गुरुवार, 25 जुलाई 2019

👉 प्याले में समुद्र:-

यूनानी दार्शनिक सुकरात समंदर के किनारे टहल रहे थे। उनकी नजर रेत पर बैठे एक अबोध बालक पर पड़ी, जो रो रहा था। सुकरात ने रोते हुए बालक का सिर सहलाते हुए उससे रोने का कारण पूछा। बालक ने कहा, ‘यह जो मेरे हाथ में प्याला है, इसमें मैं समुद्र के सारे पानी को भरना चाहता हूं, किंतु यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।’ बालक की बात सुनकर सुकरात की आंखों में आंसू आ गए।

सुकरात को रोता देख, रोता हुआ बालक शांत हो गया और चकित होकर पूछने लगा, ‘आप भी मेरी तरह रोने लगे, पर आपका प्याला कहां है?’ सुकरात ने जवाब दिया, ‘बच्चे, तू छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहता है, और मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में संसार की तमाम जानकारियां भरना चाहता हूं।’ बालक को सुकरात की बातें कितनी समझ में आईं यह तो पता नहीं, लेकिन दो पल असमंजस में रहने के बाद उसने अपना प्याला समंदर में फेंक दिया और बोला, ‘सागर यदि तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता, तो मेरा प्याला तो तेरे में समा सकता है।’

बच्चे की इस हरकत ने सुकरात की आंखें खोल दीं। उन्हें एक कीमती सूत्र हाथ लग गया था। सुकरात ने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर कहा, ‘हे परमेश्वर, आपका असीम ज्ञान व आपका विराट अस्तित्व तो मेरी बुद्धि में नहीं समा सकता, किंतु मैं अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ आपमें जरूर लीन हो सकता हूं।’

दरअसल, सुकरात को परमात्मा ने बालक के माध्यम से ज्ञान दे दिया। जिस सुकरात से मिलने के लिए बड़े-बड़े विद्वानों को समय लेना पड़ता था, उसे एक अबोध बालक ने परमात्मा का मार्ग बता दिया था। असलियत में परमात्मा जब आपको अपनी शरण में लेता है, यानि जब आप ईश्वर की कृपादृष्टि के पात्र बनते हैं तो उसकी एक खास पहचान यह है कि आपके अंदर का ‘मैं’ मिट जाता है। आपका अहंकार ईश्वर के अस्तित्व में विलीन हो जाता है।

‘मैं-पन’ का भाव छूटते ही हमारे समस्त प्रकार के पूर्वाग्रह, अपराधबोध, तनाव, व्यग्रता और विकृतियों का ईश्वरीय चेतना में रूपांतरण हो जाता है। दरअसल, हरेक व्यक्ति को कई बार अपने जीवन में परमात्मा की अनुभूति होती है। जितना हमारा जीवन सहज-सरल, व पावन-पवित्र होता जाता है, उतना ही परमात्मा प्रसाद-स्वरूप हमारे जीवन में समाहित होता जाता है।

👉 आज का सद्चिंतन 25 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 July 2019


👉 काया से नहीं, प्राणों से प्यार करें:-

जो हमें प्यार करता हो, उसे हमारे मिशन से भी प्यार करना चाहिए। जो हमारे मिशन की उपेक्षा, तिरस्कार करता है लगता है वह हमें ही उपेक्षित-तिरस्कृत कर रहा है। व्यक्तिगत रूप से कोई हमारी कितनी ही उपेक्षा करे, पर यदि हमारे मिशन के प्रति श्रद्धावान् है, उसके लिए कुछ करता, सोचता है तो लगता है मानो हमारे ऊपर अमृत बिखेर रहा है और चंदन लेप रहा है। किंतु यदि केवल हमारे व्यक्तित्त्व के प्रति ही श्रद्धा है, शरीर से ही मोह है, उसी की प्रशस्ति पूजा की जाती है और मिशन की बात उठाकर ताक पर रख दी जाती है तो लगता है हमारे प्राण का तिरस्कार करते हुए केवल शरीर पर पंखा ढुलाया जा रहा हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६९, पृष्ठ ९, १०

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 36)

👉 आध्यात्मिक निदान- पंचक

आध्यात्मिक चिकित्सक के रूप में परम पूज्य गुरुदेव इन सभी प्रक्रियाओं में निष्णात व मर्मज्ञ थे। आध्यात्मिक निदान पंचक में उनकी विशेषज्ञता का पास रहने वालों को नित्यप्रति अनुभव होता था। यूं तो इस तरह के अनुभव एवं घटनाएँ तो हजारों हैं, पर यहाँ केवल एक घटना का उल्लेख किया जा रहा है। यह घटना एक ऐसे व्यक्ति से सम्बन्धित है जो गुरुदेव से वर्षों से जुड़ा हुआ था। वर्षों के सान्निध्य के बाजवूद उसका घर- परिवार रोग- शोक से घिरा था। आर्थिक स्थिति भी विपन्न थी। जब भी वह गुरुदेव के पास आता, अपनी परेशानी कहते हुए रोने लगता। गुरुदेव भी उसके दुःख से द्रवित हो जाते। कभी- कभी तो उनके आँसू भी छलक आते। यह भी कहते तुम परेशान न हो बेटा मैं तुम्हारे लिए प्रयास कर रहा हूँ। पर उनके इस कथन एवं आश्वासन के बावजूद उसके जीवन में कहीं कोई अच्छा होने के लक्षण नहीं नजर आ रहे थे।

हार- थक कर एक दिन वह प्रयाग चला गया। वहाँ कुम्भ मेला लगा हुआ था। अनेकों सन्त- महात्मा यहाँ आए हुए थे। एक स्थान पर देवरहा बाबा का भी मचान लगा हुआ था। परेशान तो वह था ही। इस परेशानी को ओढ़े हुए वह उनके पास गया। उसे देखकर पहले तो उन्होंने आशीर्वाद का हाथ उठाया। फिर स्वयं ही बोले- तुम्हारा नाम रामनारायण है, फतेहपुर के रहने वाले हो, शान्तिकुञ्ज के आचार्य जी के शिष्य हो। अच्छा मेरे पास आओ। और उन्होंने भीड़ में से उसे बुलाकर अपना चरण उसके माथे पर रखा और कहा तुम इतने हैरान क्यों हों, तुम्हारे ऊपर आचार्य जी की कृपा है। तुम नहीं जानते कि वह बिना कुछ कहे तुम्हारे लिए क्या कुछ कर रहे हैं।

यह कहते हुए वह थोड़ा रुके और बोले- तुम्हारे संस्कार, प्रारब्ध एवं पूर्वजन्म के कर्म भयावह हैं। अगर आचार्य जी की कृपा न होती तो तुम्हारा सभी कुछ तिनका- तिनका बिखर गया होता। न तुम बचते और न तुम्हारा परिवार। अब तक सब कुछ समाप्त हो चुका होता। आचार्य श्री दिव्य द्रष्टा हैं, वह सब कुछ जानते हैं और उचित उपाय कर रहे हैं। तुम सोचो कि तुम्हारे ऊपर उनका इतना स्नेह है कि अभी थोड़ी देर पहले वह सूक्ष्म रूप से हमारे पास आए थे, और उन्होंने कहा कि आप हमारे इस बच्चे को समझा दो कि उसका सब कुछ ठीक हो जाएगा। देवरहा बाबा की बातों ने सुनने वाले को अभिभूत कर दिया। समयानुसार शान्तिकुञ्ज आने पर उसने ये सारी बातें गुरुदेव को बतायी। सुनकर वह मुस्करा दिए। बस इतना बोले बेटा- तुम अभी मेरे अस्पताल में भरती हो। मैं एक अच्छे डाक्टर की तरह तुम्हारी देखभाल कर रहा हूँ। कुछ ही वर्षों बाद उसकी परिस्थितियाँ बदल गई। उसने चिकित्सक एवं रोगी के सम्बन्धों की पवित्र भावनाओं को अपने अन्तःकरण में महसूस किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 53

👉 Amrit Chintan 25 July 2019

The lotus is the most beautiful flower, whose petals open one by one. But it will only grow in the mud. In order to grow and gain wisdom, first you must have the mud --- the obstacles of life and its suffering. ... The mud speaks of the common ground that humans share, no matter what our stations in life. ... Whether we have it all or we have nothing, we are all faced with the same obstacles: sadness, loss, illness, dying and death. If we are to strive as human beings to gain more wisdom, more kindness and more compassion, we must have the intention to grow as a lot, open each petal one by one.

Goldie Hawn

Man today is fascinated by the possibility of buying, more, better, and especially, new things. He is consumption hungry... To buy the latest gadget, the latest model of anything that is on the market, is the dream of everybody, in comparison to which the real pleasure in use is quite secondary. Modern man, if he dared to be articulate about his concept of heaven, would describe a vision which would look like the biggest department store in the world.

Erich Fromm

👉 आत्म विकास की सामान्य प्रक्रिया

कई व्यक्ति कम से कम समय में अधिक से अधिक बढ़-चढ़कर उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए आतुर होते और आकुल व्याकुल बनते देखे गए हैं। ऐसे लोगों के लिए बच्चों वाले बालू के महल और टहनियाँ गाड़कर बगीचा खड़ा करने जैसा कौतुक रचना पड़ता है या फिर बाजीगरों जैसा छद्म भरा कौतूहल दिखाकर अबोधजनों को चमत्कृत करना पड़ता है। आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने का रूप धारा करने में नाटक कर्त्ता ही प्रवीण होते हैं। उन्हीं को मुखौटे लगाना, मेकअप करना और साजसज्जा से अलंकृत होना आता है। शालीनता के रहते बचकानी योजना बन नहीं सकती। कार्यान्वित होने का तो कभी अवसर ही नहीं आता। स्थाई निर्माणों में देर लगती हैं। स्नातक, इंजीनियर, डॉक्टर, पहलवान बनने में भी समय लगता है। जमीन से गढ़ा खजाना मिलने पर धनवान बनने वाले सुने तो जाते हैं, पर देखे नहीं गए। देवता के वरदान अथवा जादू मंत्र से किसी ने ऋद्धि-सिद्धि अर्जित नहीं की है। अंतराल को जगाने, दृष्टिकोण बदलने और गतिविधियों को सुनियोजित  आदर्शवादी बनाने-संकल्पों पर आरूढ़ रहने से ही इस स्तर का विकास हो सकता है, जिसमें बहुविधि सफलताओं के फल-फूल लगें। विभूतियों के चमत्कारी उभार उभरें।

अदूरदर्शी तत्काल सम्पन्नता व सफलता से भरे पूरे अवसर उपलब्ध करना चाहते हैं। प्रकृति क्रम से यह संभव नहीं। उसमें कर्म और फल के बीच अंतर अवधि रहने का विधान है। नौ महीने माँ के पेट में रहने के उपरांत ही भ्रूण इस स्थिति तक पहुँचता है कि प्रसवकाल की कठिनाई सह सके और नये वातावरण में रह सकने की जीवट से सज्जित हो सके। जो इन तथ्यों को अनदेखा करते हैं और अपनी हठवादिता को ही अपनाये रहते हैं। उन्हें इसकी पूर्ति के लिए छद्मों का सहारा लेना पड़ता है। किसी को प्रलोभन देकर या दबाव से विवश करके ही वाहवाही का पुलिंदा हथियायो जा सकता है। काँच के बने नगीने ही सस्ते बिकते हैं। असली हीरा खरीदना हो तो उसके लिए समूचित मूल्य जुटाया जाना चाहिए। फसल से घर भरने के लिए किसान जैसी तत्परता अपनाई जानी चाहिए और बोने से लेकर काटने तक की लम्बी अवधि में धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिए।

आत्मिक प्रगति के लिए दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण, सुसंस्कारों का अभिवर्धन हेतु दुहरा पुरुषार्थ अपनाया जाना चाहिए। इसका प्रथम चरण है- संयम, साधना और दूसरा- उदार संलगनता। इन दोनों के लिए आवश्यक श्रद्धा विश्वास अंतराल में पक सके, इसके लिए योगाभ्यास स्तर की तपश्चर्याओं का आश्रय लेना चाहिए। यों इस प्रकार के क्रिया कृत्यों विश्वास पर न रखने वाले व्यक्ति अपनी समूची क्रियाशीलता और सद्भावना उच्च स्तरीय क्रिया- कलापों में नियोजित करके समग्र जीवन को साधनामय बना सकते हैं।

आत्मिक विकास के लिए शरीर को स्वस्थ रखना परम आवश्यक है और शरीर को समुन्नत, समग्र, सुविकसित बनाने का सामान्य तरीका अत्यंत सरल और सामान्य है। शरीर स्वस्थता के लिए अकेला संयम भी अपना चमत्कार दिखाता है फिर अगर पौष्टिक भोजन और नियमित व्यायाम का सुयोग भी मिल जाय, तो समझना चाहिए सोना और सुगन्ध मिलने जैसी बात बन गई। वस्तुतः इन्द्रिय असंयम ही शरीर को रुग्णता और दुर्बलता के गर्त में गिराता है। मानसिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए संतुलन अपने आपमें पूर्ण है। राग-द्वेष से आवेश, अवसाद से-लिप्सा, लालसा से-अहमन्यता और महत्त्वाकांक्षा से यदि अपने को बचाये रखा जा सके, तो कल्पना-शक्ति, विचार-शक्ति, निर्णय शक्ति न केवल सुरक्षित रहती है, वरन् बढ़ती भी रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...