शनिवार, 30 नवंबर 2019

👉 परिस्थितियों के अनुकूल बनिये

परिस्थितियों की अनुकूलता की प्रतिज्ञा करते-2 मूल उद्देश्य दूर पड़ा रह जाता है। हमें जीवन में जो कष्ट है, जो हमारा लक्ष्य है, उसे हम परिस्थिति के प्रपंच में पड़ कर विस्मृत कर रहे हैं।

यदि आपके पास कीमती फाउन्टेन पेन नहीं है, बढ़िया कागज और फर्नीचर नहीं है, तो क्या आप कुछ न लिखेंगे? यदि उत्तम वस्त्र नहीं हैं, तो क्या उन्नति नहीं करेंगे? यदि घर में बच्चों ने चीजें अस्त-व्यस्त कर दी हैं, या झाडू नहीं लगा है, तो क्या आप क्रोध में अपनी शक्तियों का अपव्यय करेंगे? यदि आपकी पत्नी के पास उत्तम आभूषण नहीं हैं, तो क्या वे असुन्दर कहलायेंगी या घरेलू शान्ति भंग करेंगी? यदि आपके घर के इर्द-गिर्द शोर होता है, तो क्या आप कुछ भी न करेंगे? यदि सब्जी, भोजन, दूध इत्यादि ऊंचे स्टैन्डर्ड का नहीं बना है, तो क्या आप बच्चों की तरह आवेश में भर जायेंगे? नहीं, आपको ऐसा कदापि न करना चाहिए।

परिस्थितियाँ मनुष्य के अपने हाथ की बात है। मन के सामर्थ्य एवं आन्तरिक स्वावलम्बन द्वारा हम उन्हें विनिर्मित करने वाले हैं। हम जैसा चाहें जब चाहें सदैव कर सकते हैं। कोई भी अड़चन हमारे मार्ग में नहीं आ सकती। मन की आन्तरिक सामर्थ्य के सम्मुख प्रतिकूलता बाधक नहीं हो सकती।

सदा जीतने वाला पुरुषार्थी वह है जो सामर्थ्य के अनुसार परिस्थितियों को बदलता है। किन्तु यदि वे बदलती नहीं, तो स्वयं अपने आपको उन्हीं के अनुसार बदल लेता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में उसकी मनः शान्ति और संतुलन स्थिर रहता है। विषम परिस्थितियों के साथ वह अपने आपको फिट करता चलता है।

निराश न होइए यदि आपके पास बढ़िया मकान, उत्तम वस्त्र, टीपटाप, ऐश्वर्य इत्यादि वस्तुएँ नहीं हैं। ये आपकी उन्नति में बाधक नहीं हैं। उन्नति की मूल वस्तु-महत्वाकाँक्षा है। न जाने मन के किस अतल गह्वर में यह अमूल्य सम्पदा लिपटी पड़ी हो किन्तु आप गह्वर में है अवश्य। आत्म-परीक्षा कीजिये और इसे खोजकर निकालिये।

प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान न होकर उनके अनुकूल बनिये और फिर धीरे-2 उन्हें बदल डालिये।

अखण्ड ज्योति- मई 1949 पृष्ठ 16

👉 अपने लिए नहीं, ईश्वर के लिये जिएँ?

सभी ईश्वर के पुत्र हैं और सब में परमात्मा का निवास है यह मानते हुए यदि हम परस्पर एकता, निश्छलता, प्रेम और उदारता का व्यवहार करने लगें तो जीवन में अजस्र पवित्रता का अवतरण होने लगे, सर्वत्र सद्व्यवहार के दर्शन होने लगें और आज जो कटुता, संकीर्णता और कलह का वातावरण दीख पड़ता है, उसका अन्त होने में देर न लगे।

हमें केवल अपने शरीर के लिए ही नहीं, आत्मा के लिए भी जीना चाहिए। यदि मनुष्य शरीर की सुविधा और सजावट का ताना-बाना बुनते रहने में ही इस बहुमूल्य जीवन को व्यतीत कर दें, तो उसे वह लक्ष्य कैसे प्राप्त होगा जिसके लिये जन्मा है। स्वार्थ में संलग्न व्यक्ति तो विघटन की ओर ही बढ़ेंगे। उनके व्यवहार एक दूसरे के लिए असन्तोषजनक और असमाधानकारक ही बनेंगे। ऐसी दशा में द्वेष और परायेपन की भावना बढ़कर आवरण को नारकीय क्लेश-कलह से भर देगी, और यह संसार अशांति एवं विनाश की काली घटाओं से घिरने लगेगा।

ईसा ने सोचा कि यदि ईश्वर का, पुत्र केवल शारीरिक सुखों के लिए जीवन धारण किये रहेगा तो इस संसार में धर्म का राज्य कभी उदय न होगा। यदि अपने लिए ही जिया गया तो मनुष्य की पशुओं की अपेक्षा श्रेष्ठता कैसे बनी रहेगी, यह अनुभव करते हुए वे इसी निर्णय पर पहुँचे कि हमें अपने लिए नहीं प्रभु के लिए जीना चाहिए। अस्तु ईसा मसीह घर छोड़ कर चल दिए और बन पर्वतों और ग्राम नगरों में धर्म का प्रचार करते हुए भ्रमण करने लगे। ईश्वर का पुत्र अपने लिए नहीं ईश्वर के लिए ही जी सकता है, इसके अतिरिक्त उसके पास और दूसरा मार्ग ही क्या है?

टॉलस्टाय
अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 1

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

👉 मैं कौन हूँ

मैं कौन हूँ? अनगिनत बार यह सवाल अपने से पूछा। कितने महीने-साल इस प्रश्न के साथ गुजरे, अब तो उसका कोई हिसाब भी सम्भव नहीं। हर बार बुद्धि ने उत्तर देने की कोशिश की, पढ़े-सुने हुए, संस्कार जन्य उत्तर। लेकिन इन सब उत्तरों से कभी तृप्ति नहीं मिली, क्योंकि ये सभी उत्तर उधार के थे, मरे हुए थे। हर बार सतह पर गूँज कर कहीं विलीन हो जाते थे। अन्तरात्मा की गहनता में उनकी कोई ध्वनि नहीं सुनाई पड़ती थी। प्रश्न जहाँ पर था, वहाँ इन उत्तरों की पहुँच नहीं थी।
  
अनुभूति इतनी जरूर हुई कि प्रश्न कहीं केन्द्र पर था, जबकि उत्तर परिधि पर थे। प्रश्न अन्तस में अंकुरित हुआ था, जबकि समाधान बाहर से थोपा हुआ था। इस समझ ने जैसे जीवन में क्रान्ति कर दी। बुद्धि का भ्रम टूट गया। और अन्तर्चेतना में एक नया द्वार खुल गया। यह सब कुछ ऐसा था, जैसे कि अचानक अंधेरे में प्रकाश उतर आया हो। अपनी ही चेतना की गहराइयों में यह अहसास होने लगा कि कोई बीज भूमि को बेधकर प्रकाश के दर्शन के लिए तड़प रहा है। बौद्धिकता का माया जाल ही इसमें मुख्य बाधा है।
  
इस नयी समझ ने अन्तर्गगन को उजाले से भर दिया। बुद्धि द्वारा थोपे गए उत्तर सूखे पत्तों की तरह झड़ गए। प्रश्न गहराता गया। साक्षी भाव में यह सारी प्रक्रिया चलती रही। परिधि की प्रतिक्रियाएँ झड़ने लगी, केन्द्र का मौन मुखर होने लगा। मैं कौन हूँ? इस प्रश्न प्यास से समग्र व्यक्तित्व तड़प उठा। मैं कौन हूँ? इस प्रश्न के प्रचण्ड झोकों से प्रत्येक श्वास कंपित हो गयी। एक अग्नि ज्वाला की भांति अन्तस की गहराइयों में यह हुंकार गूँज उठा- आखिर कौन हूँ मैं?
  
बड़ा अचरज था, ऐसे में कि हमेशा नए-नए तर्क देने वाली बुद्धि चुप थी। आज परिधि पर मौन छाया था, केवल केन्द्र मुखर था। कुछ ऐसा था जैसे कि मैं ही प्रश्न बन गया था। और तभी अन्तर सत्ता में एक महाविस्फोट हुआ। एक पल में सब परिवर्तित हो गया। प्रश्न समाप्त हो गया, समाधान का स्वर संगीत गूँजने लगा। और तब इस अनुभूति ने जन्म लिया- शब्द में नहीं शून्य में समाधान है। निरुत्तर हो जाने में उत्तर है। सच तो यही है कि समाधि ही समाधान है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३२

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Nov 2019

◆ साधना का तात्पर्य है, अपने आप के कुसंस्कारों, दोष- दुर्गुणें का परिशोधन, परिमार्जन और उसके स्थान पर सज्जनता, सदाशयता का संस्थापन। आमतौर से अपने दोष- दुर्गुण सूझ नहीं पड़ते। यह कार्य विवेक बुद्धि को अन्तर्मुखी होकर करना पड़ता है। आत्मनिरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण, आत्म विकास इन चार विषयों को कठोर समीक्षण- परीक्षण की दृष्टि से अपने आप को हर कसौटी पर परखना चाहिए। जो दोष दीख पड़े, उनके निराकरण के लिए प्रयत्न करना चाहिए।  

★ मस्तिष्क एक प्रत्यक्ष कल्प वृक्ष है, जीवन की सक्रियता एवं स्फूर्ति मस्तिष्क की क्रियाशीलता पर निर्भर है। व्यक्तित्व का सारा कलेवर यहीं विनिर्मित होता है। यही  वह पावर हाउस है, जहाँ से शरीरिक इन्द्रियाँ शक्ति प्राप्त करती हैं।। स्थूल गतिविधियाँ ही नहीं, विचारों व भावनाओं का नियंत्रण -नियमन भी यहीं से होता है।

□  हम शरीर और मन रूपी उपकरणों का प्रयोग जानें और उन्हीं प्रयोजनों में तत्पर रहें, जिनके लिये प्राणिजगत् का यह सर्वश्रेष्ठ शरीर, सुरदुर्लभ मानव जीवन उपलब्ध हुआ है। आत्मा वस्तुतः परमात्मा का पवित्र अंश है, वह श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण है। वह सृष्टि को और सुन्दर सुसज्जित बना सके, उसका चिन्तन औरकर्त्तृत्व इसी दिशा में नियोजित रहना चाहिए। यही है आत्म बोध और आत्मिक जीवनक्रम।  
 
■  जिस प्रकार भौतिक ऊर्जा अदृश्य होते हुए भी पंखे को गति, बल्ब में प्रकाश, हीटर में ताप जैसे विविध रूपों में हलचल करती दिखाई पड़ती है, उसी प्रकार वह परमसत्ता पवित्र हृदय से पुकारने पर भावनाओं के अनुरूप कभी स्नेहमयी माँ तो कभी पिता, कभी रक्षक के रूप में प्रकट होकर अपनी सत्ता का आभास कराती एवं अनुदान बरसाती रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

Chhoti Si Galti Ki Itni Badi Saja | छोटी सी गलती की इतनी बड़ी सजा | Motiv...



Title

मंगलवार, 26 नवंबर 2019

👉 विवेक:-

एक बार महावीर अपने पुत्र से कह रहे थे की एक बार मैं एक रेलवे स्टेशन पर बैठा था मेरे पास एक व्यक्ति और बैठा था हम दोनो बाते कर रहे थे उसने कहा की मुझे भी अमुक स्थान पर जाना है हम दोनो को एक ही स्थान पर जाना था !

मै केन्टिन में गया और चाय व कुछ नाश्ता लेकर आया मैंने देखा वो व्यक्ति फोन पर बात करते हुये आगे चला जा रहा!

शायद ट्रेन आने वाली थी मैंने बेग उठाया और तेजी से उसके पिछे चलने लगा शायद आगे जाने से सीट मिल जाये मेरे पिछे कई व्यक्ति चलने लगे और चलते चलते हम सभी प्लेटफार्म नम्बर एक से नम्बर दो पर पहुँच गये और वो वहाँ बैठा तब मेरे मन में एक विचार आया की मैं इसके पीछे पीछे कहाँ आ गया मॆरी ट्रेन तो प्लेटफार्म नम्बर एक पर आने वाली है और मैं तो बिल्कुल उल्टी जगह पर आ गया और देखते ही देखते मॆरी आँखो के सामने से मॆरी ट्रेन चली गई और जो चाय नाश्ता लिया वो भी वही रह गया!

अब मुझे उस व्यक्ति पर बड़ा गुस्सा आ रहा था और मैं उसके पास गया और उससे लड़ने लगा की तुम्हारी वजह से मॆरी ट्रेन छुट गई मैं अपशब्द पे अपशब्द बोले जा रहा था और वो सुने जा रहा था काफी देर बोलने के बाद मैं वहाँ बैठ गया फिर वो बड़े ही शालीनता के साथ बोले भाई सा. यदि आपकी बात समाप्त हो गई हो तो मैं कुछ बोलुं?

मैंने कहा हाँ बोलो तब उन्होंने मुझे वो शिक्षा दी जो मैं आज तक नही भुला उन्होंने कहा।

"भाई सा. अचानक मुझे घर से कॉल आया की मुझे दिल्ली की बजाय मुम्बई जाना है क्योंकि हम सभी का प्लान चेंज हो गया और मॆरी ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर दो पर आयेगी पर आप मुझे एक बात बताईये की जब आपको पता था और बोर्ड पे साफ शब्दों में लिखा था और बार बार अलाउन्समेन्ट हो रहा था की दिल्ली जाने वाली ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर एक पर आयेगी तो आपने मुझे फॉलो क्यों किया? क्या आपको उस बोर्ड और उस अलाउन्समेन्ट के ऊपर कोई विश्वास न था? आपकी सबसे बड़ी गलती यही थी की आपने अपने विवेक से काम नही किया बस बिना सोचे समझे किसी को फोलो किया इसलिये आपका चाय-नाश्ता भी गया और चाय से हाथ भी जलाया और आपकी आँखो के सामने से आपकी ट्रेन चली गई और आप बस देखते रह गये!

और इतने में उनकी ट्रेन आ गई और वो उसमें बैठकर चले गये और जाते जाते मुझे कह गये की भाई सा. जिन्दगी में एक बात अच्छी तरह से याद रखना की अंधाधुंध फोलो किसी को मत करना अपने विवेक से काम लेना की जिस राह पे तुम जा रहे हो क्या वो तुम्हे सही मंजिल तक पहुंचायेगा? किसी को फोलो करोगे तो भटक सकते हो!

यदि फोलो करना ही है तो रामायण को, धर्म -शास्त्र को फोलो करना ताकी तुम कही भटको नही किसी व्यक्ति को कभी फोलो मत करना क्योंकि पाप कभी भी किसी के भी मन में आ सकता है या फिर उसका लक्ष्य कब बदल जाये कुछ पता नही इसलिये स्वविवेक से काम लेना। अच्छाई दिखे और लगे की ये चीज प्रकाश से जोड़ सकती है परम पिता परमेश्वर से मिला सकती है और मुझे एक बेहतरीन इन्सान बना सकती है तो उसे ग्रहण कर लेना नही तो छोड़ देना और अंधाधुंध फोलो करोगे बिना परिणाम जाने भेड़-चाल चलोगे तो हो सकता है की तुम भटक जाओ और गहरे अन्धकार में लुप्त हो जाओ!

इसलिये जिन्दगी में हमेशा बेहतरीन इन्सान बनने की कोशिश करना पर किसी को अंधाधुंध फोलो मत करना फोलो प्रकाश दे सकता है तो गहरा अंधकार भी दे सकता है!

👉 ॐकार का अनुभव

ॐकार दिव्य नाद है। यह परम संगीत है। सृष्टि के सभी स्वर इसमें पिरोए हैं। पेड़ों पर बैठे पखेरुओं का कलरव, उच्च हिम शिखरों पर छायी शान्ति, पहाड़ों से उतरते झरनों की मर्मर, वृक्षों से गुजरती हवाओं की सरसर, महासागरों में लहरों का तर्जन, आकाश में बादलों का गर्जन- सभी का सार यह ओंकार है।
  
ॐकार शब्द बीज है। सभी शब्द इसी से जन्मे हैं। इसी से उन्हें जीवन मिलता है और इसी में उन्हें लय होना है। वेद ही नहीं बाइबिल भी ओम् से उपजी है। गीता और गायत्री इसी से प्रकट हुई है। इसीलिए तो वेद कहते हैं कि ओम् को जिन्होंने जान लिया, उन्हें जानने को कुछ शेष न रहा। बाइबिल भी इसी सच्चाई को दुहराती है कि प्रारम्भ में ईश्वर था, और ईश्वर शब्द के साथ और फिर उसी शब्द से सब प्रकट हुआ।
  
ॐकार सृष्टि बीज है। सृष्टि की सभी ऊर्जाओं का परम स्रोत है यह। अनन्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा के विभिन्न स्तर, आयाम और ऊर्जा धाराएँ ओंकार से ही प्रवाहित हुई हैं। तभी तो उपनिषद् कहते हैं कि ओंकार से सब पैदा हुआ, ओंकार में सभी का जीवन है और अन्त में सब कुछ ओंकार में ही विलीन हो जाएगा। सृष्टि के सूक्ष्मतम से महाविराट् होने तक के सभी रहस्य इस ओंकार में समाए हैं।
  
ॐकार ध्यान बीज है। इसके ध्यान से सभी रहस्य उजागर होते हैं। शक्ति के स्रोत उफनते हैं। यह ओंकार हममें है, तुममें है, सबमें है। पर है अभी यह बन्धन में। जब तक यह बन्धन में रहेगा। हमारे भीतर रुदन का हाहाकार मचा रहेगा। वेदनाएँ हमें सालती रहेंगी। ओंकार के बन्धन मुक्त होते ही रुदन की चीत्कार संगीत के उल्लास में बदल जाएगी। ध्यान से ही यह बन्धनमुक्ति सम्भव होती है। ध्यान से ही ओंकार का बीज अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित होता है। इस ओंकार के ध्यान से ही गायत्री का गान फूटता है। यह शास्त्र की नहीं, अनुभव की बात है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३१

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Nov 2019

★ आशा आध्यात्मिक जीवन का शुभ आरम्भ है। आशावादी व्यक्ति सर्वत्र परमात्मा की सत्ता विराजमान देखता है। उसे सर्वत्र मंगलमय परमात्मा की मंगलदायककृपा बरसती दिखाई देती है। सच्ची शान्ति, सुख और सन्तोष मनुष्य की निराशावादी प्रवृत्ति के करण नहीं, अपने ऊपर अपनी शक्ति पर विश्वास करने से होता है।

◆ गृहस्थाश्रम की सफलता तीन बातों पर निर्भर करती है। पहला गृहस्थ- जीवन के पूर्व की तैयारी, दूसरे पति- पत्नी के दाम्पत्य जीवन में आने का ध्येय, तीसरा गृहस्थ जीवन में एक दूसरे का व्यवहार और उनका कर्तव्य पालन।    

□  तेजस्विता तपश्चर्या की उपलब्धि है, जो निजी जीवन में संयम, साधना और सामाजिक जीवन में परमार्थ परायणता के फलस्वरूप उद्भूत होती है। संयम- अर्थात् अनुशासन का, नीति मर्यादाओं का कठोरतापूर्वक परिपालन। 
 
■  आहार न केवल स्थूल दृष्टि से पौष्टिक, स्वल्प और सात्विक होना चाहिए, वरन् उसके पीछे यायानुकूल उपार्जन और सद्भावनाओं का समावेश भी होना चाहिए ।। तभी वह अन्य मनुष्य के तीनों आवरणों को पोषित कर सकेगा और स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर को विकसित कर सकेगा। तभी वह शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वांगीण विकास कर सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 1)

Q.1. Are there any restrictions on Gayatri worship?

Ans. There is a prevalent belief that the right to worship Gayatri is exclusively restricted to the Brahmans or the so called “Dwij” (which is traditionally considered synonymous with “Brahmans”, a caste in India).           
This is a gross misconception. If there is a dispute on the basis of caste only Kshatriyas will be entitled to Gayatri Sadhana as revealed to Vishwamitra, who was its rishi. His descendants will be well within their right to lay claim to  their ancestral right . But such an argument would be nothing but childish.   
  
If persons living in India alone claim the right in respect of Gayatri what will happen to those Indians who have accepted citizenship of other countries? If Gayatri Sadhana  is regarded only for Hindus, a ban will have to be imposed on those scientists who are conducting research in this field in foreign countries. In fact, in this age of intellectual freedom it is ridiculous to talk of such absurdities. Gayatri is the manifestation of the Creative Power of God; and like the sun,  water, air earth etc. everyone is entitled to derive benefit from it. The concept of proprietary rights is applicable to only material objects. Creations of nature are accessible to all in equal measure. Endless benefits (Gayatri kalpavrikcha) can be enjoyed by invocation of Gayatri by all human beings irrespective of their social status. Every religion has its Supreme Mantra like Kalma of Muslims, ‘Baptisma’ of Christians, Namonkar of Jains, Om Mani Padme Ham of Tibetan Buddhists. So also in Indian religions tradition there is only one Supreme Mantra, Gayatri Mantra.

It is foolish to say that Brahmans, Kshatriyas, Vaishyas, Kayasthas etc. have different Gayatris. This bane of discrimination on account of high or low caste should not be allowed to enter into and pollute the spiritual environment in which there is one God, one religion and one source of knowledge.
  
Gayatri is also the key to the invisible Cosmic Consciousness. An ancient Indian practice required compulsory admission of children to schools (Gurukuls) for learning spiritual concepts and practices. Here, the student was initiated by the spiritual preceptor (Guru) through this very Gayatri-Mantra, irrespective of his social background. As a matter of fact, the Shikha (tuft of hair on the crown of head) symbolises Ancient Indian (Bhartiya) culture. All Hindus traditionally keep Shikha as constant reminder to them to nurture high and noble thoughts. As such, Shikha itself represents Gayatri, which entitles all to the worship of Gayatri.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 27

रविवार, 24 नवंबर 2019

👉 मन और आत्मा

मन: कल तो में भाग मिल्खा भाग फिल्म देखकर आया, उस फिल्म के किरदार ने मेरे अंदर बहुत ही अधिक ऊर्जा भर दी है, और अब मुझमे इतना साहस आ चुका है कि में कुछ भी करके दिखा सकता हूँ।

मन घर आया और फिल्म की ऊर्जा के विश्वास पर अपने संकल्पो को पूरा करने लग गया, परन्तु दो दिन बाद ही उसकी ऊर्जा ध्वस्त हो गयी।

उस समय उसने सोचा की मुझे किसी और का मोटिवेशनल वीडियो देखना चाहिए। उसने you tube पर वीडियो देखे और फिर से उसने स्वयं के समस्त संकल्पो को मजबूत कर लिया और फिर से तैयारी शुरू कर दी। लेकिन वो फिर से हार गया।

परन्तु इस बार मन स्वयं की आत्मा से पूछने लगा आखिर में गलती क्या कर रहा हूँ।

आत्मा का जवाब: आप भाग मिल्खा भाग फिल्म देखकर आकर्षित तो हुए, किन्तु आपके आकर्षण का कारण उस  फिल्म के किरदार का अभिनय था। आपने बहुत ही कम समय में आपने आदर्श को चुन लिया

इसलिए  वो विचार आपकी "जीवात्मा" तक नही  पहुच सके

मन: है महान आत्मा अब मुझे क्या करना चाहिए। जिससे की मेरे विचार "आकर्षण के स्थान पर विवेक" को महत्व दें।
            
आत्मा: मेरे मित्र हमेशा उन्ही को सुनो उन्ही को अपनी अभिप्रेरणा बनाओ, जिनके पास "विचारो की सिद्धि हो"। जो पूजनीय है जिनका व्यक्तित्व अलौकिक है ऐसे लोग दुनिया में बहुत कम है जैसे कि👇👇

राम कृष्ण परमहंस, समर्थगुरु रामदास, प. श्रीराम शर्मा आचार्य, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, महर्षि रमण आदि।

👉 निसंदेह: दुनिया में बहुत सारे विचारक है, हो सकता है वो श्रेष्ठ वक्ता भी हो, लेकिन वे लोग पूजनीय हो ये जरूरी नहीं।

👉 सद्गुरु का द्वार

चाहत सच्ची हो तो गहरी होती है, और यदि गहरी हो तो पूरी होती है। एक बूढ़ा साधु-भीख मांगने निकला था। बूढ़े होने के कारण उसे आँख से कम नजर आता था। सो वह अनजाने ही एक आश्रम के पास जाकर खड़ा हो गया और आवाज लगायी। किसी ने उससे कहा; आगे बढ़। यह मकान नहीं, आश्रम है, सद्गुरु का द्वार है। और जिन सद्गुरु का यह द्वार है, उन्होंने भी स्थूल शरीर का त्याग कर दिया है।
  
साधु ने सिर उठाकर आश्रम पर एक नजर डाली। उसके हृदय में भक्ति की ज्वाला जल उठी। कोई उसके अन्तर्मन में बोला; देह त्यागने से क्या हुआ, सद्गुरु कभी मरा नहीं करते। उनकी अविनाशी चेतना सदा ही उनकी तपस्थली में व्याप्त रहती है। बस यही आखिरी द्वार है। सद्गुरु के द्वार पर आकर फिर अब कहाँ जाना?
  
उसके भीतर एक संकल्प सघन हो गया। अडिग चट्टान की भाँति उसके हृदय ने कहा; यहाँ से खाली हाथ वापस नहीं जाऊँगा। जो सद्गुरु के द्वार, देहरी तक आकर भी खाली हाथों लौट गए, उनके भरे हाथों का भी क्या मोल है? बस इन्हीं अविचलित भावों के साथ वह आश्रम के द्वार पर ठहर गया। उसने अपने खाली हाथों को आकाश की ओर फेंक दिया। उसके दिल की प्यास चरम पर पहुँच गयी। और उसका अन्तःकरण करुण रव में गा उठा- ‘एक तुम्हीं आधार सद्गुरु।’
  
सद्गुरु के द्वार आश्रम वालों के अपमान, तिरस्कार के झंझावातों को सहते हुए उसके दिन बीतने लगे। पखवाड़े-मास बीत गए। वर्ष भी बीते। इस तरह कितने साल गुजरे उसने गिनती भी नहीं की। अब तो उसके जीवन की मियाद भी पूरी हो गयी थी। पर अन्तिम क्षणों में उसे आश्रमवासियों ने नाचते देखा। उसकी आँखें ज्योति की स्रोत बन गयी थीं। उसके बूढ़े शरीर से प्रकाश झर रहा था। उसने मरने से पहले एक व्यक्ति को अपनी अनुभूति बतायी, सद्गुरु के द्वार से कोई खाली नहीं जाता। केवल अपने को मिटाने का साहस चाहिए। जो स्वयं को मिटा देता है, वह सद्गुरु के द्वार से सब कुछ पा लेता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३०

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Nov 2019

★ सुख- दुःख हर तरह की परिस्थिति में सन्तुष्ट रहने को सन्तोष कहते हैं। कुसंस्कारों के परिशोधन एवं सुसंस्कारों के अभिवर्द्धन के लिए स्वेच्छापूर्वक जो कष्ट उठाया जाता है- वह तप कहलाता है। स्वयं के अध्ययन- विश्लेषण के लिए किया जाने वाला अध्यवसाय स्वाध्याय है। अपने चित्त को श्रद्धापूर्वक परमात्मा के दिव्य स्वरूप में नियोजित करना ईश्वर प्राविधान कहलाता है।

◆ संकीर्ण स्वार्थपरता एवं आसुरी जीवन दर्शन को निरस्त करने के लिए आवश्यक है कि चिन्तन की उत्कृष्टता ,स्वभावगत शालीनता और व्यवहार की आदर्शवादिता के दूरगामी सत्परिणामों को तर्क, प्रमाण और उदाहरणों सहित समझाया जाय।   

□  भगवान् पत्र, पुष्पों के बदले नही, भावनाओं के बदले प्राप्त किये जाते हैं और वे भावनाएँ आवेश, उन्माद या कल्पना जैसी नहीं, वरन् सच्चाई की कसौटी पर खरी उतरने वाली होनी चाहिए। उनकी सच्चाई की परीक्षा मनुष्य के त्याग, बलिदान, संयम, सदाचार एवं व्यवहार से होती है। 
 
■  आदर्शवादी और उत्कृष्टता वादी चिंतन के साथ जब गायत्री उपासना की जाती है, तो उसे सोने में सुगन्ध मिलने की तरह सराहा जाता है। इस सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण साफ रखना चाहिए कि उपासना का जितना महत्त्व है, उतना ही, बल्कि उससे भी कहीं अधिक महत्त्व साधना का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 10)

Q.13. What are the basic aims of Gayatri Sadhana?

Ans. The science of Gayatri Upasana has been developed to help human beings in ridding themselves of base animal instincts and replace them with the divine virtues. Adherence to the laws of this science provides a Sadhak permanent relief from the shackles of unhappiness and misery.

Q.14. What is the relevance of Gayatri Upasana in the modern society?

Ans. During the last few decades concepts of religion have been increasingly distorted by vested interests. The deliberately induced misconceptions about religion led to the miraculous achievements in the field of material sciences, created an environment wherein people began to doubt the utility of spirituality and became sceptic about the very existence of God. Many of the neo-literates began to regard religion as superstition to the extent that being an atheist became a symbol of intellectualism.
              
Now, on the peak of its achievements, science has failed to achieve the wellbeing of the society as a whole, and people have begun to revise their attitude about spirituality. It is being realised that for restoring ethical and the moral values, spirituality is as important as the material aspects of life. Gayatri Sadhana is within the reach of common man, Its methodology is easy to adopt, it is well defined and is easily understood. With the help of Gayatri Sadhana, therefore, one can make remarkable progress in imbibing basic ethical and moral values with minimal effort.


✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 24

शनिवार, 23 नवंबर 2019

👉 जीवन दर्शन

आँखें बन्द हों तो पाँव अपने आप ही राह भटक जाते हैं। बन्द आँखें किए चलने वाले किसी गड्ढे में जा गिरें तो कोई अचरज नहीं है। भूलना-भटकना, गुमराह हो जाना, पग-पग पर ठोकरों से चोटिल होते रहना ही ऐसों की नियति है। इनसे यही कहना है कि आँखें बन्द रखने के अतिरिक्त न कोई पाप है और न कोई अपराध। जिसने आँखें खोल ली, उसके जीवन में फिर अँधेरा नहीं रहता।
  
भिक्षु आनन्दभद्र के जीवन का एक मार्मिक प्रसंग है। वह पूर्वी देशों में धर्म प्रचार के लिए गए हुए थे। कुछ अज्ञानियों ने उन्हें पकड़ लिया और भारी यातनाएँ दी। परन्तु इन यातनाओं के बीच भी उनकी शान्ति अविचल थी। यातनाओं के बीच भी वह परम प्रसन्न थे। गालियों के उत्तर में उनकी वाणी मिठास से सनी थी। किसी ने उनसे पूछा;  आप में इतनी अलौकिक शक्ति कैसे आयी? उन्होंने एक हल्की मुस्कराहट के साथ कहा, बस, मैंने अपनी आँखों का उपयोग करना सीख लिया है।
  
प्रश्नकर्त्ता ने अचरज से प्रतिप्रश्न किया, लेकिन आँखों का शान्ति और साधुता से क्या सम्बन्ध? सम्भवतः वह भिक्षु आनन्दभद्र के सहनशीलता के मर्म से अपरिचित था। उसे समझाने के लिए महाभिक्षु ने कहा, मैं जब ऊपर आकाश की ओर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि इस धरती का जीवन बहुत ही क्षण भंगुर और सपने की तरह है और सपने में किया हुआ किसी का व्यवहार मुझे कैसे छू सकता है? जब दृष्टि अपने भीतर निहारती है तो उसे पाता हूँ जो कि अविनश्वर है- उसका तो कोई कुछ भी बिगाड़ने में समर्थ नहीं है।
  
जब मैं अपने आस-पास देखता हूँ, तो पाता हूँ ऐसे भी भावनाशील जन हैं जिनके हृदयों में मेरे लिए असीम करुणा है। यह अनुभूति मुझे कृतज्ञता से भर देती है। अपने पीछे देखने पर अहसास होता है कि कितने ही प्राणी ऐसे हैं, जो मुझसे भी कहीं ज्यादा पीड़ा भोग रहे हैं। उन्हें देखकर मेरा हृदय करुणा और प्रेम से भर जाता है। इस भाँति मैं शान्त हूँ, आनन्दित हूँ और प्रेम से भर गया हूँ। क्योंकि मैंने अपनी आँखों का उपयोग करना सीख लिया है। सचमुच ही आँखें खोलने से- जीवन दर्शन मिलता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२९

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

My Family Is My Strength Part 2 | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

Gayatri Hi Brahmastra | गायत्री ही गायत्री ही ब्रह्मास्त्र



Title

👉 कोयले का टुकड़ा

अमित एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का था। वह बचपन से ही बड़ा आज्ञाकारी और मेहनती छात्र था। लेकिन जब से उसने कॉलेज में दाखिला लिया था उसका व्यवहार बदलने लगा था। अब ना तो वो पहले की तरह मेहनत करता और ना ही अपने माँ-बाप की सुनता।  यहाँ तक की वो घर वालों से झूठ बोल कर पैसे भी लेने लगा था। उसका बदला हुआ आचरण सभी के लिए चिंता का विषय था। जब इसकी वजह जानने की कोशिश की गयी तो पता चला कि अमित बुरी संगती में पड़ गया है।  कॉलेज में उसके कुछ ऐसे मित्र बन गए हैं जो फिजूलखर्ची करने, सिनेमा देखने और धूम्र-पान करने के आदि हैं।

पता चलते ही सभी ने अमित को ऐसी दोस्ती छोड़ पढाई- लिखाई पर ध्यान देने को कहा; पर अमित का इन बातों से कोई असर नहीं पड़ता, उसका बस एक ही जवाब होता,  मुझे अच्छे-बुरे की समझ है, मैं भले ही ऐसे लड़को के साथ रहता हूँ पर मुझपर उनका कोई असर नहीं होता…

दिन ऐसे ही बीतते गए और धीरे-धीरे परीक्षा के दिन आ गए, अमित ने परीक्षा से ठीक पहले कुछ मेहनत की पर वो पर्याप्त नहीं थी, वह एक विषय में फेल हो गया । हमेशा अच्छे नम्बरों से पास होने वाले अमित के लिए ये किसी जोरदार झटके से कम नहीं था। वह बिलकुल टूट सा गया, अब ना तो वह घर से निकलता और ना ही किसी से बात करता। बस दिन-रात अपने कमरे में पड़े कुछ सोचता रहता। उसकी यह स्थिति देख परिवारजन और भी चिंता में पड़ गए। सभी ने उसे पिछला रिजल्ट भूल आगे से मेहनत करने की सलाह दी पर अमित को तो मानो सांप सूंघ चुका था, फेल होने के दुःख से वो उबर नही पा रहा था।

जब ये बात अमित के पिछले स्कूल के प्रिंसिपल को पता चली तो उन्हें यकीन नहीं हुआ, अमित उनके प्रिय छात्रों में से एक था और उसकी यह स्थिति जान उन्हें बहुत दुःख हुआ, उन्होंने निष्चय किया को वो अमित को इस स्थिति से ज़रूर निकालेंगे।

इसी प्रयोजन से उन्होंने एक दिन अमित को अपने घर बुलाया।

प्रिंसिपल साहब बाहर बैठे अंगीठी ताप रहे थे। अमित उनके बगल में बैठ गया। अमित बिलकुल चुप था , और प्रिंसिपल साहब भी कुछ नहीं बोल रहे थे। दस -पंद्रह मिनट ऐसे ही बीत गए पर  किसी ने एक शब्द नहीं कहा। फिर अचानक प्रिंसिपल साहब उठे और चिमटे से कोयले के एक धधकते टुकड़े को निकाल मिटटी में डाल दिया, वह टुकड़ा कुछ देर तो गर्मी  देता रहा पर अंततः ठंडा पड़ बुझ गया।

यह देख अमित कुछ उत्सुक हुआ और बोला,  प्रिंसिपल साहब, आपने उस टुकड़े को मिटटी में क्यों डाल दिया, ऐसे तो वो बेकार हो गया, अगर आप उसे अंगीठी में ही रहने देते तो अन्य टुकड़ों की तरह वो भी गर्मी देने के काम आता !

प्रिंसिपल साहब मुस्कुराये और बोले,  बेटा, कुछ देर अंगीठी में बाहर रहने से वो टुकड़ा बेकार नहीं हुआ, लो मैं उसे दुबारा अंगीठी में डाल देता हूँ…. और ऐसा कहते हुए उन्होंने टुकड़ा अंगीठी में डाल दिया।

अंगीठी में जाते ही वह टुकड़ा वापस धधक कर जलने लगा और पुनः गर्मी प्रदान करने लगा।

कुछ समझे अमित।  प्रिंसिपल साहब बोले, तुम उस कोयले के टुकड़े के समान ही तो हो, पहले जब तुम अच्छी संगती में रहते थे, मेहनत करते थे, माता-पिता का कहना मानते थे तो अच्छे नंबरों से पास होते थे, पर जैस वो टुकड़ा कुछ देर के लिए मिटटी में चला गया और बुझ गया, तुम भी गलत संगती में पड़ गए  और परिणामस्वरूप  फेल हो गए, पर यहाँ ज़रूरी बात ये है कि एक बार फेल होने से तुम्हारे अंदर के वो सारे गुण समाप्त नहीं हो गए… जैसे कोयले का वो टुकड़ा कुछ देर मिटटी में पड़े होने के बावजूब बेकार नहीं हुआ और अंगीठी में वापस डालने पर धधक कर जल उठा, ठीक उसी तरह तुम भी वापस अच्छी संगती में जाकर, मेहनत कर एक बार फिर मेधावी छात्रों की श्रेणी में आ सकते हो …

याद रखो,  मनुष्य ईश्वर की बनायीं सर्वश्रेस्ठ कृति है उसके अंदर बड़ी से बड़ी हार को भी जीत में बदलने की ताकत है, उस ताकत को पहचानो, उसकी दी हुई असीम शक्तियों का प्रयोग करो और इस जीवन को सार्थक बनाओ।

अमित समझ चुका था कि उसे क्या करना है, वह चुप-चाप उठा, प्रिंसिपल साहब के चरण स्पर्श किये और निकल पड़ा अपना भविष्य बनाने।

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (अन्तिम भाग)

भिक्षा व्यवसाय, मृतक भोज, बाल-विवाह, कन्या विक्रय, पत्नी त्याग आदि अनेकानेक प्रचलन ऐसे हैं जो औचित्य की कसौटी पर किसी भी प्रकार खरे सिद्ध नहीं होते फिर भी हमारे गले में फाँसी के फंदे की तरह कसे हुए हैं। इन कुरीतियों को इसी प्रकार सहते रहा गया, उनका मोह न छोड़ा गया तो समझना चाहिए कि हम दिन-दिन गलते, फिसलते, पिछड़ते और घटते गिरते ही चले जायेंगे।

अनैतिकता का तो कहना ही क्या? समय का पालन, वचन का पालन, विश्वास का पालन घटता जा रहा है। व्यवसाय, आचरण, कर्तव्य, उत्तरदायित्व के क्षेत्रों में तनिक तनिक सी बात पर मनुष्य ऐसी कलामुण्डी खाता है मानों नीति मर्यादा पालन की नहीं, कहने सुनने भर की बात रह गई है। कामचोरी, हरामखोरी, करचोरी, रिश्वत, धोखाधड़ी, छल, स्वार्थान्धता, नागरिक कर्तव्यों की अवहेलना आदि की अवांछनीयताएँ अब सामान्य व्यवहार की, चातुर्य कौशल की अंग बनती जा रही है। लगता है मनुष्य अपनी गरिमा का परित्याग कर प्रेत पिशाच जैसी अपनाई जाने वाली दुष्टता, भ्रष्टता अपनाने के लिए तेजी से अग्रसर हो रहा है।

आज राष्ट्र का एक भी परिवार परिकर इस सर्वव्यापी छूत से बचा हुआ नहीं है। नौकरी के लिए पढ़ाई की अब कोई उपयोगिता रह नहीं गई है। फिर भी लोग घर फूँककर तमाशा देखने और बालकों को उच्च शिक्षा के नाम पर ऐसी स्थिति में पटक देते हैं जिनमें से नौकरी न मिलने पर किसी काम के नहीं रहते।

आज की व्यस्तता को देखते हुए यह आशा तो नहीं की जा सकती कि जन सामान्य चक्रव्यूह तोड़ने वाले अभिमन्यु की भूमिका निभायें। पर इतनी आशा तो की ही जा सकती है कि वे अपने निजी जीवन में, परिवार के क्षेत्र में जो मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ, अवांछनीयताएँ पनपती देखें उन्हें समय रहते उखाड़ने का प्रयत्न करें। कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि उनका समर्थन न करें, उनकी प्रशंसा भी न करें। विरोध बन पड़े तो करे पर यदि वैसा साहस न हो तो कम से कम असहमति और असहयोग की स्थिति तो बनाये ही रहें। यदि सत्य निष्ठा उमगे, औचित्य के प्रति श्रद्धा जगे तो उसे साहस भरे संघर्ष के रूप में परिणत करना चाहिए और जितना सम्भव हो उतना विरोध अथवा असहयोग जारी रखना ही चाहिए। इतनी प्रखरता यदि जीवन्त रखी जा सके तो उतने से भी अनौचित्य के असुर का मनोबल टूटेगा और देवत्व पनपेगा।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शक्ति - साधना

शक्ति में समूचा अस्तित्त्व सिमटा है। जड़-चेतन इसी के रूप हैं। कहीं इसकी सुप्त निष्क्रियता झलकती है, तो कहीं इसकी जाग्रत् सक्रियता के दर्शन होते हैं। जीवन के विविध रूप इसी से प्रकटे हैं। पशु-पक्षियों में, वृक्ष-वनस्पतियों में इसी की चेतनता लहराती है। इसकी ही ऊर्जा गति-प्रगति, विकास-विस्तार के अनेक रूप धरती है। सचमुच ही जीवन और जगत् शक्तिमय है। शक्ति के सिवा यहाँ कुछ भी नहीं।
  
शक्ति-लीला का यह रहस्य मानव जीवन में सबसे गहरा है। स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोश शक्ति की विविध रहस्यमयी धाराओं को ही प्रकट करते हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा व सहस्रार चक्र में महाशक्ति अपने अनेकों रहस्यों को उजागर करती है। कुण्डलिनी महाशक्ति तो जैसे मानव जीवन का अधिष्ठान ही है। जगन्माता आदिशक्ति स्वयं ही इस परम रूप में प्रतिष्ठित होकर मानवीय जीवन को सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव प्रदान करती हैं।
  
शक्ति-लीला के इस रहस्य से जो अनजान-अनभिज्ञ रहते हैं, वे शक्ति-समुद्र में वास करते हुए भी दीन-दुःखी व दयनीय बने रहते हैं। ‘सागर-बिच मीन पियासी’ यही उनकी जीवन कहानी होती है। जो इस रहस्य को जानने की साधना करते हैं, वे आदिशक्ति की सन्तान होने का गौरव पाते हैं। उनके रोम-रोम में शक्ति के समुद्र लहराते हैं। उनकी नाड़ियों व शिराओं में ऊर्जा की धाराएँ उफनती हैं। शक्ति-साधकों के लिए कहीं भी कुछ भी असम्भव नहीं रहता।
  
असम्भव को सम्भव करने वाली शक्ति साधना की यह परम विद्या गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में समायी है। जो अनुभवी हैं वे इस सच्चाई को जानते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों का प्रति क्षण इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। जो शक्ति-साधक इन क्षणों के महत्त्व को पहचान कर गायत्री महाशक्ति की साधना में तल्लीन होंगे वे शक्ति स्रोत बने बिना न रहेंगे। जीवन और जगत् की अनेकों रहस्यमयी शक्ति के अनुदानों से उनका जीवन कृतार्थ होगा।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२८

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 Nov 2019

★ प्रेम गंगा की भाँति वह पवित्र जल है, जिसे जहाँ छिडका जाय, वहीं पवित्रता पैदा करेगा। उसमें आदर्शेंकी अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। आदर्श रहित प्यार को ही मोह कहते हैं। दूरदर्शिता, विवेकशीलता, शालीनता, पवित्रता, सदाशयता जैसे गुणों का भरपूर समावेश प्रेम में होता है। उसमें इन्हीं गुणों की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है। मोह इन विशेषताओं से रहित होता है।

◆ दृष्टिकोण में संयम, सहकार, सन्तुलन स्नेह, सद्भाव, श्रम, साहस जैसे सद्गुणों का महत्व समझने और अपने स्वभाव, व्यवहार को सज्जनोचित बनाने की उपयोगिता समाविष्ट हो सके, तो समझना चाहिए कि आज गई- गुजरी स्थिति होने पर भी कल इन्हीं विशेषताओं के कारण उज्ज्वल भविष्य का सरंजाम जुटाना सुनिश्चित है।   

□  धर्म व्यक्तित्व के गहन क्षेत्र में प्रवेश करके भावश्रद्धा, प्रखर प्रज्ञा और आदर्श कर्म- निष्ठा को उभारकार मनुष्य में देवत्व का उदय करता है। भ्रष्टता और दुष्टता पर शासकीय नियन्त्रण नगण्य जितना ही हो पाता है। धर्म चरित्र और चिन्तन में उत्कृष्टता भर देने और समाज को सत्परम्परा अपनाने के लिए बाधित करने वाला एक प्रचण्ड अनुशासन है। ऐसा अनुशासन जिसके सामने न अनीति ठहरती है, न उद्दण्ड आततायी उच्छृंखलता। 
 
■   ऊँचे उद्देश्यों का होना सराहनीय है, पर उनकी सफलता के लिए ऐसे कर्मठ समर्थकों की मण्डली चाहिए जो लक्ष्य के प्रति, इस प्रकार समर्पित हो, मानो वही ईमान है और वही भगवान है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 9)

Q.11. What is Savita?         
Ans. The deity for meditation on Gayatri Mantra is ‘Savita’. Savita is the cosmic power of God which provides energy to all animate and inanimate systems of the cosmos. In the Sun and other stars, for instance, it works as fission and fusion of atoms.

Q.12. Why is Gayatri Upasana considered supreme as compared to other forms of worship?

Ans. Gayatri is the fountainhead of all streams of divine powers personified and designated as deities (Lakhyami, Durga, Saraswati etc.) Thus by invocation of Gayatri the Sadhak starts accessing divine attributes. Speciality of Gayatri Sadhana lies in the fact that it provides the Sadhak an access to the huge store of spiritual energy accumulated in the cosmos by Tap of innumerable Gayatri Sadhakas since times immemorial. With a little effort, he is able to get assistance from the ancient Rishis in astral realms (the abodes of elevated and enlightened soul) and moves speedily realms on the spiritual path.  
Gayatri Sadhana is based on the super-science governing the laws of transformation of matter and energy by influx of divine energies from supramental (Para) realms to the natural (a-Para) realm.  

Gayatri is also personification of God’s power of righteous wisdom. Assimilating the substance and meaning underlying its worship leads to far-sighted wisdom. This alone is  sufficient incentive to inspire one to lead righteous life and effortlessly get rid of worldly sorrows, grief, pain and suffering. The Sadhak gets patience to endure difficulties which cannot be avoided. He is also crowned with worldly success on account of inculcation of perseverance and courage to march ahead on the path of integral growth.

Attainment of heaven and liberation are the outcome of refinement in outlook and incorporation of excellence in the method of working. It  is not necessary to wait for the next life after death for achieving these twin aims. Liberation from bondage means freedom from the fetters of greed, infatuation and egoism. A person who assimilates the knowledge underlying Gayatri and infuses his soul with inner refinement surely gets liberated from worldly bondage. However,   when Jap is performed in a routine manner as a ritual and no attempt is made to assimilate its substance in practical life, no perceptible progress takes place.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 24

बुधवार, 20 नवंबर 2019

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ५)

कुरीतियों की दृष्टि से यों अपना समाज भी अछूता नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक्त जोड़ों का विवाह कर दिया जाय और सार्वजनिक घोषणा के रूप में उनका पंजीकरण करा देना या घरेलू त्यौहार जैसा कोई हलका सा हर्षोत्सव कर देना यही औचित्य की मर्यादा है। पर अपने यहाँ उसे युद्ध जीतने या पहाड़ उठाने जैसा बना लिया गया है। उस धमाल में पैसों की, समय की जितनी बर्बादी होती है उसका हिसाब लगाने पर प्रतीत होता है कि आजीविका का एक तिहाई अंश इसी कुप्रचलन में होली की तरह जल जाता है। खर्चीली शादियाँ हमें किस तरह दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। कितने ही परिवारों की सुख शान्ति और प्रगति किस प्रकार इस नरभक्षी पिशाचिनी की बलिवेदी पर नष्ट होती है इसे अधिकाँश लोग समझते भी हैं और कोसते भी हैं। फिर भी आश्चर्य यह है कि छोड़ते किसी से नहीं बनता। इसे कुरीतियों का माया जाल ही कहना चाहिए जो तोड़ने का दम−खम करने वालों को भी अपने शिकंजे से छूटने नहीं देता।

जाति-पाँति के नाम पर प्रचलित ऊँच-नीच की मान्यता के पीछे न कोई तर्क है न तथ्य, न प्रमाण, न कारण। फिर भी अपने समाज में ब्राह्मण-ब्राह्मण के, ठाकुर-ठाकुर के, अछूत-अछूत के बीच जो ऊँच-नीच का भेद-भाव चलता है उसे देखते हुए लगता है कि यह सवर्ण-असवर्ण के मध्य चलने वाला विग्रह नहीं है, वरन् हर बिरादरी वाले अपनी ही उपजातियों में ऊँच-नीच का भेद बरतते-बरतते इस प्रकार बँट गये हैं मानो उनका कोई एक देश, धर्म, समाज या संस्कृति रह ही नहीं गई हो। इस दुर्विपाक से सभी परिचित हैं, सभी दुःखी हैं, सभी विरुद्ध हैं। फिर भी कुरीतियों का कुचक्र तो देखिये कि बरताव में सुधारक भी पिछड़े लोगों की तरह ही आचरण करते हैं।

नर-नारी के बीच बरता जाने वाला भेदभाव कुरीतियों की दृष्टि से और भी घिनौना है। इसने पर्दे के प्रतिबन्ध में आये जन समुदाय को दूसरे दर्जे के नागरिक की, नजरबन्द कैदी की स्थिति में ले जाकर पटक दिया है। नारी आज की स्थिति में देश की अर्थ व्यवस्था में, सामाजिक प्रगति में कुछ योगदान दे सकने की स्थिति में रही ही नहीं। अशिक्षा, उपेक्षा, अयोग्यता, पराधीनता, अस्वस्थता के बन्धनों में जकड़ी हुई, अन्धाधुन्ध प्रजनन के प्राण घातक भार के अत्याचार से लदी हुई नारी अपने आपके लिए, नर समुदाय के लिए, समूचे समाज के लिए भारभूत बनकर रह रही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 क्या तुम मनुष्य हो?

क्या तुम मुनष्य हो? इस अटपटे सवाल के बारे में यही कहना है कि प्रेम तुममें जितना गहरा है, तुम उतने ही श्रेष्ठ मनुष्य हो। इसके विपरीत तुममें साधन-सम्पत्ति का लोभ जितना ज्यादा है, मनुष्य के रूप में तुम उतने ही निम्न हो। प्रेम और परिग्रह जिन्दगी की दो दिशाएँ हैं। हृदय प्रेम से भरा हो, तो परिग्रह शून्य हो जाता है। और जिनका चित्त लोभ और परिग्रह से घिरा है, वहाँ प्रेम शून्य होता है।
  
एक महारानी ने अपने मौत के बाद अपनी कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियाँ लिखने का हुक्म दिया था- ‘इस कब्र में अपार धनराशि गड़ी हुई है। जो व्यक्ति निहायत गरीब एवं एकदम असहाय हो, वह इसे खोदकर ले सकता है।’ उस कब्र के पास से हजारों दरिद्र एवं भिखमंगे निकले, लेकिन उनमें से कोई भी इतना दरिद्र एवं असहाय नहीं था जो धन के लिए मरे हुए व्यक्ति की कब्र खोदे। एक अत्यन्त बूढ़ा भिखमंगा तो वहाँ सालों-साल से रह रहा था। वह हमेशा उधर से गुजरने वाले प्रत्येक दरिद्र व्यक्ति को कब्र की ओर इशारा कर देता था।
  
हालांकि आखिर में वह व्यक्ति भी आ ही गया, जिसकी दरिद्रता इतनी ज्यादा थी कि उसने उस कब्र को खोद ही डाला। आप जानना चाहेंगे कि वह व्यक्ति कौन था? तो सुनिए वह स्वयं एक सम्राट था। और उसने इस कब्र वाले देश को बस अभी-अभी जीता था। उसने अपनी विजय के साथ इस कब्र की खुदाई शुरू करवा दी। पर उसे इस कब्र में एक पत्थर के सिवा और कुछ नहीं मिला। इस पत्थर पर लिखा हुआ था, ‘मित्र, तू अपने से पूछ, क्या तू मनुष्य है। क्योंकि धन के लिए कब्र में सोए हुए मुरदों को परेशान करने वाला मनुष्य हो ही नहीं सकता।’
  
वह सम्राट जब निराश होकर उस कब्र के पास से वापस लौट रहा था, तो उस कब्र के पास रहने वाले बूढ़े भिखमंगे को लोगों ने खूब जोर से हँसते हुए देखा। वह हँसते हुए कह रहा था ‘मैं कितने सालों से इन्तजार कर रहा था, आखिरकार आज धरती के दरिद्रतम निर्धन और सबसे ज्यादा असहाय व्यक्ति का दर्शन हो ही गया।’ सच में प्रेम विहीन व्यक्ति से बड़ा दरिद्र और दीन-दुःखी और कोई हो ही नहीं सकता। जो प्रेम के अलावा किसी और सम्पदा की खोज में लगा रहता है, एक दिन वही सम्पदा उससे सवाल करती है- क्या तुम मनुष्य हो?

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२७

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Nov 2019

★ स्वस्थ जीवन का आधार है- अध्यात्म सिद्धान्तों का जीवन के हर क्षण, हर गतिविधि में व्यापक समावेश। दवाओं से स्वास्थ्य नहीं खरीदा जा सकता। मनो,विकार  व्यक्तिगत व समष्टिगत रोगों का मूल कारण है। राष्ट्र के समग्र स्वास्थ्य हेतु, इसके निवारण के लिए अध्यात्म सिद्धान्तों को उत्कृष्ठता की पक्षधर मान्यताओं का जन- स्तरीय व्यापक प्रचार- प्रसार अति आवश्यक है।

◆ जिस तरह अग्नि, यज्ञ कुण्ड में प्रज्वलित होती है, वैसे ही ज्ञानाग्नि अन्तःकरण में, तपाग्नि इन्द्रियों में तथा कर्माग्नि देह में प्रज्वलित रहनी चाहिए। यही यज्ञ की। आध्यात्मि स्वरूप है। अपनी संकीर्णता, अहंता, स्वार्थपरता को जो इस दिव्य अग्नि में होम देता है, वह बदले में इतना प्राप्त करता है, जिससे नर को नारायण की पदवी मिल सके।  

□  मनुष्य में देवत्व का उदय गुण- कर्म- स्वभाव में चिन्तन और चरित्र में शालीनता अपनाने से ही सम्भव है। नव युग की महती आवश्यकता दुष्प्रवृत्ति उन्मूल और संवर्धन का पक्षधर लोक मानस बनाना पड़ेगा। नये सिरे से यथार्थवादी दिशाधारा अपनाने के लिए अभीष्ट उत्साह एवं साहस जाग्रत् कर सके। 
 
■  प्रसन्न रहना सब रोगों की दवा है और प्रसन्न रहने के लिए आवश्यक है अपना जीवन निष्कलुष बनाया जाय। निष्कलुष, निष्पाप, निर्दोष और पवित्र जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति ही सभी परिस्थितियों में प्रसन्न रह सकता है और यह तो सिद्व हो ही चुका है कि मनोविकारों से बचे रहकर प्रसन्नचित्त मनःस्थिति ही सुदृढ़स्वास्थ्य का सुदृढ़ आहार है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 8)

Q.10. What is the relationship between Gayatri Mantra and other powers of God?

Ans. According to Savitri Upnishad, from the eternal omnipotence of God represented by Om, seven streams of divine power, known as Vyahritis, emanate. Three amongst these (Bhur , Bhuwaha and Swaha) form the prefix of Gayatri Mantra. The Vyahritis are also known as the ‘Sheersha’ (fountainhead) of Gayatri.

When Gayatri- the Primordial Power of the Divine, with Its totality of energy systems, interacts with the five basic elements of material universe (Panch Bhautik Prakriti - Savitri), complex, mysterious reactions are set into motion. Spirituality identifies these five basic elements (of which the entire material universe in its of solid, liquid and gaseous states and physical bodies of animate systems are composed) as Prithvi, Jal, Vayu, Tej and Akash. In course of interaction of the cosmic energies with these basic elements subtle sound waves similar to those produced by twenty-four letters of Gayatri Mantra are created.
In the course of thousands of years of research, Indian spiritual masters and yogis have evolved procedures for accessing divine energy by “tuning” into these cosmic sound waves by chanting of Gayatri Mantra, performance of Yagya and other associated procedures of Gayatri Sadhana.
(Also please see the answer to Q.No. 8)

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 23

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 19 Nov 2019

👉 प्रार्थना

प्रार्थना का संगीत प्रेम की सरगम से सजता है। प्रेम की सजल संवेदनाओं से ही प्रार्थना के स्वर स्फुटित होते हैं। प्रेम के शब्दों को गूँथकर ही प्रार्थना का काव्य रचा जाता है। भावमय भगवान् केवल भावनाओं की सघन पुकारों को सुने बिना नहीं रहते। संवेदनाओं की सजलता ही उन्हें स्पर्श कर पाती है।
  
सजल संवेदनाओं, सघन भावनाओं एवं प्रेम की प्रतीति को जो अपने जीवन में घोल देते हैं, उनका जीवन सहज ही प्रार्थनामय हो जाता है। सूफी फकीरों में इस बारे में एक घटना बहुप्रचलित है। सूफी फकीर नूरी को उनके कुछ अन्य फकीर साथियों के साथ काफिर होने का आरोप लगाया गया था। इसके लिए इन सबको मृत्युदण्ड भी सुना दिया था।
  
मृत्युदण्ड की घड़ी में जब जल्लाद फकीर नूरी के एक साथी के पास नंगी तलवार को लहराता हुआ आया, तो नूरी ने उठकर स्वयं को अपने मित्र के स्थान पर पेश किया। ऐसा करते समय नूरी के चेहरे पर गहरी प्रसन्नता और स्वरों में भरपूर नम्रता थी। इस दृश्य को देखकर दर्शक स्तब्ध रह गए। हजारों की भीड़ एक पल को सहम गयी।
  
अचरज से भरे जल्लाद ने कहा- हे युवक! तलवार ऐसी वस्तु नहीं है, जिससे मिलने के लिए लोग उत्सुक एवं व्याकुल हों और फिर तुम्हारी तो अभी बारी भी नहीं आयी। जल्लाद की इन बातों पर फकीर नूरी मुस्करा उठे और कहने लगे- मेरे लिए प्रेम ही प्रार्थना है। मैं जानता हूँ कि जीवन, संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु है। लेकिन प्रेम के मुकाबले वह कुछ भी नहीं है। जिसे प्रेम उपलब्ध हो जाता है, उसके लिए सारा जीवन प्रार्थना बन जाता है। और प्रार्थनाशील मनुष्य का कर्त्तव्य है कि जब भी कोई कष्ट आगे आए, तो स्वयं सबसे आगे हो जाओ और जहाँ सुख-सुविधाएँ मिलती हों तो वहाँ पीछे होने की कोशिश करो।
  
फकीर नूरी की इन बातों ने जता दिया कि प्रार्थना का कोई ढाँचा नहीं होता। वह तो हृदय का सहज अंकुरण है। जैसे पर्वत से झरने बहते हैं, वैसे ही प्रेमपूर्ण व्यक्ति के प्रत्येक कर्म में प्रार्थना की धुन गूँजती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२६

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 Nov 2019

★ बुद्धि जीवन यापन के लिए साधन एकत्रित कर सकती है,गुत्थियों को सुलझा सकती है, किन्तु जीवन की उच्चतम भूमिका में नहीं पहुँचा सकती। चेतना की उच्चस्तरीय परतों तक पहुँच सकता, तो हृदय की महानता द्वारा ही सम्भव है। बुद्धि प्रधान किन्तु हृदय शून्य व्यक्ति भौतिक जीवन में कितना भी सफल क्यों न हो, किन्तु  भव- सागर की चेतन परतों तक पहुँच सकने में वह असमर्थ होता है।

◆ मनुष्य जहाँ महापुरुषों को देखता है, वहाँ उसे अपने बड़े होने का ज्ञान आ जाता है और जितना ही सच्चा इस महानता का दर्शन होता है, उतना ही निश्चित उसका महान् बन जाना होता है। महान् मन वाले लोग विचारों पर विवाद करते है, मध्यम मन वाले वस्तुओं पर तथा शुद्ध मन वाले व्यक्तियों पर बहस करते हैं। 

□  समय ही जीवन की परिभाषा है। भक्ति- साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है, लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता। अपना समस्त जीवन- क्रम एक सुनिर्धारित समय विभाजन- चक्र के अनुसार चलावें। उठने, नहाने, घूमने, जाने, कार्य करने, अध्ययन, मनन, चिन्तन, गृहकार्य आदि का एक बँधा हुआ समय हो और ठीक समय पर अपने काम में लग जाना चाहिए। पत्रों का उत्तर तत्काल दें। दिए हुए समय पर लोगों से मिलने जायें, अपने दैनिक जीवन में छोटे- छोटे कार्यों में भी नियमितता बरते, समय के पाबन्द बनें।
 
■  जीवनी शक्ति को दृढ़ता पूर्वक स्वीकार करना एवं उसका दैनंदिन जीवन में अभ्यास करना स्वस्थ रहने के लिए बहुत आवश्यक है। ईश्वर की स्वास्थ्य दायक शक्ति हर समय हर व्यक्ति- जीवधारी के शरीर, मन व आत्मा को अनुप्राणित करती रहती है। जितने, भी व्यक्ति दीर्घकाल तक जिये हैं जीवन जीने की विधा के कारण ही स्वस्थ रह पाये हैं। यदि इस सूत्र का अनुसरण किया जा सके, तो हर क्षण, हर पल उल्लास पूर्ण रीति से जिया जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 7)

Q.9. Why is Gayatri designated as Vedmata, Devmata and Vishwamata?  

Ans. Gayatri has been called Vedmata because it is the essence of source of Vedas. It is called Devmata because there is perpetual growth of divinity and righteousness in its devotee. Its ultimate object is to inculcate and awaken the feeling of ‘Vasudhaiv Kutumbakam’ and ‘Atmavat Sarvabhooteshu’ (Welfare of man - the individual lies in the welfare of all humankind). It is known as Vishwamata since it aims at establishment of good-will, equality, unity and love amongst the entire human race, cutting across barriers of language, race, colour, sex etc. and ultimately uniting the whole world on basis of realised spiritual unity in diversity.

The individual basis of Gayatri is to establish righteous wisdom. ‘Naha’ implies inculcation of cooperation and collective endeavour - mutual caring and sharing.
The absolute wisdom condensed in Gayatri magnified itself as the Vedas. For this reason Gayatri is known as the Mother of Vedas. (Gayatri Mantra is the  means for invocation of Divine grace).  
Gayatri is the fountainhead of all divine powers (Devtas). It is therefore, known as the Devmata. (Ref. Tandya Brahman).

Gayatri sustains the cosmos as the three Supreme Emanations of the Supreme, known as Brahma, Vishnu and Mahesh. Hence, it is called Vishwamata (Ek Pwan Kashi Khand, Poorvardha 4.9.58)

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 22

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ४)

जीभ का चटोरापन अनावश्यक मात्रा में अभक्ष्य पेट पर लादता है और क्रमशः अपच, रक्त दूषण बढ़ाते-बढ़ाते समूची स्वास्थ्य सम्पदा को ही बर्बाद करके रख देता है। इसी प्रकार कामुक चिन्तन में निरत रहने वाले पाते तो कुछ नहीं, अपनी एकाग्रता और चिन्तन की शालीनता गिराते-गिराते, घटाते-घटाते खोखला बनाने वाली दुश्चरित्रता के मानसिक मरीज बन जाते हैं। ऐसे लोग बौद्धिक दृष्टि से तो दुर्बल होते ही जाते हैं। शरीरबल, मनोबल और चरित्र बल की दृष्टि से भी गई गुजरी स्थिति में जा पहुँचते हैं।

व्यक्तित्व को खोखला करने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपने चिन्तन, स्वभाव और व्यवहार में ढूँढ़ते रहा जाय, साथ ही उन्हें संक्रामक बीमारी मानकर समय रहते उन्मूलन का उपाय उपचार किया जाता रहे तो यह अपने आप से स्वयं लड़ते रहने की शूरता किसी सफल सेनापति को विजयश्री मिलने जैसी मानी जायेगी। जो अपने को जीतता है वह विश्व विजयी बनता है। इस उक्ति को सर्वथा सारगर्भित समझा जाना चाहिए। गीता में ऐसे ही धर्मक्षेत्र, कर्मक्षेत्र में अर्जुन को लड़ने का उपदेश भगवान ने दिया था। वह हर विचारशील के लिए सदा सर्वदा अनुकरणीय है।

वह व्यक्तिगत सुधार परिधि की गुण, कर्म, स्वभाव क्षेत्र की चर्चा हुई। अब एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए। परिवार एवं समाज में प्रयुक्त होने वाले प्रचलनों को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए और खोजना चाहिए कि सर्वत्र न सही अपने निज के व्यवहार तथा सम्बद्ध परिवार में ऐसी क्या अवांछनीयताएँ हैं जो व्यक्तिगत क्षेत्र में पनपने पर भी समूचे समाज के लिए घातक सिद्ध होती हैं। हैजा प्लेग के विषाणु आरम्भ में किसी छोटे क्षेत्र में होते हैं पर छूत की बीमारी बनकर दूर-दूर तक फैलते और असंख्यों का प्राण हरण करते चले जाते हैं। मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ और अनैतिकताएँ एक प्रकार से चरित्र एवं समाज क्षेत्र की बीमारियाँ हैं। यह जहाँ पनपती हैं उतने ही क्षेत्र में तबाही नहीं करती वरन् अपनी चपेट में सुविस्तृत क्षेत्र को जकड़ती और पतन पराभव का वातावरण बनाती चली जाती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 17 नवंबर 2019

👉 जीवन जीने की कला

जीवन-जीने की कला में है। जिस किसी भी तरह अनगढ़ तौर-तरीकों से जीते रहने का नाम जीवन नहीं है। दरअसल जो जीने की कला जानते हैं, केवल वही यथार्थ में जीवन जीते हैं। जीवन का क्या अर्थ है? क्या है हमारे होने का अभिप्राय? क्या है मकसद? हम क्या होना और क्या पाना चाहते हैं? इन सवालों के ठीक-ठीक उत्तर में ही जिन्दगी का रहस्य समाया है।
  
यदि जीवन में गन्तव्य का बोध न हो, तो भला गति सही कैसे हो सकती है और यदि कहीं पहुँचना ही न हो, तो संतुष्टि कैसे पायी जा सकती है? जिसके पास सम्पूर्ण जीवन के अर्थ का विचार नहीं है, उसकी दशा उस माली की तरह है, जिसके पास फूल तो हैं और वह उनकी माला भी बनाना चाहता है, लेकिन उसके पास ऐसा धागा नहीं है जो उन्हें जोड़ सके, एक कर सके। आखिरकार वह कभी भी अपने फूलों की माला नहीं बना पायेगा।
  
जो जीवन जीने की कला से वंचित है, समझना चाहिए कि उनके जीवन में न दिशा है और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते हैं। उनसे कभी भी उस ऊर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती है। जीने की कला से वंचित व्यक्ति जीवन के उस समग्र अनुभव से सदा के लिए वंचित रह जाता है, जिसके अभाव में जीना और न जीना बराबर ही हो जाता है।
  
ऐसे व्यक्ति का जीवन उस वृक्ष की भाँति है, जिसमें न तो कभी फूल लग सकते हैं और न कभी फल। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती। क्योंकि आनन्द की अनुभूति तो जीवन को कलात्मक ढंग से जीने पर, उसे समग्रता में अनुभव करने पर होती है। जीवन में यदि आनन्द पाना है, तो जीवन को फूलों की माला बनना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूँथना होगा। जो जीने की इस कला को नहीं जानते हैं, वे सदा के लिए जिन्दगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२५

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ३)

स्वभाव में कटुता, कर्कशता, उतावली, अधीरता, उत्तेजना की उद्दण्डता भी उतनी ही घातक है जितनी कि दीनता, भीरुता, निराशा, कायरता। यह दोनों ही असन्तुलन भिन्न प्रकार के होते हुए भी हाई ब्लड प्रेशर, लो ब्लड प्रेशर की तरह अपने-अपने ढंग से हानि पहुँचाते हैं। स्वभाव को सहिष्णु, धैर्यवान, गम्भीर, दूरदर्शी, सहनशील बनाने का प्रयत्न यदि निरन्तर जारी रखा जाय तो शिष्टता, सज्जनता के ढाँचे में प्रकृति ढलती जायेगी और हर किसी की दृष्टि में अपना मूल्य बढ़ेगा।

ईमानदारी, सच्चाई, सहकारिता, उदारता, मिल जुलकर रहना, मिल बाँटकर खाना, हँसने-हँसाने की हलकी-फुलकी जिन्दगी जीना जैसी आदतें यदि अपने चरित्र का अंग बन सके तो इसमें घाटा कुछ भी नहीं लाभ ही लाभ है। बेईमान, झूठे, ईर्ष्यालु, स्वार्थान्ध, विद्वेषी, मनहूस प्रकृति के लोग अपनी चतुरता और अहमन्यता का ढिंढोरा भर पीटते हैं। वस्तुतः वे कुछेक चापलूसों और अनाड़ियों को छोड़कर हर समझदार की दृष्टि से ओछे, बचकाने और घिनौने प्रतीत होते हैं। वस्तुतः ऐसे लोग जोकर भर समझे और अप्रामाणिक ठहराये जाते हैं। आमतौर से ऐसे लोग अविश्वस्त और चरित्रहीन समझे जाते हैं। फिजूलखर्ची, बड़प्पन, बेईमानी गरीबी के गर्त में गिरने की पूर्व सूचना है। ऐसी आदतें अपने में थोड़ी मात्रा में भी पनपी हो तो उन्हें छोटी दीखने वाली उस चिनगारी को लात से मसलकर बुझा ही देना चाहिए।

ऐसे-ऐसे और भी अनेकों दोष दुर्गुण हैं जो विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार की अनुपयुक्त आदतों के रूप में प्रकट होते हैं। एक सभ्य सुसंस्कारी मनुष्य की प्रतीक प्रतिमा मन में बसानी चाहिए और उसकी तुलना में अपनी जो भी कमियाँ दीखती हों उन्हें संकल्प और साहस के सहारे उलटने का प्रयत्न करना चाहिए। उलटने का तरीका एक ही है कि अनौचित्य के स्थान पर उसका प्रतिपक्षी औचित्य अपनाया जाय। उसे अपने दैनिक जीवनक्रम में सम्मानित रखते हुए धीरे-धीरे स्वभाव को ही उस ढाँचे में ढाल लिया जाय। बुराई कोसते रहते से नहीं मिट जाती, उसकी प्रतिपक्षी भलाई को प्रयोग में लाने की नियमित कार्य पद्धति अपनानी होती है। काँटे को काँटे से निकालते हैं और दुष्प्रवृत्तियों को हटाने के लिए सत्प्रवृत्तियों को उनसे जूझने के लिए मोर्चे पर खड़े करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Nov 2019

★ शिखा रखते समय हर व्यक्ति को इसके मूल प्रयोजन का ध्यान रखना चाहिए। मस्तिष्क में उन्हीं विचारणाओं, मान्यताओं और आकांक्षाओं को स्थान मिले, जो विवेकशीलता, नैतिकता, मानवता, सामाजिकता की कसौटी पर खरे उतरते हों। दुर्बुद्धि, दुर्भावना और दुष्टता की जो दुष्प्रवृत्तियाँ चारों ओर फैली हैं, उनका उन्मूलन करने के  लिए हमें शिखा रूपी धर्मध्वजा फहराते हुए एक ऐसा भावनात्मक महाभारत खड़ा करना चाहिए, जिसमें अनौचित्य की कौरवी सेना को परास्त कर औचित्य- अर्जुन के गले में विजय बैजयन्ती पहनाई जा सके।

◆ विचारों की शक्ति और उपयोगिता समझ सकने वाले लोग इस विशाल भीड़ से तलाश किए जाएं। जो स्वयं प्रकाश पूर्ण,बौद्घिक प्रखरता के सुनने- समझने के लिए तैयार नहीं, वे भला और किसी को क्या कुछ कह- सुन सकेंगे और क्या अपने जीवन में प्रखरता ला सकेंगे।

□  हे भगवान् ! यह शरीर तेरा मन्दिर, है अतः इसे मैं हमेशा पवित्र रखूँगा। आपने मुझे यह हृदय दिया है, मैं इसे प्रेम से भर दूँगा, आपने मुझे यह बुद्धि दी है, मैं इस दीपक को हमेशा निर्मल और तेजस्वी बनाये रखूँगा। 
 
■  गुरु- शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत् समझकर, उसे टेढे- मेढ़े मार्गों से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर, गुरु की अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश की अवहेलना करता है। यद्यपि गुरु उसे कुछ भी न कहें, किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 16 नवंबर 2019

👉 सच्चा ज्ञान:-

एक संन्यासी ईश्वर की खोज में निकला और एक आश्रम में जाकर ठहरा। पंद्रह दिन तक उस आश्रम में रहा, फिर ऊब गया। उस आश्रम के जो बुढे गुरु थे वह कुछ थोड़ी सी बातें जानते थे, रोज उन्हीं को दोहरा देते थे।

फिर उस युवा संन्यासी ने सोचा, 'यह गुरु मेरे योग्य नहीं, मैं कहीं और जाऊं। यहां तो थोड़ी सी बातें हैं, उन्हीं का दोहराना है। कल सुबह छोड़ दूंगा इस आश्रम को, यह जगह मेरे लायक नहीं।'

लेकिन उसी रात एक ऐसी घटना घट गई कि फिर उस युवा संन्यासी ने जीवन भर वह आश्रम नहीं छोड़ा। क्या हो गया?

दरअसल रात एक और संन्यासी मेहमान हुआ। रात आश्रम के सारे मित्र इकट्ठे हुए, सारे संन्यासी इकट्ठे हुए, उस नये संन्यासी से बातचीत करने और उसकी बातें सुनने।

उस नये संन्यासी ने बड़ी ज्ञान की बातें कहीं, उपनिषद की बातें कहीं, वेदों की बातें कहीं। वह इतना जानता था, इतना सूक्ष्म उसका विश्लेषण था, ऐसा गहरा उसका ज्ञान था कि दो घंटे तक वह बोलता रहा। सबने मंत्रमुग्ध होकर सुना।

उस युवा संन्यासी के मन में हुआ; 'गुरु हो तो ऐसा हो। इससे कुछ सीखने को मिल सकता है। एक वह गुरु है, वह चुपचाप बैठे हैं, उन्हे कुछ भी पता नहीं। अभी सुन कर उस बूढ़े के मन में बड़ा दुख होता होगा, पश्चात्ताप होता होगा, ग्लानि होती होगी—कि मैंने कुछ न जाना और यह अजनबी संन्यासी बहुत कुछ जानता है।'

युवा संन्यासी ने यह सोचा कि 'आज वह बूढ़ा गुरु अपने दिल में बहुत—बहुत दुखी, हीन अनुभव करता होगा।'

तभी उस आए हुए संन्यासी ने बात बंद की और बूढ़े गुरु से पूछा कि- "आपको मेरी बातें कैसी लगीं?"

बूढे गुरु खिलखिला कर हंसने लगे और बोले- "तुम्हारी बातें? मैं दो घंटे से सुनने की कोशिश कर रहा हूँ तुम तो कुछ बोलते ही नहीं हो। तुम तो बिलकुल भी बोलते ही नहीं हो।"

वह संन्यासी बोला- "मै दो घंटे से मैं बोल रहा हूं आप पागल तो नहीं हैं! और मुझसे कहते हैं कि मैं बोलता नहीं हूँ।"

वृद्ध ने कहा- "हां, तुम्हारे भीतर से गीता बोलती है, उपनिषद बोलता है, वेद बोलता है, लेकिन तुम तो जरा भी नहीं बोलते हो। तुमने इतनी देर में एक शब्द भी नहीं बोला! एक शब्द तुम नहीं बोले, सब सीखा हुआ बोले, सब याद किया हुआ बोले, जाना हुआ एक शब्द तुमने नहीं बोला। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम कुछ भी नहीं बोलते हो, तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती हैं।"

'वास्तव में दोस्तों!! एक ज्ञान वह है जो उधार है, जो हम सीख लेते हैं। ऐसे ज्ञान से जीवन के सत्य को कभी नहीं जाना जा सकता। जीवन के सत्य को केवल वे जानते हैं जो उधार ज्ञान से मुक्त होते हैं।

हम सब उधार ज्ञान से भरे हुए हैं। हमें लगता है कि हमें ईश्वर के संबंध में पता है। पर भला ईश्वर के संबंध में हमें क्या पता होगा जब अपने संबंध में ही पता नहीं है? हमें मोक्ष के संबंध में पता है। हमें जीवन के सभी सत्यों के संबंध में पता है। और इस छोटे से सत्य के संबंध में पता नहीं है जो हम हैं! अपने ही संबंध में जिन्हें पता नहीं है, उनके ज्ञान का क्या मूल्य हो सकता है?

लेकिन हम ऐसा ही ज्ञान इकट्ठा किए हुए हैं। और इसी ज्ञान को जान समझ कर जी लेते हैं और नष्ट हो जाते हैं। आदमी अज्ञान में पैदा होता है और मिथ्या ज्ञान में मर जाता है, ज्ञान उपलब्ध ही नहीं हो पाता।

दुनिया में दो तरह के लोग हैं एक अज्ञानी और एक ऐसे अज्ञानी जिन्हें ज्ञानी होने का भ्रम है। तीसरी तरह का आदमी मुश्किल से कभी-कभी जन्मता है। लेकिन जब तक कोई तीसरी तरह का आदमी न बन जाए, तब तक उसकी जिंदगी में न सुख हो सकता है, न शांति हो सकती है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 16 Nov 2019



👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग २)

दुर्व्यसनों, दुर्गुणों, उच्छृंखलताओं एवं बुरी आदतों से उत्पन्न होने वाली हानियाँ इतनी अधिक हैं कि उनकी आग में उपार्जन, स्वास्थ्य, सम्मान, सन्तुलन, भविष्य, परिवार सभी कुछ ईंधन की तरह जलते और समाप्त होते देखा जा सकता है। इसलिए प्रगति की योजनाएँ बनाते समय यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों ने कहाँ कहाँ डेरे तम्बू गाड़ रखे हैं। अनुपयुक्त आदतों की विष बेलें कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमाती जा रही है। इस उखाड़-पछाड़ के बिना सुखद सम्भावनाओं का बीजारोपण हो नहीं सकेगा।

प्रत्यक्ष शत्रुओं से निपटना आसान है। चोर उचक्कों की सुरक्षा चौकीदारी से हो सकती है, किन्तु उन दुष्प्रवृत्तियों से निपटना तो दूर उनको ढूँढ़ निकालना और होने वाली हानियों का अनुमान लगाना तक कठिन पड़ता है। अदृश्य को कैसे देखा जाय? अप्रत्यक्ष को कैसे पकड़ा जाय? सूक्ष्मदर्शी विवेक का माइक्रोस्कोप ही इन विषाणुओं का अता-पता बता सकता है जो दुर्गुणों के रूप में विषाणुओं की भूमिका निभाते और सर्वनाश का ताना-बाना बुनते रहते हैं।

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में किस हेय स्तर की दुष्प्रवृत्तियाँ अधिकार जमाती हैं, इसका तीखा निष्पक्ष पर्यवेक्षण करना चाहिए। शरीर क्षेत्र का शत्रु नम्बर एक आलस्य है और मनःक्षेत्र का प्रमाद। आलसी और प्रमादी प्रकारान्तर से आत्म हत्यारे हैं, वे अपने इन बहुमूल्य यन्त्रों को जंग लगाकर भोंथरे, अनुपयोगी एवं अपंग बना देते हैं। पक्षाघात पीड़ित जीते तो हैं किन्तु अशक्त असमर्थ, अर्ध मृतक की तरह रहकर। जिनके शरीर पर आलस्य का शनिश्चर छाया है वे काम से जी चुराते और परिश्रम में बेइज्जती अनुभव करते देखे जाते हैं। प्रमादी मस्तिष्क पर जोर नहीं डालते। उचित-अनुचित के पक्ष विपक्ष पर माथा पच्ची नहीं करते। जो चल रहा है उसी ढर्रे पर बेपेंदी के लोटे की तरह लुढ़कते रहते हैं। न समय की परवाह होती है न हानि लाभ की। किसी तरह दिन काटते चलना ही अभीष्ट होता है। पराक्रम रहित शरीर अपंग है और उत्साह रहित मस्तिष्क मूढ़मति। ऐसी दीन दयनीय स्थिति मनुष्य की अपनी बनाई होती है। यदि दिनचर्या बनाकर समय के एक-एक क्षण का उपयोग करने के लिए दिन भर के भविष्य के कार्य निर्धारित कर लिये जाय और उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर श्रमशील तत्परता और रुचि रस से भरी पूरी तन्मयता का संयुक्त नियोजन किया जा सके तो सफलता चरण चूमेगी और प्रगति पथ पर सरपट दौड़ने वाली चाल चौगुनी सौगुनी बढ़ती दीखेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विजय का महापर्व

विजय पथ पर केवल धर्मपरायण, साहसी ही अपने पाँव रखते हैं, जिनमें जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत है, वही इस राह पर चल पाते हैं। अनीति, अनाचार, अत्याचार और आतंक से लोहा यही लौहपुरुष लेते हैं। विजय दशमी के रहस्य इन्हीं के अन्तर्चेतना में उजागर होते हैं। विजय का महापर्व इनके ही अस्तित्त्व को आनन्दातिरेक से भरता है।
  
विजय के साथ संयोजित दशम् संख्या में कई सांकेतिक रहस्य संजोये हैं। दशम् का स्थान नवम के बाद है। जिसने नवरात्रियों में भगवती आदिशक्ति की उपासना की है, वही दशम् की पूर्णता का अधिकारी होता है। वही अपनी आत्मशक्ति के प्रभाव से दस इन्द्रियों का नियंत्रण करने में समर्थ होता है। धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं अक्रोध के रूप में धर्म के दस लक्षण उसकी आत्म चेतना में प्रकाशित होते हैं।
  
प्रभु श्रीराम के जीवन में शक्ति आराधन एवं धर्म की यही पूर्णता विकसित हुई थी। तभी वह आतंक एवं अत्याचार के स्रोत दशकण्ठ रावण को मृत्युदण्ड देने में समर्थ हुए। मर्यादा पुरुषोत्तम की जीवन चेतना में अहिंसा, क्षमा, सत्य, नम्रता, श्रद्धा, इन्द्रिय संयम, दान, यज्ञ, तप तथा ध्यान-इन दस धर्म साधनों की पूर्ण प्रभा-प्रकीर्ण हुई थी। इस धर्म साधन के ही प्रभाव से उनकी सभी दस नाड़ियाँ-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, कहू, अलंवुषा एवं शंखिनी पूर्ण जाग्रत् एवं ऊर्जस्विनी हुई थीं।
  
प्रभु श्रीराम की धर्म साधना में एक ओर तप की प्रखरता थी, तो दूसरी ओर संवेदना की सजलता। इस पूर्णता का ही प्रभाव था कि जब उन्होंने धर्म युद्ध के लिए अपने पग बढ़ाये तो काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मांतगी तथा कमला ये सभी दस महाविद्याएँ उनकी सहयोगिनी बनीं और ‘यतो धर्मस्ततोजयः’ के महा सत्य को प्रमाणित करते हुए विजय दशमी धर्म विजय का महापर्व बन गयी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Nov 2019

★ आशा की जानी चाहिए कि नव- सृजन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मनीषो, समय दानी धनी आदि प्रतिभावान अपनी- अपनी श्रद्धांजलि लेकर नवयुग के अभिनव सृजन में आगे बढ़ेगें और कहने लायक योगदान देंगे। इक्कीसवीं सदीं का उज्ज्वल भविष्य विनिर्मित करने के लिए इस प्रकार का सहयोग आवश्यक है और अनिवार्य भी।

◆ ‘‘उद्घरेदात्मनात्मानं’’ अपना उद्धार आप करो। अपनी प्रगति का पथ स्वयं प्रशस्त करो। जो माँगना है, अपने जीवन देवता से माँगो। बाहर दीखने वाली हर वस्तु का उद्गम केन्द्र अपना ही अन्तरंग है। आत्म देव की साधना ही जीवन देवता की उपासना है।

□  राम के कर्त्तव्य पालन में ,भरत के त्याग- तप में मीरा के प्रेम में, हरिश्चन्द्र के सत्य व्रत में, दधीचि के दान में, कृष्ण के अनासक्ति योग में चरित्र की पूर्णता के दर्शन होते है। चरित्र जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है। चरित्र ही जीवन रथ का सारथी है। उत्तम चरित्र जीवन को सही दिशा में प्रेरित करता है। चरित्र ही हमारे मूल्यांकन की कसौटी हो। चरित्रवान््् व्यक्तियों को प्रोत्साहित और महत्त्व दें।
 
■  प्रत्येक छोटे से लेकर बड़े कार्यक्रम शान्त और सन्तुलित मस्तिष्क द्वारा ही पूरे किए जा सकते हैं। संसार में मनुष्य ने अब तक जो कुछ भी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, उनके मूल में धीर- गम्भीर, शान्त- मस्तिष्क ही रहे हैं। कोई भी साहित्यकार, वैज्ञानिक, कलाकार- शिल्पी, यहाँ तक की बढ़ई, लुहार, सफाई करने वाला श्रमिक तक अपने कार्य, तब- तक भली- भांति नहीं कर सकते, जब तक उनकी मनः स्थिति शान्त न हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 6)

Q.8. Why is Gayatri known as Tripada- Trinity?
Ans. Gayatri is Tripada- a Trinity, since being the Primordial Divine Energy, it is the source of three cosmic qualities known as “Sat”, “Raj” and “Tam” represented in Indian spirituality by the deities “Saraswati” or “Hreem”.  “Lakhyami” or “Shreem” and “Kali” or “Durga” as “Kleem”. Incorporation of “Hreem” in the soul augments positive traits like wisdom, intelligence, discrimination between right and wrong, love, self-discipline and humility. Yogis, spiritual masters, philosophers, devotees and compassionate saints derive their strength from Saraswati.

The intellectuals, missionaries, reformists, traders, workers, industrialists, socialists, communists are engaged in management of equitable distribution of Shreem (Lakhyami) for human well-being. Shreem is the source of wealth, prosperity, status, social recognition, sensual enjoyment and resources.

“Kleem” (Kali or Durga) is the object of reverence and research by the physical scientists. The plethora of scientific research and development depends on the “Kleem” element of Gayatri.

The “Hreem”,  “Shreem” and  “Kleem” elements of Gayatri have eternally existed in the cosmos. The modern western civilisation has particularly devoted itself to the management of  “Kleem” (Heat, light, electricity, magnetism, gravity, matter, nuclear energy etc.) and Shreem; whereas the occultists and mystics of East have remained particularly engaged in research of “Hreem”. It is evident that the key to lasting global peace harmony and prosperity lies in integral devotion of Hreem, Shreem and Kleem. Gayatri Sadhana is the super-science for mastery of these three aspects of the Divine Mother.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 21

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

Govinda Gopala Murli Manohar Nandlala | गोविंदा गोपाला मुरली मनोहर नंदलाला



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Govinda Gopala Murli Manohar Nandlala | गोविंदा गोपाला मुरली मनोहर नंदलाला



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Essence of Worship-Intercession | Pt Shriram Sharma Acharya



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Essence of Worship-Intercession | Pt Shriram Sharma Acharya



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बुधवार, 13 नवंबर 2019

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृजनात्मक कदम उठाने की सम्भावना बनती है। खेत में कंकड़, पत्थर, झाड़ झंखाड़ जड़ जमाये बैठे हो तो उपयुक्त बीज बोने पर भी फसल न उगेगी। इस प्रसंग में सर्वप्रथम जोतने, उखाड़ने, बीनने और साफ करने का काम हाथ में लेना होगा। पहलवान बनने से पूर्व बीमारियों से छुटकारा पाना आवश्यक है। बर्तन में पानी भरने का प्रयत्न करने से पूर्व उसके छेद बन्द करने चाहिए। उद्यान लगाने वालों को पौधे चर जाने वाले पशुओं और फल कुतरने वाले पक्षियों से रखवाली का प्रबन्ध भी करना होता हैं।

जीवन साधना में सर्वप्रथम यह देखना होता है कि चिन्तन और व्यवहार में अवांछनीयताओं ने कहाँ-कहाँ अपने घोंसले बना रखे हैं। इन मकड़ जंजालों को सफा करना ही चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व रसोईघर की, पात्र-उपकरणों की सफाई आवश्यक होती है अन्यथा गन्दगी घुस पड़ने से खाद्य सामग्री विषैली हो जायेगी और पोषण के स्थान पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगी।

मलीनता साफ करने के उपरान्त ही बात बनती है। प्रातः उठते ही शौच, स्नान, मंजन, कंघी, साबुन, बुहारी का काम निपटाना पड़ता है तब अगली गतिविधियाँ अपनाने का कदम उठता है। जन्मते ही बालक गन्दगी में लिपटा आता है, सर्वप्रथम उस जंजाल से मुक्त कराने की व्यवस्था बनानी पड़नी है, सुन्दर कपड़े पहनाना उसके बाद होता है। त्यौहार मनाने का पहला काम है साफ सफाई। पूजा उपचार का भी प्रथम चरण यही है। प्रगतिशील स्थापनाओं का एक पक्ष दुष्ट दुरभिसंधियों से निपटना भी है अन्यथा अन्धी पीसे कुत्ता खाय वाली उक्ति चरितार्थ होती रहेगी। पानी खींचने से पहले कुँआ खोदना पड़ता है। नींव खोदना पहला और दीवार चुनना दूसरा काम है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 साधना का सत्य

मनुष्य हर तरफ से शास्त्र और शब्दों से घिरा है। लेकिन संसार के सारे शास्त्र एवं शब्द मिलकर भी साधना के बिना अर्थहीन हैं। शास्त्रों और शब्दों से सत्य के बारे में तो जाना जा सकता है, पर इसे पाया नहीं जा सकता। सत्य की अनुभूति का मार्ग तो केवल साधना है। शब्द से सत्ता नहीं आती है। इसका द्वार तो शून्य है। शब्द से निःशब्द में छलांग लगाने का साहस ही साधना है।
  
विचारों से हमेशा दूसरों को जाना जाता है। इससे ‘स्व’ का ज्ञान नहीं होता। क्योंकि ‘स्व’ सभी विचारों से परे और पूर्व है। ‘स्व’ के सत्य को अनुभव करके ही हम परम सत्ता-परमात्मा से जुड़ते हैं। इस परम भाव दशा की अनुभूति विचारों की उलझन और उधेड़-बुन में नहीं निर्विचार में होती है। जहाँ विचारों की सत्ता नहीं है, जहाँ शास्त्र और शब्द की पहुँच नहीं है, वहीं अपने सत्य स्वरूप का बोध होता है, ब्रह्मचेतना की अनुभूति होती है।
  
इस परम भावदशा के पहले सामान्य जीवन क्रम में चेतना के दो रूप प्रकट होते हैंः १. बाह्य मूर्छित - अन्तः मूर्छित, २. बाह्य जाग्रत् - अन्तः जाग्रत् । इनमें से पहला रूप मूर्छा-अचेतना का है। यह जड़ता का है। यह विचार से पहले की स्थिति है। दूसरा रूप अर्धमूर्छा का है, अर्ध चेतना का है। यह जड़ और चेतन के बीच की स्थिति है। यहीं विचार तरंगित होते हैं। चेतना की इस स्थिति में जो साधना करने का साहस करते हैं, उनके लिए साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता है। यह तीसरा रूप अमूर्छा - पूर्ण चेतना का है। यह पूर्ण चैतन्य है, विचारों से परे है।
  
सत्य की इस अनुभूति के लिए मात्र विचारों का अभाव भर काफी नहीं है। क्योंकि विचारों का अभाव तो नशे और इन्द्रिय भोगों की चरम दशा में भी हो जाता है। लेकिन यहाँ जड़ता के सिवा कुछ भी नहीं है। यह स्थिति मूर्छा की है, जो केवल पलायन है, उपलब्धि नहीं। सत्य को पाने के लिए तो साधना करनी होती है। सत्य की साधना से ही साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२३

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Nov 2019

★ कुशलता पूर्वक कार्य करने का नाम ही योग है, कुशल व्यक्ति संसार में सच्ची प्रगति कर सकता है जीवन का सर्वाेच्च लक्ष्य यही है कि मनुष्य प्रत्येक कार्य को विवेक  पूर्वक करे। इससे मन निर्मल रहता है, आत्मा सजग हो जाता है और मस्तिष्क परिष्कृत रहता है। ऐसे विचारशील व्यक्ति को संशय और मोहग्रस्त होकर भटकना नही पड़ता।

◆ अनासक्ति कर्मयोग का यह अर्थ कदापि नहीं है कि व्यस्थ रहकर कुछ भी अच्छा -बुरा किये जाओ ,कोई भी गुण दोष हमारे लिये नहीं आयेगा। अनासक्ति कर्मयोग का केवल यह अर्थ है कि अपने कर्मों के कर्मफल से प्रभावित होकर कर्म गति में व्यवधान अथवा विराम न आने दें जिससे दिन प्रति दिन अपने कर्मों में सुधार करते हुए परमपद की ओर बढ़ते जायें।

□  गृहस्थाश्रम समाज के संगठन मानवीय मूल्यों की स्थापना, समाज निष्ठ, भौतिक विकास के साथ- साथ मनुष्य के आध्यात्मिक- मानसिक विकास का क्षेत्र है। गृहस्थाश्रम ही समाज के व्यवस्थित स्वरूप का मूलाधार है।
 
■  संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिए असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है, लेकिन एक ऐसी भी चीज है, जिसे एक बार खोने के बाद कभी नहीें पाया जा सकता और वह है समय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 5)

Q.7. Why is Gayatri represented as a deity with five faces?

Ans. Descriptions of deities and characters in mythology showing many heads and arms are common and may appear odd and paganish to a person not familiar with the subtleties of Indian spiritual tradition.  Brahma and Vishnu have been described as having four faces,  Shiva with five, Kartikeya with six, Durga with eight and Ganesha with ten heads. It is said that the demon king  Ravana had ten heads and twenty arms; and sahastrabahu, another demon had a thousand hands.

Here, the numbers do not refer to the physiology, but to characteristics of the divine or evil  attributes of the deities or demons as the case may be.

Indian spirituality frequently mentions five-fold classifications - such as the five basic elements of the cosmos (Tatvas); the five sheaths (Koshas) covering the human soul; the five organs each of perception and action in the human body (Gyanendriyas and Karmendriyas), the five life-forces (Prans); the five types of energies operating in human bodies (Agnis); the five types of Yoga ....etc. The Gayatri Mantra, too is divisible in five parts namely (1) Om (2) Bhurbhuwaha Swaha  (3) Tatsaviturvareniyam (4) Bhargo Devasya Dheemahi (5) Dhiyo Yonaha Prachodayat. Each of these corresponds to the five primary emanation of the supreme spirit: Ganesh, Bhawani, Brahma, Vishnu and Mahesh respectively. The entire super-science of spirituality too is encapsuled in the four Vedas and one Yagya.

The five faces of Gayatri refer to these Divine attributes, which the Sadhak has to deal with in course of Sadhana.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 20

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

Tumhare Divya Darshan Ki | तुम्हारे दिव्य-दर्शन की | Pragya Bhajan Sangeet



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Significance of Birthday | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (अन्तिम भाग)

सन्तुलित मस्तिष्क का तात्पर्य भावना रहित बन जाना नहीं है। भले-बुरे को एक दृष्टि से देखने जैसी समदर्शिता की दुहाई देना भी सन्तुलन नहीं है। बुरे के प्रति सुधार और भले के प्रति उदार रहकर ही सन्तुलन बना रह सकता है। आँखों के सामने तात्कालिक लाभ का पर्दा उठ जाने, शरीर को ही सब कुछ मानकर उसी के परिकर को पोषित करते रहने की मोह माया ही भ्रान्तियों के ऐसे भण्डार जमा करती है जिन्हें विकृतियों का रूप धारण करते देर नहीं लगती। यही वह आँधी और तूफान है जिसके कारण उठने वाले चक्रवात समस्वरता बिगाड़कर रख देते है और ऐसा कर गुजरते हैं जिनके कुचक्र में फँसने के उपरान्त मनुष्य न जीवितों में रहे न मृतकों में, न बुद्धिमानों में गिना जा सके और व विक्षिप्तों में।

मलीनताएँ हर कहीं कुरूपता उत्पन्न करती है। गन्दगी जहाँ भी जमा होगी वहीं सड़न उत्पन्न करेगी। इस तथ्य को समझने वालों को एक और भी जानकारी नोट करनी चाहिए कि मनःक्षेत्र पर चढ़ी हुई मलीनता जिसे मल, आवरण या कषाय कल्मष के नाम से जाना जाता है, अन्य सभी मलीनताओं की तुलना में अधिक भयावह है। अन्य क्षेत्रों की गन्दगी मात्र पदार्थों को ही प्रभावित करती है, पर मनःक्षेत्र की गन्दगी न केवल मनुष्य को स्वयं दीन दयनीय, पतित और घृणित बनाती है वरन् उसका सम्पर्क क्षेत्र भी विषाक्त होता है। छूत की संक्रामक बीमारियों की तरह चिन्तन की निकृष्टता भी ऐसी है, जो जहाँ उपजती है उसका विनाश करने के अतिरिक्त जहाँ तक उसकी पहुँच है वहाँ भी विनाशकारी वातावरण उत्पन्न करती है।

मानसिक स्वच्छता के लिए जागरूकता बरती जानी चाहिए और विचारणा को श्रेष्ठ कार्यों में, सदुद्देश्य में नियोजित करने की बात सोचनी चाहिए। इसी में दूरदर्शी और सराहनीय विवेकशीलता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...