऊँच नीच समझने से बहुत कुछ समझ और सुधर जाते हैं। जो थोड़ा बहुत मतभेद रह जाय उसकी उपेक्षा करके उन बातों को ही विचार क्षेत्र में आगे देना चाहिए जिनमें मतैक्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 14 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Oct 2017


👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०१)

ध्यान की अनुभूतियों द्वारा ऊर्जा स्नान महर्षि के इस सूत्र में ध्यान के सूक्ष्म एवं गहन प्रयोगों का संकेत है। यह सच है कि ध्यान की प्रगाढ़ता, ...