शनिवार, 30 दिसंबर 2017

👉 मन पर संयम

🔶 एक बार एक साधक ने कन्फ्यूशियस से पूछा, मैं मन पर संयम कैसे रखूं? कन्फ्यूशियस ने उस व्यक्ति से पूछा, क्या तुम कानों से सुनते हो? साधक ने कहा, हां, मैं कानों से ही सुनता हूं।

🔷 तब कन्फ्यूशियस ने कहा, मैं नहीं मान सकता तुम मन से भी सुनते हो और उसे सुनकर अशांत हो जाते हो। इसलिए आज से केवल कानों से सुनो।

🔶 मन से सुनना बंद कर दो। तुम आंखों से देखते हो, यह भी मैं मान नहीं सकता आज से तुम केवल आंख से देखना और जीभ से चखना आरंभ करो। मन पर अपने आप संयम हो जाएगा।

🔷 संक्षेप में

🔶 यह प्रेरक प्रसंग एक सशक्त सूत्र की तरह है। केवल कान से सुनो, आंख से देखो और जीभ से चखो। उनसे मन को मत जोड़ो। मन पर संयम रखने की यह पहली सीढ़ी है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Dec 2017



👉 आज का सद्चिंतन 31 Dec 2017


👉 जिन्दगी जीनी हो तो इस तरह जिये (भाग 1)

🔷 जीवन अपने लिए एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। जिसके प्रत्येक पृष्ठ से एक से एक बढ़ कर काम शिक्षायें हमें पढ़ने को मिल सकती है।

🔶 कल क्या बीती और कल का दिन कैसे गुजरा इन पर गहराई से विचार करे तो उसमें अनेकों शिक्षाप्रद अनुभव ऐसे मिल सकते हैं जो दूसरों के उपदेश सुनने या विद्वानों को पुस्तकें पढ़ने से भी अधिक कारगर सिद्ध हो सकते है?

🔷 कल के समय का जिस प्रकार उपयोग किया गया, और उससे जो पाया गया उससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता था? जिन नासमझियों के कारण कल कई झंझटों में फँसना पड़ा क्या उनसे बचा नहीं जा सकता था? कल किस अवसर पर क्या ऐसे अदूरदर्शी कदम उठ गये जो समझदारी का समय रहते उपयोग करने से टल सकते थे और कुछ किया जा सकता था जो अधिक सुखद और श्रेयस्कर होता? इस प्रकार के प्रश्न यदि अपने आप से पूछे तो सहज ही वे उत्तर सामने आयेंगे जो आगे के लिए ध्यान में रखे जाने पर भावी उन्नति का पथ प्रशस्त कर सकते हैं।

🔶 जीवन का रसास्वादन वे लोग नहीं कर पाते जो अपने लिए ही जीते हैं। खुदगर्जी के तंग दायरे में जीना एक प्रकार की लानत है जो आदमी पर हर घड़ी आत्म ग्लानि की तरह बरसती रहती है। कई व्यक्ति खुदगर्जी की राह अपना कर अधिक सुख साधन इकट्ठे कर लेते हैं दूसरों की तुलना में ज्यादा मालदार लगते हैं। इतना होने पर भी ऐसे लोगों को एक ऐसे अभाव से दुखी रहना ही पड़ेगा जो सामूहिक और पारमार्थिक गतिविधियाँ अपनाये बिना मिल ही नहीं सकता। अपने लिए ही जीना अपनी सुख सुविधाओं की ही बात सोचना वस्तुतः मनुष्य का मानसिक बौनापन है। ओछे और उपहासास्पद ही गिने जाते रहेंगे जहाँ व्यक्तित्व की परख होगी वहाँ उन्हें फिसड्डी ही ठहराया जायेगा। जिन्दगी को प्यार करने वाले लोग अपनी सुव्यवस्था के साधन जुटाने के साथ-साथ यह भी करते हैं कि उन्हें दूसरों के लिए कुछ सोचने और करने का अवसर भी मिलता रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जनवरी 1973 पृष्ठ 34
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.34

👉 विक्षुब्ध जीवन, शान्तिमय कैसे बने? (भाग 3)

🔷 मनुष्य अपनी इन परेशानियों से छूटने का उपाय भी कर रहा है। वस्तुतः उसका सारा उद्योग, परिश्रम और पुरुषार्थ है ही केवल परेशानियां कम करने और कष्टों से छूटने के लिये। किन्तु उसके कष्टों में कमी के कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होते। मनुष्य अन्धकार में हाथ-पांव मारता हुआ सुख की दिशा के बजाय भ्रम की वीथियों में भटकता फिर रहा है। सुख के प्रयास में दुःख ही पाता चला जा रहा है। निस्सन्देह मनुष्य की यह दुर्दशा दया की ही पात्र है।

🔶 संसार में अशक्य अथवा असाध्य कुछ भी नहीं है। उसके लिये प्रबल पुरुषार्थ, दृढ़ निष्ठा, उपयुक्त दृष्टिकोण, मानसिक सन्तुलन, आत्म विश्वास और सही दिशा की आवश्यकता है।

🔷 तृष्णा भयानक अजगर के समान है। जब यह किसी मनुष्य में अनियन्त्रित हो जाती है तो सम्पूर्ण संसार को निगल जाने की इच्छा किया करती है। अपनी इस अनुचित इच्छा से प्रेरित होकर जब वह अग्रसर होता है तब भयानक संघर्ष, विरोध एवं बैर में फंसकर चोट खाता और तड़पता है। स्वार्थ से ईर्ष्या, द्वेष, लोभ आदि मानसिक विकृतियों का जन्म होता है जो स्वयं ही किसी अन्य साधन के बिना मनुष्य को जलाकर भस्म कर डालने के लिये पर्याप्त होती हैं।

🔶 दृष्टिकोण की अव्यापकता भयानक बन्दीग्रह है, जिसमें बन्दी बना मनुष्य एकाकीपन और सूनेपन से घिरकर तड़पता कलपता रहता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति अपनी मान्यताओं, विश्वासों अथवा भावनाओं से भिन्न किसी भावना, विश्वास अथवा मान्यता को सहन नहीं कर पाता। किसी दूसरी सभ्यता अथवा संस्कृति को फूटी आंख भी फलते-फूलते नहीं देख सकता। जो उससे सम्बन्धित है वही सत्य है, शिव है और सुन्दर, अन्य सब कुछ अमंगल एवं अशुभ है। इस विविधताओं, विभिन्नताओं एवं अन्यताओं से भरे संसार में भला इस प्रकार के संकुचित दृष्टिकोण वाला व्यक्ति किस प्रकार सुखी रह सकता है? उससे भिन्न मान्यताएं उठेंगी, विविधताएं व्यग्र करेंगी और भ्रांतियां उत्पन्न होंगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Wealth of Awareness (Part 1)

🔶 The characteristic making difference between a man and an animal is the awareness. Only due to its absence all the creatures other than human being are categorized on equal footing despite the fact that all creatures including human being are conscious. There is life in vegetables but no awareness. Others in this category are bees, insects,   mosquitoes etc which though have life like a human being but not the awareness. Fishes have life; frogs have life, tortoises have life; birds do have life then why we do not keep them on equal footing? We do so only because these creatures do not have any awareness.

🔷 The man has been conceived as the god of awareness/knowledge. Only his thoughtfulness, discreetness has led him to be positioned far above other creatures under the sun. Just imagine the man as a wild man of ancient times when he did not have any knowledge/awareness. Sociality as well as sense of responsibilities would have been unknown to him. When he would have been unknown about traits of his temperament, his pride, dignity, merits and actions then he too, as told by Darwin-monkey’s son, would have been really like a son of a monkey. But today the same man has become the owner of the universe, for what reason? In comparison to ancient times, today the awareness/knowledge of man has grown manifold.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 7)

🔷 साथियो! आपने गिरजाघरों को देखा है। गिरजाघरों में भगवान के लिए कोई गुंजाइश नहीं है क्या ?? वहाँ कहीं-कहीं मरियम की मूर्ति लगी रहती है, तो कहीं-कहीं ईसा की प्रतिमा लगी रहती हैं। एक छोटा-सा प्रार्थनाकक्ष होता है। कहीं इसमें अस्पताल या दवाखाने वाला हिस्सा होता है। कहीं पादरियों के रहने का हिस्सा होता है। कहीं एक छोटा सा दफ्तर बना होता है। इस तरह भगवान का एक छोटा सा केंद्र बनाने के बाद में बाकी सारी-की इमारत, सारा स्थान लोकमंगल के लिए होता है। पहले भारतवर्ष में भी ऐसा ही किया जाता था और किया भी जाना चाहिए, लेकिन आज तो मंदिरों की दशा देखकर हँसी आती है और क्रोध भी। आज मंदिरों का सारा-का धन कुछ चंद लोगों के निहित स्वार्थ के लिए खरच हो जाता है। जो कुछ भी चढ़ावा या दान आया, कुछ निहित स्वार्थ के लिए मठाधीशों और मंदिरों के स्वामी और दूसरे महंतों के पेट में चला गया।

🔶 मित्रों ! वह अनावश्यक धन, हराम का धन जब उन लोगों के पास आया तो उन्होंने क्या-क्या किया? आप नहीं जानते, मैं जानता हूँ। पंडा-पुजारियों, महंतों और मठाधीशों की हकीकत मुझे मालूम है, आपको नहीं मालूम है। आप तो केवल उनकी बाहर की शकल जानते हैं। मुझे उनके पास रहने का मौका मिला है। मैं जानता हूँ कि समाज-से किस्म के तबके अगर हैं, तो उनमें से एक तबका इन लोगों का भी हैं, जो धर्म का कलेवर या धर्म का दुपट्टा ओढ़े हुए हैं। धर्म का झंडा गाड़े हुए हैं और धर्म का तिलक लगाए हुए हैं। धर्म की पोशाक और धर्म का बाना पहने हुए बैठे हैं। ये क्या-क्या अनाचार फैलाते हैं और क्या-क्या दुनिया में खुराफातें पैदा करते हैं, इनके निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए आज का धर्मतंत्र है-मंदिर।

🔷 तो क्या मंदिर सिर्फ इसी काम के लिए है? क्या इन परिस्थितियों को बदला नहीं जाना चाहिए? हाँ, अगर हमको समाज में ढोंग, अनाचार और अज्ञान फैलाना हो, तो मंदिरों का यही रूप बना रहने देना चाहिए। अगर हमको यह ख्याल है कि जनता का इतना धन, जनता की इतनी धन, जनता का इतना पैसा-इन सब चीजों का ठीक तरीके से उपयोग किया जाए, तो आज के जो मंदिर हैं, उनकी व्यवस्था पर नए ढंग से विचार करना पड़ेगा। जिन लोगों के हाथ में उनका नियंत्रण है, उनको समझाना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि लोक मंगल के लिए आप इनका इस्तेमाल क्यों नहीं करते? ट्रस्टियों को समझाया जाना चाहिए। अगर उनकी समझ में यह बात आ जाए कि मंदिर में जितना धन लगा हुआ है, इसमें से थोड़े पैसे से भगवान की पूजा आसानी से की जा सकती है। एक पुजारी ने आधा घंटे सुबह और आधा घंटे शाम को पूजा कर ली। एक घंटे के बाद तेईस घंटे बच जाते हैं। नहीं साहब तेईस घंटे पुजारी पंखा लिए खड़े रहेंगे। जब भगवान सो जाएँगे, तो वे वहाँ से हटेंगे और जब भगवान उठ जाएँगे, तो फिर पंखा डुलाते रहेंगे। यह कोई तरीका है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 6)

👉 सद्गुरु से मिलना जैसे रोशनी फैलाते दिये से एकाकार होना

🔷 चीन में एक सन्त हुए हैं। शिन-हुआ। इन्होंने काफी दिनों तक साधना की। देश-विदेश के अनेक स्थानों का भ्रमण किया। विभिन्न शास्त्र और विद्याएँ पढ़ी; परन्तु चित्त को शान्ति न मिली। सालों-साल के विद्याभ्यास के बावजूद अविद्या की भटकन एवं भ्रान्ति यथावत् बनी रही। उन दिनों शिन-हुआ को भारी बेचैनी थी। अपनी बेचैनी के इन्हीं दिनों में उनकी मुलाकात बोधि धर्म से हुई। बोधिधर्म उन दिनों भारत से चीन गए हुए थे। बोधिधर्म के सान्निध्य में, उनके सम्पर्क के एक पल में शिन-हुआ की सारी भ्रान्तियाँ, समूची भटकन समाप्त हो गयी। उनके मुख पर एक ज्ञान की अलौकिक दीप्ति छा गयी। बात अनोखी थी। जो सालों-साल अनेकानेक शास्त्रों एवं विद्याओं को पढ़कर न हुआ, वह एक पल में हो गया।

🔶 अपने जीवन की इस अनूठी घटना का उल्लेख शिन-हुआ ने अपने संस्मरणों में किया है। उन्होंने अपने गुरु बोधिधर्म के वचनों का उल्लेख करते हुए लिखा है- विद्याएँ और शास्त्र दीए के चित्र भर हैं। इनमें केवल दीए बनाने की विधि भर लिखी है। इन चित्रों को, विधियों को कितना ही पढ़ा जाय, रटा जाय, इन्हें अपनी छाती से लगाए रखा जाय, थोड़ा भी फायदा नहीं होता। दीए के चित्र से रोशनी नहीं होती। अंधेरा जब गहराता है, तो शास्त्र और विद्याओं में उल्लेखित दीए के चित्र थोड़ा भी काम नहीं आते। मन वैसा ही तड़पता रहता है।
  
🔷 लेकिन सद्गुरु से मिलना जैसे जलते हुए, रोशनी को चारों ओर फैलाते हुए दीए से मिलना है। शिन-हुआ ने लिखा है कि उनका अपने गुरु बोधीधर्म से मिलना ऐसे ही हुआ। वह कहते हैं कि प्रकाश स्रोत के सम्मुख हो, तो भला भ्रान्तियों एवं भटकनों का अंधेरा कितनी देर तक टिका रह सकेगा? यह कोई गणित का प्रश्नचिह्न है। इसका जवाब जोड़-घटाव, गुणा-भाग में नहीं, सद्गुरु कृपा की अनुभूति में है। जीवन में यह अनुभूति आए, तो सभी विद्याएँ, सारे शास्त्र अपने आप ही अपना रहस्य खोलने लगते हैं। शास्त्र और पुस्तकें न भी हों तो भी गुरुकृपा से तत्त्वबोध होने लगता है। गुरुकृपा की महिमा ही ऐसी है। इस महिमा की अभिव्यक्ति अगले मंत्रों में है।          

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 15

👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...