शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

👉 लक्ष्मीजी कहाँ रहती हैं?

एक बूढे सेठ थे। वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव। आज यहाँ तो कल वहाँ! सेठ ने एक रात को स्वप्न में देखा कि एक स्त्री उनके घर के दरवाजे से निकलकर बाहर जा रही है।

उन्होंने पूछा : ‘‘हे देवी आप कौन हैं? मेरे घर में आप कब आयीं और मेरा घर छोडकर आप क्यों और कहाँ जा रही हैं?

वह स्त्री बोली : ‘‘मैं तुम्हारे घर की वैभव लक्ष्मी हूँ। कई पीढयों से मैं यहाँ निवास कर रही हूँ किन्तु अब मेरा समय यहाँ पर समाप्त हो गया है इसलिए मैं यह घर छोडकर जा रही हूँ। मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ क्योंकि जितना समय मैं तुम्हारे पास रही, तुमने मेरा सदुपयोग किया। संतों को घर पर आमंत्रित करके उनकी सेवा की, गरीबों को भोजन कराया, धर्मार्थ कुएँ-तालाब बनवाये, गौशाला व प्याऊ बनवायी । तुमने लोक-कल्याण के कई कार्य किये। अब जाते समय मैं तुम्हें वरदान देना चाहती हूँ। जो चाहे मुझसे माँग लो।

सेठ ने कहा : ‘‘मेरी चार बहुएँ है, मैं उनसे सलाह-मशवरा करके आपको बताऊँगा। आप कृपया कल रात को पधारें। सेठ ने चारों बहुओं की सलाह ली। उनमें से एक ने अन्न के गोदाम तो दूसरी ने सोने-चाँदी से तिजोरियाँ भरवाने के लिए कहा।

किन्तु सबसे छोटी बहू धार्मिक कुटुंब से आयी थी। बचपन से ही सत्संग में जाया करती थी।

उसने कहा : ‘‘पिताजी ! लक्ष्मीजी को जाना है तो जायेंगी ही और जो भी वस्तुएँ हम उनसे माँगेंगे वे भी सदा नहीं टिकेंगी। यदि सोने-चाँदी, रुपये-पैसों के ढेर माँगेगें तो हमारी आनेवाली पीढी के बच्चे अहंकार और आलस में अपना जीवन बिगाड देंगे। इसलिए आप लक्ष्मीजी से कहना कि वे जाना चाहती हैं तो अवश्य जायें किन्तु हमें यह वरदान दें कि हमारे घर में सज्जनों की सेवा-पूजा, हरि-कथा सदा होती रहे तथा हमारे परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहे क्योंकि परिवार में प्रेम होगा तो विपत्ति के दिन भी आसानी से कट जायेंगे।

दूसरे दिन रात को लक्ष्मीजी ने स्वप्न में आकर सेठ से पूछा : ‘‘तुमने अपनी बहुओं से सलाह-मशवरा कर लिया? क्या चाहिए तुम्हें?

सेठ ने कहा : ‘‘हे माँ लक्ष्मी! आपको जाना है तो प्रसन्नता से जाइये परंतु मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे घर में हरि-कथा तथा संतो की सेवा होती रहे तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम बना रहे।

यह सुनकर लक्ष्मीजी चौंक गयीं और बोलीं : ‘‘यह तुमने क्या माँग लिया। जिस घर में हरि-कथा और संतो की सेवा होती हो तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रीति रहे वहाँ तो साक्षात् नारायण का निवास होता है और जहाँ नारायण रहते हैं वहाँ मैं तो उनके चरण पलोटती (दबाती) हूँ और मैं चाहकर भी उस घर को छोडकर नहीं जा सकती। यह वरदान माँगकर तुमने मुझे यहाँ रहने के लिए विवश कर दिया है.!

👉 आज का सद्चिंतन 5 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Jan 2019


👉 स्वर्ग प्राप्त करना बहुत ही सरल है!

स्वर्ग का द्वार हर मनुष्य के लिए खुला हुआ है। जो चाहे सो उसमें बड़ी आसानी के साथ प्रवेश कर सकता है। परमात्मा ने श्रेष्ठ, शुभ और पुण्य कार्यों को बड़ा ही सरल बनाया है, इस राजमार्ग पर चलने का हर कोई अधिकारी हैं। झूठ बोलने में बहुत सोचने समझने, विचारने और संभल संभल कर बात करने की जरूरत होती है परन्तु सत्य बोलने में जरा भी खटपट नहीं।

चोरी करने के लिए बड़ी तिकड़म लड़ानी पड़ती है परन्तु ईमानदारी से रहना बेहद आसान है, एक कम बुद्धि का आदमी भी ईमानदारी का व्यवहार बड़ी सुगमता से कर सकता है इसमें उसे कुछ भी परेशानी न उठानी पड़ेगी। इसी प्रकार जुआ व्यभिचार, ढोंग, छल आदि में पग पग पर कठिनाई पड़ती हैं परन्तु पावन कर्तव्यों का पालन करते रहना बेहद आसान है, उसमें कोई आपकी बदनामी या कठिनाई नहीं है।

लोग समझते हैं कि असत्य का, पाप का रास्ता सरल और सत्य का, धर्म का रास्ता कठिन है परन्तु असल बात ऐसी नहीं है। नरक के द्वार तक पहुँचने में बहुत कठिनाई है और स्वर्ग का द्वार सड़क के किनारे है जहाँ हर कोई बड़ी आसानी के साथ पहुँच सकता है। यह द्वार हर किसी के लिए हर घड़ी खुला रहता है। आप चाहें तो आज ही-अभी ही, उसमें बे रोक टोक प्रवेश कर सकते हैं।

अपने अन्तःकरण को टटोलिए, आत्म निरीक्षण कीजिए, आपके अन्दर जो ईश्वरीय दिव्य तेज जगमगा रहा है उसके दर्शन कीजिए विवेक के प्रकाश में अपनी सद्भावनाओं और सद्वृत्तियों की सम्पत्ति को तलाश कीजिए यही आपकी अमर सहचरी है। यह अप्सराएं आपको क्षण भर में स्वर्ग के दरवाजे तक पहुँचा सकती हैं।

📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1944 पृष्ठ 1

👉 Where is the Lasting Joy?

We are all driven by the quest for joy. Behind all our plans, actions, expectations, lies this perennial thirst for joy. But because of our natural perception of the world and life at the gross material level, our domain of search remains confined to the sentient world and related extrovert experiences. We are not even aware that there could be an inner bliss or spiritual joy.

The feeling of delight is within us. How could the external things, material experiences enhance or suppress it? They might just give a momentary excitation or satisfy our ego for sometime. The true means and sources of joy lie deep within our own selves. The Vedic philosophy logically describes this fact – it is the consciousness-element of mind, which feels the joy. So, without knowing this sublime element or deciphering its nature and conditioning it, one can’t hope for unalloyed bliss or lasting joy. Conquering the mind is indeed bigger than conquering the world. One who succeeds in it is the happiest, strongest person in this world.

Hidden there is the subtle spring of infinite bliss in the core of our inner self. What we ever experience as joy is only a sprinkle of this immense source. The pleasure, if any, we find in the outer world is also a reflection of this inner impulse. As the Vedic Sciences (of Yoga etc) preach – in order to peep into this inner treasure, we will first have to purity and control our minds (both conscious and unconscious mind), stabilize and uproot its agility and extrovert tendencies. Such a mind can eventually have the realization of divinity, of the absolute truth, the omnipresent, eternal Brahm. Attaining this state is a grand sadhana. The gamut of universal principles of religion is taught only for this purpose. The righteous path of morality, human religion alone can reach the realms of ever lasting joy.

📖 Akhand Jyoti, Sept. 1942

👉 स्थायी सुख कहाँ है?

हम बहुधा शारीरिक सुख तथा मानसिक सुख को ढूँढ़ते फिरते हैं, पर जो सबसे उत्तम सुख है, उस आध्यात्मिक सुख की हमें खबर ही नहीं है। हमारे जितने भी कार्य हैं, उनमें सुख पाने की एक इच्छा छिपी रहती है। हम स्थूलदर्शी मनुष्य बाहरी वस्तुओं से ही सुख पाने की इच्छा रखते हैं। क्या बाहरी वस्तु किसी को सुख दे सकती है?

इस जगत् में हमारे सुख के समान बाहर नहीं, भीतर हैं, अर्थात् सुख माने के लिए बाहर ढूंढ़ना वृथा है। हिंदू-शास्त्र भी इस बात का प्रमाण देती है कि बिना मन का तत्त्व-निर्णय किए, बाह्य जगत् के सुखों की कोई आशा नहीं। इसलिए मन का तत्त्व जानना और उस पर पूरा अधिकार जमा लेना अत्यंत आवश्यक है। मन को जीत लेने से ही हम संसार को जीत लेंगे।

मनुष्य के लिए सुख की, आनंद की खान भीतर ही है। उसकी झलक बाहर भी दिखाई देती है, पर वह केवल झलक ही है। शास्त्र का कथन ठीक ही है कि यदि सत्य वस्तु, ब्रह्म या परमात्मा का रूप जानना हो, तो हमें अपने चित्त को क्षण भर के लिए स्थिर बनाना पड़ेगा। इसे साधना-धर्म का अंग कहते हैं। इसलिए स्थायी सुख-प्राप्ति के लिए हमें धर्म का आश्रय लेना पड़ेगा। धर्म ही हमें वर्तमान मुहूर्त के क्षणिक सुख के बदले भविष्य में होने वाले अक्षय सुख का मार्ग बताता है।

📖 अखण्ड ज्योति -सितम्बर 1942

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Jan 2019

◾ दुनिया में हर आदमी के सामने समस्याएँ हैं। सबकी अपनी-अपनी उलझनें हैं, पूर्ण संतुष्ट और सुखी व्यक्ति की रचना परमात्मा ने नहीं की है। जितना कुछ प्राप्त है, उस पर आनंद मनाने-संतुष्ट रहने की और अधिक प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते रहने की नीति जिनने अपना ली है, उनके लिए हँसते रहने के अगणित कारण अपने चारों ओर बिखरे दिखाई पड़ते हैं।

◾ बच्चों को आमतौर से उनके अभिभावक बहुत अच्छे उपदेश देते रहते हैं और उन्हें राम, भरत एवं श्रवण कुमार देखना चाहते हैं, पर कभी यह नहीं सोचते कि क्या हमने अपनी वाणी एवं आकाँक्षा को अपने में आवश्यक सुधार करके इस योग्य बना लिया कि उसका प्रभाव बच्चों पर पड़ सके।

◾ हम जीवन में जितना निरर्थक प्रलाप करते हैं, निरर्थक शब्द बोलते हैं यदि उतने समय में कुछ काम किया जाय तो उतने से एक नया हिमालय पहाड़ बन जाये। यदि इन शब्दों का उपयोग किसी को सान्त्वना देने, भगवद् पूजन, प्रभु नाम स्मरण, संगीत, जप-कीर्तन में करें तो हमारा और समाज का कितना भला हो सकता है साथ ही हम वाचालता से उत्पन्न दोष जिनसे लड़ाई-झगड़ा, क्लेश, ईर्ष्या, द्वेष आदि का उदय होता है, उनसे बच जायें।

◾ विषय वासनाएँ हाथ में पकड़ी हुई छड़ी  की तरह तो हंै नहीं कि हाथ खोल दीजिए वह स्वतः गिर जायेगी। यह जन्म-जन्मांतर का कलुष है, जो मनोदर्पण पर संचित होकर स्थायी बन जाता है। इसे मल-मल कर धोना पड़ेगा। जिस प्रकार मैल को मैल से साफ नहीं कर सकते, उसी प्रकार विषयों को वासना से नहीं धोया जा सकता। इनको धोने के लिए निर्मल भावनाओं की आवश्यकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मबोध का अभाव ही खिन्नता (भाग 1)

स्वाभाविक प्रसन्नता खोकर अस्वाभाविक खेद, दुःख, किस बात का? रंज किस निमित्त? विचार करने पर प्रतीत होगा कि खिन्नता सिर पर लादने के वैसे कारण हैं नहीं जैसे कि समझ गये हैं।

घाटा कितनी दौलत का पड़ा। यह हिसाब लगाने से पूर्व देखना यह होगा कि जब आये थे तब क्या−क्या वस्तुऐं साथ थीं और जब विदाई का दिन सामने होगा तब क्या−क्या साथ जाने वाला है। जब दोनों परिस्थितियों में खाली हाथ ही रहना है तो थोड़े समय के लिए जो वस्तुएँ किसी प्रकार हाथ लगीं उनके चले जाने पर इतना रंज किस निमित्त किया जाय, जिससे प्रसन्नता भरे जीवन का आनन्द ही हाथ में चला जाय?

जिन वस्तुओं के चले जाने का रंज है वे कुछ समय पहले दूसरों के हाथ में थीं। जब हाथ आई तब इस बात की किसी ने कोई गारण्टी नहीं दी थी कि यह सदा सर्वदा के लिए अपने पास रहेगी। आज अपने हाथ, कल दूसरे के हाथ−वस्तुओं का यही क्रम है। कुछ समय के लिए हाथ आना और देखते−देखते दूसरे के हाथ चले जाना, विश्व व्यवस्था के इस क्रम में स्थायित्व की कल्पना करना यह भ्रम मात्र है। धन की हानि होते देखकर रुदन करना, अपने अनजानपन के अतिरिक्त और है क्या? जो अपने हाथ आया था वह दूसरे के हाथ खाली कराकर वह खिलौना दूसरों के हाथ खेलने के लिए थमा दिया गया तो इसमें क्या अनहोनी बात हो गई?

स्वजन सम्बन्धियों में से कुछ मृत्यु के मुख में चले गये अथवा अब जाने वाले हैं। इसमें अनहोनी क्या हुई? अपना शरीर जा रहा है या जाने वाला है इसमें भी प्रवाह क्रम ही समझा क्यों न जाय? जब जन्म लिया था तब कितने ही स्वजन सम्बन्धियों से नाता तोड़कर इस देह में आ गया था। अब उसी प्रकार इस देह से सम्बन्ध तोड़कर अन्य देह में प्रवेश करने का अवसर आ गया तो रुदन की क्या बात? नये शरीर बदलते रहना कपड़े बदलने के समान है। जो स्वाभाविक है। उसमें अनहोनी क्या हुई?

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1985 पृष्ठ 26

👉 सीख के उपहार......

प्राचीन मिथिला देश में नरहन (सरसा) राज्य का भी बड़ा महत्व था। वहां का राजा बड़ा उदार और विद्वान् था। अपनी प्रजा के प्रति सदैव वात्सल्य भाव रखता था। प्रजा को वह सन्तान की तरह चाहता था, प्रजा भी उसे पिता की तरह मानती थी। किन्तु उसकी राजधानी में एक गरीब आदमी था, जो हर घड़ी राजा की आलोचना किया करता। राजा को इस बात की जानकरी थी किन्तु वे इस आलोचना के प्रति उपेक्षा भाव ही रखते।

एक दिन राजा ने इस बारे में गम्भीरता से सोचा। फिर अपने सेवक को ‘गेहूं के आटे के बडे मटके’, ‘वस्त्र धोने का क्षार’, ‘गुड़ की ढेलियां’ बैलगाड़ी पर लाद कर उसके यहां भेजा।

राजा से उपहार में इन वस्तुओं को पाकर वह आदमी गर्व से फूल उठा। हो न हो, राजा ने ये वस्तुएँ उससे डर कर भेजी हैं। सामान को घर में रखकर वह अभिमान के साथ राजगुरु के पास पहुँचा। सारी बात बताकर बोला, “गुरुदेव! आप मुझसे हमेशा चुप रहने को कहा करते थे। यह देखिये, राजा मुझसे डरता है।”

राजगुरु बोले, “बलिहारी है तुम्हारी समझ की! अरे! राजा को अपने अपयश का डर नहीं है उसे मात्र यह चिंता है कि तुम्हारी आलोचनाओं पर विश्वास करके कोई अभिलाषी याचना से ही वंचित न रह जाय। राजा ने इन उपहारों द्वारा तुम्हे सार्थक सीख देने का प्रयास किया है। वह यह कि हर समय मात्र निंदा में ही रत न रहो, संतुष्ट रहो, शुभ-चिंतन करो और मधुर संभाषण भी कर लिया करो। आटे के यह मटके तुम्हारे पेट पुष्टि के साथ तुम्हारे संतुष्ट भाव के लिए हैं, क्षार तुम्हारे वस्त्रो के मैल दूर करने के साथ ही मन का मैल दूर करने के लिए है और गुड़ की ये ढेलियां तुम्हारी कड़ुवी जबान को मीठी बनाने के लिए हैं।”

👉 आज का सद्चिंतन 4 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Jan 2019


👉 छोटी शक्ति से ही कार्य आरम्भ करो!

यदि आपके पास मनचाही वस्तुएं नहीं हैं तो निराश होने की कुछ आवश्यकता नहीं। अपने पास जो टूटी-फूटी चीजें है उन्हीं की सहायता से अपनी कला को प्रदर्शित करना आरम्भ कर दीजिये, जब चारों ओर घोर घन अन्धकार छाया हुआ होता है तो वह दीपक जिसमें छदाम की मिट्टी, आधे पैसे का तेल और दमड़ी को बत्ती है। कुल मिलाकर एक पैसे की भी पूँजी नहीं है—चमकता है और अपने प्रकाश से लोगों के रुके हुए कामों को चालू कर देता है।

जब कि हजारों पैसे के मूल्य वाली वस्तुएं चुपचाप पड़ी होती हैं, यह एक पैसे की पूँजी वाला दीपक प्रकाशवान होता है, अपनी महत्ता प्रकट करता है, लोगों का प्यारा बनता है, प्रशंसित होता है और अपने आस्तित्व को धन्य बनाता है। क्या दीपक ने कभी ऐसा रोना रोया है कि मेरे पास इतने मन तेल होता, इतने सेर रुई होती, इतना बड़ा मेरा आकार होता तो ऐसा बड़ा प्रकाश करता?

दीपक को कर्महीन नालायकों की भाँति, बेकार शेखचिल्लियों जैसे मनसूबे बाँधने की फुरसत नहीं है, वह अपनी आज की परिस्थिति हैसियत और औकात को देखता है, उसका आदर करता है और अपनी केवल मात्र एक पैसे की पूँजी से कार्य आरम्भ कर देता है। उसका कार्य छोटा है, बेशक; पर उस छोटेपन में भी सफलता का उतना ही महत्व है जितना के सूर्य और चन्द्र के चमकने की सफलता का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Significance of Satsang

Satsanga means being in the company of good people, inspiring discourses and discussions. You should always try to be in the company of such people who protect you from evils and wrongs; who can induce hope even in the moments of despair and offer you encouraging support in adverse circumstances.

It is easy to get the sycophants or selfish friends around, who would just be ‘friends’ when they need something from you: they need not be your well wishers, and might even pull you in the rut of addictions, ego and avarice; they won’t hesitate in stepping you on your back if it suits their vested interests. You may find it difficult to find wise men who would be your guides; who would be your critiques on your face to correct your flaws and advice you righteously; who would warn you of the dangers or risks well n time. People often prefer the company of elite; we should know that the best company is that of the enlightened personalities, the elevated souls.

Having true friends, though few in numbers, is a sign of wisdom. Noble friendship is quite significant in the ascent of life in many respects. It is foolish to make enemies, but worse is to leave the friendship of good people.

Pure intellect and faith in sincere efforts with assiduity are the two key elements essential for transmutation of personality. Adoption of virtues transforms the bad, debased ones into great personalities; on the contrary, vices could decline and debouch the great ones into mean, inferior, scornful levels. So your friends should be those who inspire the virtues and uproot the vices. You may also begin on your own by cultivating food qualities, like constructive use of time, alertness, sincerity and perseverance… Small steps in the prudent direction lead to brighter goals.

📖 Akhand Jyoti, Apr. 1942

👉 सत्संग का महत्त्व

तुम्हें ऐसे व्यक्तियों का प्रेमपात्र बनने का सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए जो कष्ट पड़ने पर तुम्हारी सहायता कर सकते हैं और बुराइयों से बचाने की एवं निराशा में आशा का संचार करने की क्षमता रखते हैं।

खुशामदी और चापलूसों से घिर जाना आसान है। मतलबी दोस्त तो पल भर में इकट्ठे हो सकते हैं, पर ऐसे व्यक्तियों का मिलना कठिन है, जो कड़वी समालोचना कर सके, जो खरी सलाह दे सकें, फटकार सकें और खतरों से सावधान कर सकें। राजा और साहूकारों की मित्रता मूल्यवान् समझी जाती है, पर सबसे उत्तम मित्रता उन धार्मिक पुरुषों की है, जिनकी आत्मा महान् है। जिसके पास पूँजी नहीं है, वह कैसा व्यापारी? जिसके पास सच्चे मित्र नहीं हैं, वह कैसा बुद्धिमान? उन्नति के साधनों में इस बात का बड़ा मूल्य है कि मनुष्य को श्रेष्ठ मित्रों का सहयोग प्राप्त हो। बहुत से शत्रु उत्पन्न कर लेना मूर्खता है, पर उससे भी बढ़कर मूर्खता यह है कि भले व्यक्तियों की मित्रता को छोड़ दिया जाए।

निर्मल बुद्धि और श्रम में श्रद्धा, यही दो वस्तुएँ तो किसी मनुष्य को महान् बनाने वाली हैं। उत्तम गुणों को अपनाने से नीचे व्यक्ति ऊँचे बन सकते हैं और दुर्गुणों के द्वारा बड़े व्यक्ति छोटे हो सकते हैं। निरंतर लगन, सावधानी, समय का सदुपयोग छोटे को बड़ा बना सकते हैं, हीन मनुष्यों को कुलीन बना सकते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति -अप्रैल 1942

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 Jan 2019

◾ उन्नति कोई उपहार नहीं है, जो छत फाड़कर अनायास ही हमारे घर में बरस पड़े। उसके लिए मनुष्य को कठोर प्रयत्न करने पड़ते हैं और एक मार्ग अवरुद्ध हो जाय तो दूसरा सोचना पड़ता है। गुण, योग्यता और क्षमता ही सफलता का मूल्य है। जिसमें जितनी क्षमता होगी उसे उतना ही लाभ मिलेगा।

◾ मौन प्रकृति का शाश्वत नियम है। चाँद, सूरज, तारे सब बिना कुछ कहे-सुने चल रहे हैं। संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य मौन के साथ ही पूर्ण होता है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में कोई महान् कार्य करना चाहे तो उसे एक लम्बे समय तक मौन का अवलम्बन लेना पड़ेगा, क्योंकि मौन से ही शक्ति का संग्रह और उद्रेक होता है।

◾ इस संसार की रचना कल्पवृक्ष के समान नहीं है कि जो कुछ हम चाहें वह तुरन्त ही मिल जाया करें। यह कर्मभूमि है, जहाँ हर किसी को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। अपनी योग्यता और विशेषता का प्रमाण प्रस्तुत किये बिना कोई किसी महत्त्वपूर्ण स्थान पर नहीं पहुँच सकता । यहाँ हर किसी को परीक्षा की अग्नि में तपाया जाता है और जो इस कसौटी पर खरा उतरता है, उसी को प्रामाणिक एवं विश्वस्त माना जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

◾ जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।

~ स्वामी विवेकानन्द

👉 अपना मूल्याँकन, आप कीजिये (भाग 3)

इसमें कोई सन्देह नहीं कि कोई भी व्यक्ति केवल उतनी ही सफलताएँ प्राप्त कर सकता है या उतनी ही उपलब्धियाँ अर्जित कर सकता है, जितनी कि वह चाहता है, चाहने को तो लोग न जाने क्या-क्या चाहते, न जाने क्या-क्या आकाँक्षाएँ और इच्छाएँ रखते हैं, पर वैसा चाहना और बात है तथा उसका फलित होना और बात। लोग चाहते हैं कि उसके पास खूब सम्पत्ति जमा हो, पर सौ में से दस प्रतिशत भी सच्चे मन से यह नहीं चाहते कि वे सम्पन्न बनें। उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि वे संपन्न भी बन सकते हैं। पानी में डूबते समय जैसे तीव्र आकांक्षा होती है कि बच जाया जाये और डूबने वाला व्यक्ति हाथ-पैर मारने लगता है, अपने शरीर के दबाव और पानी की उछाल शक्ति में संतुलन बिठाने के लिए हड़बड़ाहट में ही सही प्रयत्न करने लगता है और फलस्वरूप तैरने लगता है। यही तीव्र आकाँक्षा का परिचय है। कोई व्यक्ति दरिद्रता से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे दरिद्रता में वैसी ही घुटन अनुभव करना चाहिए जैसी कि डूबने वाला व्यक्ति पानी में डूबते समय करता है, पर वैसी घुटन कहाँ अनुभव होती है?

आत्म-विश्वासी भाग्य को अपने पुरुषार्थ का दास समझता है तथा उसे अपना इच्छानुवर्ती बना लेता है। इसके लिए आवश्यकता केवल इस बात की है कि उचित मूल्याँकन किया जाए और आत्मविश्वास को सुदृढ़। यदि अपना उचित मूल्याँकन किया जाये तो वह निष्कर्ष अपनी प्रतिभा का स्पर्श पाते ही जीवन्त हो उठता है तथा व्यक्ति बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को लाँघ सकता है। नैपोलियन को अपने विजय अभियान में जब आल्पस पर्वत पार करने का अवसर आया तो लोगों ने उसे बहुत समझाया कि आज तक आल्पस पर्वत कोई भी पार नहीं कर सका है और इस तरह की चेष्टा करने वाले को मौत के मुँह में जाना पड़ा है। उन व्यक्तियों को नैपोलियन ने यही उत्तर दिया था कि मुझे मौत के मुंह में जाना मंजूर है, पर आल्पस से हार मानना नहीं और इस निश्चय के सामने आल्पस को झुकना ही पड़ा।

स्मरण रखा जाना चाहिए और विश्वास किया जाना चाहिए कि इस संसार में मनुष्य के लिए न तो कोई वस्तु या उपलब्धि अलभ्य है तथा न ही कोई व्यक्ति किसी प्रकार अयोग्य है। अयोग्यता एक ही है और वह है अपने आपके प्रति अविश्वास। यदि अपना उचित मूल्याँकन किया जाये तो कोई भी बाधा मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1981 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1981/January/v1.14

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ५)

कुरीतियों की दृष्टि से यों अपना समाज भी अछूता नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक...