गुरुवार, 11 जनवरी 2018

👉 आज का सद्चिंतन 12 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Jan 2018


👉 MY LIFE: An indivisible Lamp (Akhand-Deepak) (Last Part)

🔷 Don’t you know I have five bodies? But fifties of persons know that at one place I do one job and at other place I do another job. At one time I keep writing and at the same time my books keep being prepared & published. Don’t you see me sitting at one place; I regularly come & sit here from morning to evening, again do PUJA at night and sleep. I again do PUJA at evening. Do you see me sitting idle? Which time I write, do you know? I have eight full hours.

🔶  I write for eight full hours and eight hours are devoted to my GURUDEV, writing magazines & other articles, epics. I continue to write for eight full hours but you do not know from where come these eight hours. I am not a single person, I am many persons. There live five persons in the same nest. It is told there are five receptacles in the same body. My five receptacles function as five independent persons.
                                        
🔷 I will take care of you. My love will be showering on you. I am sending you off, but it is not the last. This farewell may be from corporeal point of view, but from soul point of view it is not any farewell. The souls are not listened to have died; the love between the souls cannot be ended. I have been grabbing all of you for so many last times through love and will not set you free unless either of you or me is not reached at a decisive stage.

🔶  Either only I will go to hell or you too will be accompanying me to heaven. Either the dog will go to heaven with YUDHISTIR or YUDHISTIR will have to stay with god on the earth. I do not assume you and me comparable to aforesaid statement as it is far above our status. But I am of the view that you have been associated with me for so many births leading me to again pull you towards me. I have pulled you to near me so that I could pour all my love over you.                   

Finished, today’s session.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 6)

🔶 मित्रो, ज्ञानयोग उस चीज का नाम है, जिसमें कि अपने भीतर चिंतन में जो अवांछनीय तत्त्व घुलते चले जाते हैं, उनको हम हिम्मत के साथ रोकें और जिन चीजों की आवश्यकता है, जो चिंतन हमारे भीतर आना चाहिए उस चिंतन को बुला करके-निमंत्रित करके अपने भीतर स्थिर करें, तो हमारा मस्तिष्क वह हो सकता है जिसे हम ज्ञान का भण्डार कह सकते हैं।
 
🔷 विद्या की दृष्टि से, ज्ञान की दृष्टि से, सुलझाव की दृष्टि से एक से एक बहुमूल्य चीजें इसके भीतर से निकलती हुई चली आ सकती हैं। ज्ञान की गंगा हमले मस्तिष्क में से वैसी ही बह सकती है जैसे कि शंकर जी के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती थी। हमारे मस्तिष्क में संतुलन का चंद्रमा उसी तरीके से टँगा रह सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर टँगा हुआ था और हमारा तीसरा नेत्र-विवेक का नेत्र, दूरदर्शिता का नेत्र उसी तरीके से खुल सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर खुला हुआ था। मित्रो, यह ज्ञानयोग की साधना है। प्रकाश चमकना चाहिए हमारे ज्ञान को और विचारों को संतुलित और सुव्यवस्थित करने के लिए।

🔶 अगर आपको ऐसा ज्ञान आए तो में समझूँगा कि हमने आपको अनुष्ठान में और साधना स्वर्ण-जयंती वर्ष में सम्मिलित करके जिस ध्यान की बाबत बताया है उसको आपने जान लिया और उसका व्यवहारिक स्वरूप समझ गए। अगर आप उसका व्यावहारिक रूप नहीं जान पाए और कल्पनालोक में ही उड़ते रहे तो फिर ख्वाब ही देखते रहेंगे, सपने ही देखते रहेंगे। अध्यात्म सपना नहीं व्यावहारिक है। यह हमारे इसी जीवन से ताल्लुक रखता है और आज से ताल्लुक रखता है। ख्वाबों का अध्यात्म नहीं है, सपनों का अध्यात्म नहीं है। ख्वाबों का-सपनों का भगवान नहीं है। भगवान है तो वह जो हमारे आज के अभी के जीवन में आना चाहिए और हमारे व्यक्तित्व के रूप में प्रकट होना चाहिए। हमारे भीतर से प्रकट होना चाहिए।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 14)

👉 गुरु-चरण व रज का माहात्म्य
🔶 भगवान् भोलेनाथ के मुख से उच्चरित ये महामंत्र गहरे और गहन भावों से भरे हुए हैं। इनका श्रवण और पठन सम्भव है। सामान्य जनों को कुछ अतिशयोक्ति जैसा लगे; किन्तु जो साधक इस पर मनन और निदिध्यासन करेंगे, उन्हें इन महामंत्रों से सत्य और ऋत की प्रकाश किरणें फूटती अनुभव होंगी। इस अनुभूति के क्षणों में उन्हें ऐसा लगेगा कि जो कुछ इन मंत्रों में है, वह तो मात्र संकेत है, यथार्थ तो कहीं और भी अधिक विस्तृत और विराट् है।
  
🔷 इसे सुस्पष्ट रीति से समझाने के लिए इन पंक्तियों में एक गुरुभक्त साधक की अनुभूति कथा प्रस्तुत की जा रही है। यह अनुभूति कथा सम्पूर्णतया सत्य है। यह सत्य घटना श्री अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी के श्रेष्ठ साधक गंगाधरण के बारे में है। अभी कुछ ही वर्षों पूर्व वह अपनी पार्थिव देह को छोड़कर अपने सद्गुरु के चरणों में विलीन हुए। बातचीत के क्रम में उन्होंने अपने साधनामय जीवन का रहस्य बताते हुए कहा कि श्रेष्ठ, सुगम; किन्तु सर्वाधिक फलदायी एवं प्रभावोत्पादक साधना अपने सद्गुरु के चरणों का चिन्तन और ध्यान है।
  
🔶 उन्होंने बताया कि जब मैं पाण्डिचेरी आश्रम महर्षि अरविन्द के पास आया, उस समय मेरी उम्र मात्र १७ साल थी। पढ़ा-लिखा कुछ खास था नहीं, सामान्य तमिल बोल पाता था। जिस समय वह अपना अनुभव बता रहे थे उस समय उनकी आयु लगभग ८७ साल थी। तो अपने जीवन के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा- श्री अरविन्द से पहली बार मिलने पर उन्होंने पूछा- तुम यहाँ क्यों आए हो? और क्या चाहते हो? उनके इन सवालों के जवाब में मैंने कहा- प्रभु! मैं नहीं जानता कि मैं क्यों आया हूँ, नहीं मालूम मेरी चाहत क्या है? वैसे तो मैं काफी गरीब हूँ, पर मैं इतना कह सकता हूँ कि मैं यहाँ केवल रोटी खाने के लिए नहीं आया।
  
🔷 इस सरल उत्तर पर श्री अरविन्द बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने माताजी से कहा कि यह लड़का अपने योग के लिए तैयार है। इसके बाद गंगाधरण जी को आश्रम के कामों में लगा दिया गया। नाली साफ करना, गौशाला की सफाई करना जैसे साधारण काम उन्हें करने पड़ते थे। विगत यादों को कुरेदते हुए गंगाधरण जी ने बताया कि मुझे दिए जाने वाले काम तो अतिसाधारण थे, पर मैं श्री अरविन्द के चरणों का चिन्तन करते हुए उसे भक्ति के साथ करता था। काम के प्रति मेरा यही भाव था कि मैं आश्रम के साधारण काम नहीं; बल्कि अपने सद्गुरु की व्यक्तिगत सेवा कर रहा हूँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 26

👉 अध्यात्म और ईश्वर का मर्म

🔷 आध्यात्मिकता का अर्थ है उस चेतना पर विश्वास करना, जो प्राणधारियों को एक दूसरे के साथ जोड़ती है, सुख-संवर्धन और दु:ख-निवारण की स्वाभाविक आकांक्षा को अपने शरीर या परिवार तक सीमित न रख कर अधिकाधिक व्यापक बनाती है। अध्यात्म का सीधा अर्थ आत्मीयता के विस्तार के रूप में किया जा सकता है। ‘प्रेम ही परमेश्वर है’ का सिद्धान्त यहाँ अक्षरश: लागू होता है। अन्तरात्मा की सघन पिपासा, प्रेम का अमृत पान करने की होती है। इसी लोभ में उसे निरन्तर भटकना पड़ता है। छल का व्यापार प्रेम, विश्वास के सहारे ही चलता है। वासना के आकर्षण में प्रेम की संभावना ही उन्माद पैदा करती है। यह तो कृत्रिम और छद्मप्रेम की बात हुई, उसकी यथार्थता इतनी मार्मिक होती है कि प्रेम देने वाला और प्रेम पाने वाला दोनों ही धन्य हो जाते हैं।
  
🔶 दार्शनिक विवेचना में इस भक्तिमार्गी आस्तिकता के लिए कोई स्थान नहीं है। वेदान्त ने आत्मा के परिष्कृत स्तर को ही परमात्मा माना है और उत्कृष्टता से भरापूरा अन्त:करण ही ब्रह्मलोक है। अपनी महानता पर विश्वास और तदनुरूप श्रेष्ठï आचरण का अवलम्बन, यही है सच्ची आस्तिकता। इसी के परिपोषण में साधना और उपासना का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया जाता है।
  
🔷 अनेकता में समाविष्ट एकता की झाँकी कर सकना ही ईश्वर दर्शन है। सृष्टि का प्रत्येेक सजीव और निर्जीव घटक एक-दूसरे से प्रभावित ही नहीं होता, वरन् परस्पर पूरक और अभिन्न भी है। एक की संवेदना दूसरे को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती, इसलिए अमुक व्यक्तित्वों की सुख-सुविधा को ध्यान में न रखते हुए समस्त विश्व का हित साधन करने की दृष्टि रखकर ही जीवन की कोई  रीति-नीति निर्धारित की जाय, यह दृष्टि तत्त्व दर्शन का प्रत्यक्ष प्रतिफल  है। जब यह स्वत: सिद्ध सत्य चेतना के गहन मर्मस्थल तक प्रवेश कर जाए और निरन्तर इसी स्तर की अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि अध्यात्म और जीवन का समन्वय हो चला।
  
🔶 पूजा की इतिश्री अमुक कर्मकाण्डों की पूर्ति के साथ ही हो जाती है; किन्तु आध्यात्मिकता व्यक्ति के अन्तरङ्गï और बहिरङ्ग जीवन में व्यावहारिक हेर-फेर करने के लिए विवश करती है। आत्मसुधार, आत्म निर्माण के क्रम में अन्तरङ्ग की आस्थाओं, मान्यताओं, आकांक्षाओं और अभिरुचियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन  होता है। आत्मसंयम, इंद्रिय निग्रह, मर्यादा-पालन, सादगी, सज्जनता, नम्रता, चरित्र गठन, कर्त्तव्य-पालन, धैर्य, साहस, संतुलन जैसी अनेक सत्प्रवृत्तियाँ अन्तरङ्ग आध्यात्मिकता के वृक्ष पर फल-फूलों की तरह अनायास ही लदने लगती हैं। ऐसे व्यक्ति को महामानव स्तर के उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सुसम्पन्न देखा जा सकता है।
  
🔷 बहिरङ्ग जीवन में आध्यात्मिकता की प्रतिक्रिया श्रमशीलता, स्वच्छता, सुव्यवस्था, सद्ïव्यवहार, ईमानदारी, शालीनता, न्यायनिष्ठा, जनसेवा, उदारता जैसे आचरणों में प्रकट होती है। ऐसे लोगों को समाजनिष्ठï, कत्र्तव्यनिष्ठ एवं धर्मनिष्ठ कहा जा सकता है। मर्यादाओं का उल्लंघन वे करते नहीं, साथ ही अनीति को सहन भी नहीं करते। अवांछनीयता के विरुद्ध उनका संघर्ष अनवरत रूप से चलता रहता है। न वे किसी से अनावश्यक मोह बढ़ाते  हैं और न किसी को स्नेह-सद्भाव से वंचित करते हैं।
  
🔶 आध्यात्मिकता को प्राचीन भाषा में ब्रह्मïविद्या कहते हैं। यह उत्कृ ष्टï चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की एक परिष्कृत जीवन पद्धति है, जिसे अपनाने पर भीतर सन्तोष और बाहर सम्मान की वे उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं, जिन पर कुबेेर और इन्द्र जितने वैभव को निछावर किया जा सके। व्यक्तित्व की पूर्णता और प्रखरता का सारा आधार आध्यात्मिकता पर  ही अवलम्बित माना जा सकता है।

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ५)

कुरीतियों की दृष्टि से यों अपना समाज भी अछूता नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक...