शनिवार, 16 नवंबर 2019

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग २)

दुर्व्यसनों, दुर्गुणों, उच्छृंखलताओं एवं बुरी आदतों से उत्पन्न होने वाली हानियाँ इतनी अधिक हैं कि उनकी आग में उपार्जन, स्वास्थ्य, सम्मान, सन्तुलन, भविष्य, परिवार सभी कुछ ईंधन की तरह जलते और समाप्त होते देखा जा सकता है। इसलिए प्रगति की योजनाएँ बनाते समय यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों ने कहाँ कहाँ डेरे तम्बू गाड़ रखे हैं। अनुपयुक्त आदतों की विष बेलें कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमाती जा रही है। इस उखाड़-पछाड़ के बिना सुखद सम्भावनाओं का बीजारोपण हो नहीं सकेगा।

प्रत्यक्ष शत्रुओं से निपटना आसान है। चोर उचक्कों की सुरक्षा चौकीदारी से हो सकती है, किन्तु उन दुष्प्रवृत्तियों से निपटना तो दूर उनको ढूँढ़ निकालना और होने वाली हानियों का अनुमान लगाना तक कठिन पड़ता है। अदृश्य को कैसे देखा जाय? अप्रत्यक्ष को कैसे पकड़ा जाय? सूक्ष्मदर्शी विवेक का माइक्रोस्कोप ही इन विषाणुओं का अता-पता बता सकता है जो दुर्गुणों के रूप में विषाणुओं की भूमिका निभाते और सर्वनाश का ताना-बाना बुनते रहते हैं।

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में किस हेय स्तर की दुष्प्रवृत्तियाँ अधिकार जमाती हैं, इसका तीखा निष्पक्ष पर्यवेक्षण करना चाहिए। शरीर क्षेत्र का शत्रु नम्बर एक आलस्य है और मनःक्षेत्र का प्रमाद। आलसी और प्रमादी प्रकारान्तर से आत्म हत्यारे हैं, वे अपने इन बहुमूल्य यन्त्रों को जंग लगाकर भोंथरे, अनुपयोगी एवं अपंग बना देते हैं। पक्षाघात पीड़ित जीते तो हैं किन्तु अशक्त असमर्थ, अर्ध मृतक की तरह रहकर। जिनके शरीर पर आलस्य का शनिश्चर छाया है वे काम से जी चुराते और परिश्रम में बेइज्जती अनुभव करते देखे जाते हैं। प्रमादी मस्तिष्क पर जोर नहीं डालते। उचित-अनुचित के पक्ष विपक्ष पर माथा पच्ची नहीं करते। जो चल रहा है उसी ढर्रे पर बेपेंदी के लोटे की तरह लुढ़कते रहते हैं। न समय की परवाह होती है न हानि लाभ की। किसी तरह दिन काटते चलना ही अभीष्ट होता है। पराक्रम रहित शरीर अपंग है और उत्साह रहित मस्तिष्क मूढ़मति। ऐसी दीन दयनीय स्थिति मनुष्य की अपनी बनाई होती है। यदि दिनचर्या बनाकर समय के एक-एक क्षण का उपयोग करने के लिए दिन भर के भविष्य के कार्य निर्धारित कर लिये जाय और उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर श्रमशील तत्परता और रुचि रस से भरी पूरी तन्मयता का संयुक्त नियोजन किया जा सके तो सफलता चरण चूमेगी और प्रगति पथ पर सरपट दौड़ने वाली चाल चौगुनी सौगुनी बढ़ती दीखेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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