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सोमवार, 30 मई 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १३५)

अनन्य भक्ति ही श्रेष्ठतम है

महर्षि पुलह ने कथा के सूत्र को अपनी स्मृति के सूत्र से जोड़ते हुए फिर से बरसाने की गोपी मृणालिनी की भक्तिकथा कहनी शुरू की। उन्होंने बताया कि श्रीराधा जी ने मृणालिनी से कहा- ‘‘भक्ति सांसारिक लगाव से भिन्न है। इसमें सांसारिक विसंगतियों के लिए कोई भी स्थान नहीं है। न तो यहाँ वासना है और न आसक्ति। ईर्ष्या या फिर किसी अन्य छल-कपट अथवा अधिकार की कोई मांग नहीं है। भक्त वही है जो न केवल अपने आराध्य को ईश्वर माने, बल्कि स्वयं भी ईश्वरीय गुणों से युक्त हो। जो ईश्वर से सांसारिक सम्बन्ध रखता है अथवा फिर अपने मन में सांसारिक भाव या सांसारिक कामनाएँ संजोये हुए है वह किसी भी तरह से भक्त नहीं हो सकता है।

श्रीराधा जी की ये बातें मृणालिनी के मन-अन्तःकरण में सात्त्विक भाव का सम्प्रेषण कर रही थीं। उसके मन में सर्वत्र एक प्रेरक प्रकाश छाने लगा था। वह बड़े ध्यान से श्रीराधा जी की बातें सुन रही थी। श्रीराधा जी उससे कह रही थीं- भक्त के लिए भगवान नरदेह धारण करने के बावजूद सामान्य मानव नहीं होते। श्रीकृष्ण ने भले ही लीला से नरदेह धारण कर ली हो, पर वह सदा ही दिव्य, लोकोत्तर और षडऐश्वर्य से पूर्ण ईश्वर हैं। यहाँ तक कि उनकी देह मृण्मय होते हुए भी चिन्मय है। मैंने उन्हें इसी रूप में देखा-जाना और अनुभव किया है। श्रीराधा जी की अनुभूति मृणालिनी को बड़ी प्रेरक लगी। लेकिन अभी तक उसका मूल प्रश्न अनुत्तरित था।

दरअसल उसे तो यह जानना था कि श्रीकृष्ण को जब वे पूरी तरह से चाहती हैं, उनकी ही पूरी तरह से हो जाना चाहती है, ऐसे में भला वे श्री कृष्ण उसके कैसे पूर्णरूपेण हो सकते हैं? श्रीराधा जी मृणालिनी के मन की यह बात जान गयीं और मन्द स्मित के साथ बोलीं- यही तो मानवीय भाव एवं ईश्वरीय भाव के बीच का भेद है। मानव, ईश्वरीय संस्पर्श एवं संयोग के बिना कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता परन्तु ईश्वर सदा ही पूर्ण है। उनमें कुछ घटाने पर अथवा कुछ बढ़ाने पर भी वे पहले ही की भाँति पूर्ण रहते हैं। उनका हर एक भक्त उन्हें पूर्ण रूप में ही पाता है। बस इसमें महत्त्वपूर्ण बात इतनी ही है कि उन्हें पूर्ण रूप से पाने के लिए स्वयं का पूर्ण रूप से विसर्जन करना पड़ता है। समर्पण व विसर्जन जितना बढ़ता जाता है, उन परमात्मा की प्राप्ति भी उतनी ही होती जाती है।

भक्त अपने भगवान के सिवा अन्य किसी ओर नहीं देखता। उसे इस बात की कोई चिन्ता, फिक्र या परवाह नहीं होती कि उसके भगवान कितने लोगों से किस तरह से और कैसे प्यार करते हैं। उनके प्रति किसका समर्पण कैसा है? भक्त तो बस अपने प्रेम, अनुराग, भक्ति, समर्पण, विसर्जन को बढ़ाना चाहता है। यहाँ तक वह स्वयं को उनमें पूरी तरह से विसर्जित एवं विलीन कर देना चाहता है। यह चाहत ही उसे भक्त बनाती है। यही उसे अपने भगवान् के पूरा पाने का अहसास दिलाती है। अरे मृणालिनी! श्रीकृष्ण तो परमात्मा हैं, उन्ही का एक अंश सृष्टि के समस्त जीवों में है। उनसे मिलने की चाहत तो सभी में नैसर्गिक रूप से है और होनी भी चाहिए।

श्रीराधा की इन बातों को मृणालिनी सुन रही थी। सुनते हुए वह उनकी ओर एकटक देख रही थी। श्रीराधा जी उसे मानव देह में ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न साक्षात ईश्वर लग रही थीं। उनमें भला ईर्ष्या की छुद्रता कैसे हो सकती थी। वह बड़ी अनुरक्ति से उनकी ओर देखती रही। इस तरह से उनको देखते हुए वह अपने मन में सोच रही थी कि सचमुच ही श्रीराधा और श्रीकृष्ण में कोई भेद नहीं है। श्रीराधा कृष्ण हैं और श्रीकृष्ण ही राधा हैं। सम्भवतः यही एकान्त भक्ति का निहितार्थ है। यही भक्ति का चरम व परम है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २६३

👉 भक्तिगाथा (भाग १३४)

अनन्य भक्ति ही श्रेष्ठतम है

‘‘श्रीराधा की बात मृणालिनी को अच्छी तो बहुत लगी, पर किंचित आश्चर्य भी हुआ। उसे एक ही समय में दो अनुभवों ने घेर लिया। पहला अनुभव इस खुशी का था कि स्वयं श्रीराधा उसे श्रीकृष्ण के प्रेम का रहस्य समझा रही हैं। इससे अधिक सौभाग्य उसका और क्या हो सकता है? क्योंकि यह सच तो ब्रज धरा के नर-नारी, बालक-वृद्ध सभी जानते थे कि श्रीकृष्ण के हृदय का सम्पूर्ण रहस्य वृषभानु की लाडली के अलावा कोई नहीं जानता। यह बात ब्रज के मानवों को ही नहीं, वहाँ के पशु-पक्षियों, वृक्ष-वनस्पतियों को भी मालूम थी कि बरसाने की राधा नन्दगाँव के कृष्ण के रहस्य के सर्वस्व को जानती हैं। और वही राधा इस रहस्य को मृणालिनी को कहें, समझाएँ, बताएँ इससे अधिक सुखकर-सौभाग्यप्रद भला और क्या होगा?

लेकिन मृणालिनी के अनुभव का एक दूसरा हिस्सा भी था। इसी हिस्से ने उन्हें अचरज में डाल रखा था। यह आश्चर्य की गुत्थी ऐसी थी, जिसे वह चाहकर भी नहीं सुलझा पा रही थी। यह आश्चर्य भी श्रीराधा से ही जुड़ा था। उसे लग रहा था कि जब श्रीराधा स्वयं कृष्ण से प्रेम करती हैं, तब वह अपने इस प्रेम का दान उसे क्यों करना चाहती हैं। ऐसे में तो उन्हें स्वयं वञ्चित रहना पड़ेगा। कृष्णप्रेम का अधिकार उसे सौंप कर स्वयं ही राधा रिक्त हस्त-खाली हाथ क्यों होना चाहती हैं। मृणालिनी के लिए यह ऐसी एक अबूझ पहेली थी जिसे वह किसी भी तरह से सुलझा नहीं पा रही थी। बस वह ऊहापोह से भरी और घिरी थी। संकोचवश यह पूछ भी नहीं पा रही थी और बिना पूछे उससे रहा भी नहीं जा रहा था।

हाँ! उसके सौम्य-सलोने मुख पर भावों का उतार-चढ़ाव जरूर था, जिसे श्रीराधा ने पढ़ लिया और वह हँस कर बोलीं- अब कह भी दे मृणालिनी, नहीं कहेगी तो तेरी हालत और भी खराब हो जाएगी। श्रीराधा की इस बात से उसका असमञ्जस तो बढ़ा पर संकोच थोड़ा घटा। वह जैसे-तैसे हिचकिचाते हुए लड़खड़ाते शब्दों में बोली- क्या कान्हा से आप रूठ गयी हैं? उसके इस भोले से सवाल पर श्रीराधा ने कहा- नहीं तो। मृणालिनी बोली- तब ऐसे में उन्हें मुझे क्यों देना चाहती हैं? उसकी यह भोली सी बात सुनकर श्रीराधा जी हँस पड़ीं।’’ श्रीराधा की इस हँसी का अहसास ऋषिश्रेष्ठ पुलह के मुख पर भी आ गया। वे ही इस समय भाव भरे मन से उस गोपकन्या मृणालिनी की कथा सुना रहे थे।

लेकिन यह कथा सुनाते-सुनाते उन्हें लगा कि समय कुछ ज्यादा ही हो चला है। अब जैसे भी हो देवर्षि नारद के अगले भक्तिसूत्र को प्रकट होना चाहिए। यही सोचकर उन्होंने मधुर स्वर में कहा- ‘‘मेरी इस कथा का तो अभी कुछ अंश बाकी है। ऐसे में मेरा अनुरोध है कि देवर्षि अपने सूत्र को बता दें। इसके बाद कथा का शेष अंश भी पूरा हो जाएगा।’’ उनकी यह बात सुनकर नारद अपनी वीणा की मधुर झंकृति के स्वरों में हँस दिए और बोले- ‘‘आप का आदेश सर्वदा शिरोधार्य है महर्षि! बस मेरा यह अनुरोध अवश्य स्वीकारें और अपनी पावनकथा का शेष अंश अवश्य पूरा करें।’’ देवर्षि नारद के इस कथन पर ऋषिश्रेष्ठ पुलह ने हँस कर हामी भरी। उनके इस तरह हामी भरते ही देवर्षि ने कहा-
‘भक्ता एकान्तिनोमुख्याः’॥ ६७॥

एकान्त (अनन्य) भक्त ही श्रेष्ठ है।
अपने इस सूत्र को पूरा करके देवर्षि ने कहा- ‘‘हे महर्षि! अब मेरा आपसे भावभरा अनुरोध यही है कि इस सूत्र का विवेचन, इसकी व्याख्या आप अपने द्वारा कही जा रही कथा के सन्दर्भ में करें।’’ नारद का यह कथन सुनकर ऋषिश्रेष्ठ पुलह के होठों पर मुस्कान आ गयी। उन्होंने वहाँ पर उपस्थित जनों की ओर देखा। सभी उनकी इस दृष्टि का अभिप्राय समझ गए और सबने विनीत हो निवेदन किया- ‘‘हे महर्षि! आप कथा के शेष भाग को पूरा करते हुए इस सूत्र का सत्य स्पष्ट करें।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २६२

👉 भक्तिगाथा (भाग १३३)

जिन प्रेम कियो तिनहिं प्रभु पायो

देवर्षि के इस सूत्र ने ऋषिश्रेष्ठ पुलह को भावविभोर कर दिया। उनके मुख को देखकर लगा जैसे कि वह अतीत की किन्हीं स्मृतियों में खो गए। उनकी इस भावदशा को देखकर देवर्षि नारद ने पूछा- ‘‘हे महर्षि! आप क्या सोचने लगे? क्या किसी भक्त की भक्ति ने आपको विभोर कर दिया है।’’ इस पर ब्रह्मर्षि पुलह ने कहा- ‘‘आपका कथन सत्य है देवर्षि! भक्तिमती मृणालिनी की स्मृतियों ने मुझे भिगो दिया है। आपके सूत्र में जिस सत्य की चर्चा है, वह सभी गुण उस भक्तिमती कन्या में थे।’’ महर्षि पुलह की यह बात सभी को बहुत भायी। देवर्षि तो इससे विशेष रूप से प्रसन्न हुए। उन्होंने विनम्र स्वर में कहा- ‘‘भगवन्! आप उस पावन कन्या की भक्ति गाथा सुनाकर हम सबको कृतार्थ करें।’’
देवर्षि के इस कथन का सभी ने अनुमोदन किया। सब के सब महर्षि पुलह की ओर आशा भरी नजरों से देखने लगे। इससे ऋषि श्रेष्ठ पुलह के मन में भी उत्साह का संचार हुआ। उन्होंने भाव भीगे स्वर में कहा- ‘‘बात द्वापर युग की है। तब यमुना का नीर नीलमणि की भांति पारदर्शी था और उसकी प्रत्येक जलतरंग में देवी यमुना की चेतना घुली हुई थी। यमुना के इस तीर पर बसे वृन्दावन क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण के साथ ही सम्पूर्ण गोलोक धाम अवतरित हुआ था। गोकुल, नन्दगांव, बरसाना और आस-पास के सभी क्षेत्रों में इस दिव्य गोलोक धाम की पवित्र एवं चमत्कारी चेतना का स्पर्श सहज सम्भव था।

यहीं के बरसाने की कन्या थी मृणालिनी। तप्त काञ्चन जैसा रंग था उसका। उसकी देह के सारे अंग जैसे सांचे में ढले थे। उसकी देह का सौन्दर्य अवर्णनीय था। उसकी इस सुन्दर देह से भी कहीं अधिक सुन्दर था उसका मन, जिसमें सदा-सर्वदा कृष्णप्रेम की सरिता उफनती रहती थी। श्रीकृष्ण उसके सर्वस्व थे। सखी वह राधिका की थी। उसे जिन्होंने भी देखा उन्हें यही अनुभव हुआ जैसे कि श्रीराधा उसमें घुली हुई थी। और वह स्वयं श्रीराधा में घुल चुकी थी। श्रीकृष्णप्रेम का अंकुर तो उसमें जन्म से ही था, परन्तु पहले वह श्रीकृष्ण को अपना स्वामी और स्वयं को उनकी सेविका मानकर मन ही मन नित्य अपने प्रभु की सेवा करती थी। घर के सारे काम करते हुए उसका मन सदा-सर्वदा श्रीकृष्ण में ही अनुरक्त रहता था। ऐसा करते हुए उसकी मनोलीनता बहुत गहरी हो जाती थी। ऐसे में उसका देह बोध यदा-कदा जाता रहता। उसकी माता इसे उसकी अन्यमनस्कता मानकर झिड़क देती- लाली! तेरा मन जाने कहाँ अटकता-भटकता रहता है। जरा घर के कामों में मन लगाया कर। माता के ऐसा कहने पर वह मीठे स्वर में कहती- मैया जैसा तू कहती है, वैसा ही करूँगी।

उसने जब अपनी इस मनोदशा की चर्चा राधा से की, तो वह मुस्करायीं और बोली- यह अच्छी बात है परन्तु श्रीकृष्ण कोई जमींदार या अधिकारी नहीं हैं। उन्हें सही ढंग से पाने व पहचानने के लिए यह स्वामी, सेवक एवं सेवा के रूपों को भंग करना पड़ेगा। वे तो हमारी आत्मा के ईश्वर हैं। सच कहूँ- सभी जीवात्माओं के सच्चे पति वही हैं। हमें तो विधाता ने नारी रूप प्रदान कर धन्य कर दिया है। अपने इस रूप में हम उनकी प्रिया व कान्ता होने का सहज अनुभव कर सकती हैं।

ऐसा कहकर श्रीराधा ने उसे कान्ता भक्ति व दास्य भक्ति की महिमा बतायी। ९ वर्षीया मृणालिनी को अपनी प्रिय सखी का उपदेश बहुत अच्छा लगा। श्रीराधा ने उससे कहा- देख मृणालिनी कान्ता भक्ति के अनुभव के लिए आवश्यक है जीवचेतना का देहभाव से मुक्त होना क्योंकि इसमें दैहिक वासनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। तुम वासनाशून्य हो, इसलिए इस भाव को सहज आत्मसात कर सकती हो। जो आत्मा के तल पर जीते हैं, वे ही कान्ताभाव से श्रीकृष्ण को पा सकते हैं। इस भक्ति के अनुभव विशिष्ट हैं, जिसे मैं तुझे आगे बताऊँगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २६१ 


मंगलवार, 24 मई 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १३२)

जिन प्रेम कियो तिनहिं प्रभु पायो

सुशान्त शर्मा की अनुभवकथा ने सुनने वालों को रोमांचित कर दिया। सभी की भावनाएँ भक्ति से भीग गयीं। अभी भी उनके मन के आंगन में सुशान्त शर्मा के जीवन की अनुभूतियाँ हीरककणों की तरह चमक रही थीं। यह चमक इन सब के अन्तःकरण के कोने-कोने में प्रकाश बिखेर रही थी। अद्भुत था यह प्रकाश। इसमें सात्त्विकता, सजलता, विमलता का अतुलनीय आनन्द घुला था। इस आनन्द में सबके सब ऐसे निमग्न हुए कि बात करना ही भूल गए। देर तक चहुँ ओर मौन पसरा रहा। हिमालय के शुभ्र शैलशिखर मौन साक्षी बने सभी अन्तः-बाह्य परिस्थितियों को निहार रहे थे। नीरवता जैसे भक्ति की पावन भावनाओं को आत्मसात करने में लगी थी।

देवगण, ऋषिगण, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व एवं सिद्धों का यह समुदाय इन क्षणों में यही सोच रहा था कि भक्ति में ऐसी असाधारण क्षमता है जो अनगढ़ को सुगढ़, अपावन को पावन- बड़ी सहजता से बना देती है। भक्ति रूपान्तरण का रसायन है। अन्य आध्यात्मिक विधियाँ क्षमतावान होते हुए भी इस क्षमता से रहित हैं। तप में ऊर्जा है, योग में बल है, इनसे असम्भव को सम्भव बनाने वाले चमत्कार तो किए जा सकते हैं, परन्तु व्यक्तित्व का रूपान्तरण कर पाना सम्भव नहीं है। कोयले का हीरा बन जाना तो केवल भक्ति से ही सम्भव है।

जो चमत्कार करना व चमत्कारी बनना चाहते हैं, उनके लिए अनेको मार्ग हैं, परन्तु जिन्हें केवल पवित्रता का प्रकाश चाहिए, जिन्हें बस परमात्मा का सान्निध्य, सुपास चाहिए उनके लिए तो भक्ति ही साधना, सिद्धि एवं साध्य है। चिन्तन की ये और ऐसी अनेक कड़ियाँ एक-दूसरे से जुड़ती रहीं। विचारों की इन वीथियों में अनेकों मन भ्रमण करते रहे। लेकिन ऋषिश्रेष्ठ पुलह की आकांक्षा इससे कुछ अधिक थी। वे तो देवर्षि नारद से भक्ति का अगला सूत्र सुनना चाहते थे। एकबारगी उन्होंने सभी की ओर देखा- अभी तक सब मौन थे। तभी अचानक उनके नेत्र ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की ओर जा टिके। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उनकी भावनाओं को समझा। वे हल्के से मुस्करा दिए। फिर उन्होंने अपने अन्तर्मन की डोर देवर्षि की भावनाओं से जोड़े।

ऐसा होते ही देवर्षि की दृष्टि ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के मुख की ओर गयी। वशिष्ठ के चेहरे के भावों को उन्होंने देखते ही पढ़ लिया, फिर हल्के से हँस दिए। अपनी इस हँसी को मुस्कराहट में बदलते हुए उन्होंने उपस्थित जनों से कहा- ‘‘यदि आप सभी की अनुमति व सहमति हो तो मैं भक्तिगाथा का अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ देवर्षि के ऐसा कहते ही, ब्रह्मर्षि पुलह के गाल पुलकित हो गए। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र के मुख पर भी आह्लाद की चन्द्रिका चमक उठी। अन्य जन भी अपने सांकेतिक या प्रकट हाव-भाव से सहमति जताने लगे। इन सबकी सहमति पाकर देवर्षि ने मधुर स्वर में अपने अगले सूत्र को प्रकट करते हुए कहा-

‘त्रिरूपभङ्गपूर्वकं नित्यदास-नित्यकान्ताभजनात्मकं
वा प्रेमैव कार्यम्, प्रेमैव कार्यम्’॥ ६६॥

तीन (स्वामी, सेवक और सेवा) रूपों को भङ्ग कर नित्य दासभक्ति या नित्य कान्ताभक्ति से प्रेम ही करना चाहिए, प्रेम ही करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५९

शुक्रवार, 20 मई 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १३१)

दोषों को भी प्रभु को अर्पित करता है भक्त

इस पर देवर्षि ने कहा- ‘‘महर्षि आप धन्य हैं। आप वही कह रहे हैं, जो मुझे अपने सूत्र में कहना है।’’ उनकी यह बात सुनकर ऋषिश्रेष्ठ क्रतु ने कहा- ‘‘फिर भी हे देवर्षि! आपका सूत्र अमूल्य है। पहले आप उसे कहें। इसके बाद ही मैं सुशान्त की कथा पूरी करूँगा।’’ इस पर देवर्षि ने मुस्कराते हुए कहा- ‘‘मुझे आपकी आज्ञा शिरोधार्य है भगवन्!’’ इतना कहकर उन्होंने बड़े ही भावपूर्ण व मधुर स्वरों में उच्चारित किया-

तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं
तस्मिन्नेव करणीयम्॥ ६५॥

सब आचार भगवान के अर्पण कर चुकने पर यदि काम, क्रोध, अभिमानादि हों, तो उन्हें भी उस (भगवान) के प्रति ही करना चाहिए।

देवर्षि ने अपना यह सूत्र कहने के बाद महर्षि क्रतु से कहा- ‘‘भगवन्! आप सुशान्त शर्मा के घटनाप्रसंग को अवश्य कहें। मेरा विश्वास है कि आपके स्नेह ने सुशान्त को अवश्य ही भगवान का कृपापात्र बनाया होगा।’’ इस पर ऋषिश्रेष्ठ क्रतु ने कहा- ‘‘यह तो मैं नहीं कहता कि उसे भगवान का कृपापात्र किसने बनाया, मेरे स्नेह ने या फिर उसी के किसी शुभ संस्कार ने। पर इतना सच अवश्य है कि संसार से हर तरह से ठुकराए गए सुशान्त ने मेरे पास आकर सचमुच ही स्वयं के अस्तित्त्व को परमात्मा में विसर्जित करने की बड़ी निष्कपट कोशिश की।

मेरे पास आने के कुछ ही दिनों बाद वह मानसिक रूप से स्वस्थ व शारीरिक रूप से सबल होने लगा। थोड़े ही दिनों बाद उसकी स्थिति सामान्य हो गयी। मेरे सान्निध्य में उसे याद आने लगा अपने पिता का सान्निध्य। साथ ही उसे याद हो आए अपने पुराने बचपन के दिन। जब वह त्रैकालिक सन्ध्या नियमित किया करता था। जब वह सूर्यमध्यस्थ गायत्री से स्वयं के प्राणों के एकाकार होने की भावना करता था। इन बचपन की स्मृतियों ने उसे विह्वल कर दिया। इसी विह्वलता में एक दिन उसने कहा- हे देव! क्या मैं पुनः गायत्री उपासना प्रारम्भ कर सकता हूँ। इस पर मैंने कहा- अवश्य पुत्र! तब उसने कहा- भगवन्! क्या इतने वर्षों तक नीच कर्म करने के बाद भी मैं इस लायक हूँ।

उसकी इस बात पर मैंने कहा- पुत्र! शास्त्रों में प्रत्येक अशुभ कर्म के लिए प्रायश्चित विधान है। पहले तुम प्रायश्चित करो। फिर मैं तुम्हारा यज्ञोपवीत संस्कार पुनः करूँगा। तब तुम सम्पूर्ण विधि से सन्ध्यावन्दन के साथ गायत्री उपासना करना। मेरी यह बात सुनकर सुशान्त प्रसन्न हो गया। उसने निर्धारित विधान के अनुसार कृच्छ चान्द्रायण करते हुए लगातार एक वर्ष तक भगवान् के पावन नाम का जप किया। इस कठोर व्रत के साथ वह निरन्तर १८ घण्टे तक जप करता रहता। वर्ष पूरा होने पर मैंने उसका यज्ञोपवीत संस्कार किया।
जिस दिन उसका यह संस्कार हुआ, उस दिन वह आह्लादित था। उसके बाद उसने अपनी गायत्री साधना प्रारम्भ की। तीनों समय सन्ध्योपासना के साथ गायत्री आराधना। इसी आराधना में घुलते गए उसके हृदय के भाव। वह अपने सभी भावों को भगवती के चरणों में अर्पित करता गया। अभिमान अर्पित होकर समर्पण हो गया। क्रोध ने संकल्प का रूप धारण किया। काम जगन्माता में समर्पित होकर भक्ति बन गया। उसकी साधना अविराम बनी रही, साथ ही उसके दुर्गण, सद्गुण में रूपान्तरित होते गए। दिन बीते, मास-वर्ष बीते। साथ ही उसके कलंक धुलते गए। वह निष्कलंक, निष्कपट एवं निर्मल होता गया। अब तो उसे अपमानित करने वाले लोग उसे आश्चर्य से देखने लगे क्योंकि अब उन्हें भी उसकी साधना की सुगन्ध प्रभावित करने लगी। वे सब भी कहने लगे कि साधना के संस्कार सुप्त भले ही हो जाएँ पर लुप्त कभी नहीं होते।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५७

सोमवार, 16 मई 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १३०)

दोषों को भी प्रभु को अर्पित करता है भक्त

‘‘क्लेशों से क्लान्त, कलंकित, अनेकों मनोग्रन्थियों के मार से दबा सुशान्त न तो कुछ सोच पा रहा था, न कुछ समझ पा रहा था। जिन्दगी की सारी राहें उसके लिए खो चुकी थीं। सब ओर घना अंधियारा छाया हुआ था। ऐसे घने मानसिक अंधकार से घिरा सुशान्त इधर-उधर मारा-मारा घूमता था। लावण्या ने उसे अपने यहाँ से निकाल दिया था। जिन मित्रों पर उसे गर्व था, वे सभी मित्र कब के उससे दूर जा चुके थे। पिता के द्वारा अर्जित विपुल चल एवं अचल सम्पत्ति धीरे-धीरे लावण्या के चरणों में समर्पित हो चुकी थी। अब तो बस दुत्कार-फटकार, अपमान-असम्मान ही बचा था। पंडित शशांक शर्मा के जो मित्र पहले उसे स्नेह भाव से देखा करते थे, वे अब उससे मुँह फेर चुके थे।

स्मृतियों के धुंधलेपन में उसे अब यह भी याद नही रह गया था कि वह पंडित शशांक शर्मा का सुपुत्र है। वह विप्रकुल में जन्मा है और उसने अपना बचपन संध्यावन्दन करते हुए वेदमाता गायत्री की आराधना में बिताया है। अब जो स्मृतियाँ कभी उभरती-उफनती थीं, वे सभी बड़े ही विदू्रप जीवन की थीं। उनमें लावण्या थी, जिसके सम्पर्क में उसका सदाचरण विषाक्त हुआ था। वे मित्र थे, जिनके कुसंग में वह कुपथ पर चला था। लेकिन अब ये सब भी उससे किनारा कर गये थे। बचा रह गया था तो केवल उसका दुर्भाग्य, जो उसे बार-बार मरण के लिए प्रेरित करता था। कलंक व अपमान की असंख्य चोटों से आहत उसके मन में मर जाने के अलावा अन्य कोई भी विचार नहीं आता था।

अपने विचार प्रवाह में डूबता-उतराता एक दिन वह पास के अरण्य में चला गया। वहाँ पर एक पहाड़ी थी, न जाने किस प्रेरणा से वह उस पर चढ़ता गया। इस पहाड़ी के नीचे एक नदी बहती थी- मकराक्षी। इस नदी में अनेकों मगरमच्छ रहते थे। उसने सोचा इसी नदी में कूद कर जीवन की समाप्ति कर ले। नदी में गिरने के बाद यह अधम शरीर किसी न किसी मगर के मुख का ग्रास बन जाएगा। यह सोचते हुए जैसे ही उसने छलांग लगाने की चेष्टा की, वैसे ही दैवयोग से मैं आ गया। मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा- पुत्र! जब संसार अपने सभी द्वार बंद कर लेता है, उस समय पमरेश्वर उसके लिए अपने हृदय का द्वार खोल देते हैं। सुशान्त को मेरा यह स्नेहपूर्ण व्यवहार अटपटा व विचित्र लगा। पर जब उसने मेरी आँखों में देखा तो वहाँ उसे आत्मीय स्नेह नजर आया। काफी देर तक तो वह यूं ही गुमसुम खड़ा रहा। फिर वह मेरे से जोर से चिपट कर बिलखते हुए रोने लगा। रोते-रोते जब उसकी हिचकियाँ थमीं तब उसने कहा- महर्षि क्या अभी भी मेरे जीवन में कुछ सार्थक होना सम्भव है?

क्यों नहीं पुत्र! तुम जो हो जैसे हो, वैसे ही तुम परमेश्वर में समर्पित हो जाओ। क्या अपने दोषों को भी मैं भगवान को अर्पित कर दूँ। उत्तर में मैंने कहा- हाँ पुत्र! दोषों को भी। क्योंकि जब दोष भगवान के पावन चरणों में अर्पित होते हैं तब वे रूपान्तरित होकर सद्गुण में बदल जाते हैं।’’ जब महर्षि सुशान्त का विवरण सुना रहे थे, तब देवर्षि नारद उन्हें भावपूर्ण नेत्रों से निहारे जा रहे थे। जब उन्होंने दोषों को प्रभु अर्पित करने की बात कही तो देवर्षि के मुख से अचानक निकल गया- ‘‘अहा! यह कितना सत्य कथन है।’’ देवर्षि के कहने से महर्षि क्रतु का ध्यान उनकी ओर गया और वह बोले- ‘‘अरे मैं तो सुशान्त की कथा सुनाने के फेर में यह भूल ही गया कि हम सबको आपके सूत्र की प्रतीक्षा है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५५

शुक्रवार, 6 मई 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२८)

भक्त के लिए जरूरी है दंभ का त्याग

‘‘सुशान्त तीव्रतर क्रम में जीवन के घने अंधेरे में घिरता-फँसता, उलझता जा रहा था। स्त्री, धन, वैरी व नास्तिक के विचारों व भावों में उसकी जीवनचेतना जकड़ गयी थी। इस जकड़न ने उसके व्यक्तित्व को बुरी तरह विषाक्त कर दिया था। अब वह पहले की तरह शान्त, शिष्ट, शालीन ब्राह्मणकुमार सुशान्त नहीं रहा। अब तो उसके व्यवहार में अभिमान व दम्भ की दुर्गन्ध फैलने लगी थी। उसे देखने वाले यकीन ही न कर पाते कि यही विप्रकुल शिरोमणि वेदाचार्य पंडित शशांक शर्मा का पुत्र सुशान्त शर्मा है। पंडित शशांक शर्मा का यश अभी भी आस-पास के क्षेत्र में चहुँ ओर व्याप्त था। जन-जन में उनकी चरित्रनिष्ठा, श्रद्धा-आस्था का विषय था। ऐसे विद्वान, तपस्वी ब्राह्मण के कुल में ऐसा पातक, ऐसा घना अंधियारा।

पर आज का सच यही था। जो पंडित शशांक शर्मा के हितैषी थे, उन्होंने उनके पुत्र सुशान्त को समझाने, सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें की। लेकिन उन्हें कोई कामयाबी न मिली। बल्कि उल्टे उन्हें सुशान्त के मित्रों के हाथों अपमानित व तिरस्कृत होना पड़ा। यद्यपि उन सबने इसका कोई बुरा नहीं माना। क्योंकि इन सब पर पंडित शशांक शर्मा ने अनेकों उपकार किए थे। उनका हार्दिक स्नेह व अपनत्व इन सबने पाया था। अभी तक इनमें से किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? बचपन से इतना अधिक सदाचरण में निरत रहने वाले सुशान्त में यह विषाक्तता आयी कैसे? लेकिन इसका उत्तर अभी तक किसी के पास न था।

रही बात सुशान्त की तो वह अभी भी नगरवधू लावण्या के रूपजाल में उलझा था। लावण्या और उसके सहयोगी मिलकर सुशान्त का धन-वैभव लूट रहे थे। वासना का विष, द्युत-क्रीड़ा का व्यसन, वैरियों के प्रति द्वेष उसकी चिन्तन चेतना में हावी हो चुका था। नास्तिकों के संग साथ के कारण नारायण का पावन नाम कब का विस्मृत-विलीन हो चुका था। जितने भी हितैषी थे, वे सभी परेशान-हैरान थे। जितने कुटिल कुचाली थे, उनकी खुशी का कोई ठिकाना न था।’’ ब्रह्मर्षि क्रतु सुशान्त शर्मा की स्थिति का वर्णन-विवरण दिए जा रहे थे। अन्य सभी शान्त भाव से उन्हें सुन रहे थे। लेकिन अचानक न जाने क्यों महर्षि क्रतु ने देवर्षि की ओर देखते हुए कहा- ‘‘हे भक्तश्रेष्ठ! आप भक्ति का अगला सूत्र कहें। मेरा विश्वास है कि आपका अगला सूत्र भक्ति के आचारशास्त्र को और भी अधिक प्रकट व प्रकाशित करेगा।’’

महर्षि के इस कथन पर देवर्षि गम्भीर हुए और बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! आप परम भागवत हैं। आपसे अधिक भक्त के आचरण का ज्ञान किसे होगा? फिर भी आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं कहता हूँ’’-
‘अभिमानदम्भादिकं त्याज्यं’॥ ६४॥
अभिमान दम्भ आदि का त्याग करना चाहिए।

देवर्षि के इस सूत्र ने प्रायः सभी के चिन्तन सरोवर में अनेको विचारउर्मियों को अठखेलियाँ करने पर विवश कर दिया, हालांकि बोला कोई कुछ भी नहीं- सबके सब मौन बने रहे। काफी देर तक यूं ही नीरवता वातावरण में व्याप्त रही। फिर इस चुप्पी को तोड़ते हुए ऋषि क्रतु बोले- ‘‘जिस तरह से यह सच है कि भक्त को अभिमान व दम्भ आदि का त्याग कर देना चाहिए। उसी तरह से इस सच का दूसरा पहलू यह भी है कि भक्ति के अभाव में व्यक्ति अभिमान-दम्भ आदि से घिर जाता है जैसा कि सुशान्त शर्मा के जीवन में घटित हुआ।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५२


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बुधवार, 4 मई 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२७)

भक्ति का आचारशास्त्र

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की यह बात सुनेकर ऋषि क्रतु ने कहा- ‘‘इस सन्दर्भ में मुझे ब्राह्मणपुत्र सुशान्त शर्मा के जीवन की घटनाओं का स्मरण हो रहा है।’’ सुशान्त शर्मा का जीवनक्रम सम्पूर्ण तो नहीं, परन्तु थोड़ा-बहुत ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को भी पता था। उन्होंने भी इसे सुनने में अपनी रूचि दिखायी। ऋषि क्रतु कह रहे थे- ‘‘सुशान्त शर्मा का जन्म संस्कारवान ब्राह्मण कुल में हुआ था। यह ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रिय ब्राह्मणों का पावन कुल था। वेद-शास्त्र का पठन-पाठन, नित्य यज्ञ, अग्निहोत्र, भगवान नारायण की भक्ति, इस परिवार के सभी सदस्यों के जीवन के अनिवार्य व अविभाज्य अंग थे। यहाँ इस परिवार की नारियाँ भी नित्य त्रैकालिक संन्ध्या वंदन करती थीं। परिवार के सभी सदस्य यहाँ तक कि पालतु-पशु भी एकादशी के दिन निराहार रहते थे।

सुशान्त शर्मा को इस कुल के पावन संस्कार मिले थे। उसका जीवन अपने परिवार के सदस्यों के साथ आव्याहत गति से चल रहा था। लेकिन बीच में दैव का दुर्विपाक आ गया। क्रूर काल ने अपने कठोर कर्म विधान का कुटिल कुचक्र चलाया। सुशान्त शर्मा के पिता असमय बीमार हुए और चल बसे। उसकी माता, पिता का वियोग न सहन कर सकी और उन्होंने देह का त्याग कर दिया। अब तक सुशान्त किशोरवय का हो चुका था। रिश्तेदारों की दृष्टि उसके धन की ओर थी, सो उन्होंने किशोर सुशान्त को सत्पथ से जीवन के कुपथ पर लाने की सोची।

उभरते युवक सुशान्त से सुसंस्कार कुसंग के प्रभाव से धूमिल होने लगे। रिश्तेदारों व उनके सहयोगी मिलकर उसे नगरवधू लावण्या के रूप व यौवन के चर्चे सुनाने लगे। उसे बार-बार उकसाते कि एक बार वह रूपवती लावण्या के रूप को निहार ले। बार-बार लावण्या के रूप की चर्चा ने युवक सुशान्त के मन को डिगा दिया। उन लोगों ने उसे यह भी समझाया कि यदि वह द्यूत क्रीड़ा सीख ले तो अपने धन को थोड़े समय में कई गुना कर सकता है। जो लोग उसे ये सारी बातें बता रहे थे वे सबके सब नास्तिक थे। प्रकारान्तर से स्त्री, धन व नास्तिक का चरित्र उसके जीवन में घुलने लगा।

जैसे विष शरीर के रक्त प्रवाह में घुल जाता है, वैसे ही स्त्री, धन व नास्तिकता का विष उसके चिन्तन व भावनाओं में घुलने लगा। दिन-पक्ष व मास बीतते गए। धीरे-धीरे सुशान्त के सुसंस्कारों पर उसके कुसंगी संगी-साथियों के कुसंस्कारों का लेप चढ़ने लगा। उसकी अन्तर्चेतना में प्रकाश घटने लगा और अन्धकार की तीव्रता बढ़ती गयी। घर-परिवार और उसके माता-पिता के वैरी भी इस कुचक्र में शामिल हो गए। अब तो उसके अन्तर्मन में दोष और द्वेष की भरमार हो गयी।

हालांकि इसका प्रारम्भ स्त्रीचरित्र के श्रवण से ही हुआ था। रूपवती नगरवधू लावण्या के रूप की चर्चा ने उसे सम्मोहित कर दिया। इन कुटिल कुचक्र रचने वालों की प्रेरणा और इनके कुसंग से वशीभूत होकर आखिरकार वह एक दिन लावण्या के यहाँ चला गया। बस फिर क्या, कुसंग का विष तीव्र से तीव्रतर होता गया। धन की लालसा ने उसे द्युत की ओर मोड़ दिया। नास्तिकों के संग में नारायण स्मरण तो पहले ही विलीन हो चुका था। अब तो पुराने वैरी, जिसे उसने कभी देखा भी न था, उनसे बदला लेने की आग उसे झुलसाने लगी।

इस महाकल्मष में भक्ति, भक्त व भगवान की पावनता विलीन होने लगी। उसका चिन्तन-चरित्र व व्यवहार जो पहले आस्तिकता, धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की त्रिवेणी में नित्य स्नात रहता था, अब उसकी स्थिति परिवर्तित हो गयी। अब तो बस वासना, तृष्णा व अहंता ही बची थी। यहाँ तक कि स्त्री, धन, वैरी व नास्तिक के चरित्र में आकण्ठ डूब जाने के कारण उसे अब कभी याद भी नहीं रहता था कि बीते दिन वह नित्य यज्ञ-अग्निहोत्र भी किया करता था। एकादशी व्रत व नारायण नाम स्मरण तो अब शायद उसकी स्मृतियों में भी न बचे थे। काल प्रवाह में उभरी कर्म की कुटिल रेखाओं ने उसकी मति, गति व नियति बदल दी। चिन्तन, भाव एवं कर्म, सभी क्षेत्रों में विकृति फैल गयी। अब उसे जो देखता वही हैरान हो जाता। किसी को विश्वास भी न होता कि यही ब्राह्मणश्रेष्ठ शशांक का संस्कारवान पुत्र सुशान्त है। पर कोई क्या करता, स्त्री, धन, नास्तिक एवं वैरी के चरित्र का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है। इस फेर में उसके भविष्य के पथ पर अंधेरा घना होता जा रहा था।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४९

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मंगलवार, 3 मई 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२६)

भक्ति का आचारशास्त्र

श्रुतसेन की भक्तिकथा सभी के मन को भा गयी। सत्संग-सुसंग से भक्ति अंकुरित-पल्लवित-पुष्पित होती है। प्रह्लाद को देवर्षि का सुसंग मिला, जबकि श्रुतसेन ने भक्त प्रह्लाद का सत्संग पाया। इस सुसंग-सत्संग से दोनों के जीवन में भक्ति का प्रवाह प्रवाहित हो उठा। ऐसा पावन प्रवाह जिसमें जीवन के सभी कषाय-कल्मष, सांसारिक भावनाएँ व उनके संस्कार बह गए। बची रह गयीं तो केवल शुद्ध-भावनाएँ व भगवान का पावन नामस्मरण। भक्त प्रह्लाद की कथा तो प्रायः सभी पुराणाचार्यों ने अपने अनूठे अन्दाज में कही है। हाँ! श्रुतसेन की कथा अभी तक केवल देवर्षि नारद के स्मृतिकोष में सुरक्षित थी जिसे उन्होंने इन क्षणों में कहा और इसे सभी ने सुना।

सुनने के साथ सब ने सत्संग की महिमा गुनी और गायी। इसे सुनते-सुनते महर्षि पुलह तो पुलकित हो गए। वे भावविभोर हुए और बोल उठे- ‘‘भक्ति, भक्त और भगवान धन्य हैं और धन्य हैं उनकी कथा-गाथा।’’ इतना कह कर वे चुप हो गए। हालांकि उनके चेहरे के भावों से लग रहा था कि अभी वे और कुछ भी कहना चाहते हैं। इसे देखकर महर्षि क्रतु ने उनसे कहा- ‘‘आप कुछ और बोलें महर्षि! आपकी बातें आशीर्वचन की तरह हैं।’’ ऋषि क्रतु की ये बात सुनकर महर्षि पुलह पहले तो मुस्कराए, फिर कहने लगे- ‘‘सुसंग-सत्संग जितना भक्तिपथ के लिए सहायक हैं, वैसे ही कुसंग इसके लिए उतना ही घातक। भक्तिपथ के पथिक को कुसंग से, कुविचारों से दूर रहना चाहिए।’’

ऋषि क्रतु जब ये बातें कह रहे थे- तब देवर्षि उन्हें ध्यान से देख रहे थे। जब वह चुप हुए तो देवर्षि ने कहा- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! आपने तो अपनी बातों में भक्ति का आचारशास्त्र प्रकाशित कर दिया है। मैं अपने इस सूत्र में कुछ ऐसा ही कहना चाह रहा था।’’ ‘‘अवश्य कहें देवर्षि!’’ नारद के कथन के बीच में ही कई स्वर समवेत रूप से उभरे। इसे सुनकर देवर्षि ने कहा- ‘‘आप सब साधुजनों का मत शिरोधार्य है।’’ इतना कहते हुए उन्होंने वीणा के मधुर गुंजन के साथ कहा-

स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं न श्रवणीयम्॥ ६३॥
अर्थात् स्त्री, धन, नास्तिक और वैरी का चरित्र नहीं सुनना चाहिए।

देवर्षि का यह सूत्र सुनने के साथ कुछ देर तक नीरव मौन पसरा रहा। थोड़ी देर तक सब चुप बने रहे। फिर अन्ततः देवर्षि ने ही मौन तोड़ते हुए कहा- ‘‘मेरा निवेदन है कि ऋषिश्रेष्ठ क्रतु इस सूत्र पर कुछ कहें।’’ महर्षि क्रतु के मन में इस समय कहने लायक बहुत बातें थीं। देवर्षि के आग्रह ने उनके भावों को उद्वेलित कर दिया। उन्होंने साभिप्राय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की ओर देखा। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उनके अभ्रिपाय को समझते हुए कहा- ‘‘हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि आप सब भाँति से समर्थ व अनुभवी हैं। देवर्षि के इस सूत्र की व्याख्या आप अपने अनुभव के प्रकाश में करें।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४८

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२५)

लोक व्यवहार की मर्यादाओं से जुड़ी है भक्ति

श्रुतसेन की भक्तिगाथा सुनते हुए सभी के भावों में भक्ति की अनूठी लहर उठी। भक्ति के अमृतकण उनके अस्तित्त्व में बिखरने लगे। सुनने वालों के अन्तर्मन में अनोखी मिठास सी घुल रही थी। इस बीच देवर्षि दो पल के लिए रूके तो सभी को एक साथ लगा कि जैसे इस घुमड़ते-उफनते भावप्रवाह में अचानक कोई अवरोध आ गया। महर्षि क्रतु से तो रहा ही न गया। वह बोले- ‘‘देवर्षि! श्रुतसेन के बारे में कुछ अधिक सुनने का मन है।’’ ऋषि क्रतु के इस कथन की सहमति में अनेकों स्वर उभरे। जिसे सुनकर नारद ने कहा- ‘‘जिस तरह से आप सब वत्स श्रुतसेन के बारे में कुछ अधिक सुनना चाहते हैं, ठीक उसी तरह मैं उस महान भक्त के बारे में कुछ और अधिक कहना चाहता हूँ।’’

‘‘अहा! यह तो अति उत्तम बात हुई।’’ गन्धर्वश्रेष्ठ चित्रसेन ने सुमधुर स्वर में कहा- ‘‘भक्त का जीवन होता ही इतना पावन है। उसके जीवन के प्रत्येक घटनाक्रम एवं प्रसंग में भगवान की भक्ति एवं भगवान् की चेतना घुली होती है। इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष सान्निध्य जितना अधिक हो जीवन के लिए उतना ही श्रेष्ठ एवं शुभ है।’’ ‘‘निश्चित ही गन्धर्वराज चित्रसेन सर्वथा उचित कह रहे हैं।’’ गायत्री के महातेज को स्वयं में समाहित करने वाले विश्वामित्र ने कहा। उन्होंने देवर्षि नारद को स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखते हुए बोला- ‘‘हे भक्ति के आचार्य! सचमुच ही भक्ति से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। यह सत्य मैं स्वतः के अनुभव से कह सकता हूँ। मैंने स्वतः के जीवन में तप एवं ज्ञान के अनेक शिखरों को पार किया है। इनके सौन्दर्य से मैं अभिभूत भी हुआ हूँ। लेकिन भक्ति के सौन्दर्य के सामने यह सभी तुच्छ हैं।’’

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन की प्रायः सभी ने सराहना करते हुए उनकी विनम्रता एवं सदाशयता की प्रशंसा की। ऋषिमण्डल एवं देवमण्डल में सभी उनकी महानता से सुपरिचित थे। सभी को उनकी सामर्थ्य का ज्ञान था। इतना ही नहीं प्रायः सब को इस महान सत्य का भी पता था कि महर्षि का बाह्य व्यक्तित्व दुर्धर्ष तपस्वी एवं परम ज्ञानी का होते हुए भी उनका आन्तरिक व्यक्तित्व सुकोमल भक्त का है। भक्त, भक्ति एवं भगवान उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय है। यही वजह है कि वह भक्त श्रुतसेन के बारे में कुछ और जानना-सुनना चाहते थे।

देवर्षि नारद को भी यह सत्य पता था। इसलिए उन्होंने बिना एक क्षण की देर लगाए अपनी स्मृतियों के कोष को निहारा, जहाँ श्रुतसेन की सुनहली स्मृतियाँ अपनी स्वर्णिम आभा बिखेर रही थी। इसे समेटते हुए उन्होंने कहा- ‘‘सचमुच ही वत्स श्रुतसेन का व्यक्तित्व भगवान से ओत-प्रोत था। जो भी विपत्तियाँ उनके जीवन में आ रही थीं, उनसे वह तनिक भी विचलित न थे। बाधाओं, विषमताओं से उन्हें कोई भी शिकायत न थी। विनयशीलता तो उनमें कूट-कूट कर भरी थी। सम्राट हिरण्यकश्यप हों या फिर भार्गव शुक्राचार्य, इन दोनों का वह हृदय की गहराइयों से सत्कार व सम्मान करते थे।

ऐसे कई अवसर आए जब सम्राट हिरण्यकश्यप एवं भार्गव शुक्राचार्य को उनके विनय ने विचलित कर दिया। उन्होंने अपने सेवकों एवं शिष्यों को बड़ी कड़ाई से हिदायत देते हुए कहा, श्रुतसेन को मेरे सम्मुख न लाया करो। मुझे भय है कि कहीं उसका विनय, उसके द्वारा पूरी सच्चाई से किया सत्कार, मेरे हृदय को ही न परिवर्तित कर दे। अलग-अलग अवसरों पर यह सत्य सम्राट हिरण्यकश्यप एवं भार्गव शुक्राचार्य दोनों ने ही शब्दों की थोड़ी फेर-बदल के साथ व्यक्त किया। श्रुतसेन के इस अनूठे लोकव्यवहार पर स्वयं मुझे भी आश्चर्य हुआ।

इसलिए जब मैं उससे मिला तो जानना चाहा- वत्स! तुम इतनी विषमाताओं में इतना लोकव्यवहार किस तरह से निभा लेते हो? उत्तर में श्रुतसेन ने हल्की सी मधुर मुस्कान से साथ कहा- देवर्षि! यह सब बहुत आसान है। हृदय में भक्ति का उदय हो जाय तो फिर लोकव्यवहार में कोई अड़चन नहीं रहती। उसका पहला कारण यह है कि भक्त को अपने भगवान के सिवा अन्य कोई चाहत नहीं रहती। इसका दूसरा कारण यह है कि भक्त सभी में अपने आराध्य को ही निहारता है और भक्त कभी भी अपने आराध्य के साथ कठोर तो हो ही नहीं सकता।

श्रुतसेन की ये बातें उसी क्षण मेरे दिल को छू गयीं। मैंने सोचा जब श्रुतसेन जैसे सिद्धभक्त इतना लोकव्यवहार निभाते हैं तब उन्हें तो लोकव्यवहार का पालन करना ही चाहिए, जिन्होंने अभी भक्ति के मार्ग में पाँव रखा है। फिर उसी पल मेरे हृदय में इस भक्ति सूत्र का आविर्भाव हुआ-

‘न तदसिद्धौ लोकव्यवहारौ हेयः
किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव’॥ ६२॥

जब तक भक्ति में सिद्धि न मिले, तब तक लोक व्यवहार का त्याग नहीं करना चाहिए बल्कि फलत्याग कर, निष्काम भाव से उस भक्ति का साधन करना चाहिए।

श्रुतसेन से बातें करते हुए, अनायास ही यह सूत्र मेरे मुख से उच्चारित हो गया। इसे सुनकर श्रुतसेन ने साधु! साधु!! अतिश्रेष्ठ!!! ऐसा कहते हुए मेरी सराहना की। तब मैने पूछा- वत्स! इसमें सराहना की क्या बात है? उत्तर में उन्होंने कहा- देवर्षि! सराहना सूत्र के शब्दों की नहीं बल्कि इनमें निहित गूढ़ अर्थ की है। ऐसा क्या गूढ़ अर्थ अनुभव किया तुमने? इस पर श्रुतसेन ने कहा- भक्ति की महाबाधा अहंकार है। जो लोकव्यवहार की मर्यादाओं एवं वर्जनाओं का सम्मान करता है, उसका अहंकार स्वतः ही विगलित हो जाता है। इस अहंता के साथ दो अन्य बाधाएँ वासना एवं तृष्णा भी स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं क्योंकि लोकव्यवहार की प्रायः सभी मर्यादाएँ एवं वर्जनाएँ इन्हीं तीनों वासना, तृष्णा एवं अहंता के नियमन व नाश के लिए हैं।

जो भी भगवत्स्मरण करते हुए लोकव्यवहार की मर्यादाओं एवं वर्जनाओं को हृदय से मान लेता है, उसके लिए भक्ति का सुपथ स्वतः ही प्रकाशित हो जाता है। सच कहें तो देवर्षि! लोकव्यवहार एवं भक्ति का परस्पर कोई विरोध है ही नहीं, बल्कि उल्टे ये दोनों तो एक दूसरे के परस्पर सहयोगी एवं पूरक हैं। सारी लोकमर्यादाएँ एवं वर्जनाएँ इसलिए हैं कि परिवार एवं समाज के कलह एवं संघर्ष को मिटाया जा सके। गहराई से देखें तो कलह एवं संघर्ष का कारण सुख की चाहत है। व्यक्ति में सुख की चाहत असीमित एवं समाज में सुख के साधन सीमित। अब सुख के साधन तो असीमित किए नहीं जा सकते। हाँ! सुख की चाहत अवश्य नियंत्रित की जा सकती है। लोकव्यवहार की सभी मर्यादाएँ एवं वर्जनाएँ इसी उद्देश्य के लिए हैं।

श्रुतसेन का यह चिन्तन देवर्षि को बहुत भाया। वह कुछ और अधिक सोच पाते, इससे पहले ही अपनी वार्ता के सूत्र को आगे बढ़ाते हुए श्रुतसेन ने कहा- भक्त का सुख तो अपने भगवान में होता है। भक्त की भक्ति स्वतः ही उसकी वासना, तृष्णा एवं अहंता को नियंत्रित व रूपान्तरित कर देती है। ऐसी स्थिति में लोकव्यवहार उसके लिए सर्वदा सुलभ एवं सहज हो जाता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४६

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गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२४)

भक्त को लोकहानि की कैसी चिन्ता

इसे सुनकर देवर्षि ने वीणा की मधुर झंकृति के साथ उच्चारित किया-
‘लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात्’॥ ६१॥

लोकहानि की चिन्ता (भक्त) को नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह (भक्त) अपने आपको और लौकिक-वैदिक (सब प्रकार के) कर्मों को भगवान को अर्पण कर चुका है।
सूत्र के उच्चारण के साथ देवर्षि नारद के मन में ब्राह्मणकुमार श्रुतसेन की स्मृति और भी सघन हो गयी। उनके मन मानस में चलती इस विचार श्रृंखला को ऋषि पुलह भली-भांति समझ पा रहे थे। तभी तो उन्होंने फिर से देवर्षि नारद को याद कराया- ‘‘किसकी स्मृतियाँ आपकी भावनाओं को भिगो रही हैं।’’ पुलह के इस कथन पर देवर्षि ने अश्रु पोंछते हुए कहा- ‘‘सचमुच ही ऋषिश्रेष्ठ। मुझे प्रह्लाद के प्रिय सखा श्रुतसेन की स्मृतियों ने घेरा हुआ है। अभी मैंने अपने इस सूत्र में जिस सत्य की चर्चा की, वह उसका मूर्त रूप था।’’ वहाँ उपस्थित जन इस सत्य से सुपरिचित थे कि भक्त, भक्ति व भगवान की स्मृति देवर्षि को विभोर करती है। साथ ही असत्य तो कभी देवर्षि का स्पर्श ही नहीं करता।

सभी के मन में प्रह्लाद के प्रिय सखा श्रुतसेन की भक्तिकथा जानने की जिज्ञासा तीव्र हो उठी। देवर्षि ने भी बिना कोई देर लगाए कहना शुरू किया- ‘‘श्रुतसेन की भक्ति अतुलनीय थी। उसके लिए उसके आराध्य ही जीवन थे। प्रह्लाद के साथ ही श्रुतसेन को भी सम्राट हिरण्यकश्यप एवं भार्गव शुक्राचार्य का कोपभाजन बनना पड़ा। उसे गहरी शारीरिक एवं अनेक मानसिक यातनाएँ दी गयीं। उसके परिवार को भी अकारण पीड़ित होना पड़ा। एक तरफ शुक्राचार्य के प्रचण्ड तांत्रिक प्रहार उस पर होते तो दूसरी ओर सम्राट के सैनिक उसे व उसके परिवार को पीड़ित करते। एक बार प्रह्लाद ने उससे पूछा भी- हे मित्र! तुम्हे भय तो नहीं लगता तो उत्तर में वह हँस पड़ा और बोला- मैंने इतना जान लिया है कि नारायण की इच्छा के बिना इस सृष्टि में कभी कुछ भी घटित नहीं होता।

भक्त का जीवन तो भगवान के लिए सदा विशेष होता है। उसके जीवन में कोई भी घटनाक्रम घटित हो, किसी के भी द्वारा घटित हो, पर यथार्थ में सब कुछ भगवान के अनुसार ही घटित होता है। अन्य सब तो बस केवल कठपुतलियाँ हैं जो भगवान के मंगलमय विधान को रचित करने व घटित होने में सहयोग देते हैं। कहीं कोई दोषी होता ही नहीं। भगवान जिसे अपने प्रिय भक्त के लिए उचित एवं आवश्यक समझते हैं, उसे ही किसी न किसी माध्यम से अपने भक्त तक पहुँचा देते हैं। इसलिए मैं तो सदा-सर्वदा भगवत्कृपा की ही अनुभूति करता हूँ। श्रुतसेन की बात सुनकर प्रह्लाद को बड़ा सन्तोष हुआ। इसी के साथ श्रुतसेन के कष्ट तीव्र होते गए। रिश्ते-नाते छूटे-टूटे, लोकापवाद की बाढ़ सी आ गयी। सम्पदा जाती गयी, विपदा आती गयी पर श्रुतसेन सर्वथा निश्चिन्त था। कुछ दिनों तक उसे कारागार में रखने के बाद उसे गहन डरावने वन में छोड़ दिया। लेकिन इतने पर भी न तो उसकी प्रसन्नता कम हुई और न ही उसका ईश्वरविश्वास घटा।’’

श्रुतसेन की कथा सुनाते-सुनाते ऋषिवर थोड़ा ठहरे और फिर आगे बोले- ‘‘इन विपदाओं में भी वह भगवान नारायण के प्रति कृतज्ञ भाव से प्रार्थना करता- हे भगवान! मैं अति सौभाग्यशाली हूँ, जो मुझे आपने विपदाओं का वरदान देने के लिए चुना है। हे प्रभु! मेरा तो सभी कुछ आपका है, फिर इसका आप मेरे साथ चाहे जो और जैसे करें। श्रुतसेन के जीवन की विपत्तियों के साथ श्रुतसेन का चित्त, चिन्तन एवं चेतना नारायण में निमग्न होती गयी। इस अवस्था में भला नारायण उनसे कैसे दूर रह पाते सो वे भी अपने प्रिय भक्त श्रुतसेन के चित्त व चेतना में विहार करने लगे। सर्वसमर्पण का यही सुफल होना था। जो लोक और वेद को अपने प्रभु के लिए छोड़ देता है, प्रभु सदा के लिए उसके अपने हो जाते हैं। श्रुतसेन के अस्तित्व एवं व्यक्तित्व में भक्ति का यही सत्य मुखर हुआ।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४४

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२३)

भक्त को लोकहानि की कैसी चिन्ता

भक्त प्रह्लाद की भक्तिकथा को सुनकर सबके मन आह्लादित हो उठे। उन क्षणों में वहाँ सभी के मनों में एक ही सत्य स्पन्दित होने लगा कि सच्चा भक्त कभी चिन्तित नहीं होता। फिर भला ऐसा हो भी क्यों न? जिसकी सारी चिन्ताओं का भार स्वयं भगवान वहन करें, वह क्यों चिन्तित हो। वैसे भी भक्त का दायित्व अपने भगवान का सतत चिन्तन करना है, व्यर्थ की चिन्ता करना नहीं। इन्हीं विचार वीथियों में सभी की मानसिक चेतना देर तक भ्रमण करती रही। इन भक्ति तरंगों के संग-संग ऋषिमण्डल व देवमण्डल सहित अन्य जनों ने भी अपना सन्ध्या वन्दन सम्पन्न किया। ऐसा करते हुए भगवान् सूर्यदेव धरती के दूसरी छोर पर प्रकाश, प्रखरता एवं पवित्रता का वितरण करने के लिए प्रस्थान कर गए। उनके प्रस्थान करते ही नील गगन में निशा देवी के धीमे पगों की आहट सुनायी देने लगी। इसी के साथ उनका तारों जड़ा श्याम परिधान समूचे नभमण्डल पर छा गया।

क्षण बीते-पल बीते। इसी के साथ नभ में चन्द्रोदय हो गया और तब भगवती निशा का श्याम परिधान धवल चन्द्रिका में नहा उठा। यह सर्वथा अनूठा व अनोखा दृश्य था। हिमालय के रजत शृंगों पर निशानाथ राशि की राशि चाँदनी उड़ेलने लगे। आस-पास के पर्वत शिखरों से प्रवाहित होने निर्झर, चन्द्रदेव की चन्द्रिका को अपनी जलराशि में समेटने-घोलने एवं प्रवाहित करने लगे। ऋषियों-देवों, सिद्धों व गन्धर्वों का समुदाय इस मनमोहक दृश्य को निहार रहा था। यह मनोहर दृश्य उनके भावों में और भी अधिक पुलकन उत्पन्न कर रहा था। देवर्षि नारद को अभी भी अपने प्रिय प्रह्लाद की स्मृतियाँ घेरे थीं। इन्हीं स्मृतियों में एक मीठी सी याद ब्राह्मण कुमार श्रुतसेन की भी उभरी। उन्हें याद आने लगा कि श्रुतसेन सदा प्रह्लाद के साथ अपना समय व्यतीत करते थे। नारायण नाम संकीर्तन में सबसे आगे थे। भार्गव शुक्राचार्य का शिष्य होने के बावजूद उसमें तमस व रजस का लेश भी न था। उसमें थी तो केवल शुद्ध सात्त्विकता।

भगवान श्रीनारायण के नाम का सत्प्रभाव कहें या फिर पिछले जन्मों के शुभ संस्कारों से मिली प्रतिभा अथवा भार्गव शुक्राचार्य जैसे महामनस्वी आचार्य के सान्निध्य का सुफल, वह देवशास्त्र, दर्शन, उपनिषद् आदि के साथ अन्य सभी विद्याओं व कलाओं में पारंगत हो गया। शुक्राचार्य चाहते थे कि श्रुतसेन अपने जीवन की सभी उपलब्धियों को उनकी कृपा माने। जाने-अनजाने बार-बार वह यह प्रयास भी करते पर श्रुतसेन बार-बार विनम्रतापूर्वक दुहरा देता, गुरुदेव सभी कुछ आपके आशीष एवं भगवान् नारायण की मंगलमय कृपा से सम्भव हो सका है। श्रुतसेन के इस कथन से शुक्राचार्य का अहं आहत हो जाता। यहाँ तक कि वह अपने चोटिल अहं के साथ श्रुतसेन का अनिष्ट करने पर विचार करने लगते।
देवर्षि को अभी भी वे सारी बातें याद थीं। बल्कि यूं कहें कि वे सारी बातें उनके मन के क्षितिज पर अपने आप ही उभर रही थीं। देवर्षि इन्हीं में स्वयं को पता नहीं कब तक भूले रहते, यदि महर्षि पुलह ने उन्हें टोका न होता। महर्षि उन्हें काफी देर से देखे जा रहे थे। कुछ देर तक यूं ही देखते रहने के बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा- ‘‘किस चिन्तन में खोये हैं देवर्षि!’’ ऋषिश्रेष्ठ पुलह के इस तरह टोकने पर देवर्षि कुछ बोल तो नहीं पाये बस मुस्करा दिए। तभी महात्मा सत्यधृति ने विनम्र स्वर में कहा- ‘‘हम सबको आपके अगले सूत्र की प्रतीक्षा है।’’ ‘‘यह सत्य है।’’ ऐसा कहते हुए अनेकों ने सत्यधृति का समर्थन किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४३

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गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२२)

शान्ति और परमानन्द का रूप है भक्ति

इतना कहने के बाद देवर्षि ने वहाँ उपस्थित जनों की ओर देखा और बोले- ‘‘यदि आप सब श्रेष्ठजन अनुमति दें तो भक्तश्रेष्ठ प्रह्लाद का कथाप्रसंग कहूँ।’’ प्रह्लाद का नाम सुनकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ तथा विश्वामित्र तो रोमांचित हो उठे। वे दोनों लगभग एक साथ ही बोले- ‘‘भक्त प्रह्लाद धन्य हैं, उनके स्मरण से ही मन पावन हो जाता है। उनके बारे में कहना-सुनना जन्म व जीवन को धन्य करता है।’’ वशिष्ठ एवं विश्वामित्र के कथन ने देवर्षि नारद को उत्साहित किया। वे कहने लगे- ‘‘भक्त प्रह्लाद का जन्म मेरे ही आश्रम में हुआ था। मैं जानता हूँ कि जीवन की जटिलताएँ व समस्याएँ उनके जन्म से पहले ही उनके जीवन में थीं। अलौकिक चमत्कारी सिद्धियों एवं प्रचण्ड तान्त्रिक शक्तियों के स्वामी भार्गव शुक्राचार्य एवं त्रिलोकविजयी परम समर्थ सम्राट हिरण्यकश्यप ने उनसे अकारण वैर पाल रखा था।

निर्दोष प्रह्लाद उनकी दृष्टि में दोषी थे। यदि उनका कोई दोष था तो वह थी केवल उनकी भक्ति की भावना। नारायण नाम के स्मरण में लीन रहने वाले प्रह्लाद को विनष्ट करने के लिए ये दोनों कृतसंकल्पित थे। इनकी अनेकों समर्थ शक्तियों के सामने प्रह्लाद के पास केवल प्रभुनाम व प्रभुभक्ति का सहारा था। उनका विश्वास उनकी निष्ठा, उनकी श्रद्धा, उनकी आस्था- बस यही भक्त प्रह्लाद की दिव्य शक्तियाँ थीं। प्रह्लाद इन्हीं को अपना अमोघ कवच मानते थे। जबकि भार्गव शुक्राचार्य एवं उनके शिष्य सम्राट हिरण्यकश्यप दोनों इनका उपहास उड़ाते थे। मृतसंजीवनी विद्या के आचार्य शुक्र को अपनी अलौकिक शक्तियों एवं तंत्र विज्ञान पर भरोसा था। उनकी सोच थी कि उनकी प्रचण्ड शक्तियों के सामने यह भोला-मासूम बालक भला क्या कर लेगा?

इसी सोच के बलबूते अपनी शक्ति के दम्भ में उन्मत्त भार्गव शुक्राचार्य प्रह्लाद पर एक के बाद एक कड़े प्रहार करने लगे। कभी तो वह पुत्तलिका प्रयोग करते, तो कभी वह कृत्या का विनाशक प्रयोग करते। इधर सम्राट हिरण्यकश्यप भी पीछे न था। उसने राक्षसों को प्रह्लाद को यातनाएँ देने के लिए नियुक्त कर रखा था। ये राक्षस कभी तो प्रह्लाद को पर्वत की ऊँचाई से गिरा देते। कभी वे उन्हें समुद्र में फिकवा देते। कभी वे इन्हें हाथियों के झुण्ड के पाँवों के नीचे डाल देते। इन महासमर्थ एवं अति पराक्रमी तथा अजेय समझे जाने वाले इन गुरु-शिष्य के कृत्यों को जो देखता वही सहम जाता। पर नारायण नाम को अपना आश्रय मानने वाले प्रह्लाद सर्वथा निर्भय एवं निश्चिन्त थे। उन्हें न तो कोई चिन्ता थी और न डर।

उनकी माता कयाधू सदा अपने लाडले के लिए चिन्तित एवं भयभीत रहती। प्रह्लाद जब-तब उसे समझाया करते, माता चिन्ता की कोई बात नहीं। भगवान नारायण हैं न। मेरे प्रभु सदा भक्तवत्सल हैं। रही बात विपदाओं-विपत्तियों की तो ये केवल भक्त की ही परीक्षा नहीं लेती, इन क्षणों में परीक्षा भगवान की भी होती है। भक्त की परीक्षा इस बात की होती है कि भक्त की निष्ठा, श्रद्धा, आस्था कितनी सच्ची व अडिग है। भगवान की परीक्षा इस बात की होती है कि वे कितने भक्तवत्सल एवं कितने समर्थ हैं। ये बातें अपनी माता को समझाते हुए प्रह्लाद हँस देते और कहते- माता कोई भी विपदा भगवान से बड़ी नहीं होती। मेरे ऊपर आचार्यश्री एवं पिताश्री ने अब तक जो भी विनाशक प्रहार किए हैं, उससे यही प्रमाणित हुआ है। इसीलिए मैं सर्वथा शान्त एवं परमानन्द में मग्न रहता हूँ। मुझे चिन्ता तो बस पिताश्री के लिए होती है कि कहीं सर्वसमर्थ प्रभु उनके इस आचरण के लिए उन पर कुपित न हो जाएँ।

प्रह्लाद की इन बातों को सुनकर उनकी माता कयाधू को थोड़ी आश्वस्ति मिलती, लेकिन थोड़ी देर बाद वे पुनः चिन्ता में पड़ जातीं। कई बार ऐसा भी हुआ कि उन्होंने मुझे बुलवाया अथवा वह स्वयं मुझसे मिलने आयीं। जब भी वे मुझसे मिलतीं, उनकी चिन्ता पराकाष्ठा पर होती। उनकी इस चिन्ता को देखकर मैं सर्वदा उनसे कहता- चिन्ता न करो महारानी! भगवान कभी भी अपने प्रिय भक्त को अकेला नहीं छोड़ते। भक्त सदा-सर्वदा अपने इष्ट-आराध्य की गोद में रहता है। यह किसी को दिखे अथवा न दिखे परन्तु सत्य यही है। सम्राट हिरण्यकश्यप एवं भार्गव शुक्राचार्य इसे भले न देख सकें लेकिन प्रह्लाद हमेशा ही अपने नारायण की गोद में हैं। इतना ही नहीं मैंने उन्हें यह भी बताया कि एक सत्य यह भी जान लें महारानी कि केवल प्रह्लाद के हृदय में ही नारायण नहीं बसते, भगवान नारायण के हृदय में भी अपने प्रिय प्रह्लाद का वास है।

भगवान का अपने भक्त से सतत जुड़ाव ही भक्त को सर्वथा शान्त एवं परमानन्द में मग्न रहता है। महारानी कयाधू मेरी बातें सुनतीं एवं मौन रहतीं। हाँ! उनकी चिन्ता भय एवं निराशा जरूर कम हो जाते पर प्रह्लाद तो सर्वथा निश्चिन्त थे। समय बीतता गया सम्राट एवं आचार्य के अत्याचार बढ़ते गए और एक दिन भक्त प्रह्लाद की आस्था ने स्तम्भ को फाड़कर नृसिंह रूप में स्वयं को प्रकट कर दिया। भगवान नृसिंह के विकराल रूप एवं भयावह गर्जन के सामने हिरण्यकश्यप तो मूर्छित सा हो गया। रही बात भार्गव शुक्राचार्य की तो वे भय के मारे कहीं जा छुपे। परन्तु प्रह्लाद तो अपने भगवान को सम्मुख पा हर्षित थे। भगवान ने पल भर में अपने भक्त की सभी समस्याएँ मिटा दीं। इसलिए जो भक्तिपथ पर चलता है उसे किसी भी समस्या के बारे में चिन्तित नहीं होना पड़ता।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४१

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सोमवार, 18 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२१)

शान्ति और परमानन्द का रूप है भक्ति

गन्धर्वराज चित्रकेतु की जिज्ञासा और महात्मा सत्यधृति के उत्तर ने सभी के अन्तस को स्पन्दित किया। प्रायः सभी के मानससरोवर में विचारों की अनेकों उर्मियाँ उठीं और विकीर्ण हो गयीं। इन विचारउर्मियों की अठखेलियों से घिरे गन्धर्व श्रुतसेन सोच रहे थे कि भक्ति भावों को परिष्कृत करती है, व्यवहार में व्यक्ति को अपेक्षाकृत अधिक उदार व सहिष्णु बनाती है, यहाँ तक तो ठीक है लेकिन जीवन की परिस्थितियाँ यहीं तक सीमित नहीं हैं। इनकी जटिलता और समस्याओं के संकट जब-तब जिन्दगी को क्षत-विक्षत करते हैं। अनगिनत प्रश्नों के कंटक रह-रहकर चुभते रहते हैं। इनकी चुभन की टीस से कैसे छुटकारा मिले। वैसे भी दुनिया की रीति बड़ी अजब है। यहाँ शक्तिसम्पन्न को सर्वगुणसम्पन्न माना जाता है जबकि भावनाशील गुणसम्पन्न जनों को ठोकर खाते अपमानित होता देखा जाता है।

गन्धर्व श्रुतसेन अपनी इन्हीं विचारवीथियों में विचरण कर कर थे। उनका ध्यान किसी अन्य ओर न था, जबकि कुछ अन्य जन उनके मुख पर आने वाले भावों के उतार-चढ़ावों को ध्यान से देख रहे थे। इन ध्यान देने वालों में गन्धर्वराज चित्रसेन भी थे। उन्होंने इन्हें हल्के से टोका भी, ‘‘क्या सोचने लगे श्रुतसेन? कोई समस्या है तो कहो? यह महर्षियों, सन्तों, भक्तों व समर्थ सिद्धजनों की सभा है। यहाँ सभी समस्याओं का समाधान सम्भव है।’’ गन्धर्वराज चित्रसेन के इस कथन पर श्रुतसेन ने बड़ी विनम्रता से कहा- ‘‘आपका कथन सर्वथा सत्य है महाराज। मैं आपसे पूर्णतया सहमत हूँ, साथ ही मैं यह भी जानता हूँ कि यह महासभा न केवल समर्थ जनों की है, बल्कि अन्तर्यामी जनों की भी है। यहाँ विराजित महर्षि जन, सन्त और भगवद्भक्त सभी अन्तर्मन की वेदना एवं अरोह-अवरोह को जानने में समर्थ हैं। उनकी इस क्षमता पर भरोसा करके ही मैंने कुछ नहीं कहा।’’
श्रुतसेन के इस कथन पर देवर्षि नारद हल्के से मुस्करा दिये और बोले- ‘‘यदि आप सब की आज्ञा हो तो मैं अपना अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ ‘‘अवश्य!’’ सभी ने प्रायः एक साथ कहा। इसी के साथ देवर्षि नारद की मधुर वाणी से यह सूत्र उच्चारित हुआ-

‘शान्तिरूपात्परमानन्द रूपाच्च’॥ ६०॥
भक्ति शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है।

इस सूत्र के उच्चारण के साथ देवर्षि नारद ने गन्धर्व श्रुतसेन को देखा और फिर मुस्करा दिए। इसके बाद वह दो क्षण रूके और बोले- ‘‘जीवन की जटिलताएँ व समस्याओं के संकट शान्ति छीनते हैं और यह सच तो जग जाहिर है कि जिसकी शान्ति छिन गयी वह कभी भी सुखी नहीं हो सकता। जबकि भक्त की स्थिति थोड़ा सा अलग है। जिन्दगी की कोई जटिलता या समस्या उसकी शान्ति नहीं छिन सकती।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३९

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शनिवार, 16 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२०)

भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नही

इतना कहते हुए वे थोड़ी देर के लिए आत्मलीन हुए फिर बोले- ‘‘भक्ति-भगवान भुवनभास्कर की भाँति है। सूर्य उदय हुआ, यह किसी को कहना-बताना, जताना नहीं पड़ता। सूर्य के प्रवेश मात्र से अंधियारा हटने-मिटने लगता है। दिशाएँ प्रकाशित हो जाती हैं। वृक्ष-वनस्पतियों, लताओं, बेलों में नयी चेतना गीत गाने लगती है। पशु-पक्षी से लेकर मनुष्य तक सभी स्वयं में नया जागरण अनुभव करने लगते हैं। सूर्योदय होने भर से धरती-जगती में नए प्राण आ जाते हैं।

कुछ ऐसी ही स्थिति भक्ति की है। भक्ति का अंकुरण, जीवन के समग्र रूपान्तरण का प्रारम्भ है। भक्ति जैसे-जैसे विकसित होती है, जीवन वैसे-वैसे रूपान्तरित होता है। व्यक्ति के चरित्र-चिन्तन-व्यवहार में एक नवीन प्रकाश व प्रभा छा जाती है।’’ ऐसा कहते हुए महात्मा सत्यधृति थोड़ी देर के लिए रुके फिर बोले- ‘‘इस महासत्य को देवर्षि से बढ़कर और कौन जानेगा? किसने और कब सोचा था कि रत्नाकर रूपान्तरित होकर ऋषियों के लिए भी पूजनीय महर्षि वाल्मीकि बन जाएँगे?’’

‘‘भक्ति से समग्र रूपान्तरण का रहस्य क्या है? महात्मन्!’’ गन्धर्व चित्रकेतु ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की। एक क्षण के लिए सभी की दृष्टि चित्रकेतु की ओर उठी परन्तु उसमें प्रशंसा के भाव थे। सम्भवतः इसलिए क्योंकि इसमें अनेकों जिज्ञासाओं का सहज समावेश था। इसके उत्तर में महात्मा सत्यधृति ने कहा- ‘‘हे गन्धर्वश्रेष्ठ! भक्ति के दो चरण हैं-१. स्मरण, २. समर्पण। भगवत्स्मरण से स्वाभाविक ही चित्त परिशुद्ध होता है। ईश्वरस्मरण सतत होता चले तो चित्त से संस्कार, संचित कर्म, प्रारब्ध स्वाभाविक ही हटते-मिटते जाते हैं और ईश्वर के प्रति नित्य समर्पण हो तो अहंता स्वयं ही विगलित होकर मिट जाती है। और ज्यूँ ही, जहाँ भी, जिस किसी के जीवन में ऐसा हुआ, वहाँ ईश्वरीय चेतना, प्रकाश का अवतरण सहज हो जाता है फिर इस सहजता में रूपान्तरण भी सहज, समग्र एवं सम्पूर्ण हो जाता है। इसीलिए तो कहते हैं कि भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसकी उपस्थिति स्वयं ही अपना प्रमाण बनती है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३७

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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग ११९)

भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नही

हांलाकि देवर्षि अभी तक चुप थे, परन्तु उनकी इस चुप्पी को ऋषि विश्वामित्र ने तोड़ने का प्रयास करते हुए कहा- ‘‘देवर्षि! हम सभी को आपके नए भक्तिमन्त्र की प्रतीक्षा है।’’ ‘‘यह हमारा अहोभाग्य है ब्रह्मर्षि!’’ देवर्षि ने प्रसन्नतापूर्वक कहा और इसी के साथ वीणा की मधुर झंकृति के साथ उन्होंने अपने नए भक्तिसूत्र का सत्योच्चार किया-
‘प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात्’॥ ५९॥

क्योंकि भक्ति स्वयं प्रमाण स्वरूप है, इसके लिए अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

देवर्षि का यह सूत्र सभी को बहुत भाया। परन्तु कोई कुछ बोला नहीं, सभी मौन बने रहे। इस बार महात्मा सत्यधृति भी शान्त रहे, सम्भवतः वह इस नए भक्तिमन्त्र का मनन करने लगे। उनको यूं मौन बैठे देख ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से रहा न गया। उन्होंने अनुरोध व आग्रहपूर्ण स्वर में कहा- ‘‘हे महात्मन्! आप देवर्षि के इस सूत्र पर कुछ कहें।’’ विश्वामित्र के इस आग्रह पर महात्मा सत्यधृति ने विनम्रतापूर्ण स्वर में कहा- ‘‘हम पिछले कुछ सूत्रों पर अपनी सम्मति व अनुभव व्यक्त करते रहे हैं। इस बार कुछ कहने से कुछ सुनने की चाहत अधिक है।’’ इस बार वार्ता के सूत्र को ऋषि श्रेष्ठ वशिष्ठ ने पकड़ा और कहा- ‘‘हम सभी आपकी इस चाहत का सम्मान करते हैं। परन्तु आपसे कुछ और सुनने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहे। सम्भवतः मेरे इस कथन से अन्य सब भी, और भ्राता नारद भी सहमत हैं।’’ ‘‘निश्चय ही।’’ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के इस कथन का सभी ने एक स्वर से अनुमोदन किया। देवर्षि नारद ने लगभग हँसते हुए कहा- ‘‘मेरी तो विशेष रूप से यह इच्छा है।’’

अब तो इतने प्रबल आग्रह व अनुरोध को स्वीकार करने के अलावा अन्य कोई उपाय न था। महात्मा सत्यधृति ने सम्पूर्ण विनयशीलता के साथ इसे स्वीकार तो किया, परन्तु साथ ही यह निवेदन भी किया कि इस सूत्र के  बाद मुझे भक्ति-श्रवण का सुअवसर प्रदान किया जाय। महात्मा सत्यधृति के इस कथन पर सब हँस पड़े और हास्य के स्वर में बोले- ‘‘महात्मन्! आपका आदेश सिर माथे पर किन्तु आज तो आप हमें श्रवण का सुअवसर प्रदान करें।’’ यह सुनकर सत्यधृति बोले- ‘‘आप सब तत्त्ववेत्ता, ज्ञानी, तपस्वी, योगी हैं। भक्ति की भावना आप सबके व्यक्तित्व में रची-बसी है। आप सभी का सान्निध्य मुझे एक साथ सुलभ हो सका, यही मेरा अहोभाग्य। सम्भवतः यह भी भक्ति के संस्पर्श का प्रभाव है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३५

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बुधवार, 13 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग ११८)

भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नही

महात्मा सत्यधृति के मुख से भक्त विमलतीर्थ के अनुभव सुनकर सभी भावलीन हो गए। भावनाएँ-भावनाओं को छूती हैं, इनके स्पर्श से अस्तित्त्व व व्यक्तित्त्व के केन्द्र में एक रहस्यमय हिलोर उठती है, जो समूचे व्यक्तित्व को स्पन्दित करती चली जाती है। भक्तिमन्त्र के द्रष्टा ऋषि नारद भक्तितत्त्व के परम अनुभवी व मर्मज्ञ थे। वे जानते थे कि भक्ति-भावनाओं का परिमार्जन-परिष्कार व रूपान्तरण करने में समर्थ है। बस आवश्यकता इसके सम्यक प्रयोग की है। जिसने भी जब यह प्रयोग जहाँ कहीं भी किया उसे सफलता अवश्य मिली। इसमें कहीं किसी तरह की विकलता, असफलता की कोई गुंजाइश ही नहीं।

देवर्षि नारद अपनी लय में सोचे जा रहे थे। अन्य सभी भी अपनी विचारविथियों में भ्रमण कर रहे थे। बाहर सब ओर मौन छाया था। पर्वत शिखर, उत्तुंग वृक्ष, औषधीय वनस्पत्तियाँ, यहाँ तक वन्य पशु सभी शान्त व स्थिर थे। कहीं से कोई स्वर नहीं था। ऐसा लग रहा था कि सारे रव, नीरव में समाहित हो गए हैं। काफी देर तक ऐसा ही बना रहा। पल-क्षण बीतते गए, परन्तु भक्ति की भावसमाधि यथावत बनी रही। लेकिन तभी अब तक स्तम्भित रही वायु मन्दगति से बह चली और धीरे-धीरे उसमें हिमपक्षियों के स्वर घुलने लगे। थोड़ी देर बाद हिमालयी वन्य पशुओं ने भी उसमें अपना रव घोला। वातावरण में ऐसी चैतन्यता अचानक उभरी, जैसे कि समूची प्रकृति अपनी समाधिलीनता त्यागकर अपने बाह्य जगत के कर्त्तव्यों के प्रति सजह, सचेष्ट हो गयी हो।

इस नयी स्थिति को अपने अनुभव में समेटते हुए महर्षि पुलह मुस्करा उठे। उनकी यह मुस्कराहट ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के मन को बेध गयी। उन्होंने बड़े मन्द स्वर में  ऋषि पुलह से पूछा- ‘‘महर्षि अचानक आपकी इस मुस्कराहट का कोई प्रयोजन तो नहीं?’’ उत्तर में ऋषि पुलह ने पुनः अपनी उसी मुस्कान में स्वरों को घोलते हुए कहा- ‘‘लगता है हम सभी को मौन देखकर स्वयं प्रकृति मुखर हो उठी है।’’ महर्षि पुलह के इस अटपटे उत्तर को सुनकर ऋषि विश्वामित्र भी मुस्करा दिये। इन दोनों ऋषियों की मुस्कान ने वातावरण को और भी चैतन्य बना दिया। देवर्षि नारद के साथ अन्य सब अपनी विचार वीथियों से बाहर निकलकर जीवन की सामान्य सतह पर आ गए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३४

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मंगलवार, 22 मार्च 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग ११७)

श्रेष्ठ ही नहीं, सुलभ भी है भक्ति

महात्मा सत्यधृति ने भक्त विमलतीर्थ की यह बात सुनाते हुए कहा- ‘‘उन परमभक्त की बात ने उन दिनों मुझमें नया विश्वास जगाया। मुझे उन्हें सुनकर उस समय ऐसा लगा था कि सब प्रकार की आध्यात्मिक अयोग्यताओं के बावजूद मैं भी भगवान की कृपा का अधिकारी बन सकता हूँ अन्यथा मैं तो स्वयं की ही सोच में डूबकर पूर्णतया निराश हो बैठा था। मुझे लगने लगा था कि जैसे मेरे लिए कोई आशा ही नहीं है लेकिन भक्त विमलतीर्थ ने मेरे अस्तित्त्व में अपनी बातों से नयी चेतना का संचार किया।’’

इतना कहते हुए सत्यधृति ने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ आदि महर्षियों की ओर देखा और बोले- ‘‘हे ऋषिगण! मेरे पास अपना कहने जैसा तो कुछ नहीं है, लेकिन यदि आप अनुमति दें, तो उन परमभक्त की कही हुई बातें आप लोगों के सामने रखने का प्रयास करूँ?’’ ‘‘अवश्य महात्मन्!  हम सब अवश्य सुनना चाहेंगे।’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के इस कथन का सभी ने हृदय से अनुमोदन किया। पिछले दिनों से महात्मा सत्यधृति के मुख से उनकी भक्तिगाथा सुनते हुए सभी को उनसे एक विचित्र सी निजता हो गयी थी। उपस्थित सभी जनों को वे अपने स्वजन लगने लगे थे। भक्त विमलतीर्थ की बातों को सभी और अधिक सुनना चाहते थे।

सबकी इस उत्कण्ठा से महात्मा सत्यधृति को तो जैसे मनमांगी मुराद मिल गयी। उन्होंने बड़े मीठे स्वर में कहना शुरू किया- ‘‘भक्त विमलतीर्थ का कहना था- यदि पुण्य अथवा पाप प्रबल हो तो आध्यात्मिक साधनाएँ सम्भव नहीं बन पड़तीं क्योंकि पुण्य अपने परिणाम में सुख-समृद्धि के साथ इतने दायित्व ला देता है कि इनके चलते साधनाएँ सम्भव नहीं हो पातीं। इसी तरह पाप अपने परिणाम में विपदाओं के इतने झंझावात खड़े कर देता है कि आध्यात्मिक साधना के बारे में सोचना तक सम्भव नहीं हो पाता। इन दोनों ही स्थितियों में सम्भव और सुगम है- भगवान का स्मरण। इस स्मरण से पाप हो अथवा पुण्य, दोनों का कर्मभार हल्का होने लगता है।

भगवान का स्मरण जैसे-जैसे गहरा व प्रगाढ़ होता है, वैसे-वैसे भगवान के प्रति भाव गहरे होते जाते हैं और उनके मिलने की अभिलाषा भी तीव्र होने लगती है। यह तीव्र अभिलाषा जब विरह का रूप धारण करने लगे तो समझो कि अस्तित्त्व व अन्तःकरण में भक्ति का उदय हो गया। विरह की वेदना के साथ स्मरण व समर्पण दोनों ही गहरे हो जाते हैं। इनकी गहराई में जीवात्मा के पाप व पुण्य, दोनों ही गहरे डूब जाते हैं। जीवन समस्त कर्मभार से मुक्त होने लगता है। यह मार्ग सभी के लिए सुलभ है। इस सर्वसुलभ पथ पर कोई भी चल सकता है। जैसे-जैसे भक्त अपने भक्तिपथ पर चलता है, स्वयं भगवान आगे बढ़कर उसके अवरोध हटा देते हैं। फिर न कोई सम्पदा बाधा बनती है और न ही कोई आपदा। बस मन प्रभुनाम के मनन में लीन होता चला जाता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३२

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शनिवार, 19 मार्च 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग ११६)

श्रेष्ठ ही नहीं, सुलभ भी है भक्ति

देवर्षि अपना वाक्य पूरा कर पाते इसके पहले ही ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने विश्वासपूर्वक कहा- ‘‘आप चिन्तित न हों देवर्षि। महात्मा सत्यधृति भगवान के परम भक्त हैं। आपका भक्तिसूत्र सुनते ही उनका चिन्तन व चेतना दोनों ही बाह्य जगत में लौट आएँगे।’’

ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की बात सभी को भायी। स्वयं देवर्षि को भी इसमें सत्य व सार्थकता की अनुभूति हुई। उन्होंने वीणा की मधुर झंकृति के साथ भगवान नारायण का पावन स्मरण करते हुए अगले भक्तिसूत्र का उच्चारण किया-

‘अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ’॥ ५८॥
अन्य सब की अपेक्षा भक्ति सुलभ है।

देवर्षि नारद के इस वाक्य के साथ ही महात्मा सत्यधृति ने नेत्र उन्मीलित करते हुए कहा- ‘‘ठीक यही बोला था भक्त विमलतीर्थ ने मुझसे। कितने वर्ष बीत गए, पर उनकी बात मेरे चित्तपटल पर यथावत अंकित है। कितनी ही आकुल प्रार्थनाओं के बाद वे मुझसे मिले थे। मिलते ही उन्होंने सबसे पहले कहा था- राजन्! भगवान मनुष्य के किसी पुरुषार्थ का सुफल नहीं हैैं। वे तो बस अपनी ही अहैतुकी कृपा का सुपरिणाम हैं। मनुष्य का पुरुषार्थ कितना ही प्रबल क्यों न हो, वह सर्वसमर्थ सर्वेश्वर को तनिक सा भी आकर्षित नहीं कर सकता। उन्हें तो आकर्षित करती है, भावनाओं से भरे हृदय की करुणासक्त एवं आर्त्त पुकार।’’

थोड़ा रुक कर वे बोले- ‘‘भावाकुल हृदय की पुकार भगवान को विह्वल कर देती है। यह पुकारना सरल है जटिल भी। सरल उनके लिए है जो सरल व निष्कपट हैं, जिनका हृदय शुद्ध एवं भगवत्प्रेम से भरा है और जटिल उनके लिए है जो प्रेम व भावनाओं से रिक्त हैं। जो पुरुषार्थप्रिय हैं, उनके लिए अनेक तरह के पुरुषार्थ हैं, अनेकों तरह की साधनाएँ हैं। हठयोग, राजयोग की विधियाँ, ज्ञान-विचार के वेदान्त आदि साधन हैं। लेकिन जो इन कठिन साधनों को करने में समर्थ नहीं हैं, जिन्हें स्मरण व समर्पण प्रिय है, उनके लिए भक्ति है। सच तो यह है कि भक्ति सबके लिए है और यह सभी साधनों से सुलभ है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३१

👉 छिद्रान्वेषण की दुष्प्रवृत्ति

छिद्रान्वेषण की वृत्ति अपने अन्दर हो तो संसार के सभी मनुष्य दुष्ट दुराचारी दिखाई देंगे। ढूँढ़ने पर दोष तो भगवान में भी मिल सकते है, न हों तो...