शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५८)

ऐसा है, वह घट-घट वासी
    
योगिवर कहते हैं कि ईश्वर ऐसे बदलते मुखौटों में बँधा नहीं है। वह पुरुषोत्तम है, पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ है। और साथ ही चेतना की एक परम पवित्र अवस्था। यह अवस्था ऐसी है, जिसे न तो क्लेश छू पाते हैं, न कर्म और न विपाक तथा न ही आशय। इन सभी से ईश्वरीय चेतना अछूती है। क्लेश, कर्म, विपाक और आशय ये क्या हैं? अच्छा हो इन सबको हम महर्षि के सूत्रों की भाषा में ही जानें। तो पहले स्थान पर है क्लेश। इसका विस्तृत ब्योरा पतंजलि ने दूसरे पाद के तीसरे सूत्र से नवे सूत्र तक दिया है। उन्होंने इस प्रकरण में पाँच क्लेश गिनाये हैं- १. अविद्या, २. अस्मिता, ३. राग, ४. द्वेष एवं ५. अभिनिवेश। ये पाँचों क्लेश हम सभी को कभी न कभी व्यापते हैं। परन्तु ईश्वर को इनमें से कोई क्लेश छू भी नहीं सकता।
    
जहाँ तक कर्म की बात है, तो महर्षि ने अपने योग सूत्र के चतुर्थ पाद के ७ वें सूत्र में इसकी चर्चा की है। वह कहते हैं कि कुल चार तरह के कर्म होते हैं- १. पुण्य कर्म, २. पाप कर्म, ३. पुण्य एवं पापमिश्रित कर्म एवं ४. पुण्य एवं पाप से रहित कर्म। ईश्वरीय चेतना कभी भी, किसी भी तरह इन कर्मों से लिप्त नहीं होती। इन चारों प्रकार के कर्मों में कोई भी कर्म उसे छू-पाने में समर्थ नहीं होते। तीसरा क्रम विपाक का है। विपाक यानि कि कर्मों का फल। तो जब कर्म ही नहीं तो कर्मों का फल कहाँ? कर्म के लिए किसी फल की पहुँच ईश्वर तक नहीं है। ये तो बस जीवों को ही बाँधते हैं। इस कर्म विपाक के स्वरूप की चर्चा महर्षि पतंजलि ने द्वितीय पाद के १३ वें सूत्र में की है।
    
चौथे क्रम में आशय है। महर्षि के अनुसार कर्म संस्कारों के समुदाय का नाम आशय है। इसकी व्याख्या योगसूत्र के द्वितीय पाद के १२ वें सूत्र में मिलती है। यह आशय ही जीवात्मा को बाँधता है। उसको यत्र-तत्र घसीटता फिरता है। उसकी परिस्थितियों एवं मनःस्थिति में बदलाव के सारे सरंजाम आशय के द्वारा ही जुटते हैं। इसी से हँसने-रोने की स्थिति बनती है। यह न हो तो फिर आनन्द ही आनन्द है। ईश्वर इससे अछूता रहने के कारण आनन्द का परम स्रोत है। सामान्य जीवों को इन चारों के बंधन में बँधना पड़ता है। परन्तु ईश्वर इनसे सर्वथा मुक्त है। इतना ही नहीं जो उसका चिन्तन करते हैं, जो उसमें समर्पित होते हैं, वे सब भी उसी अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं।
    
ईश्वरीय चेतना को जो इस रूप में जानते हैं, वे ही साथ से परिचित होने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। यही नहीं उनका सम्पूर्ण जीवन एक उत्सव का रूप ले लेता है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि नदियाँ, झरने, वृक्ष, बहारें सभी आनन्द मना रहे हैं। एक इन्सान ही चिन्तित-परेशान है। ऐसा सिर्फ  इसलिए है क्योंकि वह जीवन को कर्म की भाँति देखता है, जबकि जगत् तो ईश्वर की लीला है। यदि हम उसकी लीला के सहचर हो सके, तो हमारा अपना जीवन अभी इसी क्षण आनन्द का निर्झर बन जाए। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १००
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५७)

ऐसा है, वह घट-घट वासी

महर्षि पतंजलि और गुरुदेव के स्वरों में आमंत्रण के मधुर गीत मुखरित हैं। यह आमंत्रण उनके लिए है, जो अन्तर्यात्रा पथ पर चलने के लिए उत्सुक हैं। अपने आपसे इसी समय पूछिए कि क्या आपमें यह उत्सुकता है? यदि जवाब हाँ है, तो महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि गुरुदेव आपकी अंगुली थामने के लिए तैयार हैं। ये महायोगिराज आपकी अन्तर्यात्रा को सुगम करने के लिए प्रत्येक सरंजाम जुटाएँगे। बस आपमें श्रद्धा और साहस की सम्पदा होनी चाहिए। ध्यान देने की बात यह है कि ऐसा कुछ आप में है, तो ही आप आमंत्रण के इन गीतों को सुन पाएँगे। तभी इन गीतों की स्वर लहरियाँ आपकी अन्तर्भावना में प्रभु प्रेम का रस घोलेंगी। ऐसा होने पर ही आपकी अन्तर्चेतना में जागरण का महोत्सव मनाया जा सकेगा।    

जीवन को महोत्सव बनाने वाले भगवान् की शरण में जाने के लिए उनकी स्पष्ट धारणा जरूरी है। साधक के मन में यह प्रश्न सदा से कौंधता रहा है—उन सर्वेश्वर का स्वरूप क्या है?  इस सवाल के जवाब में महर्षि अगला सूत्र कहते हैं-
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः 
पुरुषविशेष ईश्वरः॥ १/२४॥
क्लेशकर्मविपाकाशयै= क्लेश, कर्म, विपाक और आशय- इन चारों से, अपरामृष्टः = जो सम्बन्धित नहीं है (तथा), पुरुषविशेषः = जो समस्त पुरुषों में उत्तम है, वह  ईश्वरः = ईश्वर है।

अर्थात् ईश्वर सर्वोत्कृष्ट है। वह दिव्य चेतना की वैयक्तिक इकाई है। वह जीवन के दुःखों से तथा कर्म उसके परिणाम से अछूता है।
    
अध्यात्म विज्ञान के महावैज्ञानिक महर्षि पतंजलि ईश्वर को बड़ी स्पष्ट रीति से परिभाषित करते हैं। यह परिभाषा साधकों के लिए आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य भी है। क्योंकि यह ऐसा शब्द है, ऐसा सत्य है जिसके बारे में ज्यादातर लोग भ्रमित हैं। शास्त्र, पुराण, धर्म, मजहब सबने मिलकर ईश्वर की अनेकों धारणाएँ गढ़ी है। कोई तो उसे सातवें आसमान में खोजता है, तो कोई मन्दिरों, पूजागृहों में ढूँढता है। कोई उसकी कल्पना मानवीय रूप में करता है, तो कोई आकार विहीन मानता है। बड़ी जहमत है-किसे कहें सही और किसे ठहराएँ गलत। सामान्य जनों की बात तो जाने दें, अध्यात्मवेत्ताओं तक का मन इस बारे में साफ नहीं है। वे भी कई तरह की भ्रान्तियों में उलझे हैं।
    
महर्षि पतंजलि अपने इस सूत्र में सभी की सभी तरह की भ्रान्तियों का एक साथ निराकरण करते हैं। वह कहते हैं कि पहले तो ईश्वर को किसी व्यक्तित्व में न बाँधो। वह सभी बन्धनों से मुक्त है। व्यक्तित्व के लिए जो पर्सनल्टी शब्द है, वह यूनानी शब्द पर्सोना से आया है। यूनान के गुजरे जमाने में वहाँ नाटक मण्डलियों में अभिनेता अपने चेहरों पर एक मुखौटा लगाया करते थे। इन मुखौटों को कहते थे ‘पर्सोना’ यानि वह चेहरा जो दिखावटी है, जिसे हम ओढ़े रहते हैं। विचार करने पर इस सम्बन्ध में कई मजेदार बातें सामने आएँगी। उदाहरण के लिए जब हम दूसरों के साथ कार्यालय में या कहीं और व्यवहार करते हैं, तो स्थिति कुछ और होती है। पर जब हम अपने बाथरूम में होते हैं, रात सोते समय बिस्तर पर होते हैं, तो स्थिति बदली हुई होती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

👉 क्षुद्रता की ठंडी आग से बचें

आज इसी प्रकार की क्षुद्र मनोवृत्तियों क  साम्राज्य है। कुढ़न और ईर्ष्या की आग में झुलसते रहने वाले व्यक्ति अपना मानसिक अहित तो करते ही हैं अपनी जलन बुझाने के लिए जो षडयंत्र रचते हैं उसमें उनकी उनकी इतनी शक्ति खर्च होती रहती है जिसकी बचत करके उपयोगी मार्ग में लगाया गया होता तो अपनी बहुत उन्नति हुई होती। लोगों का जितना समय और मनोयोग इन दुष्प्रवृत्तियों में लगता है यदि उतना आत्म−कल्याण अथवा दूसरों की सेवा-सहायता में लगता तो कितना बड़ा हित साधन हो सकता था। ईर्ष्या और कुढ़न की मूर्खता पर जितना ही गम्भीरता से विचार किया जाता है उतनी ही उसकी व्यर्थता और हानि स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगती है।

इन द्वेष वृत्तियों का परित्याग करके यदि मनुष्य अपने अन्दर सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने में लग जाय तो उसकी दुनियाँ आज की अपेक्षा कल दूसरी ही हो सकती है। दृष्टिकोण के बदलने से दृश्य बदलते हैं। नाव के मुड़ने से किनारे पलट जाते हैं। हमें इस प्रकार का सुधार अपने आप में निरन्तर करते चलना चाहिए। सुधार के लिए हर दिन शुभ है उसके लिए कोई आयु अधिक नहीं। बूढ़े और मौत के मुँह में खड़े हुए व्यक्ति भी यदि अपने में सुधार करें तो उन्हें भी आशाजनक सफलता प्राप्त हो सकती है। फिर जिनके सामने अभी लम्बा जीवन पड़ा है वे तो इस आत्म−सुधार की प्रक्रिया को धीरे−धीरे चलाते रहें तो भी अपने जीवन क्रम का कायाकल्प ही कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५६)

समर्पण से सहज ही मिल सकती है—सिद्घि
    
परम पू. गुरुदेव ने अपनी व्यक्तिगत चर्चाओं के क्रम में एक दिन बताया था कि श्रद्धा वह अलौकिक तत्त्व है, जिससे पल-पल चमत्कार घटित होते हैं। एक शिष्य की जिज्ञासा में उन्होंने कहा-श्रद्धा क्या है? कैसी है? इसे लोग जानते ही कहाँ हैं बेटा! बस खाली जबान से श्रद्धा-श्रद्धा रटते रहते हैं, इसकी सच्चाई से कहाँ कोई वाकिफ है! यह सच्चाई समझ में आ जाये, तो फिर बाकी क्या बचता है। सब कुछ अपने आप ही हो जाता है। महायोगी परम पू. गुरुदेव के शब्दों में कहें, तो जिस प्रकार संकल्प सूक्ष्म शरीर की ऊर्जा है, उसी प्रकार श्रद्धा कारण शरीर की ऊर्जा की घनीभूत स्थिति है।

साधक जब अपने कारण शरीर पर केन्द्रित होता है, तो श्रद्धा जन्म लेती है। यह स्थिति भावुकता से विपरीत है। भावुकता भावनाओं की चंचल और अस्थिर स्थिति में उठती हैं, जबकि श्रद्धा के जन्मते ही भावनाएँ स्थिर, एकाग्र एवं लक्ष्य परायण होने लगती हैं। श्रद्धा की सघनता के क्रम में ये सभी तत्व बढ़ते हैं। साधक स्मरण रखे कि कारण शरीर हमारी मानवीय चेतना का केन्द्र है। हमारे अस्तित्व का गहनतम तल है। यहाँ संघनित होने वाली ऊर्जा का अन्य सभी तलों की ऊर्जा की अपेक्षा सर्वोपरि महत्त्व है। इसकी सामर्थ्य भी कहीं ज्यादा बढ़ी-चढ़ी है। यहाँ जो हो सकता है, वह कहीं और नहीं हो सकता।
    
स्थूल शरीर का सम्बन्ध कर्म जगत् यानि कि व्यवहार जगत् है, सूक्ष्म शरीर सीधे विचार जगत् यानि कि चिंतन जगत् से जुड़ा है, जबकि कारण शरीर सीधा महाकारण अर्थात् ब्राह्मी चेतना से है। यहाँ होने वाली हलचलें विचारों एवं कर्मों की दिशा तय करती है। ध्यान रहे, विचार हमें समर्पण के लिए प्रेरित तो कर सकते हैं, परन्तु समर्पण करा नहीं सकते। कर्म और विचार यानि कि स्थूल व सूक्ष्म की सभी शक्तियाँ मिलाकर भी कारण शरीर का मुकाबला नहीं कर सकती, जबकि कारण शरीर में उपजी हलचलें सूक्ष्म व स्थूल यानि कि कर्म व विचारों को अपने पीछे आने के लिए बाध्य व विचार कर सकती है।    
    
यही कारण है कि श्रद्धा व समर्पण परस्पर जुड़े है। सम्पूर्ण श्रद्धा सम्पूर्ण समर्पण को साकार करती है। और यह समर्पण या तो ईश्वर के प्रति होता है अथवा ईश्वरीय भावनाओं के प्रति जिसके साकार व सघन स्वरूप गुरुदेव होते हैं। श्रद्धा अपनी सघनता के अनुक्रम में ब्राह्मी चेतना में घुलने-मिलने लगती है। इस घुलने-मिलने का अर्थ है-ब्राह्मी चेतना के प्रवाह का साधक में प्रवाहित होना। ऐसी स्थिति बन पड़े, तो फिर सभी असम्भव स्वयं ही सम्भव बन जाते हैं। कृष्ण और मीरा का मिलन इसी तल पर हुआ था। श्री रामकृष्ण माँ काली से चेतना के इसी सर्वोच्च शिखर पर मिले थे। ऐसा होने पर समाधि सहज सम्भव होती है। क्योंकि जो प्रभु अर्पित है-जो ईश्वर की शरण में हैं, उनके लिए सब कुछ भगवान् स्वयं करते हैं। समाधि तो इस क्रम में बहुत ही सामान्य बात है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 सिद्धान्तों और व्यवहार कुशलता में सामञ्जस्य हो

एक जंगल में एक महात्मा रहा करते थे। वे नित्य अपने शिष्यों को उपदेश दिया करते थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश दिया कि सर्वप्राणियों में परमात्मा का निवास है। अतः सभी का सम्मान करो और नमन करो। एक दिन उनका एक शिष्य बन में लकड़ियाँ लेने गया। उस दिन वहाँ यह शोर मचा हुआ था कि जंगल में एक पागल हाथी घूम रहा है। उससे बचने के लिए भागो। शिष्य ने सोचा कि हाथी में भी तो परमात्मा का निवास है मुझे क्यों भागना चाहिए। वह वहाँ ही खड़ा रहा। हाथी उसी की ओर चला आ रहा था। लोगों ने उसे भागने को कहा किन्तु वह टस से मस नहीं हुआ। इतने में हाथी पास में आया और उसे सूँड़ से पकड़कर दूर फेंक दिया। शिष्य चोट खाकर बेहोश हो गया। यह खबर गुरु को लगी तो वे उसे तलाश करते हुए जंगल में पहुँचे। कई शिष्यों ने उसे उठाया और आश्रम में ले आये और आवश्यक चिकित्सा की तब कहीं शिष्य होश में आया। एक शिष्य ने कुछ समय बाद उससे पूछा “क्यों भाई जब पागल हाथी तुम्हारी ओर आ रहा था तो तुम वहाँ से भागे क्यों नहीं?” उसने कहा—

“गुरुजी ने कहा था कि सब भूतों में नारायण का वास है यही सोचकर मैं भागा नहीं वरन् खड़ा रहा।” गुरुजी ने कहा “बेटा हाथी नारायण आ रहे थे यह ठीक है किन्तु अन्य लोगों ने जो भी नारायण ही थे तुम्हें भागने को कहा तो क्यों नहीं भागे?”

सब भूतों में परमात्मा का वास है यह तो ठीक है किन्तु मेल−मिलाप भले और अच्छे आदमियों से ही करना चाहिए। व्यावहारिक जगत में साधु−असाधु, भक्त −अभक्त , सज्जन-दुर्जनों का ध्यान रखकर व्यवहार व सम्बन्ध रखना चाहिए। जैसे किसी जल से भगवान की पूजा होती है, किसी से नहा सकते हैं, किसी से कपड़ा धोने एवं बर्तन माँजने का ही काम चलाते हैं। किसी जल को व्यवहार में ही नहीं लाते। वैसे जल देवता एक ही है। इसी प्रकार संसार में भी व्यवहार करना चाहिए।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1962  

शनिवार, 24 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५५)

समर्पण से सहज ही मिल सकती है—सिद्घि

सिद्घ योगियों द्वारा अपनाये गये इस पथ पर प्रकाश ही प्रकाश है। प्रकाशित पथ पर भी अन्धी आँखों वाले ठोकर खाते रहते हैं। यह अड़चन तब आती है-जब अपने आँखें तो होती हैं, पर पथ पर अँधेरा होता है। ऐसी स्थिति में बस भटकन ही गले पड़ती है।     
    
वस्तुतः आध्यात्मिक जीवन में तीन आँखों की जरूरत पड़ती है। इसमें पहला नेत्र है-आध्यात्मिक जीवन के प्रति निष्कपट जिज्ञासा। ऐसी जिज्ञासा वाले ही इस पथ पर चलने के लिए उत्सुक होते हैं। दूसरा नेत्र है-प्रचण्ड संकल्प। ऐसा संकल्प जगने पर ही अन्तर्यात्रा पर पहला कदम पड़ता है। यात्रा अविराम रहे, इसके लिए तीसरे नेत्र यानि भावभरी श्रद्धा की जरूरत पड़ती है।
    
भावभरी श्रद्धा के महत्त्व को अन्तर्यात्रा विज्ञान के महानतम वैज्ञानिक महर्षि पतंजलि भी स्वीकारते हैं। यह सत्य है कि संकल्प की ऊर्जा जिसकी जितनी है, वह उसी क्रम में अपनी साधना में सफल होगा। महासंकल्पवान् प्रचण्ड संकल्प के धनी अपने साधना पथ पर तीव्र गति से चलने में समर्थ होते हैं। संकल्प की इस ऊर्जा का स्रोत साधक का सूक्ष्म शरीर होता है। जिसका सूक्ष्म शरीर जितना प्रखर और पवित्र होता है, उसके संकल्प उतने ही ऊर्जावान् होते हैं। लेकिन इसके अलावा भी एक मार्ग है-क्या? इस प्रश्न के समाधान में महर्षि कहते हैं-

ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥ १/२३॥
शब्दार्थ-वा= इसके सिवा; ईश्वरप्रणिधानात्=ईश्वर प्रणिधान से भी (समाधि में सफलता मिल सकती है)।
अर्थात् सफलता उन्हें भी उपलब्ध होती है, जो ईश्वर के प्रति समर्पित होते हैं।
    
महर्षि का यह सूत्र ‘गागर में सागर’ की तरह है। रत्नाकर कहे जाने वाले सागर में जितने रत्न भण्डार है, वे सभी इस सूत्र की गागर में है। ईश्वर समर्पण में बड़े ही गहन भाव समाये हैं। साधक इनके विस्तार का इसी से अनुमान कर सकते हैं कि आध्यात्मिक जगत् की दो महादुर्लभ विभूतियों महर्षि शाण्डिल्य एवं देवर्षि नारद ने इन पर अलग-अलग सूत्र लिखे हैं। शाण्डिल्य भक्ति सूत्र एवं नारद भक्ति सूत्र इन दोनों ग्रन्थों का आध्यात्मिक साहित्य में अनूठा स्थान है। यदि सार-संक्षेप में स्थिति बयान करें तो ये दोनों ही सूत्र ग्रन्थ-महर्षि पतंजलि के इस सूत्र की सरस व्याख्या भर है। यदि भगवान् महाकाल-परम बोधमय गुरुदेव की करुणा हुई, तो जिज्ञासु इस सत्य पर अनुभव भविष्य में कर सकेंगे।
    
अभी यहाँ पर तो इस सूत्र के विज्ञान का विवेचन ही अपेक्षित है। ईश्वर प्रणिधान या प्रभु को भावभरा समर्पण साधक की सघन श्रद्धा से ही सम्भव होता है। श्रद्धा है, तो ही समर्पण की बात बनेगी। श्रद्धा के अभाव में भला समर्पण की सम्भावनाएँ कहाँ। श्रद्धा और समर्पण ये दोनों ही आध्यात्मिक साहित्य में सुपरिचित शब्द हैं, परन्तु कम ही साधक होंगे, जो इनकी वैज्ञानिक स्थिति से परिचित होंगे। जबकि इनके विज्ञान को जानने वाला ही श्रद्धा के आध्यात्मिक प्रयोग कर सकता है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से अपरिचित व्यक्ति के लिए ‘श्रद्धा’ या तो केवल एक शब्द है अथवा फिर कोरी भावुकता का दूसरा नाम।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५४)

चाहत नहीं, तड़प जगे 
    
यह साधना की गति के अनुसार ही होगा। इस संदर्भ में परम पूज्य गुरुदेव का एक कथन बड़ा ही बोधप्रद है। एक बार परस्पर की चर्चा में किसी शिष्य ने उनसे जानना चाहा कि गुरुदेव साधना से सिद्धि के बीच कितने समय का फासला है। उन्होंने जवाब दिया- बेटा! यह तो फासला तय करने वाले पर निर्भर है। इसी के साथ उन्होंने उससे एक प्रतिप्रश्न किया- अच्छा, चल तू यह बता कि हरिद्वार से रामेश्वरम् कितनी देर में पहुँचा जा  सकता है। पास बैठे शिष्य ने कहा- गुरुदेव लगभग तीन-चार दिन लग सकते हैं। बस-ट्रेन बदलते हुए इतना समय तो लग ही जाएगा। क्यों, यह समय कम-ज्यादा भी तो हो सकता है। इस वाक्य के साथ ही उन्होंने अपनी बात का खुलासा किया। यदि अपना सफर हवाईजहाज या हेलीकाप्टर से तय करें, तो यह समय अपने आप ही कम हो जाएगा। इसके विपरीत यदि सफर पैदल तय किया जाय, तो यह समय कई गुना बढ़ जाएगा।
    
सुनने वाले को गुरुदेव की बात का मर्म समझ में आ गया। पर अभी वह इसे और भी स्पष्ट करना चाहते थे। सो उन्होंने कहा- बेटा! साधना से सिद्धि का सफर इस पर निर्भर करता है कि साधना के कर्म, विचार व भाव में त्वरा एवं तीव्रता कितनी है। जिनकी गति मन्द है, उनके लिए यह फासला जन्मों लम्बा हो सकता है। जिनकी गति मध्यम है, वे घिसते, पिटते जीवन के अन्तिम छोर में सिद्धि के दर्शन कर पाएँगे। पर कुछ ऐसे भी महावीर, परम पराक्रमी होते हैं, जो अपने विचार एवं भाव तीर की तरह बना लेते हैं और इन्हें कर्म के धनुष पर चढ़ाकर इस गति से लक्ष्य की ओर बढ़ाते हैं कि सिद्धि मिलने में देर नहीं लगती। ऐसों के लिए जीवन का हर पल, हर क्षण, हर कर्म, हर विचार, हर भाव साधना का ही पर्याय बन जाता है। इनके लिए कुछ भी-कहीं भी असम्भव नहीं है। जो सच्चे साधक हैं, वे इस सच्चाई को अनुभव करते हैं कि गुनगुने-गुनगुने होकर रहने का नाम तप नहीं है। यह तो खौलते हुए, उबलते हुए जीने का नाम है। ऐसे व्यक्ति अपने स्थूलता जीवन की सीमाएँ लाँघ कर पलक झपकते सूक्ष्म व कारण के द्वार खोल लेता है।
    
परम पूज्य गुरुदेव की इन बातों को सुनकर सुनने वाले को स्वामी विवेकानन्द के जीवन की एक घटना का स्मरण हो आया। स्वामी जी अपने एक भाषण में बता रहे थे कि यदि कोई अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का समग्र नियोजन कर सके, तो छह मास के भीतर आत्मज्ञान पाया जा सकता है। इस भाषण को सुनने वाले अनेकों थे। सभी ने इस वाक्य को अपने-अपने ढंग से सुना। कइयों ने तो इसे सुनकर भी अनसुना कर दिया। एक व्यक्ति ऐसा भी था, जिसे इस वाक्य में महावाक्य का बोध नजर आया। वह उठकर खड़ा हुआ और बोला- स्वामी जी, इज़ इट पासिबल? स्वामी जी का उत्तर था- यस इट इज़।
    
बस, उसने वहीं खड़े-खड़े उन्हें प्रणाम किया। और उस प्रवचन सभा से अपने कदम बढ़ाए। उसके मुख मण्डल पर संकल्प एवं समर्पण का मिश्रित तेज था। इस तेज को उस समय स्वामी जी को छोड़कर कोई नहीं देख पाया। दूसरों ने जो देखा, वह केवल इतना भर था कि वह व्यक्ति फिर अगले दिनों प्रवचन सभाओं में दिखाई नहीं पड़ा। रोज आने वाले लोग उसे भूल भी गए। इस क्रम में छह मास कब बीते पता ही न चला। हाँ, इस अवधि के बीतते-बीतते वह स्वयं एक दिन आ पहुँचा। अब की बार उसके मुख का आत्म ज्योति प्रकाशित थी। उसे देखते ही स्वामी जी ने उसे अपनी बाँहों में ले लिया और बोले- स्टर्डी, आफ्टर ऑल यू डिड दिस। हाँ स्वामी आपके आशीष से यह हो सका—ई.टी. स्टर्डी का उत्तर था। तो आपकी साधना से सिद्धि की समय अवधि आप पर निर्भर है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५३)

चाहत नहीं, तड़प जगे 

योग के मार्ग पर नया-नया चलना आरम्भ किये  साधकों के लिए यह समाधि का महाद्वार खुल जाना सहज नहीं है। उनकी कतिपय आदतें, अतीत के संस्कार, पुरातन प्रवृत्तियाँ यह स्थिति पनपने नहीं देती। उनमें चाहत तो जगती है, लेकिन थोड़े ही दिनों में धूमिल और धुँधली होकर बिखर जाती है। ऐसों को समाधान कैसे मिले? इस यक्ष प्रश्न के समाधान में महर्षि बताते हैं-

मृदुमध्याधिमात्रात्वात्ततोऽपिविशेषः॥ १/२२॥
शब्दार्थ- मृदुमध्याधिमात्रत्वात्= साधना की मात्रा हलकी, मध्यम और उच्च होने के कारण; ततः= तीव्र संवेग वालों में; अपि= भी; विशेषः= (काल का) भेद हो जाता है।
    
अर्थात् योग साधना के प्रयास की मात्रा मृदु, मध्यम और उच्च होने के अनुसार सफलता की सम्भावना अलग-अलग होती है।
    
इस सूत्र में कई उलझी हुई गुत्थियों का समाधान है। जो साधक हैं, साधना करते हैं, उनके लिए इस समाधान को जानना जरूरी है। इस समाधान की पहली बात यह है कि साधना के लिए अपने आप का समग्र नियोजन जरूरी है। आधे-अधूरेपन से, ढीले-ढाले ढंग से काम चलने वाला नहीं है; पर साथ ही एक आश्वासन भी है। यह आश्वासन उनके लिए है, जिनकी साधना में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जिनकी मनोभूमि अभी समग्र रूप से साधना के लिए नियोजित नहीं हुई है। ऐसे साधक जिनकी साधना कभी हल्की चलती है, तो कभी उसकी गति मध्यम हो जाती है। फिर कभी यकायक उसमें तीव्रता आ जाती है। इस उलट-पुलट की स्थिति से गुजरने वालों को महर्षि भरोसा दिलाते हैं कि द्वार तुम्हारे लिए भी खुलेंगे, पर इसमें समय लग सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५२)

तीव्र प्रयासों से मिलेगी, समाधि में सफलता

परम पूज्य गुरुदेव इस बारे में एक कहानी सुनाते थे। एक साधु थे बनारस में, नाम था हरिबाबा। उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा कि मैं बहुत जप-तप करता हूँ, पर सब अकारण जाते हैं। भगवान् है भी या नहीं मुझे संदेह होने लगा है। हरिबाबा ने इस बात पर जोर का ठहाका लगाया और बोले- चल मेरे साथ आ, थोड़ी देर गंगा में नाव चलायेंगे और तेरे सवाल का जवाब भी मिल जायेगा।
    
बाढ़ से उफनती गंगा में हरिबाबा ने नाव डाल दी। उन्होंने पतवार उठाई, पर केवल एक। नाव चलानी हो तो दोनों पतवारें चलानी होती हैं, पर वह एक ही पतवार से नाव चलाने लगे। नाव गोल-गोल चक्कर काटने लगी। शिष्य तो डरा-पहले तो बाढ़ से उफनती गंगा उस पर से गोल-गोल चक्कर। वह बोला-अरे आप यह क्या कर रहे हैं, ऐसे तो हम उस किनारे कभी भी न पहुँचेंगे। हरिबाबा बोले- तुझे उस किनारे पर शक आता है या नहीं? शिष्य बोला-यह भी कोई बात हुई, जब यह किनारा है तो दूसरी भी होगा। आप एक पतवार से नाव चलायेंगे, तो नाव यूँ ही गोल चक्कर काटती रहेगी। यह एक दुष्चक्र बनकर रह जायेगी।
    
हरिबाबा ने दूसरी पतवार उठा ली। अब तो नाव  तीर की तरह बढ़ चली। वह बोले-मैं तुझसे भी यही कह रहा हूँ कि तू जो परमात्मा की तरफ जाने की चेष्टा कर रहा है-वह बड़ी आधी-अधूरी है। एक ही पतवार से नाव चलाने की कोशिश हो रही है। आधा मन तेरा इस किनारे पर उलझा है, आधा मन उस किनारे पर जाना चाहता है। तू आधा-आधा है। तू बस यूँ ही कुनकुना सा है। जबकि साधना में साधक की जिन्दगी खौलती हुई होनी चाहिए।
    
गुरुदेव कहते थे- साधना भी और वासना भी, बस आधा-आधा हो गया। यह आधापन छोड़ना ही पड़ेगा। साधना करनी है, तो पूरी साधना करो। तीव्र, प्रगाढ़ और सच्ची। साधक की साधना धुएँ से घुधुँआती आग नहीं, धधकती हुई ज्वालाएँ होनी चाहिए। साधना जिस किसी तरह न करके उसे तीव्रतम और प्रचण्डतम होना चाहिए। कुछ इस तरह जैसा कि शायर ने कहा है-
लज्जते-काम और तेज करो
तल्खि-ए जाम और तेज करो
जेरे दीवार आँच कम-कम है
शोला-ए बाम और तेज करो
उस तपिश को जो खूँ रुलाती है
सहर-ओ-शाम और तेज करो
परा-तक्पीले-पुख्ताकशी-ए शौक
हवसे-खाम और तेज करो
हम पे हो जाये खत्म नाकामी
सई-ए नाकाम और तेज करो
ज्वदा खुद ही है साजिशे खमो पेच
साजिशे गाम और तेज करो
सुस्त-गामी हमें पसन्द नहीं
रक्से अय्याम और तेज करो
गर्दिशे वक्त ले न डूबे कहीं
गर्दिशे-जाम और तेज करो॥
    
बड़ी ही प्रेरणाप्रद हैं ये पंक्तियाँ। जो इसके मूल को नहीं समझ पा रहे हैं, उनके लिए इसका संक्षिप्त भाव है कि अपने प्रयासों में तेजी लाओ, समग्रता लाओ। अगर  इच्छा की है, तो इच्छा के स्वाद को और तीव्र करो। अगर उस तरफ बढ़े ही हो, तो फिर डरो मत तिक्त स्वाद से। उन्माद की परिपक्वता के लिए-पागलपन पूरा होना चाहिए। कच्ची चाहत से काम चलने वाला नहीं है; चाहत पक्की होनी चाहिए। भला ऐसे धीरे-धीरे क्या चलना? एक पाँव इधर, तो एक पाँव उधर। समय के नृत्य को और तेज करो। अब समय ज्यादा नहीं है, चूको मत- जल्दी करो तेजी लाओ। साधना अपनी पूरा त्वरा पर ही होनी चाहिए। सौ डिग्री पर पानी उबलता है, तो भाप बन पाता है। साधना भी जब सौ प्रतिशत होती है, तो अहंकार विलीन हो जाता है। सम्पूर्णता में पहुँचना ही होगा। इसके सिवा कोई अन्य मार्ग नहीं है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

👉 संसार और स्वप्न

एक किसान था। उसके एक लड़का था। और कोई सन्तान न थी। वह लड़के को बड़ा प्यार करता था और खूब लाड़ से पालन पोषण करता। एक दिन वह खेत पर काम कर रहा था तो उसे लोगों ने खबर दी कि तुम्हारा लड़का बड़ा बीमार है। उसकी हालत बहुत खराब है। किसान घर पर पहुँचा तो देखा लड़का मर चुका है। घर में स्त्रियाँ रोने लगी, पड़ोसिनें भी उस होनहार लड़के के लिए रोती हुई आईं। किन्तु किसान न रोया न दुःखी हुआ। वह शान्त चित्त से उसके अन्तिम संस्कार की व्यवस्था करने लगा। स्त्री कहने लगी “कैसा पत्थर का कलेजा है आपका, एकमात्र बच्चा था वह मर जाने से भी आपका दिल नहीं दुखा? थोड़ी देर बाद में किसान ने स्त्री को बुलाकर कहा देखो रात को मैंने एक स्वप्न देखा था। उसमें मैं राजा बन गया। मेरे सात राजकुमार थे जो बड़े ही सुन्दर और वीर थे। प्रचुर धन सम्पत्ति थी। सुबह आँखें खुलते ही देखा तो सब नष्ट। अब तुम ही बताओ कि उन सात पुत्रों के लिए रोऊं या इसके लिए। यह कहते हुए अपनी स्त्री को भी समझाया।

ज्ञानियों के लिए जैसा स्वप्न है वैसा ही यह दृश्य जगत। यह भी स्वप्नवत है, यह जानकर ज्ञानी लोग इसके हानि लाभ से प्रभावित नहीं होते और अपनी सदा एक रस, सत्य नित्य रहने वाली आत्म स्थिति में स्थिर रहते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1962  

👉 कुढ़न की असाध्य बीमारी

कुढ़न एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं। आपकी स्थिति को दूसरों की तुलना से हीन मानकर कितने ही व्यक्ति असन्तोष में कुढ़ते रहते हैं। पुरुषार्थ के अभाव में प्रयत्नपूर्वक वे उस ऊँची स्थिति तक पहुँचने का साहस तो करते नहीं, उलटे जो आगे बढ़े हुए हैं उनमें ईर्ष्या करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि यदि आगे बढ़े हुए की टाँग पकड़ कर पीछे घसीट लिया जाय या आगे बढ़ने से रोक दिया जाय तो विषमता की स्थिति दूर हो सकती है। ईर्ष्या में यही भाव छिपा रहता है। 

दूसरों की प्रशंसा या बढ़ती सहन न कर सकने में ईर्ष्यालु की महत्वाकाँक्षा छिपी रहती है। वह अपने से बड़े समझे जाने वालों की तुलना में अपने को हीन समझा जाना पसन्द नहीं करता। इस कमी को प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा स्वयं उन्नति करके पूरा किया जा सकता है, पर इस कठिन मार्ग पर चलने की अपेक्षा लोग ठीक समझते हैं कि आगे बढ़े हुओं को घसीटा जाय, उनकी निन्दा की जाय या हानि पहुँचाई जाय। ईर्ष्यालु लोग ऐसा ही कुछ किया करते हैं। कुछ आगे बढ़े हुए लोग अपने से छोटों को बढ़ते नहीं देखना चाहते। वे सोचते हैं यह यदि बढ़कर मेरी बराबर आ जावेंगे तो फिर मेरी क्या विशेषता रहेगी? इसलिए बढ़ते हुओं को ऊपर उठने से पहले ही दबा देना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५१)

तीव्र प्रयासों से मिलेगी, समाधि में सफलता

समाधि की अवस्था को पाने के लिए पूर्व वर्णित तत्वों एवं सत्यों का जीवन में तीव्रतर होते जाना जरूरी है। सारा सुफल इस तीव्रता का ही है। महर्षि कहते हैं-
तीव्रसंवेगानामासन्नः॥ १/२१॥
शब्दार्थ- तीव्रसंवेगानाम् = जिनके साधन की गति तीव्र है, उनकी (समाधि); आसन्नः = शीघ्र (सिद्ध) होती है।
अर्थात् समाधि की सफलता उनके निकटतम होती है, जिनके प्रयास तीव्र, प्रगाढ़ और सच्चे होते हैं।
    
महर्षि के इस सूत्र में अनगिनत योग साधकों की सभी शंकाओं, समस्याओं, संदेहों एवं जिज्ञासाओं का समाधान है। इन पंक्तियों को पढ़ने वाले साधकों के मन में कभी न कभी यह बात अंकुरित हो जाती है कि इतने दिन हो गये साधना करते, बरस बीत गये गायत्री जपते, अथवा साल गुजर गये ध्यान करते, पर कोई परिणाम नहीं प्रकट हुआ। वह बात नहीं पैदा हुई जो सारे अस्तित्व को झकझोर कर कहें कि देखो यह है साधना का चमत्कार और जब ऐसा नहीं होता है, तो कई परमात्मा पर ही शक करने लगते हैं। मजे की बात यह है कि उन्हें अपने पर शक नहीं होता-मेरी साधना में कहीं कोई भूल तो नहीं? नाव ठीक नहीं चलती, तो मेरी पतवारें गलत तो नहीं है? दूसरा किनारा है या नहीं, इस पर संदेह होने लगता है। 
    
मगर ध्यान रहे, जिस नदी का एक किनारा है, दूसरा दिखाई पड़े या न पड़े, होगा ही, बल्कि है ही। कोई नदी एक किनारे की नहीं होती। उस दूसरे किनारे का नाम समाधि है, इस किनारे का नाम संसार है। संसार और समाधि के किनारों के बीच जीवन की यह अन्तःसलिला, यह गंगा बह रही है। अगर ठीक से नाव चलाई जाय, सही ढंग से साधना की जाय, तो समाधि निश्चित है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५०)

इस जन्म में भी प्राप्य है—असम्प्रज्ञात समाधि

बस इसके लिए श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि एवं प्रज्ञा को अपने में जगाना होगा। ध्यान रहे, यह जागरण क्रम से होता है। जो श्रद्धावान् है, वही अगले क्रम में वीर्यवान् होगा। वीर्यवान्, स्मृतिवान् बनेगा। और स्मृतिवान् क्रमिक रूप से समाधि के सत्य को जानेगा और प्रज्ञा को उपलब्ध होगा। योग जीवन का, साधना जीवन का सबसे पहला तत्त्व श्रद्धा है। श्रद्धा शब्द से प्रत्येक अध्यात्म प्रेमी परिचित हैं। श्रद्धा के बारे में पर्याप्त कहा-सुना एवं पढ़ा-लिखा जाता है। लेकिन यह शब्दोच्चार भर पर्याप्त नहीं है। जरूरत कुछ ज्यादा की है। श्रद्धा का सत्य एवं मर्म जब तक जिन्दगी में नहीं उतरता, तब तक बात नहीं बनेगी। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे- श्रद्धा अस्तित्व के गहनतम क्षेत्र कारण शरीर में जन्मती एवं पनपती है। श्रद्धा के तरंगित होने पर समूचा अस्तित्व तरंगित होता है। जिसके प्रति श्रद्धा है- उसके प्रति समूचा व्यक्तित्व, अपना सारा अस्तित्व अपने आप ही उमड़ने लगता है। सार रूप में श्रद्धा का प्रारम्भ समग्र समर्पण का प्रारम्भ है। इसकी चरम परिणति में साधक का अस्तित्व स्वयं ही साध्य में विलीन हो जाता है। साधना के प्रति श्रद्धा का जन्म होते ही वीर्य अर्थात् साहसिक प्रयत्न प्रारम्भ हो जाते हैं। श्रद्धा हुई इसकी पहचान भी यही है। निष्क्रिय, निठल्ली एवं निकम्मी भावनाओं को कभी भी श्रद्धा का नाम नहीं दिया जा सकता।
    
यदा-कदा यह भी देखा जाता है कि श्रद्धा के नाम पर लोग अपने आलस्य को प्रश्रय देते हैं, पर यथार्थ स्थिति इसके विपरीत है। श्रद्धा व्यक्ति में चरम साहस को जन्म देती है। युगऋषि गुरुदेव के शब्दों में यह चरम साहस ही वीर्य है। गुरुदेव के अनुसार साधना के सन्दर्भ में वीर्य का सच्चा अर्थ यही है। जो परम साहसी नहीं है, वह साधक नहीं हो सकता। रक्त की बूँद तक, प्राण के अन्तिम कण तक, जीवन के अन्तिम क्षण तक जो साहस करते हैं, वही सच्चे साधक होने का गौरव हासिल करते हैं। ऐसे प्रयत्न से ही स्मृति का जागरण होता है। मालूम पड़ता है, अहसास जगता है कि मैं कौन हूँ। पहले यह स्मृति धुंधली हल्की होती है। परन्तु साधक के साहसिक प्रयत्न ज्यों-त्यों सघन होते जाते हैं, त्यों-त्यों स्पष्ट रीति से स्मृति जगने लगती है।
    
ध्यान रहे, स्मृति का अर्थ याददाश्त तक सिमटा नहीं है। स्मृति का अर्थ तो होश जगना है। स्वयं अपने बारे में सार्थक अहसास होना है। अस्तित्व की गहराइयों में अपने सच्चे स्वरूप की झलक मिलना है। यह झलक साधना को प्रगाढ़ करती है। साधक के प्रयत्नों में और भी तीव्रता एवं त्वरा पैदा होती है। स्मृति की झलकियों में जब मन तदाकार होने लगता है, तब समाधि प्रस्फुटित होती है। यह भावदशा है, जब साधक अपनी साधना में पूरी तरह डूब जाता है। साधक, साधना एवं साध्य तीनों आपस में घुल-मिल जाते हैं। यही से जीवन रूपान्तरित होना शुरू होता है। अन्तरतम में बदलाव के स्वर फूटते हैं। समाधि में साधक की चेतना समग्र, सम्पूर्ण एवं प्रकाशित होती है और इसी बिन्दु पर प्रज्ञा प्रकट होती है। बोध के स्वर जन्म लेते हैं। सत्य समझ में आता है। जन्म-जन्मान्तर के बन्धन खुलते हैं। वासना-तृष्णा-अहंता तीनों ही ग्रन्थियाँ खुलने लगती है। बड़ी ही अपूर्व अवस्था है यह। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

👉 परदोष दर्शन भी एक बड़ा पाप है

गाँव के बीच शिव मन्दिर में एक संन्यासी रहा करते थे। मंदिर के ठीक सामने ही एक वेश्या का मकान था। वेश्या के यहाँ रात−दिन लोग आते−जाते रहते थे। यह देखकर संन्यासी मन ही मन कुड़−कुड़ाया करता। एक दिन वह अपने को नहीं रोक सका और उस वेश्या को बुला भेजा। उसके आते ही फटकारते हुए कहा—‟तुझे शर्म नहीं आती पापिन, दिन रात पाप करती रहती है। मरने पर तेरी क्या गति होगी?”

संन्यासी की बात सुनकर वेश्या को बड़ा दुःख हुआ। वह मन ही मन पश्चाताप करती भगवान से प्रार्थना करती अपने पाप कर्मों के लिए क्षमा याचना करती।

बेचारी कुछ जानती नहीं थी। बेबस उसे पेट के लिए वेश्यावृत्ति करनी पड़ती किन्तु दिन रात पश्चाताप और ईश्वर से क्षमा याचना करती रहती।

उस संन्यासी ने यह हिसाब लगाने के लिए कि उसके यहाँ कितने लोग आते हैं एक−एक पत्थर गिनकर रखने शुरू कर दिये। जब कोई आता एक पत्थर उठाकर रख देता। इस प्रकार पत्थरों का बड़ा भारी ढेर लग गया तो संन्यासी ने एक दिन फिर उस वेश्या को बुलाया और कहा “पापिन? देख तेरे पापों का ढेर? यमराज के यहाँ तेरी क्या गति होगी, अब तो पाप छोड़।”

पत्थरों का ढेर देखकर अब तो वेश्या काँप गई और भगवान से क्षमा माँगते हुए रोने लगी। अपनी मुक्ति के लिए उसने वह पाप कर्म छोड़ दिया। कुछ जानती नहीं थी न किसी तरह से कमा सकती थी। कुछ दिनों में भूखी रहते हुए कष्ट झेलते हुए वह मर गई।

उधर वह संन्यासी भी उसी समय मरा। यमदूत उस संन्यासी को लेने आये और वेश्या को विष्णु दूत। तब संन्यासी ने बिगड़कर कहा “तुम कैसे भूलते हो। जानते नहीं हो मुझे विष्णु दूत लेने आये हैं और इस पापिन को यमदूत। मैंने कितनी तपस्या की है भजन किया है, जानते नहीं हो।”

यमदूत बोले “हम भूलते नहीं, सही है। वह वेश्या पापिन नहीं है पापी तुम हो। उसने तो अपने पाप का बोध होते ही पश्चाताप करके सच्चे हृदय से भगवान से क्षमा याचना करके अपने पाप धो डाले। अब वह मुक्ति की अधिकारिणी है और तुमने सारा जीवन दूसरे के पापों का हिसाब लगाने की पाप वृत्ति में, पाप भावना में जप तप छोड़ छाड़ दिए और पापों का अर्जन किया। भगवान के यहाँ मनुष्य की भावना के अनुसार न्याय होता है। बाहरी बाने या दूसरों को उपदेश देने से नहीं। परनिन्दा,छिद्रान्वेषण, दूसरे के पापों को देखना उनका हिसाब करना, दोष दृष्टि रखना अपने मन को मलीन बनाना ही तो है। संसार में पाप बहुत है, पर पुण्य भी क्या कम हैं। हम अपनी भावनाऐं पाप, घृणा और निन्दा में डुबाये रखने की अपेक्षा सद्विचारों में ही क्यों न लगावें?

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1962  

👉 आवेश और अधीरता

जरा सी प्रतिकूलता को सहन न कर सकने वाले आवेशग्रस्त, उत्तेजित, अधीर और उतावले मनुष्य सदा गलत सोचते और गलत काम करते हैं। उत्तेजना एक प्रकार का दिमागी बुखार है। जिस प्रकार बुखार आने पर देह का सारा कार्यक्रम लड़खड़ा जाता है उसी प्रकार आवेश आने पर मस्तिष्क की विचारणा एवं निर्णय में कोई व्यक्ति सही निर्णय नहीं कर सकता। आवेशग्रस्त मनुष्य प्रायः न करने योग्य ऐसे काम कर डालते हैं जिनके लिए पीछे सदा पश्चाताप ही करते रहना पड़ता हैं। आत्महत्याऐं प्रायः इन्हीं परिस्थितियों में होती हैं। कहनी अनकहनी कह बैठते हैं। मारपीट, गाली-गलौज, लड़ाई-झगड़े, कत्ल आदि के दुखद कार्य भी उत्तेजना के वातावरण में ही बन पड़ते हैं। अधीरता भी एक प्रकार का आवेश ही है। बहुत जल्दी मनमानी सफलता अत्यन्त सरलतापूर्वक मिल जाने के सपने बाल बुद्धि के लोग देखा करते हैं वे यह नहीं सोचते कि महत्वपूर्ण सफलताऐं तब मिला करती हैं जबकि व्यक्ति श्रमशीलता, पुरुषार्थ, साहस, धैर्य एवं सद्गुणों की अग्नि परीक्षा में गुजर कर अपने आपको उसके उपयुक्त सिद्ध कर देता है। जल्दीबाजी में बनता कुछ नहीं, बिगड़ता बहुत कुछ है। इसलिए धैर्य को सन्तुलन और शान्ति को एक श्रेष्ठ मानवीय गुण माना गया है। कठिनाइयों से हर किसी को पाला पड़ता है, विघ्नों से रहित कोई काम नहीं। तुर्त−फुर्त सफलता किसे मिली है, किसके सब साथी सज्जन और सद्गुणी होते हैं?

हर समझदार आदमी को सहनशीलता, धैर्य और समझौते का मार्ग अपनाना पड़ता है। जो प्राप्त है उसमें प्रसन्नता अनुभव करते हुए अधिक के लिए प्रयत्नशील रहना बुद्धिमानी की बात है पर यह परले सिरे की मूर्खता है कि अपनी कल्पना के अनुरूप सब कुछ न मिल जाने पर मनुष्य खिन्न, दुखी और असंतुष्ट ही बना रहे। सबकी सब इच्छाऐं कभी पूरी नहीं हो सकती। अधूरे में भी जो सन्तोष कर सकता है उसी को इस संसार में थोड़ी सी प्रसन्नता उपलब्ध हो सकती है। अन्यथा असंतोष और तृष्णा की आग में जल मरने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं हैं। अधीर, असंतोष और महत्वाकाँक्षी मनुष्य जितने दुखी देखे जाते हैं उतनी जलन, दर्द और पीड़ा से पीड़ित घायल और बीमारों को भी नहीं होती। सन्तोष का मरहम लगाकर कोई भी व्यक्ति इस जलन से छुटकारा प्राप्त कर सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४९)

इस जन्म में भी प्राप्य है—असम्प्रज्ञात समाधि


अन्तर्यात्रा के प्रयोगों को पूरे यत्न एवं गहराई के साथ अपनाने वाले साधकों के न केवल बाह्य जीवन में, बल्कि आन्तरिक जीवन में परिष्कार इस कदर होता है कि दूर संवेदन, पूर्वाभास जैसे तथ्य उनकी जिन्दगी का सहज हिस्सा बन जाते। बोध की सूक्ष्मता इस कदर बढ़ती है कि उनकी साधना के समय होने वाले अन्तदर्शन में दिव्य लोकों का वैभव सहज झलकने लगता है। यहाँ तक कि अध्यात्म जगत् की विभूतियों के रूप में लोक विख्यात महर्षियों के संकेत एवं संदेश स्वयमेव प्राप्त होने लगते हैं।
    
इस पथ पर चल रहे साधक अपने व्यावहारिक जीवन में पारस्परिक सामञ्जस्य, सम्बन्धों में सजल संवेदनाओं का विकास, कार्यकुशलता एवं कार्यक्षमता में अचरज करने जैसी प्रगति अनुभव करते हैं। तब और अब में आकाश-पाताल जैसा अन्तर दिखाई पड़ने लगता है। सच्चाई यही है कि योग साधना व्यक्ति का सम्पूर्ण व समग्र विकास करती है। व्यक्तित्व के सभी आयामों को परिष्कृत कर उनकी अचरज भरी शक्तियों को निखारती है। आन्तरिक जीवन एवं बाह्य जीवन का कायापलट कर देने वाला चमत्कार इससे सहज सम्भव होता है।
    
साधक चाहे तो क्या नहीं कर सकता। ऐसा नहीं कि जिन्होंने अपने पिछले जन्म में विदेह या प्रकृतिलय अवस्था प्राप्त कर ली, उन्हीं को यह असम्प्रज्ञात समाधि उपलब्ध होगी। सम्भावनाएँ उनके लिए भी हैं, जिन्होंने अभी इसी जन्म में, अपनी साधना का प्रारम्भ किया हैं, उनके लिए भी सम्भावनाओं के द्वार खुले हैं। पर किस तरह? इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए महर्षि कहते हैं-
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्॥ १/२०॥
शब्दार्थ-इतरेषाम् = दूसरे साधकों का (योग)। श्रद्धावीर्य स्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वकः = श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक सिद्ध होता है।
अर्थात् दूसरे जो असम्प्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं, वे श्रद्धा, वीर्य (प्रयत्न), स्मृति, समाधि और प्रज्ञा के द्वारा उपलब्ध होते हैं।
    
यह सूत्र महर्षि पतंजलि के सभी सूत्रों से कहीं अधिक मूल्यवान् है। हालाँकि दूसरों सूत्रों में भी गहरी चर्चा है, गहन चिन्तन है। इन सूत्रों में साधना के, साध्य के एवं सिद्धि के अनेकों रहस्य खुलते हैं, लेकिन इस पर भी जो बात इस सूत्र में है, वह कहीं और नहीं है, क्योंकि इस सूत्र में अपने जीवन की चरम सम्भावनाओं को साकार करने वाला सहज मार्ग बता दिया गया है। बुद्धत्व को प्रकट करने की सम्पूर्ण प्रक्रिया इस एक सूत्र में ही समझा दी गई है। बड़ी ही स्पष्ट रीति से महर्षि पतंजलि कहते हैं कि तुम भी, हाँ और कोई नहीं तुम ही, जो इन क्षणों में इस सूत्र की व्याख्या को पढ़ रहे हो इस सूत्र को पकड़कर बुद्ध बन सकते हो, पतंजलि बन सकते हो, युगऋषि आचार्य श्री के जीवन के सार को अनुभव कर सकते हो।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 The supremacy of wisdom in the Yug Nirman solemn pledge

In Yug Nirman Sat-sankalpa* (the solemn pledge for ushering in the new era of bright future for all), there is an ardent call for making wisdom excel everywhere. We should learn to make use of our wisdom to rationalize each and every thing. We should do only what is right and worth doing and adopt only that which is worth adopting. If a question crops up in our mind about what people might think or say about our out of the ordinary actions or conduct, we should recall that there are two types of people—those who are sensible and those who are senseless

The voice of a few sensible people is as powerful as that of the hordes of senseless people. There has always been dearth of sensible people in this world. There may be a very few lions compared to flocks of jackals living in a forest. However, the roar of only one lion stands out a mile among the yells and yaps of thousands of jackals. In the same way, if only a few of sensible people happen to firmly resolve to take some prudent initiatives, they can make widely prevalent badness crumble to pieces in the same way as the sunrise makes the early morning mist disappear. This need to be done and must be done to steer the capabilities and resources of the mankind into desirable positive direction.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- 66 (5.12)

शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

👉 पाप का भागी कौन—पाप किसने किया

एक ब्राह्मण ने बगीचा लगाया। उसे बड़े मनोयोगपूर्वक सम्हालता, पेड़ लगाता, पानी देता। एक दिन गाय चरती हुई बाग में आ गई और लगाये हुए कुछ पेड़ चरने लगी। ब्राह्मण का ध्यान उस ओर गया तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने एक लठ्ठ लेकर उसे जोर से मारा। कोई चोट उस गाय पर इतने जोर से पड़ी कि वह वहीं मर गई। गाय को मरा जानकर ब्राह्मण बड़ा पछताया। कोई देख न ले इससे गाय को घसीट के पास ही बाग के बाहर डाल दिया। किन्तु पाप तो मनुष्य की आत्मा को कोंचता रहता है न। उसे सन्तोष नहीं हुआ और गौहत्या के पाप की चिन्ता ब्राह्मण पर सवार हो गई।

बचपन में कुछ संस्कृत ब्राह्मण ने पढ़ी थी। उसी समय एक श्लोक उसमें पढ़ा जिसका आशय था कि हाथ इन्द्र की शक्ति प्रेरणा से काम करते हैं, अमुक अंग अमुक देवता से। अब तो उसने सोचा कि हाथ सारे काम इन्द्र शक्ति से करता है तो इन हाथों ने गाय को मारा है इसलिए इन्द्र ही गौहत्या का पापी है मैं नहीं?

मनुष्य की बुद्धि की कैसी विचित्रता है जब मन जैसा चाहता है वैसे ही हाँककर बुद्धि से अपने अनुकूल विचार का निर्णय करा लेता है। अपने पाप कर्मों पर भी मिथ्या विचार करके अनुकूल निर्णय की चासनी चढ़ाकर कुछ समय के लिए कुनैन जैसे कडुए पाप से सन्तोष पा लेता है।

कुछ दिनों बाद गौहत्या का पाप आकर ब्राह्मण से बोला—मैं गौहत्या का पाप हूँ तुम्हारा विनाश करने आया हूँ।

ब्राह्मण ने कहा—गौहत्या मैंने नहीं की, इन्द्र ने की है। पाप बेचारा इन्द्र के पास गया और वैसा ही कहा। इन्द्र अचम्भे में पड़ गये। सोच विचारकर कहा—‛अभी मैं आता हूँ।’ और वे उस ब्राह्मण के बाग के पास में बूढ़े ब्राह्मण का वेश बनाकर गये और तरह−तरह की बातें कहते करते हुए जोर−जोर से बाग और उसके लगाने वाले की प्रशंसा करने लगा। प्रशंसा सुनकर ब्राह्मण भी वहाँ आ गया और अपने बाग लगाने के काम और गुणों का बखान करने लगा। “देखो मैंने ही यह बाग लगाया है। अपने हाथों पेड़ लगाये हैं, अपने हाथों से सींचता हूँ। सब काम बाग का अपने हाथों से करता हूँ। इस प्रकार बातें करते−करते इन्द्र ब्राह्मण को उस तरफ ले गये जहाँ गाय मरी पड़ी थी। अचानक उसे देखते इन्द्र ने कहा। यह गाय कैसे मर गई। “ब्राह्मण बोला—इन्द्र ने इसे मारा है।”

इन्द्र अपने निज स्वरूप में प्रकट हुआ और बोला—‟जिसके हाथों ने यह बाग लगाया है, ये पेड़ लगाये हैं, जो अपने हाथों से इसे सींचता है उसके हाथों ने यह गाय मारी है इन्द्र ने नहीं। यह तुम्हारा पाप लो।” यह कहकर इन्द्र चले गये। गौ हत्या का पाप विकराल रूप में ब्राह्मण के सामने आ खड़ा हुआ।

भले ही मनुष्य अपने पापों को किसी भी तरह अनेक तर्क, युक्तियाँ लगाकर टालता रहे किन्तु अन्त में समय आने पर उसे ही पाप का फल भोगना पड़ता है। पाप जिसने किया है उसी को भोगना पड़ता, दूसरे को नहीं। यह मनुष्य की भूल है कि वह तरह−तरह की युक्तियों से, पाप से बचना चाहता है। अतः जो किया उसका आरोप दूसरे पर न करते हुए स्वयं को भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए।


👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४८)

विदेह एवं प्रकृतिलय पाते हैं—अद्भुत अनुदान

प्रकृतिलय की अवस्था और भी उत्कृष्ट है। प्रकृतिलय योगी का देह से नाता टूटने के साथ प्रकृति के साथ भी तादात्म्य नहीं रहता। ऐसे योग साधकों के लिए न तो देह का कुछ महत्त्व और न ही संसार का। इनके लिए न कोई अभिव्यक्ति और न ही संसार है। ऐसे योगी बस एक बार जन्म लेते हैं। उनके इस जन्म का कारण बस इतना होता है कि उन्हें अपने वचन पूरे करने हैं, बहुत सारे कर्म गिरा देने हैं। सारा पिछला बेबाक करना है। वे तो बस देते हैं, माँगते नहीं-चुकाते हैं। प्रकृतिलय योगियों की कोई भी चाहत नहीं होती। उन्हें भला चाहत कैसे हो सकती है? वे तो बस अपने दिये हुए वचनों को निभाने आते हैं। अपने किन्हीं कर्म बीजों को नष्ट करने के लिए देह धारण करते हैं।
     
परम पूज्य गुरुदेव ऐसे महान् योगियों में महर्षि रमण का नाम लेते हैं। गुरुदेव के अनुसार महर्षि को बचपन से ही प्रकृतिलय अवस्था प्राप्त हुई। देह से उनका तादात्म्य तो जैसे था ही नहीं। किशोरावस्था के लगभग जब उन्हें मृत्यु का अनुभव हुआ, तब तो उनकी दशा नितान्त भिन्न हो गयी। ऐसी भावदशा उन्हें उपलब्ध हुई कि न तो दैहिक तादात्म्य रहा और न ही प्रकृति तथा संसार का कोई नाता बचा। सत्तरह वर्ष की अवस्था में ही वह तिरुवलामल्लाई तप के लिए आ गये। उनके तप का प्रारम्भ इस जिज्ञासा से हुआ कि मैं कौन हूँ? क्यों देह नहीं हूँ, प्रकृति भी नहीं हूँ, यह सत्य उन्हें सदा से प्रत्यक्ष था। अब तो बस यात्रा को आगे बढ़ाना था। सो उन्होंने प्रयत्नपूर्वक यात्रा आगे बढ़ाई। सहज ही आत्मबोध हुआ, साथ ही कर्मबीज भी समयानुसार नष्ट होते गये। महर्षि रमण के तप के प्रभाव से समूचा देश भी प्रभावित एवं प्रकाशित हुआ।
    
विदेह एवं प्रकृतिलय अवस्था प्राप्त महायोगियों का जीवन कई अर्थों में विलक्षण व अद्भुत होता है। इस सम्बन्ध में भगवान् बुद्ध के जीवन की एक घटना बड़ी ही भाव भरी है। निर्वाण के अनुभव के बाद भी भगवान् तथागत मौन थे। मगध सम्राट् के साथ अन्य कई राज्यों के नरेश उनसे प्रार्थना कर चुके थे कि वे कुछ बोलने की कृपा करें। निर्वाण के परम अनुभव के बारे में बतायें। परन्तु भगवान् हर बार यह कहकर टाल जाते कि अभी ठीक समय नहीं आया। एक दिन अचानक तथागत ने घोषणा की कि वह पंचशाल गाँव में अपना पहला प्रवचन करेंगे। सम्राटों के आग्रह को अस्वीकार कर एक सामान्य गाँव में प्रवचन। और इस गाँव में वैसे भी कुछ ही झोपड़ियाँ थी। तथागत की घोषणा से गाँव के लोग तो जैसे उद्वेलित हो गये।
    
हर्ष एवं आश्चर्य से उद्वेलित-उत्तेजित गाँव के लोगों के बीच भगवान् बुद्ध प्रवचन हेतु पहुँच गये। सभी तैयारियाँ जैसे-तैसे पूरी की गयी। परन्तु भगवान् को जैसे अभी भी किसी की प्रतीक्षा थी। तभी एक हरिजन युवती आयी और बुद्ध ने प्रवचन प्रारम्भ किया। प्रवचन की समाप्ति के बाद लोग पूछने लगे-क्या आप इसी युवती का इन्तजार कर रहे थे? बुद्ध मुस्कराये और बोले-हाँ, मुझे इसी की प्रतीक्षा थी। मैंने इसे पिछले जन्मों की यात्रा में वचन दिया था कि महाबोधि का प्रथम अनुभव मैं सर्वप्रथम इसे बताऊँगा। बस वह वचन पूरा करना था। सो आज पूरा हुआ। ‘असम्प्रज्ञात को उपलब्ध’ व्यक्ति इसी भावदशा में जीता है, यह भावदशा जन्मान्तर की साधना के अलावा प्रयत्नपूर्वक भी इस जीवन में पायी जा सकती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 दो परस्पर विरोधी मार्ग

गुबरीले कीड़े का और भौंरे का उदाहरण स्पष्ट है। गंदा कीड़ा केवल गंदगी, गोबर और विष्ठा की तलाश में बगीचा ढूँढ़ डालता है और अपनी अभीष्ट वस्तु ढूँढ़कर ही चैन लेता है। इसके विपरीत भौंरा फूलों पर ही दृष्टि रखता है। उन्हीं पर बैठता है और सुगंधि का आनन्द लाभ करता है। उसे पता भी नहीं चलता कि इस बाग में कहीं गोबर पड़ा हुआ है भी या नहीं। बगीचे में गोबर भी पड़ा रहता है और फूल भी होते हैं पर गंदा कीड़ा अपनी मनोवृत्ति के अनुरूप चीज ढूँढ़कर अपने आपको उस गंदगी से गंदा करता है और दूसरों की दृष्टि में घृणित भी बनता है। भौंरे की मनोवृत्ति उस गन्दे कीड़े से भिन्न होती है इसलिए उसे गुलाब के सुगन्धित पुष्पों का रस भी मिलता है और कवियों द्वारा प्रशंसा का अधिकारी भी बनता है। हम में से कुछ लोग गन्दे गुबरीले कीड़े का उदाहरण बनते हैं और कुछ भौंरों के पद चिह्नों पर चलते है। इन दोनों मार्गों में से हम भी अपने लिए कोई एक मार्ग चुन सकते हैं और उसी के अनुरूप घृणित एवं उत्कृष्ट परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। छिद्रान्वेषण गन्दे गुबरीले कीड़े की मनोवृत्ति है और गुण ग्राहकता सुरुचिपूर्ण भौंरे की, जो अपने को पसंद लगे उसे आसानी से स्वभाव का अंग बना सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४७)

विदेह एवं प्रकृतिलय पाते हैं—अद्भुत अनुदान

श्रद्धा अनूठी सेतु है। हृदय में यह प्रगाढ़ हो, तो देश एवं काल की दूरियाँ भी सिमट जाती हैं। लोक-लोकान्तर के सत्य पलक झपकते ही भाव चक्षुओं के सामने आ विराजते हैं। दिव्य लोकों में तपोलीन ऋषि सत्तायें भी हृदयाकाश में प्रत्यक्ष होकर मार्गदर्शन देती हैं। यह उद्गार मात्र एक काल्पनिक विचार भर नहीं, एक जीवन्त अनुभूति है। महर्षि पतञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव का सूक्ष्म सहचर्य भी यह अनुभव करा सकती है, जिसके बाद अन्तर्यात्रा का यह पथ आनंद से कट जाता है।
    
साधकों को योगानंद का अनुभव करा रहे महर्षि पतंजलि अब बताते हैं कि असम्प्रज्ञात समाधि किसे उपलब्ध होती है? वे कहते हैं-
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १/१९॥
शब्दार्थ - विदेहप्रकृतिलयानाम् = विदेह एवं प्रकृतिलय योगियों का (उपर्युक्त योग); भवप्रत्ययः = भव प्रत्यय (जन्म होने से ही सहज प्राप्त) कहलाता है।
    
अर्थात्  विदेहियों और प्रकृतिलयों को असम्प्रज्ञात समाधि सहज ही उपलब्ध होती है। क्योंकि अपने पिछले जन्म में उन्होंने अपने शरीरों के साथ तादात्म्य बनाना समाप्त कर दिया था। वे फिर से जन्म लेते हैं, क्योंकि इच्छा के बीज बने रहते हैं।
    
विदेह एवं प्रकृतिलय बड़े ही सौन्दर्यपूर्ण शब्द हैं। इनमें आध्यात्मिक भावों का अवर्णनीय सौन्दर्य समाया है। इनमें से विदेह का अर्थ है-जो जान लेता है कि अब वह देह नहीं है। यह अनूठी स्थिति उसे असम्प्रज्ञात समाधि के बाद ही उपलब्ध होती है। असम्प्रज्ञात समाधि की विभूतियाँ तो उसे पिछले जन्म में ही प्राप्त हो चुकी। इस जन्म में तो वह प्रारम्भ से ही असम्प्रज्ञात का वैभव धारण किये हुए जन्मता है। उसे जीवन की शुरुआत से ही इस सत्य का सम्पूर्ण बोध होता है कि वह देह नहीं है। देह तो उसने सिर्फ इसलिए धारण की है कि पिछले कर्मों का हिसाब-किताब बराबर करना है। पिछले कर्म बीजों को नष्ट करना है। कर्मों का सारा खाता बराबर करना है। ऐसे विदेह योगियों का जन्म तो बस समाप्त हो रहे हिसाबों से बना होता है। हजारों जन्म, अनगिन सम्बन्ध, बहुत सारे उलझाव और वादे, हर चीज को समाप्त करना है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४६)

जिससे निर्बीज हो जाएं सारे कर्म संस्कार

परम पूज्य गुरुदेव इस भाव सत्य को अपने वचनों में कुछ यूँ प्रकट करते थे। वह कहते थे कि निष्काम कर्म करते हुए मन शुद्ध हो जाता है। विचार और भावनायें धुल जाती हैं, तो सम्प्रज्ञात समाधि की झलक मिलती है। लेकिन इस शुद्धतम अवस्था में भी मन तो बना ही रहता है, लेकिन यह जब मन ही विलीन हो जाता है, तो समझो कि असम्प्रज्ञात समाधि उपलब्ध हो गयी। पहली अवस्था में काँटे हट जाते हैं, छट जाते हैं, तो दूसरी अवस्था में फूल भी गायब हो जाते हैं।
    
असम्प्रज्ञात समाधि की यह भाव दशा बड़ी अजब-गजब है। साधारण तौर पर सामान्य मनुष्य तो इसकी कल्पना ही नहीं कर सकता। मनोलय, मनोनाश की कल्पना करना, इसमें निहित सच्चाई की अनुभूति करना अतिदुर्लभ है, क्योंकि साधारण तौर पर तो सारी की सारी जिन्दगी मन के चक्कर काटते, मन की उलझनों में उलझते बीतती है। एक विचार, एक कल्पना से पीछा नहीं छूटता कि दूसरी आ धमकती है। यही सिलसिला चलता रहता है। अनवरत-निरन्तर यही प्रक्रिया गतिशील रहती है। हाँ, यह जरूर होता है कि कभी अच्छी कल्पनायें, अच्छे विचार उपजते हैं, तो कभी बुरे विचार और बुरी कल्पनायें सताती हैं।
    
पहली समाधि की दशा जिसे सम्प्रज्ञात कहते हैं, उसमें बुराई गिर जाती है। मन की सारी अशुद्धता तिरोहित हो जाती है। दूसरी अवस्था में असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में अच्छाई भी गिर जाती है। यहाँ तक कि अच्छाई या शुद्ध अवस्था को धारण करने वाला मन भी समाप्त हो जाता है। मन की यह समाप्ति प्रकारान्तर से देह बोध की समाप्ति है। इस अवस्था में देह के पृथक होने का अहसास होता है। अभी हम कितना ही कहते रहें कि मैं अलग और मेरी देह अलग। परन्तु यह बात होती निरी सैद्धान्तिक है। अनुभूति के धरातल पर इसकी कोई कीमत नहीं है। जब तक मन रहता है, तब तक हम सदा देह से चिपके रहते हैं। देह की चाहतें, देह के सुख-दुःख हमें लुभाते या परेशान करते रहते हैं।
    
लेकिन मन के गिरने के बाद, असम्प्रज्ञात दशा में देह और दैहिक व्यवहार का संचालन मन की गहरी परत में, चित्त में दबे हुए अप्रकट संस्कार करते हैं। अतीत के कर्मबीज, विगत जन्मों का प्रारब्ध-बस इसी के द्वारा जीवन की सारी गतिविधियाँ चलती रहती हैं। ध्यान रहे, इस असम्प्रज्ञात भाव दशा में नये कर्म बीज नहीं इकट्ठे होते, क्योंकि इनको इकट्ठा करने वाला मन ही जब नहीं रहा, तो फिर ये किस तरह इकट्ठा होंगे। अब तो बस जो कुछ अतीत का लेन-देन है, उसी का समाप्त होना बाकी रह जाता है। कुछ भी नये  की कोई गुंजाइश या उम्मीद नहीं रहती है।
    
इस सत्य को हम इस तरह भी अनुभव कर सकते हैं कि हम असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा वृक्ष तो मिटा देते हैं। यहाँ तक कि उसकी जड़ें भी खोद देते हैं। फिर भी जो बीज धरती पर पड़े रह गये हैं, वे तो अभी फूटेंगे। ज्यों-ज्यों उनका मौसम आयेगा, वे अंकुरित होते चलेंगे। असम्प्रज्ञात समाधि के बावजूद जीवन और मरण का चक्र तो बना ही रहता है। हाँ, यह जरूर है कि जीवन की गुणवत्ता भिन्न होती है। लेकिन जन्म तो लेना ही पड़ेगा, क्योंकि बीज अभी जले नहीं है। जो व्यक्त था, वह तो कट चुका, परन्तु जो अव्यक्त है, वह तो अभी भी बाकी है। असम्प्रज्ञात समाधि सबीज समाधि है। इन बीजों के कारण योग साधक का जन्म होता है, जो अद्भुत होता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

👉 एक विश्वास

मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आ कर एक लिफाफा मुझे पकड़ा  दिया. लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देख कर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई.

‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे. मैं ने लिफाफा खोला तो उस में 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी. इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर. मैं ने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला. पत्र किसी परी कथा की तरह मुझे अचंभित कर गया. लिखा था :

आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं. मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा. ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है. घर पर सभी को मेरा प्रणाम.
आप का, अमर.

मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गए.

एक दिन मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलटपलट रहा था कि मेरी नजर बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी. वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनयविनय करता और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर जा कर खड़ा हो जाता. मैं काफी देर तक मूकदर्शक की तरह यह नजारा देखता रहा. पहली नजर में यह फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों द्वारा की जाने वाली सामान्य सी व्यवस्था लगी, लेकिन उस लड़के के चेहरे की निराशा सामान्य नहीं थी. वह हर बार नई आशा के साथ अपनी कोशिश करता, फिर वही निराशा.

मैं काफी देर तक उसे देखने के बाद अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया और उस लड़के के पास जा कर खड़ा हो गया. वह लड़का कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था. मुझे देख कर उस में फिर उम्मीद का संचार हुआ और बड़ी ऊर्जा के साथ उस ने मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं. मैं ने उस लड़के को ध्यान से देखा. साफसुथरा, चेहरे पर आत्मविश्वास लेकिन पहनावा बहुत ही साधारण. ठंड का मौसम था और वह केवल एक हलका सा स्वेटर पहने हुए था. पुस्तकें मेरे किसी काम की नहीं थीं फिर भी मैं ने जैसे किसी सम्मोहन से बंध कर उस से पूछा, ‘बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?’

‘आप कितना दे सकते हैं, सर?’

‘अरे, कुछ तुम ने सोचा तो होगा.’

‘आप जो दे देंगे,’ लड़का थोड़ा निराश हो कर बोला.

‘तुम्हें कितना चाहिए?’ उस लड़के ने अब यह समझना शुरू कर दिया कि मैं अपना समय उस के साथ गुजार रहा हूं.

‘5 हजार रुपए,’ वह लड़का कुछ कड़वाहट में बोला.

‘इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,’ मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था फिर भी अनायास मुंह से निकल गया.

अब उस लड़के का चेहरा देखने लायक था. जैसे ढेर सारी निराशा किसी ने उस के चेहरे पर उड़ेल दी हो. मुझे अब अपने कहे पर पछतावा हुआ. मैं ने अपना एक हाथ उस के कंधे पर रखा और उस से सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, ‘देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले तो नहीं लगते, क्या बात है. साफसाफ बताओ कि क्या जरूरत है?’

वह लड़का तब जैसे फूट पड़ा. शायद काफी समय निराशा का उतारचढ़ाव अब उस के बरदाश्त के बाहर था.
‘सर, मैं 10+2 कर चुका हूं. मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं. मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है. अब उस में प्रवेश के लिए मुझे पैसे की जरूरत है. कुछ तो मेरे पिताजी देने के लिए तैयार हैं, कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते,’ लड़के ने एक ही सांस में बड़ी अच्छी अंगरेजी में कहा.

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ मैं ने मंत्रमुग्ध हो कर पूछा?

‘अमर विश्वास.’

‘तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो. कितना पैसा चाहिए?’

‘5 हजार,’ अब की बार उस के स्वर में दीनता थी.

‘अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं तो क्या मुझे वापस कर पाओगे? इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,’ इस बार मैं ने थोड़ा हंस कर पूछा.

‘सर, आप ने ही तो कहा कि मैं विश्वास हूं. आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं. मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं, आप पहले आदमी हैं जिस ने इतना पूछा. अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया तो मैं भी आप को किसी होटल में कपप्लेटें धोता हुआ मिलूंगा,’ उस के स्वर में अपने भविष्य के डूबने की आशंका थी.

उस के स्वर में जाने क्या बात थी जो मेरे जेहन में उस के लिए सहयोग की भावना तैरने लगी. मस्तिष्क उसे एक जालसाज से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं था, जबकि दिल में उस की बात को स्वीकार करने का स्वर उठने लगा था. आखिर में दिल जीत गया. मैं ने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले, जिन को मैं शेयर मार्किट में निवेश करने की सोच रहा था, उसे पकड़ा दिए. वैसे इतने रुपए तो मेरे लिए भी माने रखते थे, लेकिन न जाने किस मोह ने मुझ से वह पैसे निकलवा लिए.

‘देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में, तुम्हारी इच्छाशक्ति में कितना दम है, लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए, इसीलिए कर रहा हूं. तुम से 4-5 साल छोटी मेरी बेटी भी है मिनी. सोचूंगा उस के लिए ही कोई खिलौना खरीद लिया,’ मैं ने पैसे अमर की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

अमर हतप्रभ था. शायद उसे यकीन नहीं आ रहा था. उस की आंखों में आंसू तैर आए. उस ने मेरे पैर छुए तो आंखों से निकली दो बूंदें मेरे पैरों को चूम गईं.

‘ये पुस्तकें मैं आप की गाड़ी में रख दूं?’

‘कोई जरूरत नहीं. इन्हें तुम अपने पास रखो. यह मेरा कार्ड है, जब भी कोई जरूरत हो तो मुझे बताना.’
वह मूर्ति बन कर खड़ा रहा और मैं ने उस का कंधा थपथपाया, कार स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी.

कार को चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने खेले जुए के बारे में सोच रहा था, जिस में अनिश्चितता ही ज्यादा थी. कोई दूसरा सुनेगा तो मुझे एक भावुक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा. अत: मैं ने यह घटना किसी को न बताने का फैसला किया.

दिन गुजरते गए. अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी. मुझे अपनी मूर्खता में कुछ मानवता नजर आई. एक अनजान सी शक्ति में या कहें दिल में अंदर बैठे मानव ने मुझे प्रेरित किया कि मैं हजार 2 हजार रुपए उस के पते पर फिर भेज दूं. भावनाएं जीतीं और मैं ने अपनी मूर्खता फिर दोहराई.

दिन हवा होते गए. उस का संक्षिप्त सा पत्र आता जिस में 4 लाइनें होतीं. 2 मेरे लिए, एक अपनी पढ़ाई पर और एक मिनी के लिए, जिसे वह अपनी बहन बोलता था. मैं अपनी मूर्खता दोहराता और उसे भूल जाता. मैं ने कभी चेष्टा भी नहीं की कि उस के पास जा कर अपने पैसे का उपयोग देखूं, न कभी वह मेरे घर आया. कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा. एक दिन उस का पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा है. छात्रवृत्तियों के बारे में भी बताया था और एक लाइन मिनी के लिए लिखना वह अब भी नहीं भूला.

मुझे अपनी उस मूर्खता पर दूसरी बार फख्र हुआ, बिना उस पत्र की सचाई जाने. समय पंख लगा कर उड़ता रहा. अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा. वह शायद आस्ट्रेलिया में ही बसने के विचार में था. मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. एक बड़े परिवार में उस का रिश्ता तय हुआ था. अब मुझे मिनी की शादी लड़के वालों की हैसियत के हिसाब से करनी थी. एक सरकारी उपक्रम का बड़ा अफसर कागजी शेर ही होता है. शादी के प्रबंध के लिए ढेर सारे पैसे का इंतजाम…उधेड़बुन…और अब वह चेक?

मैं वापस अपनी दुनिया में लौट आया. मैं ने अमर को एक बार फिर याद किया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया.

शादी की गहमागहमी चल रही थी. मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे और मिनी अपनी सहेलियों में. एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आ कर रुकी. एक संभ्रांत से शख्स के लिए ड्राइवर ने गाड़ी का गेट खोला तो उस शख्स के साथ उस की पत्नी जिस की गोद में एक बच्चा था, भी गाड़ी से बाहर निकले.

मैं अपने दरवाजे पर जा कर खड़ा हुआ तो लगा कि इस व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है. उस ने आ कर मेरी पत्नी और मेरे पैर छुए.

‘‘सर, मैं अमर…’’ वह बड़ी श्रद्धा से बोला.

मेरी पत्नी अचंभित सी खड़ी थी. मैं ने बड़े गर्व से उसे सीने से लगा लिया. उस का बेटा मेरी पत्नी की गोद में घर सा अनुभव कर रहा था. मिनी अब भी संशय में थी. अमर अपने साथ ढेर सारे उपहार ले कर आया था. मिनी को उस ने बड़ी आत्मीयता से गले लगाया. मिनी भाई पा कर बड़ी खुश थी.

अमर शादी में एक बड़े भाई की रस्म हर तरह से निभाने में लगा रहा. उस ने न तो कोई बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर डाली और न ही मेरे चाहते हुए मुझे एक भी पैसा खर्च करने दिया. उस के भारत प्रवास के दिन जैसे पंख लगा कर उड़ गए.
इस बार अमर जब आस्ट्रेलिया वापस लौटा तो हवाई अड्डे पर उस को विदा करते हुए न केवल मेरी बल्कि मेरी पत्नी, मिनी सभी की आंखें नम थीं. हवाई जहाज ऊंचा और ऊंचा आकाश को छूने चल दिया और उसी के साथसाथ मेरा विश्वास भी आसमान छू रहा था.

मैं अपनी मूर्खता पर एक बार फिर गर्वित था और सोच रहा था कि इस नश्वर संसार को चलाने वाला कोई भगवान नहीं हमारा विश्वास ही है.

👉 गुण ग्राहकता ही श्रेष्ठ है

जिनको दूसरों के गुण देखने की आदत है वे बुरे लोगों में भी चतुरता, मुस्तैदी, पुरुषार्थ, साहस आदि गुणों को देखते हैं और उनकी विशेषताओं की प्रशंसा करते हैं। यह ठीक है कि बुराइयों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए, उन्हें रोका जाना चाहिए। पर यह भी ठीक है कि किसी को निन्दा करके या चिढ़ाने से नहीं सुधारा जा सकता। उन परिस्थितियों, समस्याओं और मनोवृत्तियों को सुधारने के लिए प्रयत्न करना होगा जिनके कारण बुराई उत्पन्न होती है। आमतौर से मनुष्य उससे प्रभावित रहता है जो उसकी किसी न किसी अंश में प्रशंसा करता है और उसमें जो थोड़ी बहुत अच्छाई है उसका आदर करता है। मनुष्य अपने विरोधी की नहीं प्रशंसक की बात मान सकता है और यदि सुधार संभव है तो उसी के द्वारा संभव है जिसके प्रति उसके मन में सद्भावना जमीं हुई है। 

यह सद्भावना जमाये रहने में वे ही सफल हो सकते हैं जो सद्भावनायुक्त, गुणग्राही एवं प्रशंसक हैं। इस विशेषता के कारण मनुष्य अजात शत्रु हो जाता है, जो अपने बुरे स्वभाव के कारण शत्रुता करना चाहते हैं वे भी देर तक कर नहीं पाते। सज्जनता के सामने उन्हें एक दिन परास्त ही होना पड़ता है। ऐसे अगणित उदाहरण आये दिन आँखों के सामने उपस्थित होते रहते हैं जिनमें सज्जनता के हथियार से दुर्जनों को परास्त ही नहीं किया गया वरन् उनका हृदय परिवर्तन करके सज्जनता का अनुयायी भी बना लिया गया। शत्रुओं की संख्या घटाने और मित्रों की संख्या बढ़ाने का सबसे उत्तम तरीका यह है कि हम दूसरों की अच्छाइयाँ ढूँढ़ना और उनकी प्रशंसा करना सीखें। इससे दूसरों पर तो अच्छा प्रभाव पड़ता ही है अपना मन भी प्रसन्नता अनुभव करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४५)

जिससे निर्बीज हो जाएं सारे कर्म संस्कार

अन्तर्यात्रा का विज्ञान अन्तर्जगत के नंदनवन में प्रवेश करने के इच्छुक योग साधकों के लिए नेह भरा निमंत्रण है। इसमें उनके लिए आह्वान है, जो अन्तर्यात्रा करने के लिए उत्सुक हैं, जिज्ञासु हैं। जिनमें महर्षि पतञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव की योग अनुभूतियों का साझीदार बनने की निष्कपट चाहत है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में उठ रही पुकार उनके लिए है, जो अध्यात्म विद्या के वैज्ञानिक बनना चाहते हैं। अगर ऐसा कुछ आप में है, तो इसे सुनिश्चित सत्य मानें कि महर्षि पतंञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि गुरुदेव आपकी अंगुली थामकर आपको कदम दर कदम इस अन्तर्यात्रा पथ पर आपको आगे बढ़ायेंगे। बस, आपको केवल उठकर खड़़ा होना होगा। इसके लिए इस योग कथा की प्रत्येक पंक्ति के प्रत्येक शब्द पर गहनता से मनन करना होगा। 
    
महर्षि बता चुके हैं कि कर्म संस्कारों के निर्बीज होने की संभावना चित्त की असम्प्रज्ञात भावदशा में सम्भव बन पड़ती है। असम्प्रज्ञात समाधि क्या है? इस जिज्ञासा के समाधान में महर्षि का कथन है-
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥ १/१८॥
    
शब्दार्थ- विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः= विराम-प्रत्यय का अभ्यास जिसकी पूर्व अवस्था है और संस्कारशेषः= जिसमें चित्त का स्परूप ‘संस्कार’ मात्र ही शेष रहता है, वह योग, अन्यः -अन्य है।
अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति होती है और मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किये रहता है। 
    
सम्प्रज्ञात समाधि का पहला चरण पूरा करने के बाद ही योग साधक को असम्प्रज्ञात अवस्था सुलभ होती है। पहला चरण है—शुद्धता का और दूसरा चरण है- विलीनता का। हालाँकि ये दोनों ही क्रियायें मन की ऊपरी सतह पर ही सम्पन्न होती हैं। भीतरी सतह यानि कि अचेतन मन में पूर्व जन्मों के संस्कार जस के तस बने रहते हैं। इनका नाश अभी भी नहीं होता है। हालाँकि ये अप्रकट रहते हैं। फिर भी इनकी उपस्थिति बरकरार रहती है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद...