रविवार, 24 दिसंबर 2017

👉 अंधी का बेटा

🔷 एक विधवा अंधी औरत का एक बेटा था, जिसे वह बहुत प्यार करती थी. वह चाहती थी कि पढ़-लिखकर उसका बेटा एक बड़ा आदमी बने. इसलिए गरीबी के बाद भी उसने कस्बे के सबसे अच्छे स्कूल में उसका दाखिला करवाया।

🔶 लड़का पढ़ाई में तो अच्छा था, लेकिन एक बात से हमेशा परेशान रहा करता था. उसे स्कूल में दूसरे बच्चे ‘अंधी का बेटा’ कहकर चिढ़ाते थे. वह जहाँ भी दिख जाता, सब उसे ‘देखो अंधी का बेटा आ गया’ कहकर चिढ़ाने लगते।

🔷 इसका उस पर बहुत विपरीत असर हुआ और उसके मन में अपनी माँ के प्रति शर्म की भावना घर  करने लगी. धीरे-धीरे ये शर्म चिढ़ में बदल गई. वह अपनी माँ के साथ कहीं भी आने-जाने से कतराने लगा।

🔶 समय बीता और लड़का पढ़-लिखकर एक अच्छी नौकरी करने लगा. उसकी नौकरी शहर में थी. वह अपनी माँ को कस्बे में ही छोड़ गया. उसने अपनी माँ से वादा तो किया कि शहर में रहने की व्यवस्था करने के बाद वह उसे भी अपने साथ ले जायेगा. लेकिन उसने अपना वादा नहीं निभाया. शहर जाने के बाद उसने अपनी माँ से कोई संपर्क नहीं किया।

🔷 कुछ महीनों तक अंधी औरत अपने बेटे का इंतज़ार करती रही. लेकिन जब वह नहीं आया, तो एक दिन वह उससे मिलने शहर पहुँच गई. इधर-उधर पूछते-पूछते किसी तरह वह अपने बेटे के घर पहुँची. बाहर गार्ड खड़ा हुआ था. उसने गार्ड से कहा कि उसे उसके मालिक से मिलना है. गार्ड ने अंदर जाकर जब अपने मालिक को बताया, तो जवाब मिला – “बाहर जाकर बोल दो कि मैं अभी घर पर नहीं हूँ.” गार्ड ने वैसा ही किया. अंधी औरत दु:खी होकर वहाँ से चली गई।

🔶 कुछ देर बाद लड़का अपनी कार में ऑफिस जाने के लिए निकला. रास्ते में उसने देखा कि एक जगह पर भीड़ लगी हुई है. भीड़ का कारण जानने के लिए जब वह कार से उतरा, तो बीच रास्ते में अपनी बूढ़ी माँ को मरा हुआ पाया।

🔷 उसकी माँ की लाश की मुठ्ठी में कुछ था. मुठ्ठी खोलने पर उसने देखा कि उसमें एक ख़त है. वह ख़त खोलकर पढ़ने लगा।

🔶 बेटा, बहुत खुश हूँ कि तू बड़ा आदमी बन गया है. तुझसे मिलने का मन किया, तो शहर चली आई. इसके लिये मुझे माफ़ करना. क्या करूं तेरी बहुत याद आ रही थी. सालों से मेरी इच्छा थी कि एक दिन तुझे बड़ा आदमी बना हुआ देखूं. मेरा सपना तो पूरा हुआ, लेकिन तुझे मैं देख नहीं सकती. काश कि बचपन में तेरे साथ वो घटना नहीं हुई होती. काश तेरी आँखों में सरिया न घुसा होता और मैंने तुझे अपनी आँखें न दी होती, तो आज मैं तुझे इस ओहदे पर देख पाती।

🔷 तेरी बदकिस्मत माँ

🔶 ख़त पढ़ने के बाद लड़का फूट-फूट कर रोने लगा. वह आत्मग्लानि से भर उठा. जिस माँ के अंधी होने के कारण वह उससे दूर हो गया था, उसने अपनी ही ऑंखें उसके लिए ही बलिदान कर दी थी. वह ताउम्र खुद को माफ़ नहीं कर सका।

🔷 दोस्तों, माता-पिता का प्रेम असीम है. ये वो अनमोल प्रेम है, जिसकी कोई कीमत नहीं. वे हमारे सुख लिए अपना सर्वस्य न्यौछावर कर देते हैं. हमें सदा उनका सम्मान और उनसे प्रेम करना चाहिए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 Dec 2017


👉 पहले दो तब मिलेगा।

🔶 संसार का यह अचल नियम कितना सत्य है कि “पहले दो तब मिलेगा” पेट में पहले भोजन पहुँचाया जाता है तब वह हमें रक्त जैसी अमूल्य वस्तु प्रदान करता है, घड़ी में पहले चाबी दी जाती है तब वह हमें ठीक समय देती है, कुंए में पहले बर्तन डालते हैं तब उसमें पानी आता है, दान देने वाले पहले देते हैं तब यश और कीर्ति के भागी बनते हैं, ब्याज खाने वाले पहले रकम देते हैं तब उन्हें ब्याज की कौड़ियाँ मिलती हैं, चक्की में पहले गेहूँ डालते हैं, तब आटा मिलता है, किसान पहले बीज बोता है तब उसे कई गुना मिलता है।

🔷 व्यापारी पहले माल खरीदने में अपनी रकम लगाता है तब वह मुनाफा पाता है, पेड़ों को देखिये पहले वे बिना किसी आनाकानी के मीठे फल और पत्ते देते हैं तब उसकी जगह नये पत्ते और फल प्राप्त करते हैं, बिजली का पहले बटन दबाते हैं तब प्रकाश मिलता है, समुद्र पहले बादलों को अपना जल देता है तब उसे इन्द्र कई गुना वापिस लौटा देता है, पहले किसी की सेवा करते हैं तब वह हमें कुछ देता है, किसी के हृदय पर शासन करने के लिए पहले अपना हृदय देना पड़ता है तब उसका हृदय प्राप्त कर सकते हैं।

🔶 संसार की किसी जड़ चेतन वस्तु को लीजिये “पहले देने पर ही मिलेगा” यहाँ तक कि मन्द बुद्धि पशु जाति को ही लीजिये कुत्ते को रोटी और प्यार देने पर ही वह आपकी आज्ञा का पालन कर सकेगा, अन्यथा काट खाने को दौड़ेगा। भोले भाले अज्ञान बालक का हृदय भी देखिये पहले वह गेंद बिना किसी संकोच के धरती पर फेंक देता है लेकिन उस गेंद को धरती अपने पास नहीं रखती है बल्कि बालक को ही वापस लौटा देती है।

📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1944 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/February/v1.12

👉 दुःखी संसार में भी सुखी रहा जा सकता है (भाग 2)

🔷 पर क्या धन प्राप्त करके लोग सुखी हो जाते हैं? यदि ऐसा होता तो हर धनवान को अविवाद रूप से सुखी होना चाहिये और हर निर्धन को दुःखी। किन्तु ऐसा होता नहीं। बहुत से धनवान दुःखी दिखलाई देते हैं और अनेक निर्धन सुखी देखे जा सकते हैं। क्या धन और क्या स्वास्थ्य, स्त्री-बच्चे, मान-प्रतिष्ठा, सुख के जो भी साधन माने जाते हैं, सुख पाने के उपाय नहीं हैं। सुख पाने का उपाय कुछ और ही है। वह है जीवन जीने की एक पद्धति।

🔶 संसार में सुख जीवन व्यतीत करने के लिये कुछ बातों को ग्रहण करना होगा त्याज्य बातों में सबसे पहली बात है फलासक्ति। अपने कर्म के फलों में आसक्ति रखने से सफलता-असफलता, हानि-लाभ, आशा-निराशा के द्वन्द्व भाव में पड़ना होगा, जिसका परिणाम असुख ही होता है। भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है—‘‘कर्म करो पर फल की आशा मत करो। सुख पाने में नहीं त्याग में है। सुख, कर्म-फल के लिये दीवाने रहने, लालायित रहने में नहीं है, बल्कि कर्म-शील होकर सफलता, असफलता की ओर उदासीन रहकर कर्त्तव्य करने में है। आसक्ति को त्याग कर दूसरों के लिये जिये। जो लोग संकीर्ण स्वार्थ और लोभ को छोड़कर दूसरों के लिये जीते हैं, वही लोग जीवन का सच्चा आनन्द उठाते हैं। स्वार्थी, संकीर्ण और लोभी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता।’’

🔷 निःसन्देह फलासक्ति का त्याग और अनासक्ति का ग्रहण सुखी जीवन व्यतीत करने का बहुत बड़ा उपाय है। इसीलिये अनासक्त व्यक्ति को योगी कहकर सम्बोधित किया जाता है। अनासक्ति भाव के कारण कर्मों में आई दुःखदायी असफलता मनुष्य को प्रभावित नहीं कर पाती और न सफलता के लिये उसमें दुःखद स्पृहा का समावेश होता है। वह तो असफलता-सफलता में तटस्थ भाव से स्थित समत्व का आनन्द लिया करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/April/v1.32

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.5

👉 Amrit Chintan 25 Dec

🔶 When we indulge in same sinful act there is feeling of restlessness or feel palpitation, dryness of mouth and some sort of resistance. One become conscious I may not be caught is seen. There is some one inside every human being who holds this check and curses. This unit of your consciousness is your ‘Sadguru’ of your self.

🔷 The highest component of character is Love, high emotions and selflessness. If that type of feeling and emotions prevail in family. It will create a heavenly atmosphere there. Eyes amidst economical distress will not disturb the harmony among them. It is for that the formula of God. Religion and his discipline have been imposed by Rishis of our culture.

🔶 This is wrong that any one can please God by enchanting name of Mantra or any form of ritual of worship. Why he should get pleased by repeating his name. What he means is Aradhna i. e. service to downtrodden people of the society. The whole world is a lager family of God and you are a member of that family. Hence you care and share their pains.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो!

🔷 भगवान के मंदिर जगह-जगह बनाए जाएँ, यह विचार उस समय उत्पन्न हुआ, जब भगवान की विचारणा को जनमानस में स्थापित करने, भगवान की प्रेरणाओं को सर्वत्र प्रकाशित करने की आवश्यकता अनुभव की गई। भगवान सब जगह विराजमान हैं। पेड़-पत्ते से लेकर फूल-पौधों तक और मनुष्य के हृदय से लेकर इस आसमान तक, कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ वे विद्यमान न हों। फिर भगवान को एक स्थान पर बिठाने और खाना खिलाने की क्या जरूरत पड़ गई? यह विचारणीय प्रश्न है। भगवान तो बादलों को बरसाते हैं। जरूरत पड़े, तो जहाँ कहीं वर्षा हुआ करे, वहाँ जा बैठें और फुहारों का आनंद ले लें। नहाने की उनको क्या दिक्कत पड़ेगी? नदियाँ उनकी बहती हैं। जब कभी स्नान करना पड़े, घंटों नहा सकते हैं। उनको कोई रोकने वाला है क्या? फिर भगवान को स्नान कराने की क्या जरूरत थी?

🔶 मित्रो! भगवान तो एक विचारणा है, भावना है, एक चेतना है। उनको एक जगह बिठाया जाए, ये कैसे मुमकिन हो सकता है? भगवान की वृत्तियों और प्रवृत्तियों को हम लोग भूल गए हैं। उनको स्मरण दिलाने के लिए ही मंदिर, चेतना केंद्र बनाए गए हैं, जिनके माध्यम से भगवान की वृत्तियों को सर्वसाधारण के मनों तक पहुँचाना संभव हो सकेगा। गाँवों में देवालय इसीलिए बनाए गए हैं कि जो लोग भगवान को भूल गए हैं, वे इस माध्यम से अपने जीवन लक्ष्य को पहचानें। लोग भगवान का नाम तो जानते हैं कि भगवान कृष्ण होते हैं, भगवान राम होते हैं, हनुमान होते हैं, लेकिन सही बात यह है कि भगवान के स्वरूप, उनके आदेश, उनकी शिक्षाओं और मानव जीवन से उनका संबंध, इन सबको सौ फीसदी लोग भूल गए हैं। यदि वे भूले न होते तो उनने अपने जीवन लक्ष्य को याद रखा होता और यह स्मरण रखा होता कि भगवान ने इंसान को दुनिया में किसलिए भेजा है? उसके ऊपर क्या जिम्मेदारियाँ सौंपी हैं? भगवान ने मनुष्य से क्या उम्मीदें की हैं?

🔷 मित्रो! भगवान तो हृदय में, घट-घट में समाया हुआ है और वह मनुष्य के द्वारा अच्छी वृत्तियों को पूरा किया जाना देखना चाहता है। अगर ये बातें मनुष्य को याद नहीं हैं, उसे केवल किसी मंदिर की मूर्ति की शक्ल भर याद रहती है, तो कैसे कहा जाए कि इस आदमी को भगवान याद है और वह भगवान को भूला नहीं है? साथियो! लोग भगवान को भूलते जा रहे थे और भूल रहे हैं। इसीलिए उनको स्मरण दिलाए रखने के लिए मंदिरों की स्थापना की गई, ताकि जब कभी भी आदमी उधर से निकले, तो प्रणाम करे, दंडवत करे और सुबह शाम उनका दर्शन करे, ताकि उसे याद आए कि कोई भगवान नाम की सत्ता भी है और वह मनुष्य के जीवन से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। मनुष्य जीवन के विकास के लिए, जीवन में सुख शांति की स्थापना करने के लिए भगवान की सहायता और भगवान के सहयोग की नितांत आवश्यकता है। यह सिद्धांत और आवश्यकता मनुष्य को अनुभव होती रहे, इसलिए हर जगह मंदिर बनाए गए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 सत्य और सिद्धांत

🔶 सुकरात को जब मृत्यु दण्ड की सजा सुनाया गया, तो उसके कुछ विश्वस्त मित्रों ने उन्हें बंदी ग्रह से निकाल ले जाने का निश्चय किया। इसके लिए सारी योजना गुप्त रूप से तैयार का ली गई, किन्तु जब इसके बारे में उनको बताया गया, तो उन्होंने वैसा करने से इन्कार कर दिया। बहुत पूछने पर इतनी ही कहा, कि यदि मैं तुम्हारे साथ भाग गया तो सारी दुनिया मुझे यही कह कर कोसेगी कि सुकरात सचमुच देशद्रोही था ओर यदि मैं सत्य की खातिर बलिदान हो गया, तो उसके सत्य अनेक सत्य को एक सुकरात अगणित सुकरात को आने वाले समय में पैदा कर देगा, फिर कोई यह लाँछन नहीं लगा सकेगा कि सुकरात राजद्रोही था, अतः मेरा उत्सर्ग हो जाने दो।

🔷 इतना कह कर उन्होंने हँसते हँसते विषपान कर लिया। असत्य पर सदा सत्य और सिद्धांत की विजय होती है।

👉 लालच बुरी बला

🔷 एक व्यक्ति ने एक जिन्न साधा और वशवर्ती कर लिया। छोड़ने की शर्त यह तय हुई, कि जिस दिन उसका सुखा कुंआ भर जायेगा, उसी क्षण उसे मुक्त कर दिया जायेगा। जिन्न ने अपनी शक्ति द्वारा जल्दी ही भर दिया।

🔶 व्यक्ति लालची था उसने हाथ आये अवसर का भरपूर लाभ उठाना चाहा, कहा हमारा कोठार अभी खाली है, जब अन्न से वह भर जायेगा तब छोड़ देंगे।

🔷 जिन्न अड़ गया, कहा बात सिर्फ कुएँ की थी, सो शर्त के अनुसार उसे पूरी कर दी। अब मैं स्वतंत्र हूँ, पर व्यक्ति नहीं माना, कहा मनोरथ पूर्ति से पहले मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं।

🔶 जिन्न बोला मैं पहले भी स्वतंत्र था, अब भी स्वतंत्र हूँ। तुमने कभी अपने काबू में किया ही नहीं। वह तो मैं था कि तंत्र की गरिमा रखने के लिए स्वयं को तुम्हारे सुपुर्द कर दिया, पर अब तुम लोभ वश मेरा दुरुपयोग करना चाहते हो, अतः इसका दण्ड भी तुम्हें मिलकर रहेगा।

🔷 इतना कहकर उसने ताँत्रिक का गला दबोच लिया और तत्काल यमलोक पहुँचा दिया। जाते जाते जिन्न ने एक व्यंग भरा अट्टहास किया और उसकी आत्मा से कहा “ लालच बुरी बला है।

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ५)

कुरीतियों की दृष्टि से यों अपना समाज भी अछूता नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक...