अनन्य भक्ति ही श्रेष्ठतम है
महर्षि पुलह ने कथा के सूत्र को अपनी स्मृति के सूत्र से जोड़ते हुए फिर से बरसाने की गोपी मृणालिनी की भक्तिकथा कहनी शुरू की। उन्होंने बताया कि श्रीराधा जी ने मृणालिनी से कहा- ‘‘भक्ति सांसारिक लगाव से भिन्न है। इसमें सांसारिक विसंगतियों के लिए कोई भी स्थान नहीं है। न तो यहाँ वासना है और न आसक्ति। ईर्ष्या या फिर किसी अन्य छल-कपट अथवा अधिकार की कोई मांग नहीं है। भक्त वही है जो न केवल अपने आराध्य को ईश्वर माने, बल्कि स्वयं भी ईश्वरीय गुणों से युक्त हो। जो ईश्वर से सांसारिक सम्बन्ध रखता है अथवा फिर अपने मन में सांसारिक भाव या सांसारिक कामनाएँ संजोये हुए है वह किसी भी तरह से भक्त नहीं हो सकता है।
श्रीराधा जी की ये बातें मृणालिनी के मन-अन्तःकरण में सात्त्विक भाव का सम्प्रेषण कर रही थीं। उसके मन में सर्वत्र एक प्रेरक प्रकाश छाने लगा था। वह बड़े ध्यान से श्रीराधा जी की बातें सुन रही थी। श्रीराधा जी उससे कह रही थीं- भक्त के लिए भगवान नरदेह धारण करने के बावजूद सामान्य मानव नहीं होते। श्रीकृष्ण ने भले ही लीला से नरदेह धारण कर ली हो, पर वह सदा ही दिव्य, लोकोत्तर और षडऐश्वर्य से पूर्ण ईश्वर हैं। यहाँ तक कि उनकी देह मृण्मय होते हुए भी चिन्मय है। मैंने उन्हें इसी रूप में देखा-जाना और अनुभव किया है। श्रीराधा जी की अनुभूति मृणालिनी को बड़ी प्रेरक लगी। लेकिन अभी तक उसका मूल प्रश्न अनुत्तरित था।
दरअसल उसे तो यह जानना था कि श्रीकृष्ण को जब वे पूरी तरह से चाहती हैं, उनकी ही पूरी तरह से हो जाना चाहती है, ऐसे में भला वे श्री कृष्ण उसके कैसे पूर्णरूपेण हो सकते हैं? श्रीराधा जी मृणालिनी के मन की यह बात जान गयीं और मन्द स्मित के साथ बोलीं- यही तो मानवीय भाव एवं ईश्वरीय भाव के बीच का भेद है। मानव, ईश्वरीय संस्पर्श एवं संयोग के बिना कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता परन्तु ईश्वर सदा ही पूर्ण है। उनमें कुछ घटाने पर अथवा कुछ बढ़ाने पर भी वे पहले ही की भाँति पूर्ण रहते हैं। उनका हर एक भक्त उन्हें पूर्ण रूप में ही पाता है। बस इसमें महत्त्वपूर्ण बात इतनी ही है कि उन्हें पूर्ण रूप से पाने के लिए स्वयं का पूर्ण रूप से विसर्जन करना पड़ता है। समर्पण व विसर्जन जितना बढ़ता जाता है, उन परमात्मा की प्राप्ति भी उतनी ही होती जाती है।
भक्त अपने भगवान के सिवा अन्य किसी ओर नहीं देखता। उसे इस बात की कोई चिन्ता, फिक्र या परवाह नहीं होती कि उसके भगवान कितने लोगों से किस तरह से और कैसे प्यार करते हैं। उनके प्रति किसका समर्पण कैसा है? भक्त तो बस अपने प्रेम, अनुराग, भक्ति, समर्पण, विसर्जन को बढ़ाना चाहता है। यहाँ तक वह स्वयं को उनमें पूरी तरह से विसर्जित एवं विलीन कर देना चाहता है। यह चाहत ही उसे भक्त बनाती है। यही उसे अपने भगवान् के पूरा पाने का अहसास दिलाती है। अरे मृणालिनी! श्रीकृष्ण तो परमात्मा हैं, उन्ही का एक अंश सृष्टि के समस्त जीवों में है। उनसे मिलने की चाहत तो सभी में नैसर्गिक रूप से है और होनी भी चाहिए।
श्रीराधा की इन बातों को मृणालिनी सुन रही थी। सुनते हुए वह उनकी ओर एकटक देख रही थी। श्रीराधा जी उसे मानव देह में ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न साक्षात ईश्वर लग रही थीं। उनमें भला ईर्ष्या की छुद्रता कैसे हो सकती थी। वह बड़ी अनुरक्ति से उनकी ओर देखती रही। इस तरह से उनको देखते हुए वह अपने मन में सोच रही थी कि सचमुच ही श्रीराधा और श्रीकृष्ण में कोई भेद नहीं है। श्रीराधा कृष्ण हैं और श्रीकृष्ण ही राधा हैं। सम्भवतः यही एकान्त भक्ति का निहितार्थ है। यही भक्ति का चरम व परम है।’’
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २६३















