रविवार, 18 मार्च 2018

👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

👉 सूत्र नं० 6

🔷 श्लोक-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।

अर्थ-  
🔶 श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।

सूत्र-
🔷 यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 March 2018


👉 उपासना सच्चे हृदय से कीजिए

🔷 उपासना के लिए एक अनिवार्य शर्त यह है सच्चे भाव से चित लगाकर कि जाय। आजकल जिस जिस प्रकार बहुसंख्यक कहलाने वाले व्यक्ति दुनिया का दिखाने के लिए अथवा एक रस्म पूरी करने के लिए मंदिर में जाकर पूरी कर लेते हैं और नियम को पुरा करने के लिए एकाध माला भी जप लेते हैं उससे किसी बड़े सुफल कि आशा नहीं की जा सकती उपासना और साधन तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त सांसारिक विषयों और आस पास की बातों को भूलकर प्रभु को के ध्यान में निमग्न हो जाए जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता में अपने इष्टदेव की उपासना करता है तभी वह अध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह दैवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता है इसी तथ्य को समझने के लिए वेदों में बतलाया गया है की जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिसव (परमात्मा की उपासना) करता है तव उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते हैं और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ से मेह की तरह बरसती जान पड़ती है।

🔶 संसार में जीवन निर्वाह करते हुए एक साधारण मनुष्य को अनेक विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है विरोधियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है और लोगों की भली बुरी सब प्रकार की आलोचना को सहन करना पड़ता है इससे उसके जीवन में स्वभावतः उद्वेग अशाँति भय क्रोध आदि के अवसर आते हैं ऐसा मनुष्य अपने कष्टों के निवारणार्थ और मन और आत्मा की शाँति के लिए परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। मन, वचन और कर्म से उसकी उपासना में संलग्न रहता है। तो उसकी अनास्था में परिवर्तन होने लगता है।

🔷 जब साधनों में अग्रसर होकर वह अपने चारों आरे परमात्मा शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और वह समझने लगता है कि संसार में जो कुछ हो रहा हैं वह उस प्रभू की प्रेरणा और इच्छा का फल हैं तथा वह जो कुछ करता है उसका अंतिम परिणाम जीव के लिए शुभ होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशाँति दूर होने लगती हैं और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु में व्यथित श्राँत क्लाँत व्यक्ति को शीतल और शाँति दायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गयी। मनुष्यों को अपनी भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए तरह तरह की साधनाएँ निकाली हैं।

🔶 धन, संतान, वैभव, सम्मान, प्रभाव, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिए लोग भाँति भाँति के उपायों का सहारा लेते हैं, जिससे उनकी योग्यतानुसार कम या अधिक परिणाम में सफलता भी प्राप्त होती है। पर आध्यात्मिक शाँति प्राप्त करने, साँसारिक तापों से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय यही है कि मनुष्य भिन्न भिन्न कामनाओं का मोह त्यागकर सच्चे हृदय से परमात्मा का आश्रय ले और शुद्ध भाव से उसकी स्तुति और प्रार्थना करें। हमें स्मरण रखना चाहिए कि सब प्रकार की कामनाओं को वास्तव में पूरा करने वाला भगवान ही हैं। इसलिए अगर हम उसकी पूजा करके आत्मिक शाँति प्राप्त कर लेंगे तो हमारी अन्य उचित कामनायें और आवश्यकतायें अपने आप पूरी हो जायेंगी।

🔷 कितने ही मनुष्य इस विवेचना से यह निष्कर्ष निकालेंगे कि परमात्मा के ध्यान में लीन होने से मनुष्य की कामनायें शाँत हो जायेंगी, उसमें संसार के प्रति विरक्तता के भाव का उदय हो जायेगा। इस प्रकार वह आत्मा संतोष का भाव प्राप्त कर लेगा। इस विचार में कुछ सच्चाई होने पर भी यह ख्याल करना कि परमात्मा की उपासना का साँसारिक कामनाओं से कोई संबंध नहीं, ठीक नहीं है। वेद में कहा गया हैं कि

“अपमिव प्रवणो यस्य “ दुँर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावतम्। “

🔶 भगवान का धन कभी न रुकने वाला है। वह उसके उपासकों को इस प्रकार प्राप्त होता है जिस प्रकार नीचे की ओर बहता हुआ जल। वस्तुमान समय में भी अनेकों ऐसे व्यक्ति हो चुके हैं जो बहुत साधारण विद्या बुद्धि के होते हुए भी परमात्मा के भरोसे सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं और जो अपने और दूसरों के बड़े बड़े कार्यों को सहज ही पूरा कर देते हैं। हम अपने प्राचीन ग्रंथों में संतों, तपस्वियों ओर भक्तों के जिन चमत्कारों का वर्णन पढ़ते हैं उनसे तो यह बात स्पष्ट दिखलायी पड़ती है। कि ईश्वर की सच्चे हृदय से उपासना करने वालों को किसी साँसारिक संपदा का अभाव नहीं रहता।

🔷 मंत्र में यह भी कहा है कि परमात्मा के उपासक को उसके तेज के भी दर्शन होते हैं। विचार किया जाये तो वास्तव में यही उपासना के सत्य होने की कसौटी है। जो कोई भी एकाग्र चित्त से और तल्लीन होकर परमात्मा का ध्यान करेगा उसे कुछ समय उपराँत उसके तेज का अनुभव होना अवश्यम्भावी है। यह तेज ही साधक अंतर को प्रकाशित करके उसकी भ्रान्तियों को दूर कर देता है और उसे जीवन के सच्चे मार्ग को दिखलाता है। इसी प्रकार मनुष्य सच्चे ज्ञान का अधिकारी बनता है और सब प्रकार की भव बाधाओं को सहज में पार करने की सामर्थ्य प्राप्त करता हैं॥

📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1993 पृष्ठ 2

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1993/August/v1.2

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 7)

🔷 इष्टापूर्ति का मतलब क्षतिपूर्ति होता है, जो प्रायश्चित का बहुत महत्त्वपूर्ण अंग होता है। इसलिए कर्ज आपको चुकाना ही चाहिए। किसको चुकायें? जिसका नुकसान किया था, उसको तो आप चुकायेंगे नहीं, लेकिन सारा समाज एक है, एक कड़ी से जुड़ा हुआ है, इसलिए आप एक कड़ी में जुड़े हुए सारे समाज को यह मानकर चलिए कि किसी भी हिस्से पर नुकसान पहुँचाया है, तो कोई बात नहीं, दूसरे तरीके से पूरा कर देंगे।

🔶 मान लीजिए आप किसी के कान पकड़ने की गुस्ताख़ी करें तब? तब उसके पैर छू करके प्रणाम कर लीजिए। अरे साहब! हमसे गलती हो गई, माफ कर दीजिए, पैर छूते हैं आपके। कान पकड़ा था तो कान को छूना जरूरी नहीं है, आप पैर को भी छू सकते हैं। सारा समाज एक है। इसके किसी हिस्से को आपने नुकसान पहुँचाया है, तो आप उस नुकसान को पूरा करने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति के साथ में भलाई का सलूक कर सकते हैं। जो आदमी मर गया, जिसका आपने बेईमानी के साथ पैसा हजम कर लिया था, अब कैसे उसका पैसा चुकायेंगे? नहीं साहब, हम तो उसी को चुकायेंगे, लेकिन कैसे चुकायेंगे? वह तो मर गया।

🔷 किसी लड़की का चाल-चलन खराब किया था। अब आप बताइए उसके चाल-चलन को ठीक कैसे करेंगे? नहीं साहब, हम तो क्षमा माँगेंगे। क्षमा मागेंगे लेकिन वह लड़की अब किसी की घरवाली हो गई और जिसके बेटे भी बड़े हैं, सास-ससुर भी हैं, वहाँ उनसे कहते फिरें, साहब हमने इस लड़की का चाल-चलन खराब किया था और अब हम माफी माँगते हैं। इस तरह आप भी पिटेंगे और वह लड़की भी मरेगी। जरूरी नहीं है कि जिस आदमी का आपने नुकसान किया है, उसी को लाभ दें। सारा समाज एक है, इसलिए यह बात सही है कि सारे-के संसार के तालाब में एक बड़ा ढेला फेंका और लहरें पैदा कर दीं।

🔶 बुराई पैदा करने का मतलब एक व्यक्ति को ही नुकसान पहुँचाना नहीं है, बल्कि सारे समाज को नुकसान पहुँचाना है। बुरी आदतें आपने एक को सिखा दीं, शराब पीना आपने एक को सिखा दिया, वह फिर दूसरे को सिखाएगा, दूसरा तीसरे को सिखाएगा, तीसरा चौथे को, सिखाएगा, यह तो एक लहर है। बुराइयों की भी एक लहर है और अच्छाइयों की भी एक लहर है। आपने बुराइयों की एक बार लहरें पैदा की थीं, अब उसका प्रायश्चित एक ही हो सकता है कि आप अच्छाइयों की लहरें पैदा करें और उस अच्छाइयों की लहर को पैदा करके वातावरण ऐसा बनाएँ, जिससे की उसका खामियाजा पूरा हो सके, खाई पाटी जा सके, उस छेद को बन्द किया जा सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 66)

👉 श्री सद्गुरुः शरणं मम

🔷 इस सत्य को और भी स्पष्ट करते हुए भगवान् महेश्वर आदि- माता शैलसुता पार्वती से कहते हैं-

न मुक्ता देवगंधर्वाः पितरो यक्षकिन्नराः। ऋषयः सर्वसिद्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः॥ ८६॥
ध्यानं शृणु महादेवि सर्वानन्दप्रदायकम्। सर्वसौख्यकरं नित्यं भुक्तिमुक्तिविधायकम्॥ ८७॥

श्रीमत्परब्रह्म गुरुं स्मरामि श्रीमत्परब्रह्म गुरुं वदामि। श्रीमत्परब्रह्म गुरुं नमामि श्रीमत्परब्रह्म गुरुं भजामि॥ ८८॥

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूॄत द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादि लक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥ ८९॥

नित्यं शुद्धं निराभासं निराकारं निरञ्जनम्। नित्यबोधं चिदानन्दं गुरुं ब्रह्म नमाम्यहम्॥ ९०॥

🔶 देव हों या गन्धर्व, पितर, यक्ष, किन्नर, सिद्ध अथवा ऋषि कोई भी हों, गुरु सेवा से विमुख होने पर उन्हें कदापि मोक्ष नहीं मिल सकता है॥ ८६॥ भगवान् भोलेनाथ कहते हैं, हे महादेवि! सुनो, गुरुदेव का ध्यान सभी तरह के आनन्द का प्रदाता है। यह सभी सुखों को देने वाला है। यह सांसारिक सुख भोगों को देने के साथ मोक्ष को भी देता है॥ ८७॥

🔷 सच्चे शिष्य को इस सत्य के लिए संकल्पित रहना चाहिए कि मैं गुरुदेव का स्मरण करूँगा, गुरुदेव की स्तुति-कथा कहूँगा। परब्रह्म की चेतना का साकार रूप श्री गुरुदेव की वाणी, मन और कर्म से सेवा आराधना करूँगा॥ ८८॥ श्री गुरुदेव ब्रह्मानन्द का परम सुख देने वाली साकार मूर्ति हैं। वे द्वन्द्वातीत चिदाकाश हैं। तत्त्वमसि आदि श्रुति वाक्यों का लक्ष्य वही हैं। वे प्रभु एक, नित्य, विमल, अचल एवं सभी कर्मों के साक्षी रूप हैं। श्री गुरुदेव सभी भावों से परे, प्रकृति के तीनों गुणों से सर्वथा रहित हैं। उन्हें भावपूर्ण नमन है॥

🔶 ८९॥ श्री गुरुदेव नित्य, शुद्ध, निराभास, निराकार एवं माया से परे हैं। वे नित्यबोधमय एवं चिदानन्दमय हैं। उन परात्पर ब्रह्म गुरुदेव को नमन है॥ ९०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 106

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...