रविवार, 25 नवंबर 2018

👉 करो या फिर मरो।

विपरीत परिस्थितियाँ हर व्यक्ति के जीवन में कभी-न-कभी आती ही हैं। ऐसे में आत्मविश्वास सूखी रेत की तरह मुट्ठियों से फिसलने लगता है। चारों तरफ अंधकार ही अंधकार नजर आता है, साहस घुटने टेकने लगता है। एक पल ऐसा लगता है कि सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

ऐसी स्थिति में केवल दो ही विकल्प शेष रह जाते हैं- करो या फिर मरो।

इसमें जो विपरीतताओं-विषमताओं से लड़े बगैर हार मान लेता है, उसका मरण तो निश्चित्त है। लेकिन जो साहस जुटाकर संघर्ष करता है, वही प्रतिकूलताओं पर विजय प्राप्त कर इतिहास रचता और सफलता की इबारत गढ़ता है।

👉 चापलूसी नही, अच्छी सलाह दे!!

किसी की झूठी प्रशंसा करके उसका अहंकार बढा देने की गलती हमें नहीं करनी चाहिए! क्योकि अहंकार बढने से नाश का द्वार खुलता है! इतिहास साक्षी है राजाओ का नाश हाँ मे हाँ मिलाकर उनके चापलूस ही करते रहे है! कोई भी सलाह नम्रता से, मधुरता से एकांत में ठीक प्रकार समझाते हुए दी जाए तो समझदार लोग उस पर ध्यान देते भी है और सुधरने का प्रयत्न भी करते है! क्योकि अपने अहंकार को ठेस लगने से लोग आगबबूला होने लगते है! पर अपने हितैषी के लिए तो यह जोखिम भी उठानी चाहिए और अवसर देखकर उचित सलाह देनी भी चाहिए! चुप बैठे रहने से बुराई घटती नहीं, बढती ही रहती है! अपने को ही नहीं, अपने स्वजन संबंधियो को भी निरहंकारी बनने की सलाह देते रहना चाहिए!

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महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...