बुधवार, 30 मई 2018

👉 बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं।

🔷 किसी गाँव में एक धर्मपरायण किसान रहा करता था। उसकी फसल अक्सर खराब हो जाया करती थी। कभी बाढ़ आ जाया करती थी तो कभी सूखे की वजह से उसकी फसल बर्बाद हो जाया करती । कभी गर्मी बेहद होती तो कभी ठण्ड इतनी होती कि वो बेचारा कभी भी अपनी फसल को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाया।

🔶 एक दिन किसान दुखी होकर मंदिर में जा पहुंचा और भगवान की मूर्ती के आगे खड़ा हो कर कहने लगा भगवान बेशक आप परमात्मा है लेकिन फिर भी लगता है आपको खेती बाड़ी की जरा भी जानकारी नहीं है। कृपया करके एक बार बस मेरे अनुसार मौसम को होने दीजिये फिर देखिये मैं कैसे अपने अन्न के भंडार को भरता हूँ। इस पर आकाशवाणी हुई कि ” तथास्तु वत्स जैसे तुम चाहोगे आज के बाद वेसा ही मौसम हो जाया करेगा और ये साल मैंने तुमको दिया।” किसान बड़ा ख़ुशी ख़ुशी घर आया । और उसने गेहूं की फसल बो दी।

🔷 क्या होता है कि उस बरस भगवान ने कुछ भी अपने अनुसार नहीं किया और किसान जब चाहता धूप खिल जाया करती और जब वो चाहता तो बारिश हो जाती लेकिन किसान ने कभी भी तूफान को और अंधड़ को नहीं आने दिया। बड़ी अच्छी फसल हुई। पौधे बड़े लहलहा रहे थे। समय के साथ साथ फसल भी बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी।

🔶 आखिर फसल काटने का समय आ गया किसान बड़ी ख़ुशी से खेतों की और गया और फसल को काटने के लिए जैसे ही खेत में घुसा बड़ा हैरान हुआ और उसकी ख़ुशी भी काफूर हो गयी क्योंकि उसने देखा कि गेंहू की बालियों में एक भी बीज नहीं था। उसका दिल धक् से रह गया। किसान दुखी होकर परमात्मा से कहने लगा ” हे भगवन ये क्या?”

🔷 तब आकाशवाणी हुए कि ” ये तो होना ही था वत्स तुमने जरा भी तूफ़ान, आंधी, ओलो को नहीं आने दिया जबकि यही वो मुश्किलें है जो किसी बीज को शक्ति देता है और वो तमाम मुश्किलों के बीच भी अपना संघर्ष जारी रखते हुए बढ़ता है और अपने जैसे हजारों बीजो को पैदा करता है जबकि तुमने ये मुश्किले ही नहीं आने दी तो कैसे बढ़ता ये बताओ तुम ?”  भगवान ने कहा बिना किसी चुनौतियों के बढ़ते हुए ये पौधे अंदर से खोखले रह गये। यही होना था।

🔶 यह सुनकर किसान को अपनी गलती का अहसास हुआ।

🔷 दोस्तों, जब तक हमारी ज़िंदगी में बाधाएं नहीं आती, परेशानियाँ नहीं आती हैं तब तक हमें भी अपनी ताकत का अंदाजा नहीं होता है। बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं जिससे हम अपनी ज़िंदगी में कुछ नया और बड़ा कार्य करें।

🔶 बस बाधाओं और मुश्किलों से कभी भी घबराना नहीं चाहिए और उनका सामना करते हुए आगे बढ़ता रहना चाहिए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 31 May 2018

👉 शत्रु बनाने का परीक्षित मार्ग (भाग 2)

🔷 दीपक लेकर ढूँढ़ने पर भी सम्भवतः अभी तक कोई भी व्यक्ति प्राप्य नहीं हो सकता जो सर्वांग पूर्ण हो। जिसमें कोई कमी न हो। ऐसा व्यक्ति अभी तक उत्पन्न ही नहीं हुआ वह तो भविष्य में कभी होना है। तब तक किसी को गलत बनाना, काट छाँट करना कहाँ तक उचित है? डाक्टर जौन्सन कहा करते थे “श्रीमान! स्वयं परमात्मा भी, आदमी के अन्तिम दिन से पूर्व उसके सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं देता। फिर हम और आप ही किसी को गलत कैसे कह दें?” हमारे हृदय में भी वही भाव होने चाहिये कि अपने परिचितों, प्रियजनों, मित्रों तथा अन्य लोगों की नग्नता और बुराइयों को व्यर्थ में ही न देखते फिरें। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में हमारा स्वभाव कपास के समान निर्मल होना चाहिए:—

साधु चरित शुभ सरिस कपासू। सरस विसद गुनमय फल जासू॥
जो सहि दुख पर छिद्र दुरावा। बन्दनीय जेहि जग जसु पावा॥

🔶 स्वयं कष्ट सहन करले किन्तु दूसरों के दोष छिपावे यह सज्जनों का गुण माना गया है। मुस्लिम धर्म ग्रन्थ की एक कथा है कि हजरत नूह एक दिन शराब पीकर उन्मत्त हो गये। उनके वस्त्र अस्त व्यस्त हो गये और अन्ततः वे नंगे हो गये। उनके पुत्र शाम और जैपेथ उलटे पैरों उन तक गये और उन्हें एक कपड़े से ढक दिया। उन्होंने अपने प्रिय पिता का नंगापन नहीं देखा। हमारे हृदय में भी यही भाव होना चाहिये कि अपने प्रियजनों की नग्नता अर्थात् उनकी बुराइयाँ व्यर्थ में ही न देखते फिरा करें।

🔷 कष्ट सह कर भी दूसरों के दोष छिपाने और उनकी आलोचना न करने का महत्व बहुत पहले ही जान लिया गया था। ईसा मसीह से भी 2200 वर्ष पूर्व मिश्र के प्राचीन राजा अख्तुई ने कहा था “दूसरों की भूल मत पकड़ और यदि नजर पड़ ही जाय तो कह मत” क्राइस्ट ने भी यही कहा था कि “यदि तू चाहता है कि तेरे दोषों पर विचार न किया जाय, तो तू भी दूसरों के दोषों पर विचार न कर”।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 24

👉 पाप कर्मों से बचते रहो

🔷 ‘मैं भूखा हूँ, इसलिए चोरी करूंगा’ ऐसा मत विचारो। क्योंकि इससे तुम्हारी भूख घटेगी नहीं, बढ़ ही जायगी। कीचड़ खाकर किसने दुर्भिक्ष को काटा है? पाप कर्म तो तुम्हें और भी अधिक कंगाल बना देंगे। आग से आग की उत्पत्ति होती है और पाप से पाप की, इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि भूख के मूल कारण पाप से ही दूर रहा जाय। ओस चाटने से तृप्ति नहीं हो सकती और न अधर्म का धन संतोष करा सकता है। तुम्हारा पेट चोरी से नहीं परिश्रम से भरेगा। किसी की तिजोरी को मत झाँको, अपनी भुजाओं को देखो, उनमें पेट के भर देने की भरपूर क्षमता है।

🔶 पाप कर्मों से दूर रहो जैसे साँप से दूर रहते हो। यदि तुमने पाप का भूत पाल लिया, तो यह बड़ा दुख देगा। जहाँ जाओगे वहीं छाया की तरह घेरे फिरेगा और हर घड़ी नारकीय यातनाओं से झुलसाता रहेगा। यदि तुम्हें अपने आप से प्रेम है तो देखो, पाप कर्मों की ओर मत झुकना। आपत्तियों को सहना, पर कर्तव्य धर्म से विचलित मत होना। वे मूर्ख हैं, जो पाप को पसंद करते हैं और दुख भोगते हैं, तुम्हारे लिए दूसरा मार्ग मौजूद है, वह यह कि आधे पेट खाना पर पाप कर्मों के पास न जाना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 1

👉 Soul - An Eternal Entity

🔷 “Oh Lord! Some people say soul exists, some say this body itself is the soul; while others say that soul does not exist after death. Please tell me – what is the truth? This is my third boon you have promised to grant me”.

🔶 Like Nachiketa, any human being, who has deeply involved himself in Tapa-Sadhana, Yoga or long-term meditation and contemplation practices but has not yet realized his immortal self-identity, remains in this inquisitive state. Does the soul exist or not? It is a question of paramount importance. Those who are not able to solve this riddle go on groping in dark for a convincing answer but for those who have realized their true – self, life becomes a boon and bliss.

🔷 In this regard, the concepts of Hindu philosophy are very clear. Leaving aside a few thinkers like Maharishi Charak, who identified the sense of soul consciousness with the physical body, most of the Indian seers have considered the soul as an eternal entity independent of the body. Complex methods of yoga have been discovered with the help of which it is possible to take the soul out of the body when a person is alive and make it consciously enter the dead body of another person. The following are few instances of such phenomena.

🔶 During a scriptural debate with Bhagvati Bharati, wife of Mandan Misra, Adi Shankaracharya became answerless on a question that required knowledge of sex. The latter requested for some time to be able to give a convincing reply. Coincidentally, during the same time, the king of Mahishmatinagar died. Shankaracharya made his soul enter the king’s dead body. This process is called Parkaya Pravesh. Daily he used to take out the soul from his body, leaving his dead body lying in the jungle and his soul entering the body of king. During the night when Shankaracharya used to reenter his own body, king’s body became dead. The use of two bodies by a single soul amply proves a separate existence of the soul.

🔷 In 1939, an army commandant L.P. Farrel of the Western Command saw with his own eyes near Assam-Burma border a yogi who came out from his old body and entered the dead body of a young man who then became alive. This incident has been published in the May, 1970 issue of Akhand Jyoti (Hindi edition) on pages 29-30.

🔶 Normally, it is believed that life is based on the process of respiration. But saint Haridas took samadhi for one month in the presence of Maharaja Ranjit Singh and several British officers and established that the relation of the body is related to the soul in the same way as the machine is run by the electrical power. Without the soul the body becomes dead.

🔷 These are a few of the hundreds of recorded testimonies of soul’s immortality.

📖 From Akhand Jyoti  Feb- 2002

👉 भारतीय संस्कृति के विनाश का संकट (भाग 2)

🔷 भारतीय संस्कृति के लिए एक सबसे बड़ा खतरा है, वह है—पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार अभियान। इसकी शुरूआत तभी से हो गई थी जब से अंग्रेज यहां पर आए थे। अपने शासन काल में उन्होंने सभी प्रकार अपनी संस्कृति के प्रसार की नींव मजबूत कर ली। ईसाई मिशनरियों के द्वारा प्रचार और स्कूल कालेजों में शिक्षा के माध्यम से ईसाइयत का प्रसार भारत में शुरू किया और यह आज के स्वतन्त्र भारत में बढ़ा ही है कम नहीं हुआ है।

🔶 संस्कृति के इस प्रचार अभियान के कारण प्रतिवर्ष लाखों भारतीय ईसाई बन रहे हैं। स्वदेशी रहन-सहन, भाषा, भाव, विचारों का परित्याग करके वे अपने सांस्कृतिक गौरव को भुला रहे हैं। उधर विदेशी लोग अपनी संस्कृति के प्रसार के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा रहे हैं। जन सेवा के लिए चलाए जाने वाले समस्त ईसाई चर्च, स्कूल, अस्पताल सेवा संस्थायें आदि मूल रूप में ईसाइयत के प्रचार संस्थान हैं। ये लोग भारतीयों की आस्थाओं को नष्ट करके, बहका-फुसलाकर, नौकरी, विवाह, शिक्षा तथा अन्य वस्तुओं का लोभ देकर उन्हें अपनी संस्कृति में रंग रहे हैं। आसाम, बम्बई, महाराष्ट्र, बिहार, उड़ीसा, केरल, मद्रास के आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी पूरे जोर-शोर के साथ अपना काम कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में जांच, पड़ताल करने पर बड़े सनसनी पूर्ण तथ्य मिलते हैं।

🔷 ईसाई स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बहुत सी पुस्तकों में हमारी संस्कृति के आदर्श नायक राम और कृष्ण के सम्बन्ध में घृणित विचार मिलते हैं। एक पुस्तक के अनुसार वह (श्रीकृष्ण) चोर था, उसने निरपराध धोबी का वध किया। ऐसे देवताओं की पूजा करना मूर्खता है।’’ इस तरह भगवान राम के बारे में—‘‘राम बड़ा पापी था उसने रावण का वध किया।’’ फिर इस तरह हिन्दू-संस्कृति के आधारों के प्रति आस्था नष्ट करके वे ईसा के प्रति भक्ति जगाते हैं। उसे मानव का कल्याणकारी बताकर लोगों को उसकी पूजा करने, ईसाई बनने का कूटनीतिक प्रयत्न इन ईसाई मिशनरियों द्वारा हमारे देश में कम नहीं चल रहा। इससे हमारी संस्कृति की नींव ही खोखली होती जा रही है। भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा भाग आज ईसाई बनकर अपनी प्रेरणा और जीवन पद्धति का आधार पश्चिम को मान कर चलता है। ये लोग भारत में इस तरह रहते हैं मानो ये विदेशी हों। कैसी विडम्बना है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 17

👉 गुरुगीता (भाग 122)

👉 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

🔷 ऐसा ही एक अनुभव भक्तिमती नारी गंगाबाई का है। गंगाबाई भगवान् के परम भक्त लाखाजी की बेटी थी। भक्त लाखाजी विशेष पढ़े तो नहीं थे, परन्तु गुरूगीता उन्हें कंठस्थ थी। भगवान् में उनका अगाध विश्वास था। इनकी दो सन्ताने थी- एक पुत्र, एक कन्या। पुत्र का नाम देवा और कन्या का नाम गंगाबाई था। पुत्र के विवाह के दो साल बाद उन्होंने कन्या का विवाह कर दिया। लाखाजी नियम से गुरूगीता के ११ पाठ एवं शिव सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। उनके पुत्र एवं कन्या को भी गुरूगीता से प्रगाढ़ अनुराग हो गया था।

🔶 न मालूम प्रारब्ध के किस संयोग से कैसे दिन बदल जाते हैं? गंगाबाई के पति को सर्प ने काट लिया। सर्प के काटने से उसकी तत्क्षण मृत्यु हो गयी। पुत्री के जीवन की इस त्रासदी की खबर लाखाजी को लगी। उन्होंने यह बात अपनी पत्नी, पुत्र व पुत्रवधु को बतायी। सभी इस शोक समाचार को सुनकर व्याकुल हो गए। लाखाजी ने सभी को सम्भाला और पुत्री को सान्त्वना देने के लिए उसकी ससुराल पहुँचे। ससुराल पहुँचने पर उन्हें भारी अचरज हुआ। बात भी अचरज की थी। उन्होंने देखा कि उनकी भक्तिमती पुत्री बड़े शान्त एवं स्थिर भाव से अपने सास- श्वसुर को प्रबोध दे रही है। उसकी इन बातों से सास- ससुर शान्त चित्त हो रहे थे।

🔷 गंगाबाई की यह स्थिति देखकर लाखाजी ने पूछा -बेटी! तेरी ऐसी स्थिति देखकर मैं चकित हूँ। मैं तो यहाँ तरह- तरह के विचार करके आया था कि तुझे धीरज बंधाऊँगा। परन्तु तेरे ज्ञान ने तो मुझे चकित कर दिया है। तुझे यह ज्ञान आया कहाँ से?

🔶 गंगाबाई ने कहा- पिता जी यह सब आपकी दी हुई सीख का फल है। आप के सान्निध्य में मैंने गुरूगीता कंठस्थ कर ली थी। बचपन से ही गुरूगीता का पाठ, इसके विधिवत अनुष्ठान मेरा नियम बन गया था। इस साधना को मैंने कभी भी नहीं छोड़ा। इसी का प्रभाव है कि आपके जामाता की मृत्यु के तीन दिन पहले भगवान् ने मुझे स्वन्प में दर्शन देकर कहा- बेटी! तेरे पति की आयु पूरी हो चुकी है, यह मेरा भक्त हे। तेरे साथ उसका पूर्वजन्म का संयोग शेष था। इसी से उसने जन्म लिया था। अब इसे तीन दिन बाद साँप डसेगा। उस समय तू उसे गुरूगीता सुनाती रहना। ऐसा करने से इसका कल्याण होगा। मैं तुझे सच्चा वैराग्य और ज्ञान प्राप्त होगा।

🔷 पिताजी इतना कहकर भगवान् भोलेनाथ अन्तर्ध्यान हो गए। मैं जाग पड़ी, मानों उसी समय से मुझे ज्ञान का परम प्रकाश मिल गया। मैं सारे शोक- मोह छोड़कर पति के कल्याण में लग गयी। मैंने व्रत धारण किया और रातो जागकर पति को गुरूगीता एवं शिव सहस्त्रनाम सुनाती रही। तीसरे दिन जब पतिदेव सूर्य को अर्ध्य दे रहे थे, उसी समय अचानक एक कालसर्प ने आकर उनके पैर को डस लिया। देखते- देखते उनके प्राण पखेरू उड़ गए। मैंने देखा कर्पूरगौर भगवान् सदाशिव उनके सम्मुख विद्यमान हैं। इस दृश्य ने गुरूगीता पर मेरी आस्था बढ़ा दी। अब आप मेरी सहायता कीजिए कि भगवान् सदाशिव की भक्ति कर सकूँ। पुत्री के इस अनुभव को सुनकर पिता को रोमांच हो आया। सचमुच ही गुरूगीता से सच्चा ज्ञान सहज सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 184

मंगलवार, 29 मई 2018

👉 चलकर आओ - मिठाई लो

🔷 कथा में युवक ने सुना भगवान सबको रोटी देते हैं। युवक को बात जँच गई। उसने काम पर जाना बन्द कर दिया। जो पूछता यही उत्तर देता- "भगवान जब रोटी देने ही वाले हैं तो मेहनत क्यों करूँ?" एक ज्ञानी उधर से निकले, मतिभ्रम में ग्रस्त लड़के की हालत समझी और प्यार से दूसरे दिन सबेरे उसे अपने पास बुलाया और कुछ उपहार देने को कहा। युवक भावुक था। सबेरे ही पहुँच गया।

🔶 ज्ञानी ने पूछा- 'कैसे आये?' उसने उत्तर दिया- 'पैरों से चलकर। ' ज्ञानी ने उसे मिठाई उपहार में दी और कहा- "तुम पैरों से चलकर मेरे पास तक आये तभी मिठाई पा सके। ईश्वर रोटी देता तो है पर देता उसी को है जो हाथ पैरों के पुरुषार्थ से उसे कमाने और पाने के लिए चलता है। जब मेरा मिष्ठान्न तुम बिना पैरों से चले प्राप्त नहीं कर सके, तो भगवान द्वारा दी जाने वाली रोटी कैसे प्राप्त कर सकोगे ?"

🔷 महापुरुष अपने समय और समाज को इस पलायनवादी वृत्ति से बचाने और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्मधारणा के विकास को ही उपासना- आराधना समझ कर सम्पन्न करते रहे हैं।

📖 प्रज्ञा पुराण से

👉 बोलने से पहले सोचें

🔶 अक्सर छोटी छोटी बातों पर गुस्सा करना मनुष्य की प्रवृति है। और गुस्से में किसी को डाँट देना, अपशब्द कहना या कुछ ऐसा कह देना जो हमें नहीं कहना चाहिए, ये भी स्वाभाविक है। लेकिन जब गुस्सा शाँत होता है तब हमें एहसास होता है कि हमने क्या सही किया और क्या गलत किया। कभी कभी हम गुस्से में हम अपने मित्रो से, अपने परिजनों से या दूसरे लोगो से  इतनी कड़वी बात कह देते हैं कि हमारे मित्र हमसे नाराज हो जाते हैं, बसे बसाये घर उजड़ जाते हैं, बेवजह हम दूसरे लोगो से दुश्मनी मोल ले लेते हैं। हमारे द्वारा कहे गए शब्दों का दूसरों पर क्या असर पड़ता है आइये इस कहानी से समझते हैं।

🔷 एक गाँव में एक किसान रहता था। उसकी अपने पड़ोसी से मित्रता थी। एक बार किसी बात के लेकर किसान का अपने मित्र से झगड़ा हो गया। उसने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, जिससे उसका पड़ोसी नाराज हो गया और उनकी मित्रता टूट गयी। बाद में जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह अपने आप पर बहुत शर्मिंदा हुआ पर अब क्या हो सकता था। शर्म के कारण वह अपने मित्र से माफ़ी भी नहीं माँग सका। परेशान होकर वह एक संत के पास गया। उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा।

🔶 संत ने किसान से कहा कि, ” तुम एक थैला भर कर पंख इकठ्ठा कर के लाओ।” किसान ने पंख इकठ्ठे किये और फिर संत के पास पहुंच गया। अब संत ने कहा कि छत पर जाकर इन पंखो को हवा में उड़ा दो।

🔷 किसान ने ऐसा ही किया, थैले से निकाल कर सारे पंख हवा में उड़ गए। अब संत ने फिर कहा कि – अब इन सारे पंखो को दोबारा इकठ्ठा करके लाओ।

🔶 किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे, और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा। और अपनी असमर्थता जताते हुए बोला कि सारे पंख हवा में उड़ गए हैं, वह अब उन्हें दोबारा थैले में इकठ्ठा नहीं कर सकता।

🔷 तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुँह से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।

🔶 दोस्तों, हमारे साथ भी ऐसा ही होता है। हम गुस्से या झुंझलाहट में कभी कभी ऐसे शब्द कह जाते हैं जिनसे सामने वाला हमसे हमेशा के लिए नाराज हो जाता है। अगर हम उससे माफ़ी माँग भी लें और वो हमें माफ़ कर भी दे तब उसके कानो में वे कड़वे शब्द हमेशा गूंजते रहते हैं और वो चाहकर भी हमारे साथ पहले जैसा व्यव्हार नहीं कर पाता।

🔷 तो दोस्तों आज ही ये बात गाँठ बाँध लीजिये कि किसी को कुछ भी कहने से पहले एक बार जरूर सोचें कि हमारे शब्द क्या हैं चाहे हम किसी से गुस्से में बोल रहे हैं या बिना गुस्से के। ये सोचे कि जो हम बोल रहे हैं हानि अगर वही हमारे लिए बोला जाये तो हमें कैसा महसूस होगा। इसलिए जो कुछ भी बोले अच्छी तरह से सोच समझकर बोलें। अन्यथा बोलें ही नहीं, चुप रहना ही बेहतर है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 May 2018

👉 शत्रु बनाने का परीक्षित मार्ग (भाग 1)

🔶 दूसरों के दोष देखना कठिन बात नहीं है। सहज ही, छोटी मोटी भूलों को पकड़ कर किसी की भी आलोचना की जा सकती है। तिल का ताड़ बनाया जा सकता है। शब्दों की भी आवश्यकता नहीं। केवल भू−भ्रंगियों द्वारा नाक सिकोड़ कर अथवा मुँह बिचकाकर आप किसी भी व्यक्ति की आलोचना कर सकते हैं, तथा उसकी भूलों को प्रकाश में ला सकते हैं। किन्तु आलोचना करने से अथवा गलती पकड़ने से क्या वह व्यक्ति आपसे सहमत हो सकता है? “तुम बहुत फूहड़ हो। कितनी गन्दी पड़ी है अलमारी और फाइलों का यह हाल है?

🔷 वास्तव में तुम क्लर्की के योग्य नहीं हो।” यह हैं कुछ नपे तुले शब्द, जो एक अधिकारी अपने क्लर्क अथवा सेक्रेट्री से कहता है। यह वाक्य किसी भाँति एक छुरी से कम नहीं है। सीधे सीधे श्रोता के आत्माभिमान पर चोट करता है। उसके अहंभाव, निर्णय−बुद्धि तथा चतुरता पर प्रहार करता है। क्या इससे वह अपना मस्तिष्क बदल देगा। कदापि नहीं प्लेटो और कान्ट के महान तर्कशास्त्र का आश्रय लेकर भी उससे बहस की जाय, तो भी व्यर्थ होगा। क्योंकि आलोचना के इस वाक्य ने उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।

🔶 दूसरों के दोष देखना और आलोचना करना एक दो धार वाली तलवार है, जो आलोचक एवं आलोच्य दोनों पर चोट करती है। शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करने का इससे सरल मार्ग और कौन सा हो सकता है? एक विद्वान का अनुभव है कि “मैं जब तक अपनी पत्नी के दोष ही देखता रहा, तब तक मेरा गृहस्थ जीवन कदापि शान्तिमय नहीं रहा”। इस प्रकार की प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर सामने वाले व्यक्ति के दोष ही नजर पड़ते हैं, गुण नहीं। गुण—यदि उसमें हों भी−तो इस भाँति छिप जाते हैं जैसे तिनके की ओट पहाड़ छिप जाते हैं। पाश्चात्य सुप्रसिद्ध विचारक बेकन के अनुसार—पर छिद्रान्वेषण करना महा मानस रोग है। इससे मुक्त हो जाना ही चाहिये। मैथ्यू आर्नल्ड ने कहा था कि ‘दूसरों के दोष देखना−भगवान के प्रति कृतघ्न होना है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 24

👉 क्या कर्म क्या अकर्म?

🔶 जो बात एक देश में नीति की समझी जाती है, वही बात दूसरे देश में नीति की बिलकुल विघातक समझी जाती है। कुछ देशों में चचेरी बहिन से विवाह करना साधारण व्यवहार की बात है, किन्तु अन्य कई देशों में यही चाल नीति के बिलकुल विरुद्ध मानी जाती है। कई देशों में साली से विवाह करना पाप समझते हैं, कई में उसे ऐसा नहीं समझते। कई देशों में एक पुरुष के एक समय में एक ही पत्नी होना नीति की बात मानी जाती है- परन्तु दूसरे कई देशों में एक ही समय में चार पाँच अथवा सौ पचास स्त्रियों का होना भी एक साधारण चाल है।

🔷 इसी प्रकार नीति के अन्य सिद्धान्तों का भी अव्यवहार्य रूप प्रत्येक देश में भिन्न-भिन्न पाया जाता है, कर्त्तव्य का भी यही हाल है। कई जगह ऐसा समझा जाता है कि मनुष्य यदि कोई एक काम नहीं करता तो वह कर्त्तव्यच्युत हो जाता है। परन्तु अन्य देशों में वही कार्य करने वाला मूर्ख समझा जाता है। यद्यपि वास्तविक दशा ऐसी है, तथापि हम लोग सदैव यही समझते हैं कि साधारणतया नीति और कर्त्तव्य के विचार सम्पूर्ण मानव जाति में एक ही हैं। अब हमारे सामने प्रश्न खड़ा होता है कि, हम अपनी उपर्युक्त समझ और उपर्युक्त बातों के व्यवहार्थ स्वरूप की भिन्नता के अनुभव का मेल कैसे मिलावें। बस परस्पर विरोधी अनुभवों की एक वाक्यता करने के लिये दो मार्ग खुले हुए हैं।

🔶 एक मार्ग यह है कि यह समझा जाय कि “मैं जो कुछ कहता अथवा करता हूँ वही ठीक है और वैसा न करने वाले अन्य लोग मूर्ख तथा अनीतिवान है।” परन्तु यह मार्ग मूर्खों का है। चतुरों का मार्ग इससे भिन्न है। वे कहते हैं कि भिन्न-भिन्न देश काल और भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के कारण एक ही सिद्धाँत के व्यवहार में भेद दिखाई देते हैं। परन्तु वास्तविक में यह बाहर से दीख पड़ने वाले भेद भाव सच्चे नहीं है। इस सिद्धाँत की निरर्थकता न दिखला कर केवल परिस्थिति की भिन्नता मात्र दिखलाते हैं। पंडितों का मत यह है कि, सिद्धान्त चाहे एक ही हो तो भी उसका व्यावहारिक स्वरूप परिस्थिति के अनुसार बदलना संभव है, न सिर्फ संभव है वरन् आवश्यक भी है।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 16

👉 A Light

There is Light, if we can find it,
That dissolves the night that cloaks a troubled heart.
It is the Sun that slowly rises,
And in its Light, the night is gone.
There is a Silent Place, when we can find it,
Not in some distant city or foreign town.
It’s here, not very far away,
Just within reach of our awareness, now.
There is Love, that’s waiting for us,
That fulfills, even erases, our greatest desire,
For It, and It alone, is the object of our affections,
Not some fickle lover, but a fiery Joy, that lifts us higher.
To see! To be! That is the all of what we seek.
The price is high; forsaking our personal sense of wanting;
But for this sacrifice, a new world is revealed.
In which this inner Light alone, yearns to know Itself.
When we’ve mastered all the rules that guide us.
Even these must fall away, as stages in a rocket ship,
On a journey that takes us beyond this world
To another, not far away, but here within us now.
Akhand Jyoti – Jan- 2003

📖 From Akhand Jyoti  Jan- 2003

👉 भारतीय संस्कृति के विनाश का संकट (भाग 1)

🔶 आजकल संस्कृति का अर्थ बहुत सीमित रूप में लिया जाने लगा है। भारतीय जीवन-पद्धति, कला-कौशल, ज्ञान-विज्ञान, हमारे सामाजिक जीवन, व्यापार संगठनों, उत्सव, पर्व, त्यौहार आदि जिनके सम्मिलित स्वरूप से हमारी संस्कृति का बोध होता था वहां आज संस्कृति का अर्थ खुदाई में प्राप्त प्राचीन खण्डहरों के स्मृति-चिन्ह, नृत्य-संगीत के कार्य-क्रम, या कुछ प्राचीन तथ्यों के पढ़ने लिख लेने तक ही संस्कृति की सीमा समझ ली जाती है। प्राचीन ध्वंसावशेषों की खुदाई करके संस्कृति के बारे में तथ्य निर्णय करने के प्रयत्न पर्याप्त रूप में होते जा रहे हैं। यह सब प्राचीन इतिहास और हमारे सांस्कृतिक गौरव की जानकारी के लिए आवश्यक भी है लेकिन इन्हीं तथ्यों को संस्कृति मान लेना भारी भूल है। भारतीय संस्कृति तो एक निरन्तर विकासशील जीवनपद्धति रही है, उसे इन संकीर्णताओं में नहीं बांधा जा सकता। इतिहास के रूप में उसे एक अंग अवश्य माना जा सकता है।

🔷 आजकल सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर नृत्य-संगीत के कार्यक्रम होते देखे जाते हैं। यद्यपि नृत्य-संगीत कला, आमोद-प्रमोद भी हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं लेकिन इन्हें ही सांस्कृतिक आदर्श मानकर चलना संस्कृति के बारे में अज्ञान प्रकट करना ही है। हमारी संस्कृति केवल नाच-गाने तक ही सीमित नहीं है। इसमें जहां आनन्द उल्लास का जीवन बिताने की छूट है वहां जीवन के गम्भीर दर्शन से मनुष्य को महा-मानव बनने का विधान भी है। हमारे यहां का ऋषि कला का साधक भी होता था, तो जीवन और जगत के सूक्ष्मतम रहस्यों का उद्गाता—दृष्टा भी। पर्व त्यौहारों के रूप में सामूहिक आनन्द उल्लास का जीवन भी बिताया जाता था तो सामाजिक, राजनैतिक सुधारों पर ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में गंभीर विचार विमर्श भी होता था। ऐसी थी हमारी संस्कृति। उसे केवल नृत्य संगीत के कार्य-क्रमों तक ही सीमित रखना उसके महत्व को न समझना ही है।

🔶 बहुत कुछ अर्थों में संस्कृति, इतिहास की तरह पढ़ने लिखने की वस्तु मान ली गई। हमारे दैनिक जीवन में सांस्कृतिक मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं। संस्कृति के सम्बन्ध में खोज करने वाले स्वयं सांस्कृतिक जीवन नहीं बिताते। उनका रहन-सहन आहार-विहार जीवन-क्रम सब विपरीत ही देखे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 16

👉 गुरुगीता (भाग 121)

👉 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

गुरूपुत्रो वरं मूर्खस्तस्य सिद्ध्यन्ति नान्यथा। शुभकर्माणि सर्वाणि दीक्षाव्रततपांसि च॥ १५६॥
संसारमलनाशार्थं भवपाशनिवृत्तये। गुरूगीताम्भसि स्न्नानं तत्त्वज्ञः कुरूते सदा॥ १५७॥
स एव च गुरूः साक्षात् सदा सद्ब्रह्मवित्तमः। तस्य स्थानानि सर्वाणि पवित्राणि न संशय॥ १५८॥
सर्वशुद्धः पवित्रोऽसौ स्वभावाद्यत्र तिष्ठति ।। तत्र देवगणाः सर्वे क्षेत्रे पीठे वसन्ति हि॥ १५९॥
आसनस्थः शयानो वा गच्छंस्तिष्ठन् वदन्नपि। अश्वारूढो गजारूढः सुप्तो वा जाग्रतोऽपि वा॥ १६०॥
शुचिमांश्च सदा ज्ञानी गुरूगीता जपेन तु। तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६१॥

🔶 गुरूपुत्र मूर्ख होने पर भी वरण के योग्य है। इससे भी कराए गये दीक्षा- तप आदि व्रत एवं अन्य शुभ कर्म सिद्ध होते हैं, वृथा नहीं होते ॥ १५६॥ गुरूगीता के महामंत्रों से स्न्नान संसार के मल को धोने वाला है, इससे भवपाशों से छुटकारा मिलता है॥ १५७॥ जो गुरूगीता के जल से स्न्नान करता है, वह सभी ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ एवं सदागुरू होता है। वह जिस किसी स्थान में निवास करता है, वह स्थान पवित्र होता है, इसमें कोई संशय नहीं है॥ १५८॥ सर्वशुद्ध एवं पवित्र गुरूदेव जहाँ भी स्वाभाविक रूप से निवास करते हैं, वहाँ सभी देवों का निवास होता है॥ १५९॥ गुरूगीता का जप करने वाला पवित्र ज्ञानी पुरूष बैठा हुआ, सोया हुआ, जाता हुआ, खड़ा हुआ, बोलता हुआ, अश्व की पीठ पर आरूढ़, हाथी पर आरूढ़, सुप्त अथवा जाग्रत् सर्वदा विशुद्ध होता है। किसी भी अवस्था में उसका दर्शन करने से पुनर्जन्म नहीं होता॥ १६०- १६१॥

🔷 भगवान् शिव की इस अमृतवाणी में गुरूगीता के अनुष्ठान का महत्त्व है। गुरूगीता का जप- पाठ साधक को सच्चा शिष्य और सच्चे शिष्य को गुरूपद पर आरूढ़ करता है। ऐसा साधक हमेशा ही गुरूकृपा, ईश्वरकृपा के सान्निध्य में रहता है। उसके अन्तःकरण में भगवद्कृपा हिलोरे लेती है। गुरूगीता का यह महत्त्व केवल सिद्धान्त ,विचार या कल्पना न होकर सारभूत अनुभव है। इसे उन्होंने पाया, जिन्होंने गुरूगीता की साधना की। जो इसकी कृपा छाँव में बैठकर तप करते रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 183

👉 असफलता सफलता से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है

🔷 सभी के जीवन में एक समय ऐसा आता है जब सभी चीज़ें आपके विरोध में हो रहीं हों। चाहें आप एक प्रोग्रामर हैं या कुछ और, आप जीवन के उस मोड़ पर खड़े होता हैं जहाँ सब कुछ ग़लत हो रहा होता है। अब चाहे ये कोई सॉफ्टवेर हो सकता है जिसे सभी ने रिजेक्ट कर दिया हो, या आपका कोई फ़ैसला हो सकता है जो बहुत ही भयानक साबित हुआ हो।

🔶 लेकिन सही मायने में, विफलता सफलता से ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है। हमारे इतिहास में जितने भी बिजनिसमेन, साइंटिस्ट और महापुरुष हुए हैं वो जीवन में सफल बनने से पहले लगातार कई बार फेल हुए हैं। जब हम बहुत सारे कम कर रहे हों तो ये ज़रूरी नहीं कि सब कुछ सही ही होगा। लेकिन अगर आप इस वजह से प्रयास करना छोड़ देंगे तो कभी सफल नहीं हो सकते।

🔷 हेनरी फ़ोर्ड, जो बिलियनेर और विश्वप्रसिद्ध फ़ोर्ड मोटर कंपनी के मलिक हैं। सफल बनने से पहले फ़ोर्ड पाँच अन्य बिज़निस मे फेल हुए थे। कोई और होता तो पाँच बार अलग अलग बिज़निस में फेल होने और कर्ज़ मे डूबने के कारण टूट जाता। लेकिन फ़ोर्ड ने ऐसा नहीं किया और आज एक बिलिनेअर कंपनी के मलिक हैं।

🔶 अगर विफलता की बात करें तो थॉमस अल्वा एडिसन का नाम सबसे पहले आता है। लाइट बल्व बनाने से पहले उसने लगभग 1000 विफल प्रयोग किए थे।

🔷 अल्बेर्ट आइनस्टाइन जो 4 साल की उम्र तक कुछ बोल नहीं पाते थे और 7 साल की उम्र तक निरक्षर थे। लोग उनको दिमागी रूप से कमजोर मानते थे लेकिन अपनी थ्ओरी और सिद्धांतों के बल पर वो दुनिया के सबसे बड़े साइंटिस्ट बने।

🔶 अब ज़रा सोचो की अगर हेनरी फ़ोर्ड पाँच बिज़नेस में फेल होने के बाद निराश होकर बैठ जाता, या एडिसन 999 असफल प्रयोग के बाद उम्मीद छोड़ देता और आईन्टाइन भी खुद को दिमागी कमजोर मान के बैठ जाता तो क्या होता? हम बहुत सारी महान प्रतिभाओं और अविष्कारों से अंजान रह जाते।

🔷 तो मित्रों, असफलता सफलता से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है…

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 May 2018



👉 आज का सद्चिंतन 29 May 2018

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (अन्तिम भाग)

मृदुता :-
🔷 स्वभाव की मृदुलता ग्रहण करें। मृदुल स्वभाव उस व्यक्ति का है जिसे देख कर स्वतः मन में उसके प्रति आकर्षण का भाव उत्पन्न होता है। उसके मुख, स्वभाव तथा चरित्र से मानसिक आकर्षण, प्रेम, तथा आनन्द प्रस्फुटित होता है। मृदुलता के अंतर्गत वे सभी विधियाँ आती हैं जिनके द्वारा मनुष्य दूसरों को प्रसन्न रखता तथा हृदय में अपने प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। उसका सबके प्रति प्रेममय, मित्रतापूर्ण व्यवहार होता है। उसका व्यवहार मित्रों और हितैषियों को उसकी ओर आकर्षित करता है। उसमें चिड़चिड़ापन, उत्तेजना, क्रोध, कटुता, कुढ़न इत्यादि नहीं होती।

🔶 मृदु व्यक्ति बड़ा मीठा हंसमुख स्वभाव रखता है सभ्यतापूर्ण ढंग से व्यवहार करता है और प्रेम सहानुभूति से स्निग्ध रहता है। जो व्यक्ति उसके संपर्क में आता है, उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

🔷 मृदु व्यक्ति सदा दूसरों को प्रसन्न रखने और प्रेम करने की बात सोचता रहता है उसके मित्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। वह उदार, दयावान, और प्रेममय रहता है। इन सद्गुणों के कारण मृदुल व्यक्ति सब स्थितियों और सब प्रकार के व्यक्ति यों से बड़ा अच्छा निभाव कर लेता है।

🔶 यथा शक्ति दूसरों से प्रेम कीजिए। सहानुभूतिपूर्ण ढंग से अप्रिय कामों को कीजिए। जिससे भी मिलें आपके वाक्य, शब्द और अक्षर प्रेम से सरस स्निग्ध रहें। जगत् के विदग्ध हृदयों को आपके शब्दों से ऐसा मरहम प्राप्त हो कि वे अपने संताप भूल सकें और दो घड़ी अपने महत्त्व का अनुभव कर सकें।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 21

👉 झूठा वैराग्य

🔷 कितने ऐसे मनुष्य हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी मौलिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्भय, निष्ठुर होते हैं। निस्संदेह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों से, मुसीबतों से, बच जाते हैं, किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती, लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर से कर सकते हैं? जो वज्र वत कठोर हृदय होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा जीवन भी भला कोई जीवन है? वैरागी वह है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम को पूरा कर, सब की सेवा कर, सबसे प्रेम कर, फिर भी सबसे अलग रहता है।

🔶 हम लोगों को यह एक विचित्र आदत सी पड़ गई है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने पड़ते हैं, जो भी कठिनाइयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिए हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरे के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यह हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं। यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायेगा कि यदि हम स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आप का वास असंभव था। हम बुरे हैं तो संसार भी बुरा प्रतीत होगा लेकिन लोग वैराग्य का झूठा ढोल पीटकर अपने को अच्छा और संसार को बुरा बताने की आत्म वंदना किया करते हैं।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड-ज्योति जमार्च 1943 पृष्ठ 5

👉 Amrit Chintan 29 May

🔷 Self confidence and sentiment are two different things. Self confidence men is always far sighted. He is always brave and confident all confident people always apply their contemplation. Hard working and activeness is always associated with that.

🔶 Among the prominent figures of this world intellectuals, learned leaders, scientists moneyed and famous are supposed to dominate in the society. Virtues and quality of life is always a God gift which must be used for self-development and welfare of the society.

🔷 Worship is a seed, which if put in proper discipline of growth, it will bear a full grown tree with all its components of  leaves branches fruits, flowers and their seeds again.

🔶 Decide aim of your life. Follow some ideality in your own life, and work whole heartedly on that to achieve your constant visit to that ideality itself is great success of life over and above other virtues of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (अन्तिम भाग)

🔷 हमें अपने जीवनयापन के सामान्य कार्यक्रम से ईसाइयत को ढूंढ़कर निकालना होगा और उसके स्थान पर भारतीयता की प्रतिष्ठापना करनी होगी। अंग्रेज चले गये अब अंग्रेजियत की गुलामी क्यों की जाय? हैट पैन्ट में क्या खूबसूरती है जो हमारे धोती कुर्ते में नहीं है। उसे हम स्वयं पहनें और बच्चों को पहनावें। अंग्रेजी भाषा को केवल एक विदेशी उपयोगी भाषा की दृष्टि से पढ़ें तो सही पर उसे अपनी मातृ भाषा से अधिक मान न दें। अपने दैनिक जीवन में, पत्र व्यवहार में, स्वाध्याय और अध्ययन में हिन्दी के माध्यम से हम पढ़ते और बोलते हैं उसी के भाव एवं आदर्श हमारे मस्तिष्क में स्थान जमाते हैं।

🔶 भारतीय साहित्य में ही वह क्षमता है जो भारतीय आदर्शों की ओर हमें प्रेरित करे। रामायण और गीता, वेद और धर्मशास्त्रों का, अपने पूर्वजों के पुनीत चरित्रों और कृतियों का थोड़ा बहुत अध्ययन हमारे नैतिक जीवन में आवश्यक रूप से स्थान प्राप्त करे। चोटी हममें से प्रत्येक के सिर पर होनी चाहिए। बिना जनेऊ कोई कन्धा खाली न हो। हिन्दू संस्कृति के दो प्रधान प्रतीक शिखा और सूत्र—चोटी और जनेऊ आज बुरी तरह उपेक्षित हो रहे हैं। जन साधारण की सांस्कृतिक निष्ठा को कायम रखने के लिए इन दोनों प्रतीकों की आवश्यकता एवं अनिवार्यता समझी जाय।

🔷 पतिव्रत और पत्नीव्रत के आदर्शों पर जोर दिया जाय। लड़कियां इस प्रकार का वेश विन्यास न बनावें जो दूसरों में अवांछनीय उत्तेजना उत्पन्न करे। फैशनपरस्ती और विलासिता, हमारे लिए घातक सिद्ध होगी। पर्दा बुरी बला है। हर बच्चे के षोडश संस्कार कराये जायें ताकि बालक पर तथा घर वालों पर भारतीयता के आदर्शों की छाप पड़े, संस्कार कराने वाले ऐसे पुरोहित पैदा हों जो न केवल धार्मिक कर्मकांड विधिवत् करें वरन् भारतीय आदर्शों की शिक्षा और प्रेरणा उन धर्म अवसरों पर लोगों को प्रदान करें। हमारा प्रत्येक त्यौहार एक सामूहिक सामाजिक संस्कार है, उन्हें इस प्रकार मनाया जाय कि जन साधारण अपने वर्तमान जीवन को प्राचीन आदर्शों के अनुरूप ढालने की प्रेरणा प्राप्त करे।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 9

👉 गुरुगीता (भाग 121)

👉 गुरूगीता से मिलता है ज्ञान का परम प्रकाश
🔷 गुरूगीता के महामंत्रों का अवतरण जिसके अन्तस् में हुआ, समझो वहाँ आध्यात्मिक प्रकाश की धाराएँ बरस गयीं। उसे सद्गुरू कृपा व ईश्वर कृपा का वरदान मिल गया। जिनके अन्तःकरण में आध्यात्मिक भावों का उदय होता है, उनमें यह चाहत भी जगती है कि सद्गुरू का सान्निध्य मिले ,ईश्वर की कृपा मिले। पर कैसे? इसकी विधि उन्हें नहीं मालूम होती। इस विधि के अभाव में पल्ले पड़ती है, तो सिर्फ भटकन ,उलझन और संत्रास। परन्तु जो गुरूगीता के आध्यात्मिक प्रभावों की समझ रखते हैं, वे बड़ी ही आसानी से इससे उबर जाते हैं। गुरूगीता की कृपा जिन्हें प्राप्त है, उन्हें भटकन, उलझन के कंटक नहीं चुभते। इसके अनुष्ठान से उनकी सभी आध्यात्मिक उलझने अन्तःकरण में स्वयमेव फूट पड़ते हैं।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी महत्त्व को बताया गया है। इसमें कहा गया है कि गुरूगीता का जप- पाठ ,अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु, शिव सभी के उपासकों को सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है। भगवान् शिव ने माता से कहा- हे सुमुखि! अब मैं तुम्हें गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है। भगवती का मंदिर ,गौशाला अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गए हैं ।। पवित्र निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप अनुष्ठान करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 182

शनिवार, 26 मई 2018

👉 हिंसा का बीज़

🔶 कस्बे में एक महात्मा थे। सत्संग करते और लोगों को धैर्य, अहिंसा, सहनशीलता, सन्तोष आदि के सदुपदेश देते। उनके पास सत्संग मे बहुत बड़ी संख्या में भक्त आने लगे। एक बार भक्तों ने कहा महात्मा जी आप कस्बे में अस्पताल, स्कूल आदि भी बनवाने की प्रेरणा दीजिए। महात्मा जी ने ऐसा ही किया। भक्तों के अवदान और परिश्रम से योजनाएं भी बन गई। योजनाओं में सुविधा के लिए भक्तों नें, कस्बे के नेता को सत्संग में बुलाने का निर्णय किया।

🔷 नेताजी सत्संग में पधारे और जनसुविधा के कार्यों की जी भरकर सराहना  की और दानदाताओं की प्रशंसा भी। किन्तु महात्मा जी की विशाल जनप्रियता देखकर, अन्दर ही अन्दर जल-भुन गए। महात्मा जी के संतोष और सहनशीलता के उपदेशों के कारण कस्बे में समस्याएं भी बहुत कम थी। परिणाम स्वरूप नेता जी के पास भीड कम ही लगती थी।

🔶 घर आकर नेताजी सोच में डूब गए। इतनी अधिक जनप्रियता मुझे कभी भी प्राप्त नहीं होगी, अगर यह महात्मा अहिंसा आदि सदाचारों का प्रसार करता रहा। महात्मा की कीर्ती भी इतनी सुदृढ थी कि उसे बदनाम भी नहीं किया जा सकता था। नेता जी अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे।आचानक उसके दिमाग में एक जोरदार विचार कौंधा और निश्चिंत होकर आराम से सो गए।

🔷 प्रातः काल ही नेता जी पहूँच गए महात्मा जी के पास। थोडी ज्ञान ध्यान की बात करके नेताजी नें महात्मा जी से कहा आप एक रिवाल्वर का लायसंस ले लीजिए। एक हथियार आपके पास हमेशा रहना चाहिए। इतनी पब्लिक आती है पता नहीं कौन आपका शत्रु हो? आत्मरक्षा के लिए हथियार का पास होना बेहद जरूरी है।

🔶 महात्मा जी नें कहा, “बंधु! मेरा कौन शत्रु?  शान्ति और सदाचार की शिक्षा देते हुए भला  मेरा कौन अहित करना चाहेगा। मै स्वयं अहिंसा का उपदेश देता हूँ और अहिंसा में मानता भी हूँ।” नेता जी नें कहा, “इसमें कहाँ आपको कोई हिंसा करनी है। इसे तो आत्मरक्षा के लिए अपने पास रखना भर है। हथियार पास हो तो शत्रु को भय रहता है, यह तो केवल सावधानी भर है।” नेताजी ने छूटते ही कहा, “महात्मा जी, मैं आपकी अब एक नहीं सुनूंगा। आपको भले आपकी जान प्यारी न हो, हमें तो है। कल ही मैं आपको लायसंस शुदा हथियार भैंट करता हूँ।”

🔷 दूसरे ही दिन महात्मा जी के लिए चमकदार हथियार आ गया। महात्मा जी भी अब उसे सदैव अपने पास रखने लगे। सत्संग सभा में भी वह हथियार, महात्मा जी के दायी तरफ रखे ग्रंथ पर शान से सजा रहता। किन्तु अब पता नहीं, महाराज जब भी अहिंसा पर प्रवचन देते, शब्द तो वही थे किन्तु श्रोताओं पर प्रभाव नहीं छोडते थे। वे सदाचार पर चर्चा करते किन्तु लोग आपसी बातचित में ही रत रहते। दिन प्रतिदिन श्रोता कम होने लगे।

🔶 एक दिन तांत्रिकों का सताया, एक विक्षिप्त सा  युवक सभा में हो-हल्ला करने लगा। महाराज नें उसे शान्त रहने के लिए कहा। किन्तु टोकने पर उस युवक का आवेश और भी बढ़ गया और वह चीखा, “चुप तो तूँ रह पाखण्डी” इतना सुनना था कि महात्मा जी घोर अपमान से क्षुब्ध हो उठे। तत्क्षण क्रोधावेश में निकट रखा हथियार उठाया और हवाई फायर कर दिया। लोगों की जान हलक में अटक कर रह गई।

🔷 उसके बाद कस्बे में महात्मा जी का सत्संग वीरान हो गया और नेताजी की जनप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 May 2018



👉 आज का सद्चिंतन 27 May 2018


👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 5)

जागरुकता :-

🔶 जो जीवन में जागरुक रहता है, उन्मत्त होता रहता है। जो तन्द्रा आलस्य या विलास में सोया रहता है, क्षय और पतन को प्राप्त होता है। जागरुक व्यक्ति अपने चारों ओर, संसार में देश तथा समाज में होने वाले क्रम तथा घटनाओं पर तीखी दृष्टि रखता है और उनसे लाभ उठाता है।

🔷 जागरुकता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति मानसिक तथा शारीरिक दृष्टि से चौकना रहता है। उसका मन संसार की प्रगति को देखता रहता है। उसमें शैथिल्य और आलस्य नहीं रहता। सतर्क पहरेदार की भाँति वह अपने इर्द गिर्द के परिवर्तनों को देखता और उनसे लाभ उठाता है। डाक्टर को देखिए, सिपाही या मल्लाह को देखिए, वे कैसे चुस्त, सतर्क, जागरुक रहते हैं। अपने काम पर तीखी दृष्टि लगाये रहते हैं। आध्यात्मिक जगत् के पथिक के लिए जागरुकता अतीव आवश्यक गुण है।

🔶 जीवन में अपने कर्त्तव्यों, उत्तरदायित्वों, आगे आने वाली जिम्मेदारियों, व्ययों के प्रति जागरुक रहिये। आपकी प्रगति कैसी हो रही है, आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, शारीरिक सभी रूपों में आप कितना आगे बढ़ रहे हैं, अथवा नीचे सरके आ रहे हैं?—यह चौकन्ने हो कर नापते रहिये। चौकन्ना व्यक्ति आने वाले खतरों से मार नहीं खाता। जरासा खतरा देखते ही वह गिलहरी की तरह जागरुक हो उठता है और बच निकलता है।

🔷 वे ही व्यक्ति अधिक वेतन प्राप्त करते हैं, जिनमें जागरुकता की अधिक आवश्यकता होती है। एंजिन तथा हवाई जहाज के चालक, बम चलाने वाले, मोटर ड्राइवर, डाक्टर, इंजीनियर, मजिस्ट्रेट इत्यादि सब ही को जिस गुण की अतीव आवश्यकता है, वह सतत् चेतनशीलता है।

🔶 शरीर में रोगों की ओर से सतर्क रहिये। तनिक सी लापरवाही से इन रोगों का अत्यधिक विकास हो सकता है। तनिक सी अशिष्टता से लड़ाई, झगड़ा, मुकदमेबाजी तक की नौबत आ सकती है। चारों ओर से आक्रमण आ सकते हैं पर जागरुकता सबसे हमारी रक्षा कर सकती है। अच्छा सेनापति सब जरूरतों के लिए तैयार रहता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.20

👉 Truthfulness (Last Part)

🔶 Personnel of the armed forces and intelligence agencies have strict instructions to gather information from others but not to divulge facts about themselves. This appears to be a clear encouragement to falsehood. But behind it is the exalted aim of national security and crime investigation. Hence, in such cases recourse to apparent lies can in no way be considered unbecoming or demeaning. Dharmaraj Yudhishthira, While confirming the death of Ashwathama, simply added in a low tone, ‘naro wa Kunjro wa’ (Either a man of this name or an elephant).

🔷 Many an elephant had died in the Mahabharat war. Yudhisthir instead of clarifying the position took recourse to a half truth. Even Lord Krishna, sensing that Arjun might have to die instead of Jayadratha, created the mirage of a sunset with the help of his ‘Sudarshan Chakra’. Thus, Arjuna’s life was saved and instead Arjun was able to kill Jayadrath to fulfill his vow. The seemingly deceptive trick played by Krishna served the cause of truth by serving the life of the greates warrior of the age fighting against the forces of evil.

🔶 All these epochal episodes are not meant to encourage falsehood, nor to paint truth as impractical. Honesty and truthfulness are indeed the basic moral and ethical values to be practiced in our lives.

🔷 We must not indulge in adulteration, or profiteering; must use correct weights and measures, and have transparent book keeping. But by the same token, it is not at all necessary to play Harishchandra before a thief or a ‘thug’, reveal to him details of one’s money and valuables and thus facilitate and encourage theft and dacoity.

📖 Akhand Jyoti- Feb 2001

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 3)

🔶 बात यहीं तक समाप्त नहीं होती। हमारे दाम्पत्य जीवन के आदर्श भी अब वही होते जाते हैं जो पाश्चात्य देशों के हैं। पतिव्रत और पत्नीव्रत पश्चिम में भी विदा करने की तैयारी हो चुकी है। सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा उस संस्कृति में बेकार मानी जाती है, हम भी सम्मिलित परिवारों को समाप्त कर रहे हैं। विवाह होते ही पति पत्नी सारे कुटुम्ब से अलग रहने की बात सोचते हैं और वही करते हैं। पश्चिम में आहार की स्वच्छता रहती है पर पवित्रता को व्यर्थ माना जाता है। हम भी जिस तिस के हाथ का बना भक्ष अभक्ष का विचार छोड़कर चाहे जो खाने लगे हैं।

🔷 पश्चिम वासियों का दृष्टिकोण खाओ पीओ मजा करो है। हम भी ऊंचे आदर्शवाद का कष्ट साध्य जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा को त्याग कर विलासी जीवन की ओर अग्रसर हो रहे हैं और जिस प्रकार भी नीति अनीति से सम्भव हो उसके साधन जुटाने में कटिबद्ध हो रहे हैं। ईसाइयत हमें प्यारी लगती है। हिन्दुत्व, बेवकूफी का चिन्ह प्रतीत होता है। शेक्सपियर और मिल्टन हमें विद्वान दीखते हैं, कालिदास और भवभूति का नाम भी याद नहीं होता।

🔶 क्या हमारे लिए यह उचित होगा कि अपनी महान जाति को इस सांस्कृतिक पराधीनता के चंगुल में फंसते हुए देखते रहें और चुपचाप आंसू बहाते रहें। नहीं, इतने से काम न चलेगा। हमें अपने राष्ट्रीय और जातीय गौरव की रक्षा के लिए ही नहीं—मानवता, धार्मिकता और अध्यात्मिकता के आदर्शों को जीवित रखने के लिए उस भारतीय संस्कृति को जीवित रखना होगा जिसकी गोद में पलकर इस के निवासी देवता की पदवी प्राप्त करते हैं। जो संस्कृति घर-घर में नर रत्नों को, महापुरुषों को जन्म देने की अपनी प्रामाणिकता लाखों वर्षों से प्रमाणित करती आ रही है, उसे इस प्रकार आसुरी संस्कृति से पद दलित और परांगमुख होते देखना हमारे लिए एक बड़ी हल लज्जास्पद बात होगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 8

👉 आध्यात्म पथ के पथिकों! अपरिग्रही बनो!!

🔶 मन से हर एक को सदैव अपरिग्रही होना चाहिए। आदर्श यही सामने रहना चाहिए कि सच्ची जरूरतें पूरी करने के लिए ही कमायें, जोड़ने जमा करने या ऐश उड़ाने के लिए नहीं। यदि गरीब आदमी लखपती बनने के मनसूबे बाँधता है तो वह परिग्रही है। धन वैभव के बारे में यही आदर्श निश्चित किया होना चाहिए कि सच्ची जरूरतों की पूर्ति के लिए कमायेंगे, उतनी ही इच्छा करेंगे, उससे अधिक संग्रह न करेंगे। धन को जीवन का उद्देश्य नहीं वरन् एक साधन बनाना चाहिए। “आत्मोन्नति और परमार्थ” जीवनोद्देश्य तो यही होना चाहिए।

🔷 जीवन धारण करने योग्य पैसा कमाने के अतिरिक्त शेष समय इन्हीं कार्यों में लगाना चाहिए। पैसे की आज जो सर्वभक्षी तृष्णा हर एक के मन में दावानल की तरह धधक रही है यह सर्वथा त्याज्य है। सादगी और अपरिग्रह में सच्चा आनन्द है। मनुष्य उतना ही आनन्दित रह सकता है जितना अपरिग्रही होगा। परिग्रही के सिर पर तो अशान्ति और अनीति सवार रहती है। इसी मर्म को समझते हुए योग शास्त्र के आचार्यों ने आध्यात्म पथ के पथिक को अपरिग्रही बनने का आदेश किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति जनवरी 1944 पृष्ठ 1

शुक्रवार, 25 मई 2018

👉 आज ही क्यों नहीं

🔷 एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था। गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था। सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था। अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य ज़िंदगी के सफर में असफल ना हो जाये। आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है। ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है। वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है,तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता। यहाँ तक कि अपने पर्यावरण के प्रति भी सजग नहीं रहता है और ना ही भाग्य द्वारा दिए गए सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही कुशल हो पाता है।

🔶 उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली। एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए दे कर, कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ| जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे, वह सोने में बदल जायेगी। पर याद रहे कि दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा।’

🔷 शिष्य इस अवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा सोना होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी,समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी उठना नहीं पड़ेगा। फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल जागा,उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है। उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें सोने में बदल देगा। दिन बीतता गया, पर आलसी होने के कारण वह इसी सोच में बैठा रहा कि अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान ले आएगा। उसने सोचा कि अब तो दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी , और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा। पर आलस्य से भरा हुआ उसका शरीर नींद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था।

🔶 अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया। पर इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी। उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा।

🔷 दोस्तों, जीवन में हर किसी को एक से बढ़कर एक मौके मिलते हैं पर हम इन्हे पहचान नहीं पाते और अपने आलस्य के कारण इन मौकों को हाथ से निकाल देते हैं और बाद में पछताते हैं।

🔶 अगर आप ज़िंदगी में सफल होना चाहते हैं तो अपने मौकों को पकड़ कर रखिये उन्हें हाथ से ना जाने दें क्योंकि अगर एक बार ये मौके हाथ से निकाल गए तो फिर सिवाय पछताने के कुछ नहीं बचेगा।

🔷 इसलिए अपने मौकों को सफलता में बदलने के लिए आज से ही लग जाइए | किसी भी काम को कल पर मत टालिए।

🔶 क्योंकि जिस काम को हम कल कर सकते हैं तो उसे आज ही क्यों नहीं?

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 May 2018




👉 आज का सद्चिंतन 26 May 2018


👉 मित्रता क्यों की जाती है?

🔷 क्या कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य से इस कारण मित्रता करता हैं कि वह पारस्परिक प्रत्युपकारों से वह लाभ प्राप्त करे जो अकेला रह कर नहीं कर सकता? या मित्रता का बन्धन किसी प्राकृतिक ऐसे उदार नियम से संबंधित हैं जिसके द्वारा एक मनुष्य हृदय दूसरे के हृदय के साथ अधिकाँश में उदारता और निस्वार्थता की भावना के साथ जा जुड़ता हैं?

🔶 उपरोक्त प्रश्नों की मीमाँसा करते हुए हमें यह जानना चाहिए कि मित्रता के बन्धन का प्रधान और वास्तविक हेतु प्रेम हैं। कभी कभी यह प्रेम वास्तविक हेतु प्रेम हैं। कभी कभी यह प्रेम वास्तविक न होकर कृत्रिम भी हुआ करता हैं परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि मित्रता का भवन केवल स्वार्थ की ही आधार शिला पर स्थिर हैं।
सच्ची मित्रता में एक प्रकार की ऐसी स्वाभाविक सत्यता हैं जो कृत्रिम और बनावटी स्नेह में कदापि नहीं पाई जा सकती। मेरा तो इसी लिए ऐसा विश्वास हैं कि मित्रता की उत्पत्ति मनुष्य की दरिद्रता पर न होकर किसी हार्दिक और विशेष प्रकार के स्वाभाविक विचार पर निर्भर हैं जिसके द्वारा एक समान मन वाले दो व्यक्ति परस्पर स्वयमेव संबंधित हो जाते हैं।

🔷 यह पुनीत आध्यात्मिक स्नेह भावना पशुओं में भी देखी जाती हैं। मातायें क्या अपने बच्चों से किसी प्रकार का बदला चाहने की आशा से प्रेम करती हैं? बेचारे पशु जिनको न तो अपनी दीनता का ज्ञान हैं, न उन्नति की आकाँक्षा हैं और न किसी सुनहरे भविष्य का प्रलोभन हैं भला वे अपने बच्चों से किस प्रत्युपकार की आशा करते होंगे? सच तो यह हैं कि प्रेम करना जीव का एक आत्मिक गुण हैं। यह गुण मनुष्य में अधिक मात्रा में प्रकट होता हैं इसलिए वह मित्रता की ओर आकर्षित होता है।

🔶 जिसके आचरण और स्वभाव हमारे समान ही हों अथवा किसी ऐसे मनुष्य को जिसका अन्तःकरण ईमानदारी और नेकी से परिपूर्ण हो, किसी ऐसे मनुष्य को देखते ही हमारा मन उसकी ओर आकर्षित हो जाता हैं। सच तो यह हैं कि मनुष्य के अन्तःकरण पर प्रभाव डालने वाला नेकी के समान और कोई दूसरा पदार्थ नहीं हैं। धर्म का प्रभाव यहाँ तक प्रत्यक्ष हैं कि जिन व्यक्तियों का नाम हमको केवल इतिहासों से ही ज्ञात हैं और उनको गुजरे चिर काल व्यतीत हो गया उनके धार्मिक गुणों से भी हम ऐसे मुग्ध हो जाते हैं कि उनके सुख में सुखी और दुख में दुखी होने लगते हैं।

🔷 मित्रता जैसे उदार बन्धन के लिए ऐसा विचार करना कि उसकी उत्पत्ति केवल दीनता पर ही हैं अर्थात् एक मनुष्य दूसरे से मित्रता केवल इसीलिए करता हैं कि वह उससे कुछ लाभ उठाने और अपनी अपूर्णता को उसकी सहायता से पूर्ण करें, मित्रता को अत्यन्त ही तुच्छ और घृणित समझना हैं। यदि यह बात सत्य होती तो वे ही लोग मित्रता जोड़ने में अग्रसर होते जिनमें अधिक अवगुण और अभाव हों परन्तु ऐसे उदाहरण कहीं दिखाई नहीं पड़ते। इनके विपरीत यह देखा गया हैं कि जो व्यक्ति आत्मनिर्भर हैं, सुयोग्य हैं, गुणवान हैं, वे ही दूसरों के साथ प्रेम व्यवहार करने को अधिक प्रवृत्त होते हैं। वे ही अधिकतर उत्तम मित्र सिद्ध होते हैं।

🔶 सच तो यह हैं कि परोपकार अपने उत्तम कार्यों का व्यापार करने से घृणा करता हैं और उदार चरित्र व्यक्ति अपनी स्वाभाविक उदारता का आचरण करने दूसरों को सुख पहुँचाने में आनन्द मानते हैं वे बदला पाने के लिए अच्छा व्यवहार नहीं करते। मेरा निश्चित विश्वास हैं कि सच्ची मित्रता लाभ प्राप्त करने की व्यापार बुद्धि से नहीं जुड़ती, वरन् इसलिए जुड़ती हैं कि मित्रभाव के निस्वार्थ बर्ताव से एक प्रकार का जो आध्यात्मिक सुख मिलता हैं वह प्राप्त हो।

✍🏻 दार्शनिक सिसरो
📖 अखण्ड-ज्योति मई 1944 पृष्ठ 10

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 4)

विरोध तथा प्रतिकूलता में धैर्य:-

🔷 विपत्ति, दुख या वेदनामय जीवन एक बड़ा शिक्षक है। यह वह स्थिति है जिसमें चारों ओर से कष्ट आते हैं, आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है, मन दुखी रहता है और कहीं से कोई सहारा नहीं दीखता। विपत्ति ऐसी घटनाओं का क्रम है, जो सफलता का शत्रु है और आनन्द को नष्ट करने वाला है। यह दुःख की मनः स्थिति है।

🔶 विपत्ति दूसरे रूप में एक वरदान सिद्ध होती है। जो व्यक्ति धैर्य बनाये रखता है, वह अन्ततः विजयी होता है। विपत्ति से हमारी इच्छा शक्ति में वृद्धि होती है और सहिष्णुता प्राप्त होती है। इससे हमारा मन ईश्वर की ओर प्रवृत्त होता है। अन्ततः इससे वैराग्य की प्राप्ति होती है। सत्य की पहली सीढ़ी है। विपत्ति वह गुरु है जो मनुष्य को उद्योगी और परिश्रमशील बनाता है। इससे मनुष्य की सोई हुई शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं, साधारण कार्य करती हुई शक्ति तीव्र हो जाती हैं और जागरुकता प्राप्त होती है। समृद्धि के प्रकाश में आनन्द मनाना साधारण सी बात है, किन्तु प्रतिकूलता और विपत्ति में स्थिर बुद्धि रखना।

🔷 आप विपत्ति में चिंतित न रहें, धैर्य धारण करें, प्रसन्न मुद्रा बनाएँ, हँसते रहें आत्मा से शक्ति खींच कर अपनी समस्याओं को नवीन रूप में विचार करें। आपकी आत्मा में विपत्ति से जूझने की अनन्त शक्ति है। इसे अनुभव करें।

🔶 सोच कर देखिए, प्रशान्त सागर में रह कर क्या कोई सफल नाविक बन सकता है? सागर की उत्ताल लहरों से जूझ कर आँधी तूफान को झेल कर ही बड़े कप्तान बनते हैं विपत्ति के समुद्र में ही आप जीवन के कप्तान बनते हैं। आपके धैर्य, साहस, लगन, शक्ति , अध्यवसाय की परीक्षा विपत्तियों के भयंकर तूफानों में ही होती है। विपत्ति में चारों ओर से घिर कर हम नई नई बातें खोजते हैं, नई खोजें करते हैं, खूब सोचते विचारते और अपने व्यक्ति त्व का विकास करते हैं। विपत्ति हमारे मित्रों को परखने की सच्ची कसौटी है। विपत्ति एक ऐसा साँचा है, जो हमें नए सिरे से ढालता है और विषम परिस्थितियों से युद्ध करना सिखाता है।

🔷 विपत्ति संसार के बड़े बड़े महात्माओं, राजनीतिज्ञों, विद्वानों पर आई है। वे उसमें तपे, पिसे, कुटे और मजबूत बने हैं। फिर आप क्यों निराश होते हैं? काले बादलों की तरह वह हवा में उड़ जाने वाली क्षणिक वस्तु है। यह तो आपकी इच्छाशक्ति और दृढ़ता की परीक्षा लेने के लिए आती है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.20

👉 Truthfulness (Part 1)

🔷 Many instances can be cited when a newly married bride was led to confide in her spouse about her past mistakes and then, instead of promised love and forgiveness, a highly vindictive attitude was adopted thereby making her life a veritable hell. The right thing to do is to keep completely mum about incidents of the past whose revelation is likely to create problems and misery.

🔶 Truthfulness is considered a sign of nobility. A match between word and deed is indeed a virtue, and such qualities should be routinely practiced in daily activities. However it is not falsehood to keep quiet about matters of the past whose uncovering is likely to raise a storm. Very often silence amounts to truthfulness in such circumstances.

🔷 The story goes that a cow escaped from the clutches of a butcher and was grazing by the side of the river behind an ‘ashram’. The butcher, in her pursuit came in front of the ashram and inquired from the sage about the cow’s whereabouts. The sage replied philosophically, “That which has seen speaks not, that which speaks has seen not.” He was, of course, referring to the difference between the faculties of sight (eyes) and the speech (tongue). The butcher could not follow this symbolic language and returned disappointed. The cow was thus saved by this enigmatic truth thus prevented a big tragedy.

📖 Akhand Jyoti- Feb 2001

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 2)

🔷 किसी धर्म में दीक्षित होने और उसकी संस्कृति अपना लेने में कुछ अन्तर तो है पर नाम मात्र का ही है। भारत में ईसाई संस्कृति फैल रही है। स्कूल और कालेजों के छात्र छात्राएं क्या पढ़ते हैं क्या नहीं, यह दूसरी बात है, पर वे वहां के वातावरण में अंग्रेजी भाषा सीखने के अतिरिक्त अंग्रेजी संस्कृति भी सीखते हैं। अध्यापक और अध्यापिकायें अपने व्यावहारिक जीवन में, अपने आचार विचार में, भाषा भेष भाव से, बच्चों पर यही संस्कार डालते हैं कि उन्हें न केवल अंग्रेजी पढ़नी चाहिए वरन् अंग्रेजी मूल संस्कृति का भी अनुकरण करना चाहिए।

🔶 गीली मिट्टी के समान हमारे कोमल बच्चे उस सांचे में ढलते हैं और धीरे-धीरे वे आधे ईसाई बन कर वहां से, निकलते हैं। सिरों पर ढूंढ़ने पर भी किसी के चोटी न मिलेगी। जनेऊ तलाश कराये जायें तो किसी बिरले के कन्धे पर ही उसके दर्शन होंगे। खड़े होकर पेशाब करने से लेकर चाय, डबल रोटी और अण्डे के आहार तक सभ्यता के चिह्न माने जाते हैं। इन सभ्य लोगों के होटलों में होने वाले प्रीतिभोजों में मांस मदिरा आवश्यक हैं अपनी मातृभाषा को हेय समझकर उसमें बातचीत करने को बेइज्जती समझते हैं और अंग्रेजी में पत्र लिखना बड़प्पन एवं गौरव का चिह्न मानते हैं।

🔷 भारत की गर्म जलवायु की दृष्टि से ठण्डे देश के उपयुक्त अंग्रेजी पोशाक सर्वथा अनुपयुक्त है। फिर भी लोग इसलिए उसे पहनते हैं कि अंग्रेजियत कोई बहुत बड़ी बात है। नेक-टाई ईसाई धर्म का एक धर्म चिह्न है, पर हम खुशी-खुशी उसे बांधते हैं। जरा से वजन का चार पैसे मूल्य का जनेऊ हमें बेकार लगता है और आधी छटांक भारी डेढ़ रुपया मूल्य की नेक टाई जिससे गला बांध देने पर आराम से हवा आने का मार्ग भी रुक जाय हमें यह अच्छी लगती है। यह सब उस संस्कृति के आगे आत्म समर्पण कर देने की ही महिमा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 7

👉 गुरुगीता (भाग 120)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔷 इस प्रसंग में बड़ी भक्ति पूर्ण कथा है। यह कथा दक्षिण भारत के प्रभु भक्त वेंकटरमण की है। भक्त वेंकटरमण तुंगभद्रा तट पर बसे रंगपुरम के रहने वाले थे। बचपन से ही उन्हें भगवत् चरणों में अनुराग था। यज्ञोपवीत संस्कार के समय उन्हें गायत्री मंत्र मिला। यह मंत्र उन्हें उनके कुलगुरू ने दिया था। हालाँकि उन्हें तलाश थी उन आध्यात्मिक गुरू की, जो उन्हें ईश्वर साक्षात्कार करा सके। मन की यह लगन उन्होंने बड़ी विनम्रता पूर्वक अपने कुलगुरू को कह सुनायी। बालक वेंकटरमण की बात सुनकर कुलगुरू कुछ समय तो शान्त रहे, फिर बोले -वत्स यह कार्य तो क केवल सद्गुरू प्रदान कर सकते हैं। तुम्हें उनकी प्राप्ति के लिए गुरूगीता का अनुष्ठान करना होगा। वेंकटरमण ने कुलगुरू की इन बातों पर बड़ी आस्था से कहा- आचार्य! यदि हम पवनपुत्र हनुमान को अपना गुरू बनाना चाहें तो क्या यह सम्भव है। अवश्य वत्स! कुलगुरू ने बालक की श्रद्धा की सम्बल दिया।

🔶 बस, उस दिन से बालक वेंकटरमण हनुमान जी की मूर्ति के सामने गायत्री जप एवं गुरूगीता के पाठ में तल्लीन हो गया। नित्य प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठना, स्नान, संध्या, तर्पण से निश्चित होकर हनुमान् जी की मूर्ति के सामने गायत्री मंत्र का जप एवं गुरूगीता का पाठ करना। वेंकटरमण का सह क्रम नित्यप्रति छः घण्टे चलता रहता। कभी- कभी वेंकटरमण चाँदनी रात में तुंगभद्रा के तट पर एकान्त में बैठकर गुरूगीता के श्लोकों का पाठ करने लगते, तब ऐसा मालूम होता कि उनके रोम- रोम से ही गुरूगीता मंत्रों की किरणें निकल रही हैं। इस प्रकार इस कठिन साधना में उनके ग्यारह वर्ष बीत गये।

🔷 बारहवें वर्ष के चैत्र शुक्ल पूर्णिमा की आधी रात तुंगभद्रा के बालुकामय तट पर बासन्ती बयार के झोंके के बीच में, वन्य पुष्पों के पराग की मधुरता के बीच वेंकटरमण रामभक्त हनुमान् का ध्यान करते हुए गुरूगीता का पाठ करने लगे। पाठ करते- करते उन्हें समाधि लग गयी। समाधि में उन्होंने देखा कि असंख्य वानरों की सेना के साथ हनुमान् जी आ रहे हैं। धीरे- धीरे वे सभी वानर पता नहीं कहाँ अदृश्य हो गये, बस रह गये केवल हनुमान् जी। उन्होंने बड़ी स्नेह भरी दृष्टि से वेंकटरमण को देखा और उसके चरणों में गिर गये और तभी उन्हें लगा श्री हनुमान् जी उनके हृदयपट पर अपनी तर्जनी अंगुली से स्वर्णाक्षरों में गायत्री मंत्र लिख रहे हैं और कह रहे हैं- उठो वत्स! मैं ही तुम्हारा गुरू हूँ। सचमुच गुरूगीता में क्या कुछ सम्भव नहीं। असम्भव को सम्भव करने वाली है इसकी महिमा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 180

👉 भाग्य से नहीं कर्म से निकला जाता है मुसीबतों से

🔶 एक समय की बात है| एक नदी के किनारे उसी नदी से जुडा एक तालाब था। उस तालाब में नदी से आई हुई बहुत सी मछलियाँ रहती थीं। वह तालाब लम्बी घास व झाडियों से घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था।

🔷 उसी मे ईना, चिनी तथा मिनी नाम की तीन मछलियों का समूह भी रहता था। वे आपस में मित्र थीं। उनके स्वभाव भिन्न थे। ईना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। चिनी कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने की कोशिश करो। तथा मिनी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता, जो भाग्य में लिखा है, वही होता है।

🔶 एक दिन शाम को कुछ मछुआरे नदी में मछलियाँ पकडकर घर जा रहे थे। उस दिन उनके जालों में बहुत कम मछलियाँ फँसी थी। इसलिए उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड उड़ता हुआ दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियाँ दबी थी। वे चौंके।

🔷 एक ने अनुमान लगाया “दोस्तो! लगता हैं झाड़ियों के पीछे नदी से जुडा तालाब है, जहां इतनी सारी मछलियाँ पल रही हैं।”

🔶 मछुआरे खुश होकर झाडियों में से होकर तालाब के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।🔴 एक मछुआरा बोला “अहा! इस तालाब में तो मछलियाँ भरी पडी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा। हमें यहाँ ढेर सारी मछलियां मिलेंगी।

🔷 दूसरे ने कहा “आज तो शाम होने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहाँ जाल डालेंगे।” इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछलियों ने मछुआरों की बात सुन ली थी।

🔶 ईना ने कहा “साथियो! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई है। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस तालाब को छोडकर नदी में जा रही हूँ।

🔷 चिनी बोली “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहाँ हैं, जो इतना घबराने की जरुरत हैं | हो सकता है मछुआरे आयें ही नहीं । उन मछुआरों का यहाँ आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है। हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है उनकी बस्ती में आग लग जाए।  इसलिए उनका आना निश्चित नहीं हैं। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता हैं मैं उनके जाल में फॅंसू ही नहीं।”

🔶 मिनी ने अपनी भाग्यवादी बात कही “भागने से कुछ नहीं होने वाला। मछुआरों को आना है तो वह आएंगे ही। हमें जाल में फँसना है  तो हम फँसेंगे ही। किस्मत में मरना ही लिखा हैं तो क्या किया जा सकता हैं?”

🔷 इस तरह ईना तो उसी समय वहाँ से चली गई। जबकि चिनी और मिनी मछली तालाब में ही रही।

🔶 सुबह हुई तो मछुआरे अपने जाल लेकर आ गए और उन्होंने तालाब में अपने जाल डाल दिए। चिनी ने संकट देखा तो जान बचाने के उपाय सोचने लगी । उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस तालाब में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती हैं।जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सडने लगी थी। प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सडती लाश की सडांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में चिनी एक मछुआरे के जाल में फँस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियाँ तो तडपने लगीं, लेकिन चिनी दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पडी रही। मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निश्चल पडी चिनी को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड चुकी हैं।” ऐसे बडबडाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने चिनी को तालाब में फेंक दिया।

🔷 चिनी अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने नदी की और दौड़ लगा दी ।

🔶 मिनी ने भाग्य के भरोसे रहकर अपनी जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। वह भी दूसरे मछुआरे के जाल में फँस गई थी और एक टोकरी में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली मिनी अब अपनी सोच पर पछता रही थीं कि अगर वो भी समय रहते नदी में चली गयी होती तो आज उसकी जान बच जाती। वह उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तडप-तडपकर मर गयी।

🔷 इन मछलियों कि तरह ही कुछ कुछ हमारा भी हाल है। हम भी कभी कभी जान बूझकर मुसीबतो को अपने आप बुला लेते हैं या पहले से पता होते हुए भी मुसीबतो से निकलने का प्रयास नहीं करते। और जब हम मुश्किलों से घिर जाते हैं तब पछताते हैं कि अगर हमने पहले से ये काम ना किया होता तो आज मुसीबतों में ना फंसते या अगर हम पहले से मुश्किलों से निकलने का उपाय कर लेते तो आज इतनी मुसीबतों में ना फंसते।

🔶 दोस्तों, इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें भाग्य के भरोसे न बैठकर समय रहते अपनी मुसीबतों , संकटों से बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 25 May 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 May 2018


👉 देश सेवा का मार्ग

🔶 प्लेटो ने एक स्थान पर लिखा है कि -’किसी देश का इससे अधिक सौभाग्य क्या हो सकता है कि उसमें श्रेष्ठ आचरण वाले स्त्री पुरुषों का बाहुल्य हो।’ कवि बाल्ट व्हाइट मैन का कथन है कि-’किसी देश की महत्ता उसके ऊँचे भवनों, शिक्षालयों, सम्पत्ति कोषों से नहीं हो सकती। बलवान् और चरित्रवान् व्यक्ति ही अपने देश को महान बना सकते हैं। वह बड़ा ही भाग्यशाली राष्ट्र है, जिसके निवासी उच्च आचरण को अपना आदर्श मानते हों। जर्मनी के भाग्य विधाता हिटलर ने एक स्थान पर लिखा है-हमारे देश को निर्बल स्वास्थ्य वाले धुरन्धर विद्वानों की अपेक्षा ऐसे व्यक्तियों की अत्यधिक आवश्यकता है, जो भले ही कम पढ़े लिखे हों परन्तु वे स्वस्थ हों, सदाचारी हों, आत्म विश्वासी हों और दृढ़ इच्छा शक्ति वाले हों।’

🔷 देश की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम उच्च आचरण वाले, निर्भीक, साहसी सदाचारी और स्वस्थ मनुष्यों की संख्या बढ़ावें। सुख, स्वराज्य, सुशासन तब तक किसी देश में स्थिर नहीं रह सकता, जब तक कि वहाँ के निवासी मानवोचित गुणों वाले न हों, वे मानवता का उत्तरदायित्व अनुभव न करते हों। निर्बलता, कायरता, भीरुता, छल, पाखंड और प्रवंचना का जब तक जोर रहेगा, तब तक दासता और दुर्भाग्य हमारा पल्ला नहीं छोड़ सकते। महात्मा गाँधी का कथन है कि “शारीरिक और मानसिक स्वस्थता की आवश्यकता जो लोग अनुभव करते हों और जो अपने को सब दृष्टियों से बलवान बनाने के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहें, ऐसे ही देश सेवकों की भारत माता को आवश्यकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति मई 1944 पृष्ठ 1

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 3)

परिस्थितियों के अनुकूल ढल जाना :-

🔶 अपने आपको नई नई विषम तथा विरोधी परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेना, इच्छाओं, आवश्यकताओं और रहन सहन को नवीन परिस्थितियों के अनुसार घटा बढ़ा लेना एक बड़ा गुण है। मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे व्यक्तियों, चाहे वे कैसे ही गुण स्वभाव के क्यों न हों, के अनुसार अपने को ढालना सीखे। नई परिस्थितियाँ चाहे जिस रूप में आयें, उसके वश में आ जायं। अच्छी और बुरी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अपने को घटा बढ़ा लिया करें।

🔷 अधिकाँश व्यक्ति दूसरे के अनुसार अपने को ढाल नहीं पाते, इसलिए वे दूसरों का हृदय जीत नहीं पाते, न झुक सकने के कारण वे सफल नहीं हो पाते। पत्नी पति के अनुसार, पति पत्नी के अनुसार, विक्रेता ग्राहक के अनुसार, मातहत अफसर के अनुसार, विद्यार्थी गुरु के अनुसार, पुत्र पिता के अनुसार न ढल सकने के कारण दुःखी रहते हैं।

🔶 आप बेंत की तरह लचकदार बनें जिससे अपने को हर प्रकार के समाज के अनुसार ढाल लिया करें। इसके लिए आप दूसरे की रुचि, स्वभाव, आदतों और मानसिक स्तर का ध्यान रखें। शक्कर से मीठे वचन बोलें, प्रेम प्रदर्शित करें, दूसरों की आज्ञाओं का पालन करें। आपसे बड़े व्यक्ति यह चाहते हैं कि आप उनकी आज्ञा का पालन करें। सभ्यता पूर्वक दूसरे से व्यवहार करें। ढलने की प्रवृत्ति से मित्रताएं स्थिर बनती हैं, व्यापार चलाते हैं, बड़े बड़े काम निकलते हैं। इस गुण से इच्छा शक्ति बढ़ती है और मनुष्य अपने ऊपर अनुशासन करना सीखता है। इससे आत्मबलिदान की भावना का विकास होता है, स्वार्थ नष्ट होता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.19

👉 Awakening Divinity in Man (Last Part)

🔶 Friends, turn away from the mirage of cravings, passions, greed and discontentment, and let your prayers and worship reach the stage where your personality would be illumined by God’s light, by the glow of divinity. This is true devotion. If you have cultivated virtuous tendencies and conduct, I assure you that you will get support and cooperation from people around you. Boons of enlightened progress will be showered upon you from all directions.

🔷 This is what has been, and will continue to be, the source of God’s blessings, the blessings of divine mother Gayatri. This has been the great tradition of devotion and of devotees and will be so in the future too. If you understand this secret and learn the true meaning of worship and devotion, your Gayatri anusthana here will be accomplished in the truest sense.

🔶 The self disciplining practices of this anusthana sadhana are meant to refine your personality so that virtuous tendencies flourish in you.  If this tapascarya of yours is sincere and one-pointed then at the end of this anusthana you will feel inwardly endowed with godly attributes of an authentically virtuous and noble person. When a person imbibes an attitude of loving service, he sees his own good in the welfare of others and experiences happiness in it. If you find them elevated in this state of nobility, I would say you have attained true devotion and grace of the god.

🔷 You would be blessed by God, just as the great devotees of the past have been. I have tried followed this path and have been blessed with sublime gifts in my life. I want all of you, who have come for this sadhana course of a condensed anusthana, to get inspired and be blessed by divine grace. If this inspires you and you begin to practice it, I assure you that the result will be so fulfilling, so majestic that you, your country, your life, your God, this sadhana course and I myself will be glorified. May God bless you with his grace.

|| OM SHANTI ||
 
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 1)

🔶 यों मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह एक पशु है। थोड़ी बुद्धि अधिक रहने से वह अपेक्षाकृत कुछ अधिक सुख-साधन प्राप्त कर सकता है इतना ही सामान्यतः उसे बुद्धि विशेषता का लाभ है। पर यदि उसकी अन्तःप्रेरणा उच्च भावनाओं, आदर्शों एवं आकांक्षाओं से अनुप्राणित हुई तो वह असामान्य प्रकार का, उच्चकोटि का, सत्पुरुषों जैसा जीवन-यापन करता हुआ न केवल स्वयं सच्ची सुख शांति की अधिकारी बनता है वरन् दूसरे अनेकों को भी आनन्द और सन्तोष की परिस्थितियों तक ले पहुंचने में सहायक होता है। यदि वह अंतः प्रेरणाएं निकृष्ट कोटि की हुईं तो न केवल स्वयं रोग, शोक, अज्ञान, दारिद्र, चिन्ता, भय, द्वेष, दुर्भाव, अपकीर्ति एवं नाना प्रकार के दुःखों का भागी बनता है वरन् अपने से सम्बद्ध लोगों को भी दुर्मति एवं दुर्गति का शिकार बना देता है। जीवन में जो कुछ श्रेष्ठता या निकृष्टता दिखाई देती है उसका मूल आधार उसकी अन्तःप्रेरणा ही है। इसी को संस्कृति के नाम से पुकारते हैं।

🔷 जिस प्रकार कोई पौधा अपने आप उगे और बिना किसी के संरक्षण के बढ़े तो वह जंगली किस्म का कुरूप हो जाता है। पर यदि वही पौधा किसी चतुर माली की देख-रेख में अच्छे खाद्य पानी एवं संरक्षण के साथ बढ़ाया जाय, समय-समय पर काटा-छांटा या सुधारा जाय तो बहुत ही सुन्दर एवं सुविकसित हो सकता है। मानव जीवन की स्थिति भी इसी प्रकार की है उसे उचित दिशा में उचित रीति से विकसित करने की जो वैज्ञानिक पद्धति है उसे ‘संस्कृति’ कहा जाता है।

🔶 भारतीय संस्कृति—मानव संस्कृति है। उसमें मानवता के सभी सद्गुणों को भली प्रकार विकसित करने वाले सभी तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। जिस प्रकार काश्मीर में पैदा होने वाली केशर, ‘कश्मीरी केशर’ के नाम से अपनी जन्मभूमि के नाम पर प्रसिद्ध है। इस नाम के अर्थ यह नहीं हैं कि उसका उपयोग केवल काश्मीर निवासियों तक ही सीमित है। भारतीय संस्कृति नाम भी इसीलिए पड़ा कि वह भारत में पैदा हुई है वस्तुतः वह विश्व-संस्कृत है। मानव संस्कृति है। सारे विश्व के मानवों की अन्तःप्रेरणा को श्रेष्ठ दिशा में प्रेरित करने की क्षमता उसमें कूट-कूटकर भरी हुई है। इस संस्कृति को साम्प्रदायिकता या संकीर्णता कहना—वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित होना ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 6

👉 गुरुगीता (भाग 119)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव माता जगदम्बा से कहते हैं-

जपेत् शाक्तश्च सौरश्च गाणपत्यश्च वैष्णवः। शैवश्च सिद्धिदं देवि सत्यं सत्यं न संशयः॥१५१॥
अथ काम्यं जपे स्थाने कथयामि वरानने। सागरे वा सरित्तीरेऽथवा हरिहरालये॥ १५२॥
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे। वटे च धात्रिमूले वा मठे वृंदावने तथा॥ १५३॥
पवित्रे निर्मले स्थाने नित्यानुष्ठानतोऽपि वा। निवेदनेन मौनेन जपमेतं समाचरेत् ॥ १५४॥
श्मशाने भयभूमौ तु वटमूलान्तिके तथा। सिध्यन्ति धत्तूरे मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ॥ १५५॥

🔷 गुरूगीता का जप- पाठ अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु ,शिव के उपासकों को भी सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है इसमें कोई संशय नहीं है॥ १५१॥ भगवान् शिव माँ से कहते हैं- हे सुमुखि! अब मैं तुमसे गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है॥ १५२॥ भगवती का मंदिर, गौशाला, अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गये हैं॥ १५३॥ पवित्र, निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप- अनुष्ठान करना चाहिए॥ १५४॥ इस अनुष्ठान के लिए श्मशान, भयानक स्थान ,बरगद, धूतर या आम्रव़ृक्ष के नीचे का सुपास भी श्रेष्ठ कहा गया है॥१५५॥

🔶 भगवान् शिव के इन वचनों में गुरूगीता अनुष्ठान के विविध रहस्य हैं। इन रहस्यों में प्रमुखता है- साधना भूमि का अपना वातावरण होता है। अच्छा हो कि यह वातावरण साधना के लक्ष्य के अनुरूप हो। सात्विक लक्ष्य के लिए नदी, सागर उपयुक्त है, तो वैराग्य के उन्मेष के लिए ठीक है। इनमें से किसी स्थान का चयन साधक को अपनी मनोभूमि और अपने लक्ष्य के अनुसार करना चाहिए। स्थान उपयुक्त हो, लक्ष्य स्पष्ट हो, तो गुरूगीता की साधना साधक के सभी मनोरथों को पूरा करने वाली है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 179

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...