शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

👉 सहकारिता

🔶 राजा ने मंत्री से कहा- "मेरा मन प्रजाजनों में से जो वरिष्ठ हैं उन्हें कुछ बड़ा उपहार देने का हैं। बताओ ऐसे अधिकारी व्यक्ति कहाँ से और किस प्रकार ढूंढ़ें जाय?"

🔷 मंत्री ने कहा - "सत्पात्रों की तो कोई कमी नहीं, पर उनमें एक ही कमी है कि परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा वे एक दूसरे की टाँग पकड़कर खींचते हैं। न खुद कुछ पाते हैं और न दूसरों को कुछ हाथ लगने देते हैं। ऐसी दशा में आपकी उदारता को फलित होने का अवसर ही न मिलेगा।"

🔶 राजा के गले वह उत्तर उतरा नहीं। बोले! तुम्हारी मान्यता सच है यह कैसे माना जाय? यदि कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हो तो करो। मंत्री ने बात स्वीकार करली और प्रत्यक्ष कर दिखाने की एक योजना बना ली। उसे कार्यान्वित करने की स्वीकृति भी मिल गई।

🔷 एक छः फुट गहरा गड्ढा बनाया गया। उसमें बीस व्यक्तियों के खड़े होने की जगह थी। घोषणा की गई कि जो इस गड्ढे से ऊपर चढ़ आवेगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में मिलेगा।

🔶 बीसों प्रथम चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। जो थोड़ा सफल होता दीखता उसकी टाँगें पकड़कर शेष उन्नीस नीचे घसीट लेते। वह औंधे मुँह गिर पड़ता। इसी प्रकार सबेरे आरम्भ की गई प्रतियोगिता शाम को समाप्त हो गयी। बीसों को असफल ही किया गया और रात्रि होते-होते उन्हें सीढ़ी लगाकर ऊपर खींच लिया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिला।

🔷 मंत्री ने अपने मत को प्रकट करते हुए कहा - "यदि यह एकता कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे। पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सकें। एक दूसरे की टाँग खींचते रहे और सभी खाली हाथ रहे। संसार में प्रतिभावानों के बीच भी ऐसी ही प्रतिस्पर्धा चलती हैं और वे खींचतान में ही सारी शक्ति गँवा देते है। अस्तु उन्हें निराश हाथ मलते ही रहना पड़ता है।"

👉 उपकार का बदला चुकाना

🔶 च्यवन ऋषि बहुत बड़े तपस्वी थे और वर्षों तक एक ही स्थान पर ध्यान में बैठे रहने के कारण उनका शरीर मिट्टी से ढक गया था। एक बार अयोध्या के राजा शर्याति अपनी कन्या को जिसका नाम सुकन्या था, लेकर उसी स्थान में भ्रमण करते हुए पहुँच गये। जिस समय सुकन्या घूमते हुए उस मिट्टी के ढेर के पास जा पहुँची, जिसमें दबे हुए च्यवन ऋषि ध्यानमग्न थे। उनके नेत्रों को मिट्टी के भीतर से चमकते देखकर सुकन्या को कौतूहल हुआ और उसने अज्ञानवश परीक्षा करने के अभिप्राय से उनमें काँटे चुभा दिये। जब राजा को इस दुर्घटना का समाचार मिला तो वे बड़े दुखी हुए और ऋषि से क्षमा माँगने लगे।

🔷 अज्ञान में किये गये अपराध के कारण ऋषि ने क्षमा तो कर दिया पर अन्धे हो जाने के कारण अपनी सेवा के लिए सुकन्या को माँग लिया। सुकन्या ने भी अपना अपराध समझ कर इसमें किसी प्रकार की आपत्ति न की और उसका विवाह च्यवन के साथ कर दिया गया । कुछ काल पश्चात् देवताओं के वैध अश्विनी कुमार च्यवन ऋषि के आश्रम में आये और दिव्य औषधियों के प्रभाव से उन्होंने उनके नेत्र ही ठीक न कर दिये वरन उनका कायाकल्प करके उनको सर्वथा नवयुवक बना दिया। इससे प्रसन्न होकर च्यवन ने उनसे कुछ माँगने का आग्रह किया तो उन्होंने कहा कि हमको वैद्य का धन्धा करने के कारण यज्ञ के समय देवताओं के साथ सोमपान करने से रोका जाता है, इस निषेधाज्ञा को आप दूर करा दें।

🔶 च्यवन ने इसका वचन दिया और कुछ समय पश्चात् अपने श्वसुर शर्याति नरेश द्वारा आयोजित एक बृहत यज्ञ में उन्होंने अश्विनी कुमारों को सोमपान कराया। इस अवसर पर इन्द्र ने उस नई परम्परा का घोर विरोध किया और च्यवन के मारने को वज्र फेंका पर शिवाजी के प्रताप से अन्त उसी की पराजय हुई। इस विषम परिस्थिति को देखकर देवगुरु बृहस्पति ने दोनों पक्षी में समझौता करा दिया और अश्विनी कुमारों को यज्ञ में सोमपान का अधिकार स्थायी रूप से प्राप्त हो गया। इस प्रकार च्यवन ने अपने ऊपर किये हुए उपकार का बदला चुकाने के लिए प्राणों को जोखिम में डालकर भी अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति की।

📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 आज का सद्चिंतन 10 August 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 24)

👉 प्रतिभा संवर्धन का मूल्य भी चुकाया जाए
  
🔶 राम स्वयं ऋष्यमूक पर्वत पर गए थे, और सुग्रीव-हनुमान् को सहयोग हेतु सहमत करके लौटे थे। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद के घर जाकर उन्हें देव संस्कृति के पुनरुद्धार में संलग्न होने के लिए सहमत किया था। अर्जुन को स्वयं भगवान कृष्ण ने समझाने से लेकर धमकाने तक की नीति अपनाकर युद्धरत होने के लिए बाधित किया था। समर्थ और शिवा के, चाणक्य और चंद्रगुप्त के बीच भी ऐसा ही घटनाक्रम बना था। साथ ही उन्हें आवश्यक शक्ति और सफलता प्रदान करने के लिए भी उपयुक्त तारतम्य बिठाया था।

🔷 जिन्हें पारदर्शी दृष्टि प्राप्त है, वे देख सकते हैं कि महाकाल ने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए प्राणवानों के सामने गिड़गिड़ाने का उपक्रम नहीं किया है, वरन् सुनिश्चित संभावनाओं में भागीदार बनकर अजस्र सौभाग्य प्रदान करने के लिए चुना है। इस तरह बरसने वाले वरदान की उपेक्षा-अवमानना करना किन्हीं अदूरदर्शी हतभागियों से ही बन पड़ेगा। लोभ-मोह के बंधन तो अनादि और अनन्त है। उनके कुचक्र में फँसने और बँधे रहने के लिए हीन स्तर के प्राणी भी स्वतंत्र हैं, पर मनुष्य अपनी गरिमा भरे भविष्य को यदि उसी तुच्छता पर आधारित करने का हठ करे, तो उसे किस प्रकार समझदारों की पंक्ति में बिठाया जा सकेगा?
  
🔶 सरकार मोरचे पर सैनिकों को लड़ने भेजती है, तो उनके लिए आवश्यक अस्त्रों, उपकरणों, वाहनों की, भोजन-आच्छादन की व्यवस्था भी करती है और उनके घर-परिवार के सदस्यों के निर्वाह हेतु वेतन भी प्रदान करती है। युगसृजन के लिए कटिबद्ध होने वालों को आवश्यक प्रतिभा से लेकर उपयुक्त परिस्थितियाँ उपलब्ध न हों, ऐसा हो ही नहीं सकता। नवसृजन की संभावना तो पूरी होने ही वाली है, क्योंकि उसके न बन पड़ने पर ‘महाप्रलय’ ही शेष रह जाती है, जो कि स्रष्टा को अभी स्वीकार नहीं।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 31

👉 Mind is like the roots of a tree

🔶 The sacred text of Gita compares man with a fig tree having its roots above and it branches and leaves below. The branches and leaves are clearly visible but the roots —being hidden underground— are invisible. Nonetheless, the visible part of the tree in actual fact reflects what those seemingly invisible roots crucially do for the rest of the tree. When the roots of a tree don’t get water the branches and leaves would start to wilt and wither away. On the other hand, when the tree has it roots deeply burrowed into the ground enabling them to get plentiful of water and nutrients would make the tree grow quite well.

🔷 Man also is in a similar situation. Thinking happens to be his roots. The quality of thinking, core beliefs and aspirations of an individual create corresponding outer situations for him. For example, the inner deprivation of an individual become manifested as insufficiency or emptiness in his outer life. The lack of knowledge and wisdom only reflects the lack of curiosity. Whoever trains their mind to be content with and wisely utilise whatever they have are destined to enjoy happiness and contentment in their life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama Vangmay 66 Page 1.8

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 4)

🔶 गौरव की, प्रतिष्ठा की, बड़प्पन की, सम्मान की सब कोई इच्छा करते है। पर कितने लोग हैं, जिनने यह सीखा हो कि अपना आदर्श एवं दृष्टिकोण महान रखने पर ही सच्ची और स्थिर प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। जो भी काम करें उसमें अपने व्यक्तित्व की महानता की छाप छोड़ी जाय जिसके परिणाम में हमें सच्चा गौरव प्राप्त हो, इस बात को कौन सोचता है? आज तो लोग फैशन, श्रृंगार, अकड़, शान और शौकत, शेखी, अपव्यय, बहुसंचय, कोठी, मोटर, दावत, पार्टी जैसी बनावटों के आधार पर बड़े बनने की कोशिश कर रहे हैं।

🔷 काश, उन्हें कोई यह समझा देता कि यह बाल-क्रीड़ाऐं व्यर्थ हैं। जो भी काम करो उसे आदर्श, स्वच्छ, उत्कृष्ट, पूरा, खरा, तथा शानदार करो। अपनी ईमानदारी और दिलचस्पी को पूरी तरह उसमें जोड़ दो, इस प्रकार किये हुए उत्कृष्ट कार्य ही तुम्हारे गौरव का सच्चा प्रतिष्ठान कर सकने में समर्थ होंगे। अधूरे, अस्त-व्यस्त फूहड़, निकम्मे, गन्दे, नकली, मिलावटी, झूठे और कच्चे काम, किसी भी मनुष्य का सबसे बड़ा तिरस्कार हो सकते है, यह बात वही जानेगा जिसे जीवन विद्या के तथ्यों का पता होगा।

🔶 अपनी आदतों का सुधार, स्वभाव का निर्माण, दृष्टिकोण का परिष्कार करना जीवन विद्या का आवश्यक अंग है। ओछी आदतें, कमीने स्वभाव, और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला कोई व्यक्ति सभ्य नहीं गिना जा सकता। उसे किसी का सच्चा प्रेम और गहरा विश्वास प्राप्त नहीं हो सकता। कोई बड़ी सफलता उसे कभी न मिल सकेगी। कहते है कि बड़े आदमी सदा चौड़े दिल और ऊँचे दिमाग के होते है।” यहाँ लम्बाई चौड़ाई से मतलब नहीं वरन् दृष्टिकोण की ऊँचाई का ही अभिप्राय है। जिसे जीवन से प्रेम है वह अपने आपको सुधारता है, अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करता है। फलस्वरूप उसके सोचने और काम करने के तरीके ऐसे हो जाते है जिनके आधार पर महानता दिन-दिन समीप आती जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.6

👉 मस्तिष्क वृक्ष की जड़ों के समान

🔶 गीता में मनुष्य की तुलना एक ऐसे पीपल के वृक्ष के साथ की है जिसकी जड़ें ऊपर और शाखा, पत्ते नीचे हैं। मस्तिष्क ही जड़ है और शरीर उसका वृक्ष। वृक्ष का ऊपर वाला भाग दिखाई पड़ता है, जड़ें नीचे जमीन में दबी होने से दिखाई नहीं पड़तीं, पर वस्तुत: जड़ों की प्रतिक्रिया, छाया-प्रतिध्वनि की परिणति ही वृक्ष का दृश्यमान कलेवर बनकर सामने आती है। जड़ों को जब पानी नहीं मिलता और वे सूखने लगती हैं, तो पेड़ का दृश्यमान ढाँचा मुरझाने, कुम्हलाने, सूखने और नष्ट होने लगता है। जड़ें गहरी घुसती जाती हैं, खाद-पानी पाती हैं तो पेड़ की हरियाली और अभिवृद्धि देखते ही बनती है। मनुष्य की स्थिति बिलकुल यही है। विचारणाएँ उसकी जड़ें हैं।

🔷 चिन्तन का स्तर जैसा होता है, आस्थाएँ और आकांक्षाएँ जिस दिशा में चलती हैं, बाह्य परिस्थितियाँ बिलकुल उसी के अनुरूप ढलती हुई चलती हैं। आन्तरिक दरिद्रता ही बाहर की दरिद्रता बनकर प्रकट होती रहती है। विद्या और ज्ञान की कमी विशुद्ध रूप से जिज्ञासा का अभाव ही है। प्रसन्न और संतुष्ट रहना तो केवल उनके भाग्य में बदा होता है जो उपलब्ध साधनों से सन्तुष्ट रहना और उनका सदुपयोग करना जानते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.8

👉 वास्तविक सौंदर्य

राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कईं राजकुमार व राजा उसके साथ विवाह करना चाहते थे, लेकिन वह किसी को पसन्द नहीं करती थी। आखिरकार उन र...