शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

👉 त्याग का रहस्य: -

एक बार महर्षि नारद ज्ञान का प्रचार करते हुए किसी सघन बन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक बहुत बड़ा घनी छाया वाला सेमर का वृक्ष देखा और उसकी छाया में विश्राम करने के लिए ठहर गये।

नारदजी को उसकी शीतल छाया में आराम करके बड़ा आनन्द हुआ, वे उसके वैभव की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे। 

उन्होंने उससे पूछा कि.. “वृक्ष राज तुम्हारा इतना बड़ा वैभव किस प्रकार सुस्थिर रहता है? पवन तुम्हें गिराती क्यों नहीं?” 

सेमर के वृक्ष ने हंसते हुए ऋषि के प्रश्न का उत्तर दिया कि- “भगवान्! बेचारे पवन की कोई सामर्थ्य नहीं कि वह मेरा बाल भी बाँका कर सके। वह मुझे किसी प्रकार गिरा नहीं सकता।” 

नारदजी को लगा कि सेमर का वृक्ष अभिमान के नशे में ऐसे वचन बोल रहा है। उन्हें यह उचित प्रतीत न हुआ और झुँझलाते हुए सुरलोक को चले गये।

सुरपुर में जाकर नारदजी ने पवन से कहा.. ‘अमुक वृक्ष अभिमान पूर्वक दर्प वचन बोलता हुआ आपकी निन्दा करता है, सो उसका अभिमान दूर करना चाहिए।‘ 

पवन को अपनी निन्दा करने वाले पर बहुत क्रोध आया और वह उस वृक्ष को उखाड़ फेंकने के लिए बड़े प्रबल प्रवाह के साथ आँधी तूफान की तरह चल दिया।

सेमर का वृक्ष बड़ा तपस्वी परोपकारी और ज्ञानी था, उसे भावी संकट की पूर्व सूचना मिल गई। वृक्ष ने अपने बचने का उपाय तुरन्त ही कर लिया। उसने अपने सारे पत्ते झाड़ा डाले और ठूंठ की तरह खड़ा हो गया। पवन आया उसने बहुत प्रयत्न किया पर ढूँठ का कुछ भी बिगाड़ न सका। अन्ततः उसे निराश होकर लौट जाना पड़ा।

कुछ दिन पश्चात् नारदजी उस वृक्ष का परिणाम देखने के लिए उसी बन में फिर पहुँचे, पर वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष ज्यों का त्यों हरा भरा खड़ा है। नारदजी को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। 

उन्होंने सेमर से पूछा- “पवन ने सारी शक्ति के साथ तुम्हें उखाड़ने की चेष्टा की थी पर तुम तो अभी तक ज्यों के त्यों खड़े हुए हो, इसका क्या रहस्य है?”

वृक्ष ने नारदजी को प्रणाम किया और नम्रता पूर्वक निवेदन किया- “ऋषिराज! मेरे पास इतना वैभव है पर मैं इसके मोह में बँधा हुआ नहीं हूँ। संसार की सेवा के लिए इतने पत्तों को धारण किये हुए हूँ, परन्तु जब जरूरत समझता हूँ इस सारे वैभव को बिना किसी हिचकिचाहट के त्याग देता हूँ और ठूँठ बन जाता हूँ। मुझे वैभव का गर्व नहीं था वरन् अपने ठूँठ होने का अभिमान था इसीलिए मैंने पवन की अपेक्षा अपनी सामर्थ्य को अधिक बताया था। आप देख रहे हैं कि उसी निर्लिप्त कर्मयोग के कारण मैं पवन की प्रचंड टक्कर सहता हुआ भी यथा पूर्व खड़ा हुआ हूँ।“

नारदजी समझ गये कि संसार में वैभव रखना, धनवान होना कोई बुरी बात नहीं है। इससे तो बहुत से शुभ कार्य हो सकते हैं। बुराई तो धन के अभिमान में डूब जाने और उससे मोह करने में है। यदि कोई व्यक्ति धनी होते हुए भी मन से पवित्र रहे तो वह एक प्रकार का साधु ही है। ऐसे जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहने वाले कर्मयोगी साधु के लिए घर ही तपोभूमि है।

‘अखण्ड ज्योति, फरवरी-1943’

👉 आत्म−नियंत्रण की आवश्यकता

असंयम को अपना कर हमने अपना स्वास्थ्य खोया है। चटोरेपन और कामवासना पर नियंत्रण करने का जिस दिन निश्चय कर लिया उसी दिन बिगड़ी बनने लगेगी। आहार और विहार का संयम रखकर जब सृष्टि के एकोएक प्राणी गेंद की तरह उछलते-कूदते, निरोगिता और दीर्घ जीवन का लाभ उठाते हैं तो हम क्यों न उठा सकेंगे? बन्दरिया मरे बच्चे को जैसे छाती से चिपटाये फिरती है उसी प्रकार असंयम की भुजाओं में कस कर हम भी अस्वस्थता को छाती से चिपटाये फिर रहे हैं। जहाँ यह कसकर पकड़ने की प्रक्रिया ढीली हुई नहीं कि अस्वस्थता और अकाल मृत्यु से पीछा छूटा नहीं।

तुच्छ स्वार्थों की संकीर्णता ने हमारे मनःक्षेत्र को गंदा कर रखा है। उदार और विशाल दृष्टि से न सोचकर हर बात को हम अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति की दृष्टि से सोचते हैं, अपना लाभ ही हमें लाभ प्रतीत होता है। दूसरों का लाभ, दूसरों का हित, दूसरों का दृष्टिकोण, दूसरों का स्वार्थ भी यदि ध्यान में रखा जा सके, अपने स्वार्थ में दूसरों का स्वार्थ भी जोड़कर सोचा जा सके, अपने सुख दुख में दूसरों का सुख-दुख भी सम्मिलित किया जा सके तो निश्चय ही विशाल और उदार दृष्टिकोण हमें प्राप्त होगा। और फिर उसके आधार पर जो कुछ सोचा या किया जायेगा सब कुछ पुण्य और परमार्थ ही होगा। वासना और तृष्णा ने हमें अन्धा बना दिया है संयम और सेवा की रोशनी यदि अपनी आँखों में चमकने लगे तो पिछले क्षण तक जो सर्वत्र नरक जैसा अन्धकार फैला दीखता था वह स्वर्गीय प्रकाश में परिवर्तित हो सकता है। तुच्छता को महानता में, स्वार्थ को परमार्थ में, संकीर्णता को उदारता में परिणत करते ही मनुष्य तुच्छ प्राणी न रहकर महामानव बन जाता है— देवताओं की श्रेणी में जा पहुँचता है। 

मन स्फटिक मणि के समान स्वच्छ है। हमारा अविवेक ही उसे मलीन बनाये हुए हैं। दृष्टिकोण का परिवर्तन होते ही उसकी मलीनता दूर हो जाती है और स्वाभाविक स्वच्छता निखर पड़ती है। स्वच्छ मन वाला व्यक्ति आनन्द की प्रतिमूर्ति ही तो है। वह अपने आपको तो हर घड़ी आनन्द में सराबोर रखता ही है, उसके समीपवर्ती लोग भी चन्दन के वृक्ष के समीप रहने वालों की तरह सुवासित होते रहते हैं। अपने मन का, अपने दृष्टिकोण का परिवर्तन भी क्या हमारे लिए कठिन है? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है—पर आप को क्यों नहीं सुधारा जा सकेगा? विचारों की पूँजी का अभाव ही सारी मानसिक कठिनाइयों का कारण है। विवेकशीलता का अन्तःकरण में प्रादुर्भाव होते ही कुविचार कहाँ टिकेंगे? और कुविचारों के हटते ही अपना पशु−जीवन देव−जीवन में परिवर्तित क्यों न हो जायेगा?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४१)

प्रभु प्रेम से मिलेगा—वैराग्य का चरम

वैराग्य की कसौटी पर पूर्णतया खरा साबित हुए बिना योग की मंजिल मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।  जहाँ साधन वैराग्य ऐन्द्रिक सुखों की तृष्णा में सचेतन प्रयास द्वारा भोगासक्ति की समाप्ति है, वहीं सिद्ध वैराग्य इसकी अगली और चरमावस्था है।
    
यह सिद्ध वैराग्य क्या है? इस जिज्ञासा के उत्तर में महर्षि कहते हैं-
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥ १/१६॥
शब्दार्थ- पुरुषख्यातेः= पुरुष के ज्ञान से; गुणवैतृष्ण्यम्= जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का अभाव हो जाना है; तत्= वह; परम्= पर वैराग्य है।
अर्थात् यह पर वैराग्य निराकांक्षा की अन्तिम अवस्था है- पुरुष के परम आत्मा के अन्तरतम स्वभाव को जानने के कारण समस्त इच्छाओं का विलीन हो जाना।
    
वैराग्य की यह अवस्था अतिदुर्लभ है। परमात्मा में अन्तश्चेतना के विलीन हो जाने पर यह अपने आप ही प्रकट हो जाती है। इसीलिए इसे पर वैराग्य कहते हैं। सिद्ध महापुरुषों की यह स्वाभाविक दशा होने के कारण इसे सिद्ध वैराग्य भी कहा जाता है। यह समस्त साधनाओं का फल है, जो सिद्ध योगियों को सहज सुलभ रहता है। अन्तर्चेतना प्रभु में विलीन होने के कारण विषयों के प्रति, भोगों के प्रति न गति होती है, न रुचि और न ही रुझान। यह प्रभुलीन भावदशा की सहज अभिव्यक्ति है। प्रभु प्रीति की सहज रीति है यह।
    
यह अवस्था कैसे मिले? इस परम सिद्धि का भाव चेतना में किस भाँति अवतरण हो? योग साधकों की जिज्ञासाओं का एक ही उत्तर है, प्रभु प्रेम। जिनमें भगवान् की भक्ति है, प्रभु चरणों में अनुरक्ति है, उन्हें यह सिद्धि अपने आप ही मिल जाती है। भक्ति के अलावा अन्य जो भी साधना मार्ग है- उन पर चलकर इस सिद्ध वैराग्य के दर्शन हो तो सकते हैं, पर बड़ी कठिनाई से। यह भी सम्भव है कि इन राहों पर साधकों को कई बार अटकना या रुकना पड़े। और हो सकता है, सब कुछ करके भी सिद्ध वैराग्य तक न भी पहुँचा जा सके।
    
इस सम्बन्ध में परम पूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से निकले आप्त वचन मानसिक चेतना में उस दिन की भाँति ही प्रखरता से प्रदीप्त है। जब उन्होंने वैराग्य के मर्म को समझाते हुए कहा था- बेटा! मीरा, तुलसी, सूर, रैदास आदि भक्तों को यह अपने आप ही सुलभ हो जाता है। प्रभु स्मरण, प्रभु चिन्तन और प्रभु प्रेम में भीगा हुआ मन जब एक बार उनके चरणों में विलीन हो जाता है, तो किसे याद रह जाते हैं—विषय भोग। कहाँ याद रह पाती है- इन्द्रिय विलास की बातें। सब कुछ साँप की केंचुल की तरह उतर जाता है। पेड़ से सूखे पत्ते की भाँति झड़ जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (भाग १)

भव्य भवन थोड़े से या झोंपड़े बहुत से, इन दोनों में से एक का चयन जन कल्याण की दृष्टि से करना है, तो बहुलता वाली बात को प्रधानता देनी पड़ेगी। राम...