शनिवार, 12 सितंबर 2020

👉 क्षण में शाश्वत की पहचान

क्षण में शाश्वत छुपा है और अणु में विराट्। अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे, वह विराट् को ही खो देता हैं इसी तरह जिसने क्षण का तिरस्कार किया, वह शाश्वत से अपना नाता तुड़ा लेता है। क्षुद्र को तुच्छ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही द्वार है परम का। इसी में गहरे -गहन अवगाहन करने से परम की उपलब्धि होती है।

जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य, किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम है। आनंद को पाने के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते है, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते है और जो विशेष समय की, किसी खास अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे समूचे जीवन के समय और अवसर को ही गँवा देते हैं।

जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती। उसे तो बिंदु-बिंदु और क्षण क्षण में ही पाना होता है। प्रत्येक बिन्दु सच्चिदानंद साँगर की ही अमृत अंश है और प्रत्येक क्षण अपरिमेय शाश्वत का सनातन अंश। इन्हें जो गहराइयों से अपना सका, वही अमरत्व का स्वाद चख पाता है।

एक फकीर के महानिर्वाण पर जब उनके शिष्यों से पूछा गया कि आपके सद्गुरु अपने जीवन में सबसे श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण बात कौन सी मानते थे? इसके उत्तर में उन्होंने कहा था, “ वही जिसमें किसी भी क्षण वे संलग्न होते थे।”

बूँद-बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता है। क्षण में शाश्वत की पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २४)

जानें, किस भ्रम में हैं हम
    
प्रमाण वृत्ति के तीनों स्रोतों से साक्षात्कार करने के उपरांत समधिपाद के आठवें सूत्र में महर्षि ने दूसरी वृत्ति का खुलासा किया है। वह कहते हैं-
विपर्ययो मिथ्या ज्ञानमतद्रूप प्रतिष्ठिम्॥ १/८॥

यानि कि विपर्यय एक मिथ्या ज्ञान है, जो विषय से उस तरह मेल नहीं खाती, जैसा वह है। शास्त्रकारों ने विपर्यय को असत् ज्ञान कहा है। यानि कि किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के बारे में झूठी धारणा है। इसे चित्त की भ्रमित स्थिति भी कह सकते हैं। मजे की बात यह है कि ऐसी स्थिति हममें से किसी एक की नहीं है, बल्कि प्रायः हम सबकी है। जीवन के किसी न किसी कोने में हम सभी भ्रमित हैं। सच यही है कि हम तथ्य को जाने, सत्य को अनुभव करें, उसके पहले ही उस विषय या वस्तु के बारे में ‘अनगिन धारणाएँ’ बना लेते हैं।
  
कई बार तो ये धारणाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। उस धारणा से सम्बन्धित असत् ज्ञान को जिस-किसी तरह निभाया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि व्यक्ति अकेला नहीं, परिवार और समाज भी असत् ज्ञान कि विपर्यय के भारी बोझ से लदे हैं। उसे ढोए जा रहे हैं। इस बारे में वह एक बड़ी रोचक कथा सुनाते थे। यह कथा प्रसंग एक ग्रामीण परिवार का था। इस परिवार में एक परम्परा थी कि शादी-विवाह के समय परिवार के लोग एक बिल्ली को पकड़कर एक टोकरी के नीचे ढक देते। शादी-विवाह का आयोजन चलता रहता। इसमें कई दिन बीत जाते। तब तक प्रायः बिल्ली मर जाती। बाद में उसे फेंक दिया जाता। ग्रामीण परिवार में यह प्रथा सालों से नहीं, पीढ़ियों से चल रही थी। कभी किसी ने इस प्रथा से जुड़ी धारणा के बारे में खोज-बीन करने की कोशिश नहीं की।
  
उस परिवार के लोगों का ध्यान ज्यादातर इस बात पर टिका रहता था कि घर में जब भी कोई शादी हो, तब एक बिल्ली को टोकरी के नीचे रख देना है। फिर जब सारा आयोजन समाप्त हो जाय, तो उस मरी हुई बिल्ली को कहीं फेंक देना है। परिवार की नयी पीढ़ी के लोग जिसने भी इस प्रथा के औचित्य को जानने की कोशिश की उसे झिड़क दिया गया। घर के बड़े-बूढ़ों ने उन्हें धमकाया, घर से बाहर निकाल देने की धमकी दी। और कहा कि बुजुर्गों की बातों पर सवाल उठाते हो? बस, इतना जान लो कि शादी के समय ऐसा करना शुभ होता है। बिल्ली को मार देने से भला शुभ का क्या सम्बन्ध है? इस सवाल का उत्तर किसी ने भी न दिया।
  
लेकिन परिवार के एक नवयुवक से रहा न गया। उसने बात की जड़ में जाने की ठान ली। उसने परिवार की पुरानी डायरियों को पलटा। गाँव के बड़े-बुजुर्गों से बात की। अंत में उसे सच्चाई का पता चला। सच्चाई यह थी कि सालों पहले पुरानी पीढ़ी में एक लड़की की शादी थी। सभी लोग शादी के काम में जुटे थे। घर में पालतू बिल्ली थी, जो इधर-उधर दौड़कर जब-तब चीज-सामानों को गिरा रही थी। गृहस्वामिनी उसके इस व्यवहार से परेशान हो गयी। अन्त में उसने उस बिल्ली को एक टोकरी के नीचे ढक दिया। काम-काज की व्यस्तता में वह उसे भूल गयी। शादी के बाद जब याद आयी, तो उसे टोकरी से निकाला, लेकिन तब तक बिल्ली मर चुकी थी। बड़े ही दुःखी मन से उसे बिल्ली को फेंकना पड़ा। इस सत्य ज्ञान को जानते ही असत् ज्ञान अपने आप ही खत्म हो गया। उस घर के लोगों को जब इस सच्चाई का  पता चला, तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (भाग १)

भव्य भवन थोड़े से या झोंपड़े बहुत से, इन दोनों में से एक का चयन जन कल्याण की दृष्टि से करना है, तो बहुलता वाली बात को प्रधानता देनी पड़ेगी। राम...