शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

👉 गुरु रैदास (संत रविदास)


‘जाति वंश’हो एक समान,के भावों का विस्तार किया।
गुरु रैदास‘जगतगुरु’ थे, ‘दुखियों हित अवतार’ लिया।।

‘कुल वर्ण’नहीं, सद्कर्म श्रेष्ठ है, गुरु ने हमें बताया था। 
‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’,जाति-पाति मिटाया था।। 
‘भक्ति प्रेम’ की अविरल धारा, से जग का उद्धार किया।
गुरु रैदास जगतगुरु  थे,  दुखियों हित अवतार लिया।।

बचपन से ही ‘बैरागी’ थे,  ‘रामजानकी  अनुरागी’थे। 
पारस पत्थर पाकर भी वे,सौम्य सहज थे त्यागी थे।।
जनसेवक अभिमान रहित बन,प्रभु का साक्षात्कार किया। 
गुरु रैदास जगतगुरु थे, दुखियों हित अवतार लिया।।

अहं छोड़ मिलजुल कर रहना, गुरु ने हमें सिखाया है।
कृष्ण करीम हरि राम एक सब,गुरु ने हमें बताया है।।
‘मानव धर्म के संस्थापक’ने, जगती पर उपकार किया। 
गुरु रैदास जगतगुरु थे,  दुखियों  हित अवतार लिया।।

प्रभु भक्ति के लिए हमारे,मन निर्मल अति पावन हो।
सदाचार और सद्व्यवहार का,शुद्ध ह्रदय से पालन हो।।
उर  पवित्र  करके  भक्तों ने, ईश्वर  को साकार किया।
गुरु  रैदास  जगतगुरु थे, दुखियों हित अवतार लिया।।

कवि ज्ञानी गुरु संत रूप में, रविदास विख्यात हुए।
लगन परिश्रम भक्ति भावना,‘जगतगुरु’ प्रख्यात हुए।।
कुरीतियों में फंसे राष्ट्र को, नूतन श्रेष्ट विचार दिया। 
गुरु रैदास जगतगुरु थे, दुखियों हित अवतार लिया।।

- उमेश यादव

👉 खरे व्यक्तित्व की कसौटी (अन्तिम भाग)

व्यक्तित्ववानों की परख का एक और भी तरीका है कि उनने अपने सगे सम्बन्धियों के साथ न्यायोचित व्यवहार का निर्वाह किया या नहीं। जिनके साथ निरन्तर रहना पड़ता है उन्हीं के साथ आदमी की असलियत खुलती है। बाहर के लोगों के साथ तो बनावटी सज्जनता भी दिखाई जा सकती है, पर मुखौटा पहनकर दिनचर्या का निर्वाह नहीं हो सकता। चकमे में डालने की कला कभी-कभी ही काम देती है और वह प्रायः अजनबी लोगों पर ही सफल होती है। जिनसे लगातार वास्ता पड़ता है उनसे किसी के स्वभाव या चरित्र की वस्तुस्थिति छिपी नहीं रहती।

व्यक्तित्ववानों को सदा अपनी गरिमा का ध्यान रहता है। स्वाभिमान गँवाने वाले कामों में वे हाथ नहीं डालते। ऐसी दशा में चतुर लोग उनसे उदास रहते हैं और घनिष्ठता स्थापित नहीं करते। किसकी घनिष्ठता किन से है, यह देखकर सहज ही जाना जा सकता है कि इस व्यक्ति का स्तर क्या होना चाहिए? इसी प्रकार यदि पिछले दिनों के कार्यों पर दृष्टि डाली जाय और यह देखा जाय कि वे किस स्तर के थे तो भी समझा जा सकता है कि इसका व्यक्तित्व क्या है। इस स्तर की प्रतिभा अर्जित करने के लिए उच्चस्तरीय स्वाध्याय सत्संग आवश्यक है। जिसे बाहरी स्थिति ऐसी मिलेगी वही चिन्तन और मनन भी ऊंचे स्तर का कर सकेगा। उसके द्वारा अन्यान्यों को भी ऊंचे स्तर का परामर्श एवं सहयोग मिलेगा। इन्हीं कसौटियों पर कसकर यह देखा जा सकता है कि किसका व्यक्तित्व किस स्तर का है।

व्यक्तित्व सच्चे अर्थों में मनुष्य की महती और चिरस्थायी सम्पदा है। इसी के सहारे वह अपना और दूसरों का भला कर सकता है। किन्हीं पर उपयोगी प्रभाव डालने में भी ऐसे ही लोग सफल होते हैं। अन्यथा जिनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है। वे सर्वत्र सन्देह की दृष्टि से देखे जाते हैं और पोल खुलने पर उपहासास्पद बनते हैं।

ऊंचे उठने, सफल बनने एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए जिस सौभाग्य को सराहा जाता है वह वस्तुतः खरा व्यक्तित्व ही है। सोने की जब कसौटी और अँगीठी पर परख हो जाती है तो उसकी उपयुक्त कीमत मिलती है। यही बात व्यक्तित्व के सम्बन्ध में भी वह जब खरा होने की स्थिति तक पहुँच जाता है तो मनुष्य को ऐसा सौभाग्यशाली बनाता है। जिसकी चिरकाल तक सराहना होती रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1986/April.25

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११६)

सारे नियंत्रणों पर नियंत्रण है—निर्बीज समाधि

नित नये अनुभव कराती अंतर्यात्रा के विज्ञान के प्रयोग चेतना के रहस्यमय शिखरों की झलक दिखाते हैं। इन चेतना शिखरों में हर एक शिखर सम्मोहक है। प्रत्येक का सौन्दर्य अद्वितीय है। चेतना के हर शिखर पर बोध की नयी अनुभूति है, योग की नयी शक्ति की प्राप्ति है। अंतर्यात्रा विज्ञान के इन प्रयोगों में प्रत्येक स्तर पर सर्वथा नयापन है। यह नयापन प्रयोग की प्रक्रिया में भी है और परिणाम की प्राप्ति में भी। जो पहले किया जा चुका है, अगली बार उससे कुछ अलग हटकर करना पड़ता है और इसकी परिणति भी कुछ अलग ही होती है। ज्यों-ज्यों यह सिलसिला चलता है, चित्त के विकार मिटते हैं। प्रत्येक विकार के मिटते ही एक नयी अनुभूति की किरण फूटती है। इन विकारों के मिटने के बाद विचारों के मिटने का क्रम आता है। साथ ही साधक की योग अनुभूति सघन होती है और सबसे अंत में मिटते हैं-संस्कार। सभी तरह के संस्कारों के मिटने के साथ ही योग साधक निर्विचार से निर्बीज की ओर छलांग लगाता है।
 
अनासक्ति स्वाभाविक होती है। अंतस् में न तो विकारों की कीचड़ जमती है और न विचारों का शोर होता है। ऐसे में संस्कारों की छाया और छाप भी स्वभावतः ही हटती-मिटती है। अंतश्चेतना निर्बीज में छलांग लगाने के लिए तैयार होती है।
इस तथ्य का खुलासा करते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं-
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥ १/५१॥
शब्दार्थ- तस्य = उसका; अपि = भी; निरोधे = निरोध हो जाने पर; सर्वनिरोधात् = सबका निरोध हो जाने के कारण निर्बीजः = निर्बीज; समाधिः = समाधि (हो जाती है)।
भावार्थ- जब सारे नियंत्रणों पर का नियंत्रण पार कर लिया जाता है, तो निर्बीज समाधि फलित होती है और उसके साथ ही उपलब्धि होती है-जीवन-मरण से मुक्ति।

योगर्षि पतंजलि ने इस सूत्र में जिस अनुभूति का संकेत किया है, वह व्यक्तित्व की अद्भुत घटना है। यह है-सृष्टि और जीवन में होने वाले सभी चमत्कारों का सार। यह चेतना का अंतिम शिखर है, जहाँ कोई नियंत्रण और संयम न होने के बावजूद प्रकाश और ज्ञान अपनी सम्पूर्णता में फलित होते हैं। यह वही आलोक लोक है-जिसकी चर्चा करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता (१५.६) में कहा है-
‘न तद्भासयते सूर्यो शशांको न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥’

जहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि का प्रकाश होने के बावजूद प्रकाश है। जहाँ पहुँचकर फिर से वापस नहीं आना पड़ता है, वही मेरा परम धाम है। यही शिव भक्तों का महाकैलाश है और विष्णु भक्तों का वैकुण्ठ। निर्गुण उपासकों को यही ब्रह्म सायुज्य मिलता है। परम योगियों का सत्यलोक यही है।
जीवन में भली-बुरी परिस्थितियाँ हमारे अपने ही किन्हीं भले-बुरे संस्कारों का परिणाम है। इन परिस्थितियों के प्रति हमारे मन में उठने वाले भली-बुरी भाव विचार की प्रतिक्रियाएँ अपनी प्रगाढ़ता में नये संस्कारों को जन्म देती है। इस तरह संस्कारों से परिस्थितियाँ और परिस्थितियों से संस्कार यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। आचार्य शंकर की भाषा में ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्’ यानि कि फिर से जन्म और फिर मरण और फिर दुबारा माँ की कोख में आगमन-शयन। इसका कोई अंत-विराम नहीं। जन्म-मरण का यह सिलसिला अनवरत-अविराम चलता रहता है। यदि इसे कहीं विराम देना है, तो स्वयं ही चेतना पड़ता है और योग साधक को अनासक्ति, सहनशीलता और ध्यान की त्रिवेणी में गोते लगाने पड़ते हैं। इस त्रिवेणी में स्नान करने वाला चित्त ही जन्म-मरण के कालव्यूह से बाहर आ पाता है।

.... कल के अंक में समाप्त
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Khare Vyaktitva Ki Kasuti खरे व्यक्तित्व की कसौटी (भाग 2)

शालीनता उपार्जित करने के लिए शिक्षा की भी जरूरत पड़ती है। अशिक्षित आमतौर से गँवार या मूर्ख होते हैं। उनके व्यवहार में दूसरों को हानि पहुँचा कर अपना लाभ कमा लेने की नीति का समावेश होता है। ऐसा ही वे स्वयं करते हैं और ऐसा ही कर गुजरने के लिए वे दूसरों को परामर्श देते हैं। कारण कि उनका ज्ञान समीप वर्ती, साधारण लोगों तक ही सीमित होता है और औसत आदमी सफल बनने के लिए ऐसे ही तरीके अपनाता है। उनमें से अपवाद रूप में ही भलमन साहत पाई जाती है। जिस पर इस समुदाय का प्रभाव है वे यही समझते हैं कि दुनिया का रीति-रिवाज यही है और इसी रीति-नीति को अपनाने में कोई हर्ज नहीं है।

सुशिक्षित-स्वाध्यायशील व्यक्तियों के सामने ही आदर्श वादियों की कार्य पद्धति होती है। इतिहास में ही ऐसे श्रेष्ठ पुरुष खोजे जा सकते हैं। वे कभी-कभी और कहीं-कहीं ही होते हैं। उन्हें आदर पूर्वक पढ़ने, सुनने और समझने में ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि कितने ही लोगों ने प्रत्यक्ष घाटा उठाते हुए भी आदर्शों का परिपालन किया है और सर्व साधारण के सामने अनुकरणीय पथ प्रदर्शन प्रस्तुत किया है। ऐसे लोग यदि भावनाशील हुए और आदर्शों को अपनाने से किस प्रकार महान बना जा सकता है यह समझ सके तो फिर अपने को ढाँचे में ढालता है और समय-समय पर दूसरों को भी वैसी ही सलाह देते हैं। इसी परख पर यह जाना जा सकता है कि यह व्यक्तित्ववान है या नहीं। उसकी शालीनता परिपक्व स्तर की है या नहीं।

व्यक्तित्ववान दूसरों का विश्वास अर्जित करते हैं, साथ ही सम्मान एवं सहयोग भी। ऐसे लोगों को बड़े उत्तरदायित्व सौंपे जाते हैं और वे उन्हें उठाने में प्रसन्न भी होते हैं। क्योंकि महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने में अनेक लोगों का विश्वास और सहयोग अर्जित करने में ऐसे ही लोग सफल होते हैं। निश्चित है कि महत्वपूर्ण कामों को पूरा करने में सद्गुणी साथी अनिवार्य रूप से आवश्यक होते हैं और वे हर किसी का साथ नहीं देते। कारण कि उन्हें यह देखना पड़ता है कि कहीं ओछे लोगों की मंडली में शामिल होकर हमें भी बदनामी न ओढ़नी पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 25

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११५)

जब मिलते हैं व्यक्ति और विराट्

संसार वस्तुओं एवं व्यक्तियों का भी है और ऊर्जाओं का भी और सम्भव है इनमें पारस्परिक परिवर्तन भी, परन्तु यह बात कोई वैज्ञानिक ही समझेगा। ठीक इसी भाँति दुनिया अहंता की भी है, जहाँ मैं-मेरे और तू-तेरे की दीवारें हैं और आत्म-व्यापकता, ब्रह्मनिष्ठता की भी, जहाँ ये काल्पनिक लकीरें ढहती नजर आती हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि ये भेद कभी था हीं नहीं। पर ये बात कोई अध्यात्मतत्त्व का अनुभवी ही समझेगा और कोई नहीं।
कहते हैं कि एक बड़े धनपति को अपने धन का भारी अहं था। उसे गर्व था अपनी बड़ी फैक्ट्री का। ये धनाड्य महोदय राजस्थान के थे और परम पूज्य गुरुदेव से मिलने के लिए गायत्री तपोभूमि मथुरा पहुँचे थे। अपनी बातों के बीच-बीच में फैक्ट्री एवं हवेली की चर्चा जरूर कर देते, परन्तु गुरुदेव ने उनकी इन बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। थोड़ी देर तक वार्तालाप यूँ चलता रहा। तभी गुरुदेव हँसते हुए उठे और एक बड़ा सा नक्शा सामने लाकर बिछा दिया। यह नक्शा विश्व का था। इसे दिखाते हुए वह उन सेठ जी से बोले-सेठ जी! जरा इसमें ढूँढ़िये तो सही कि अपना भारत देश कहाँ है। थोड़े से आश्चर्यचकित सेठ ने जैसे-तैसे एक जगह पर अंगुली रखकर भारत देश बताया।
अब गुरुदेव ने उनसे राजस्थान की बात पूछी, बड़ी मुश्किल से बेचारे राजस्थान बता पाये और अपना शहर जयपुर बताने में तो उन्हें पसीना आ गया। कहीं पर उन्हें जयपुर ढूँढे ही न मिला। जब गुरुदेव ने उनसे अपनी फैक्ट्री एवं हवेली बताने को कहा, तो वे चकरा गये और बोले-आचार्य जी! आप तो मजाक करते हैं, भला इसमें मेरी फैक्ट्री-हवेली कहाँ मिलेगी। उन्हें इस तरह परेशान होते देखकर गुरुदेव बोले-सेठ जी! कुछ ऐसे ही ब्रह्माण्ड के नक्शे में अपनी धरती नहीं ढूँढी जा सकती और जब बात भगवान् की हो, तो हमारा अपना अहं बड़ा होने पर भी कहीं नजर नहीं आता। इस प्रसंग को गुरुदेव ने अपनी चर्चाओं में एक बार बताते हुए कहा था-योग साधक का चित्त जैसे-जैसे शुद्ध होता है-वैसे ही उसके अहं का अस्तित्व विलीन होता है। कुछ वैसे ही जैसे कि बर्फ का टुकड़ा वाष्पीभूत हो जाता है।
और जब अहं ही नहीं, तब अहंता के संस्कार कैसे? वह तो विराट् में घटने वाली घटनाओं का साक्षी बन जाता है। उसे स्पष्ट अनुभव होता है कि सत्, रज एवं तम के त्रिगुणात्मक ऊर्जा प्रवाह वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थिति में एक आश्चर्यकारी उलटफेर कर रहे हैं। बस एक दिव्य क्रीड़ा चल रही है। एक दिव्यजननी माँ परम प्रकृति के इंगित से सारे परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे में क्रियाएँ तो होती दिखती हैं, पर कर्त्ता नहीं। उसे स्पष्ट अनुभव होता है कि वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थति इन क्रियाओं की घटने वाली घटनाओं का माध्यम है। यह मात्र कल्पना या विचार नहीं, एक अनुभव है, प्रगाढ़ एवं विस्तीर्ण। जो योग साधक में सम्पूर्ण बोध बनकर उतरता है। इस अवतरण के साथ ही उसके चित्त में क्रियाओं, भावों एवं विचारों के प्रतिबिम्ब तो पड़ते हैं, परन्तु उनका कोई निशान उस पर नहीं अंकित हो पाता।
बल्कि अंतश्चेतना की इस अनूठी भावदशा में जो भाव एवं विचार उपजते हैं, वे रहे-बचे संस्कारों का भी नाश करते हैं। इस अनुभव को पाने वाले के बोध में किसी भी वस्तु या व्यक्ति में विराट् घुलता नजर आता है। तभी तो अंग्रेजी भाषा के कवि वर्ड्सवर्थ ने यह बात कही कि यदि मैं एक फूल को जान लूँ, तो परमात्मा को जान लूँगा। लोगों ने उस महाकवि से सवाल किया भला यह कैसे? तो जवाब में वह हँसा और बोला कि इस एक के बिना परमात्मा का अस्तित्व जो नहीं है। सुनने वाला कोई पादरी था, उसने कहा-यह कैसे बात करते हो? तो उस कवि ने अपनी रहस्यमयी वाणी में कहा-तुम यह भी जान लो कि परमात्मा का अस्तित्व तो मेरे बिना भी नहीं है। पादरी को लगा कि यह कवि पागल हो गया है, पर सच्चाई यह थी कि वह महाकवि उस भावदशा को पा चुका था, जहाँ व्यक्ति एवं विराट् घुलते हुए अनुभव होते हैं। इस अनुभव की व्यापकता में देह के प्रति ममता नहीं रह पाती और न बचता है मन का कोई पृथक् अस्तित्व। अहंता यहाँ अस्तित्व को खो देती है। और चित्त के दर्पण में झाँकी होती है ब्रह्म की। ऐसे में किसी नये संस्कारों का उपजना सम्भव नहीं। यह ऐसी रहस्य कथा है, जिसे अनुभवी कहते हैं और अनुभवी ही समझते हैं। जो अनुभव पाने की डगर पर हैं, वे इस सूत्र को पकड़कर अपना नया अनुभव पा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Khare Vyaktitva Ki Kasuti खरे व्यक्तित्व की कसौटी (भाग 1)

व्यक्तित्ववान से तात्पर्य रंग रूप की सुन्दरता, कपड़ों की सज-धज, घुंघराले केश या साज-सज्जा के सामान से नहीं लगाया जाना चाहिए। यह विशेषताएं तो रंगमंच के नट नटियों में भी हो सकती हैं। पर इसके कारण उन्हें आकर्षक मात्र समझा जा सकता है। उन्हें व्यक्तित्ववान नहीं कहा जा सकता। ऐसे लोगों के प्रति किसी को श्रद्धा होती है न सम्मान। उन्हें कोई उत्तरदायित्वपूर्ण काम भी नहीं सौंपे जा सकते और न उनसे आशा की जा सकती है कि वे जीवन में कोई महत्वपूर्ण काम कर सकेंगे।

व्यक्तित्व से तात्पर्य शालीनता से है। जो सद्गुणों के उत्तम स्वभाव से सज्जनता से और मानवी गरिमा के अनुरूप अपनी वाणी, शैली, दिशाधारा एवं विधि-व्यवस्था अपनाने में है। यह सद्गुण स्वभाव के अंग होने चाहिए और चरित्र तथा व्यवहार में उनका समावेश गहराई तक होना चाहिए। अन्यथा दूसरों को फँसाने वाले ठग भी कुछ समय के लिए अपने को विनीत एवं सभ्य प्रदर्शित करते हैं। 

कोई जब उनके जाल में फँस जाता है तो अपने असली रूप में प्रकट होते हैं। धोखे में डालकर बुरी तरह ठग लेते हैं। विश्वासघात करके उसकी बुरी तरह जेब काटते हैं। कोई आदमी वस्तुतः कैसा है इसे थोड़ी देर में नहीं समझा जा सकता। उसकी पिछली जीवनचर्या देखकर वर्तमान संगति एवं मित्र मण्डली पर दृष्टिपात करके समझा जा सकता है कि उसका चरित्र कैसा है। यह चरित्र ही व्यक्तित्व की परख का प्रधान अंग है।

इसके अतिरिक्त, शिक्षा एवं विचार पद्धति भी देखने योग्य है। कुछ समय के वार्त्तालाप में मनुष्य की शिक्षा एवं आस्था का पता चल जाता है। चिन्तन वाणी में प्रकट होता है। ठग आदर्शवादी वार्त्तालाप कर सकने में देर तक सफल नहीं हो सकते। वे किसी को जाल में फँसाने के लिए ऐसी बातें करते हैं मानों उसके हितैषी हों और उसे अनायास ही कृपा पूर्वक कोई बड़ा लाभ कराना चाहते हैं। 

नीतिवान ऐसी बातें नहीं करते वे अनायास ही उदारता नहीं दिखाते और न अनुकम्पा करते हैं। न ऐसा रास्ता बताते हैं जिसमें नीति गँवाकर कमाई करने का दाँव बताया जा रहा है। व्यक्तित्ववान स्वयं नीति की रक्षा करते हैं भले ही इसमें उन्हें घाटा उठाना पड़ता हो। यही नीति उनकी दूसरों के सम्बन्ध में होती है। जब भी, जिसे भी वे परामर्श देंगे वह ऐसा होगा जिसमें चरित्र पर आँच न आती हो, भले ही सामान्य स्तर का बना रहना पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 25

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११४)

जब मिलते हैं व्यक्ति और विराट्

अंतर्यात्रा विज्ञान के रहस्यमय प्रयोगों का प्रभाव चित्त पर स्पष्ट दिखाई देता है। इसका सूक्ष्म, सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम परिशोधन होने से कर्मबीज, संस्कार, आसक्ति एवं अहंता हटते-मिटते हैं। जहाँ पहले प्रत्येक कर्म एवं भाव व विचार अपनी प्रगाढ़ स्थिति में चित्त पर अपनी अमिट छाप छोड़ते थे, वहीं अब यह स्थिति बदल जाती है। अब तो केवल चित्त पर उनका प्रतिबिम्ब पड़ता है और वह भी क्षणिक। जब तक कर्म अथवा भव-विचार की प्रगाढ़ क्रियाशीलता रहती है, तब तक चित्त के दर्पण पर उसकी झाँकी दिखती है, परन्तु जैसे ही इनकी स्थिति बदली, वैसे ही यह झलक भी मिट जाती है। इस परिशोधन से न केवल चित्त की क्रियाविधि, बल्कि उसका स्वरूप भी बदलता है। इसमें पारदर्शिता के साथ व्यापकता भी आती है। इसके संवेदन योग साधक के अंतस् में अतीन्द्रिय संवेदन एवं ब्रह्माण्डीय अनुभूतियों के रूप में उभरते हैं।

अब ऋतम्भरा प्रज्ञा के एक अन्य विशिष्ट गुण की चर्चा करते हुए महर्षि पतंजलि अपने एक नये सूत्र को प्रकट करते हैं-
‘तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी॥ १/५०॥’

शब्दार्थ- तज्जः = उससे उत्पन्न होने वाला; संस्कारः = संस्कार; अन्यसंस्कार प्रतिबन्धी = दूसरे संस्कारों का बाध करने वाला होता है।
भावार्थ- जो प्रत्यक्ष बोध निर्विचार समाधि में उपलब्ध होता है, वह सभी सामान्य बोध संवेदनाओं के पार होता है-प्रगाढ़ता मे भी, विस्तीर्णता में भी। यही वजह है कि इससे उत्पन्न संस्कार में अन्य सभी संस्कार विलीन हो जाते हैं।

यह भावदशा सामान्य अनुभव से परे है। यह बूझो तो जाने की स्थिति है, परन्तु साथ ही वैज्ञानिक भी है। संतों की उलटबासियाँ यहीं से शुरू होती है। अध्यात्मवेत्ताओं के कथन यहीं रहस्यमय हो जाते हैं, क्योंकि चेतना की इसी अवस्था में व्यक्ति एवं विराट् यहीं मिलते हैं, बल्कि यूँ कहें कि घुलते हैं। संक्षेप में यह मिलन बिन्दु है, घुलन बिन्दु है-व्यक्ति का विराट् में। जिसके साथ ऐसा हुआ अथवा हो रहा है वही इसे समझेगा। शेष को तो अविश्वास करना ही है। अब जैसे बर्फ के ठोस आकार को देखकर पारखी उसके पानी बनने की बात कह सकता है। उसके व्यापक होने की सम्भावनाएँ उसे उस बर्फ के टुकड़े में नजर आयेगी और साथ उससे आगे की अवस्था जबकि यह जल वाष्प बन जायेगा, उसके अपने मानसिक नेत्रों में झलकने लगेगी। लेकिन कोई गैर जानकार बर्फ के वाष्प होने की कहानी पर आश्चर्ययुक्त अविश्वास ही करेगा।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Do Not Panic or Perplex

Life is full of challenges and testing moments! Many a times the adverse circumstances are so intense that one just can’t bear them, he loses patience, gets anxious and panicked; cries on his destiny and helplessness… But this doesn’t solve the problem. The only source of definite support in such cases is – prudence and patience.

Ups and downs, good and bad experiences are natural phases of human life. We must remember this fact and convince ourselves of the truth that wisdom and pure knowledge (gyana) are the only keys to conquer the agonies caused by the tides of adversities or tragedies. Firm faith in God’s grace and justice is a must in such testing moments of sufferings. We must understand that our knowledge is too limited to grasp the system of God. Whether we realize it at that time or not, the circumstances and experiences that appear so painful to us also occur in fact for our welfare only.

Because of our half or illusory knowledge and narrow attitude, we cannot grasp the real cause or purpose behind the happenings in our life. We must accept it that major cause of our agonies and anxiety is our ignorance; we want everything to conform to our expectation, our favor. But the course of life has many dimensions, beyond our perception. Faith in absolute justice and mercy of the Omniscient God is all the more important in the moments of hardships and pains.

This gives us instant courage and light and helps maintain our calm without which we can’t even think properly. All religious scriptures preach the importance of the feeling of content and peace in all circumstance. It is indeed the nectar source of annulling all worries and panics even in the difficult, tragic situations. Adoption of peace, patience and satisfaction does not mean that you should not transact your duties or progress in your life. Rather, it implies that you should complete all your tasks, all duties, with mental stability and calm and a sense of inner faith in all circumstances.

📖 Akhand Jyoti, April 1943

👉 किसी परिस्थिति में विचलित न हों

जीवन में कई अवसरों पर बड़ी विकट परिस्थितियाँ आती हैं, उनका आघात असह्य होने के कारण मनुष्य व्याकुल हो जाता है और अपनी विवशता पर रोता-चिल्लाता है। प्रिय और अप्रिय घटनाएँ तो आती हैं और आती ही रहेंगी।

ऐसे अवसरों पर हमें विवेक से काम लेना चाहिए। ज्ञान के आधार पर ही हम उन अप्रिय घटनाओं के दु:खद परिणाम से बच सकते हैं। ईश्वर की दयालुता पर विश्वास रखना, ऐसे अवसरों पर बहुत ही उपयोगी है। हमारा ज्ञान बहुत ही स्वल्प है इसलिए हम प्रभु की कार्यविधि का रहस्य नहीं जान पाते जिन घटनाओं को हम आज अप्रिय देख-समझ रहे हैं, वे यथार्थ में हमारे कल्याण के लिए होती हैं।

हमें समझ लेना चाहिय कि हम अपने मोटे और अधूरे ज्ञान के आधार पर परिस्थितियों का असली हेतु नहीं जान पाते, तो भी उसमें कुछ-न-कुछ हमारा ति अवश्य छिपा होगा, जिसे हम समझ नहीं पाते। कष्टों के समय हमें ईश्वर की न्यायपरायणता और दयालुता पर अधिकाधिक विश्वास करना चाहिए। इससे हम घबराते नहीं और उस विपत्ति के हटने तक धैर्य धारण किए रहते हैं। संतोष करने का शास्त्रीय उपदेश ऐसे ही समय के लिए है। कर्त्तव्य करने में प्रमाद करना, संतोष नहीं वरन् आई हुई परिस्थिति में विचलित न होना, संतोष है। संतोष के आधार पर कठिन प्रसंगों का आधार पर हल्का हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति -अप्रैल 1943

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११३)


बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य
    
इस सूत्र में उलट बासी तो है, थोड़ा अटपटा सा भी है। पर है एक दम खरा। पर जो समझे उसके लिए। यहाँ तक कि वैज्ञानिकों के लिए भी यह काफी दिनों तक एक गणितीय पहेली बना रहा। हालाँकि इन दिनों उन्होंने फोटान की भाषा सीख ली है और कम्प्यूटर नेटवर्क के जरिए वे उसका इस्तेमाल करने लगे हैं। फिर भी एक पहेली तो उनके सामने बची हुई है ही कि एक साथ सब कुछ एक समय में कैसे जाना जा सकता है। फोटान की भाषा सीखने के बाद उनकी मानसिक चेतना तो सीमित ही है। यदि उनसे आत्मविकास की साधना हो सके, तो शायद जान पाएंगे कि आध्यात्मिक अनुभव में आत्मचेतना के विस्तार में सब कु छ एक साथ एक समय में जान लिया जाता है।
    
योगियों को ऐसे अनुभव होते रहे हैं। स्वामी विवेकानंद जी महाराज के जीवन का एक आध्यात्मिक प्रसंग है, उन दिनों वे अल्मोड़ा में रहकर साधना कर रहे थे। निपट एकाकी वन में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे। इन्द्रिय चेतना प्रत्याहार में विलीन हो गयी थी। निराकार सर्वव्यापी परम सत्ता क ी धारणा ध्यान की लय पा चुकी थी। यह ध्यान उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होता हुआ कब समाधि के सोपान चढ़ने लगा यह काल को भी पता न चला। और उन्हें इसी मध्य एक अनुभव हुआ पिण्ड के ब्रह्माण्ड का। व्यक्ति चेतना में समष्टि चेतना का अनुभव और धीरे-धीरे यह अनुभव ब्रह्माण्ड बोध में बदल गया।
    
जब उच्चस्तरीय समाधि की भाव भूमि से दैहिक चेतना में लौटे तो उन्होंने अपने गुरूभाई स्वामी तुरीयानंद से इसकी चर्चा की। बोले-हरी भाई मैं जान लिया। मुझे हो गया अनुभव अस्तित्व व्यापी चैतन्यता का। इसी को तो योगेश्वर कृ ष्ण कहते है, कि क ोई इसे आश्चर्य से सुन कहता है और कोई इसे आश्चर्य से सुनता है और कोई विरला इस आश्चर्य को सम्पूर्ण रूप से जानता है। योगी के उल्लास में से ये सभी आश्चर्य एक साथ अंकुरित-पल्लवित होते है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११२)

बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य 
सच की सम्पूर्णता तो तभी सम्भव है, जब वह सम्पूर्ण अस्तित्व की अनन्तत्व के कण-कण में समाया हो। मनीषी वैज्ञानिक आइन्सटीन के इस सिद्घांत का दूसरा पहलू क्वाण्टम् सिद्घांत में हैं। इसका प्रवर्तन मैक्सप्लैंक एवं हाइजेनबर्ग आदि वैज्ञानिकों ने किया था। उनका कहना था कि पदार्थ का सच ज्यादा टिकाऊ नहीं है। उन्होंने बताया- पदार्थ एवं ऊर्जा निरन्तर एक-दूसरे में बदलते रहते हैं और जिस तरह से पदार्थ का सबसे छोटा कण परमाणु है, उसी तरह से ऊर्जा का सबसे छोटा पैकेट क्वाण्टा है। इस क्वाण्टा की स्थिति अनिश्चित है। इसमें वस्तु जैसा कुछ भी नहीं है। ऊपर इनमें परस्पर गहरा जुड़ाव है। यह जुड़ाव इतना अधिक है कि अभिन्न भी कहा जा सकता है। 
विज्ञान के इन दोंनों सिद्घांतों ने ज्ञान- के खोजियों के सामने एक बात बड़ी साफ कर दी है कि अनुभव यदि पदार्थ के, वस्तु के , व्यक्ति के अथवा स्थिति के हैं और यदि इन्हें इन्द्रियों के झरोखों से पाया गया है, तो कभी सम्पूर्ण नहीं हो सकते। इतना ही नहीं, इन्हें सन्देह एवं भ्रम से परे भी नहीं कहा जा सकता। इस तरह के अनुभव में तो कई दीवारें है, अनेकों पर्दे हैं। एक दीवार इन्द्रियों की- एक पर्दा स्नायु जाल का। फिर एक दीवार मस्तिष्क की। फिर एक पर्दा विचार तंत्र का। हम ही सोच लें—कितनी अपूर्णता होगी इस अनुभव में। 
परम पूज्य गुरूदेव कहते थे कि अनुभव वह,जिसमें कोई दीवार या पर्दा न हो। अब यह क्या बात है कि आँख का देखा कुछ और, और यदि किसी सूक्ष्मदर्शी या दूरदर्शी यंत्र से देखा तो और। कानों ने एक खबर सुनायी और बुद्घि ने कुछ अनुमान सुझाए, पर अन्तःकरण अनुभव से रीता रहा। चेतना वैसी ही कोरी व सूनी बनी रही। लेकिन जिसकी प्र्रज्ञा ऋतम्भरा से संपूरित हो गयी उसके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं। निर्विकार समाधि की भाव दशा में अस्तित्व व्यापी चेतना की अनन्तता में सत्य अपने सम्पूर्ण रूप से प्रकाशित होता है। इसी अनुभव को पाकर सन्त कबीर बोल उठे-कहत कबीर मैं पूरा पाया अर्थात् मैने पूरा पा लिया। पूर्णिमा की चाँदनी से उद्भासित हो गया अन्तःकरण।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 कैसे भूलें अपनी गलतियों को: स्वयं को माफ़ करने के 5 तरीके


कभी कभी हम कुछ ऐसा कर बैठते है या बोल देते हैं जिसके लिए हमें बाद में बेहद पश्चाताप होता है।
खासकर तब जब आपने किसी अपने का दिल दुखाया हो।

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर  ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।

अपने आप को और अपनी गलतियों को माफ़ करने में कुछ बातें बेहद सहायक होती हैं।

◆ 1. दूसरों को दोष देना बंद करें:

अपने आप को माफ़ करने से पहले ये जान लेना जरुरी है कि आखिर आपने किया क्या था। आपके साथ हुयी घटना को विस्तार से लिख लें और अपने उन बातों  को भी लिखें जिससे उस घटना के घटने में मदद मिली हो। किसी और व्यक्ति या परिस्थितियों को दोष देने से बचें और सिर्फ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करें। हो सकता है ऐसे करते समय आप असहज महसूस करें।

■ 2. माफ़ी मांगने में संकोच न करें:

कुछ इस तरह हमने अपनी जिंदगी आसान कर ली ,
कुछ को माफ़ कर दिया और कुछ से माफ़ी  मांग ली।


हालाँकि माफ़ी मांगना इतना आसान नहीं होता लेकिन अगर आप किसी से माफ़ी मांगने के लिए पहल करते हैं तो ये दर्शाता है कि आपसे गलती हुयी थी और आप उसके लिए शर्मिन्दा हैं, और इस तरह आप वैसी गलतियों को दोहराने से बच जाते हैं।

3. नाकारात्मक विचारों को उत्पन्न होते ही त्याग दें:

कभी कभी माफ़ किये जाने पर भी हम अपने आप को माफ़ नहीं कर पाते।  स्वयं को माफ़ करना एक बार में ही संभव नहीं है, यह धीरे-धीरे समय के साथ परिपक्व होता है। इसलिए जब भी आपके मन में नाकारात्मक विचार आये गहरी सांस लेकर उसे उसी समय निकल दें और अपना ध्यान कहीं और लगायें, या इस तरह की कोई प्रक्रिया जिसे आप पसंद करते हों अपनाएँ।

4. शर्म के मरे छुपने की वजाय सामने आईये:

अपनी किसी भयंकर गलती के बाद शर्म से छुप जाना बिलकुल भी अच्छा नहीं है। अपनी गलती के बाद हम अपने दोस्त से नजरें मिलाने में झिझकते है क्यूंकि हमें डर होता है की कहीं वह मुझे पिछली बात को याद न करा दे, लेकिन जैसे ही हम उनसे मिलने की हिम्मत जुटाते है  महसूस होगा कि हमारा डर गलत था।

5. अपनी गलतियों के लिए आभारी बने:

अपनी गलतियों के प्रति आभारी होना आपको बिलकुल विचित्र लगेगा खासकर वैसी गलतियां जिनसे आपको शर्मिंदगी महसूस हुयी हो या दुःख पहुंचा हो लेकिन अगर आप गौर से एनालाइज करेंगे तो पाएंगे कि ऐसी की गयी गलतियों ने आपको कितना मजबूत और सुदृढ़ किया है।  आप ये देख पाएंगे कि इन्ही गलतियों की वजह से ही आप अधिक बुद्धिमान, मजबूत और विचारशील हो पाये हैं।  

👉 स्वर्ण जयंती मना रहा है



शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।
धर्मतंत्र का स्वर्ण  गान यह, सारे जग को सुना रहा है।।

गुरुवर ने निज कर कमलों से, शांतिकुंज निर्माण किया।
विश्वामित्र की तपस्थली में, ऋषियों का आह्वान किया।।
महा पुरश्चरणों से माँ ने, तपः क्षेत्र  विकसाया था ।
प्राणों का प्रत्यावर्तन करके, आश्रम दिव्य बनाया था।।
बीजारोपण वर्ष  इकहतर, से तरु बन लहलहा रहा है ।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।1

कल्प और चान्द्रायण से ही, साधकों को बल दिया है।
साधना से  सिद्धि पा, हर समस्या का हल दिया है ।।
देव कन्याओं के तप ने, वातावरण बनाया  था।
युग शक्ति ही नारी शक्ति है, माताजी ने तपाया था।।
सिद्धियों की दिव्य प्रभा अब,अम्बर तक झिलमिला रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।2

वानप्रस्थ से ज्ञान क्रांति का,सतत अभियान चलाया था।
महिला जाग्रति शंख बजाकर, ब्रह्मवादिनी बनाया था।।
वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को, ब्रह्मवर्चस निर्मित किया।
धर्म के शाश्वत स्वरुप को, जनहित में प्रस्तुत किया।।
शक्तिपीठ हैं शक्तिकेंद्र अब, दीप्त हो जगमगा रहा है ।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।3

सूक्ष्मीकरण साध गुरुवर ने, वीरभद्र उत्पन्न किये ।
पांच शरीर से एक साथ में, असंभव सम्पन्न किये।।
गुरुवर के हीरक जयंती पर,यज्ञ अभियान चलाया था।
राष्ट्रीय एकता यज्ञों से, भारत को श्रेष्ट बनाया  था।।
मत्स्यावतार अपनी काया को, हरपल हरक्षण बढ़ा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।4

महाप्रयाण कर स्थूल देह को, पंचतत्व में लीन किया ।
सबकी आँखों से ओझल हो, गुरुवर ने ग़मगीन किया।।
ब्रह्म्वेदी यज्ञों से गुरु ने, सोया राष्ट्र जगाया है।
सूक्ष्म रूप में गुरु चेतना, शांतिकुंज में समाया है।।
शांतिकुंज का कोना कोना, गुरु-गान गुनगुना रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।5

श्रद्धांजलि देकर शिष्यों ने, अपना फर्ज  निभाया है ।
देश धर्म संस्कृति रक्षा को, माटी ले शपथ उठाया है।।
अश्वमेधों का दौर चल पड़ा, धर्म तंत्र  मजबूत  हुआ।
दिग्दिगंत तक धर्म ध्वजा ले, क्रांति का अग्रदूत गया ।।
देव संस्कृति का परचम अब, अपने जलवे दिखा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।6

माताजी के महा प्रयाण से, पुत्रों ने दुःख पाया था ।
स्नेह सलिला जीजी ने हम, सबको गले लगाया था।।
गुरु अभियानों को श्रधेय ने, गति देकर आश्वस्त किया।
जन मानस के अंध तमस को, प्रखर-ज्ञान से ध्वस्त किया।।
अखंड ज्योति के दिव्य ज्ञान से, अज्ञानता को मिटा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।7

पूर्णाहुति कर महाकुम्भ सा, जन सैलाब जुटाया था।
धरती के कोने कोने तक, धर्म ध्वजा फहराया था।।
चेतना केन्द्रों की स्थापना, का संकल्प जगाया था।
गंगा को निर्मल करने का, जन अभियान चलाया था।।
प्रौढ़ शांतिकुंज स्वर्ण रश्मियों, से देखो जगमगा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है ।।8

कन्या कौशल शिविरों से, नारी सम्मान जगाया है।
‘दीया’ जलाकर युवा मनों में, नव विश्वास जगाया है।।
गाँव गाँव में नशा निवारण, का अभियान चलाया है।
स्वस्थ शरीर स्वच्छ मन सबका, सभ्य समाज बनाया है।।
पर्यावरण  को शुद्ध  कराने, वृक्षारोपण करा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।9

संस्कारों की परिपाटी को, फिर से जीवनदान मिला।
तीर्थ क्षेत्र में संस्कारों को पुनः उचित स्थान मिला।।
शिक्षा,स्वास्थ्य, साधना जैसे, क्रांति का आगाज हुआ।
सप्त क्रांतियों की धूम मची, अश्वमेधों का प्रयाज हुआ।।
नवल विश्व के नव समाज में, नवीन चेतना जगा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।10

भाषांतर कर शांतिकुंज से, साहित्य का विस्तार किया ।
हर भाषा में  हर लोगों तक, गुरु का श्रेष्ठ विचार दिया ।।       
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम, युग निर्माण का नारा है।
अखिल विश्व में दिग्दिगंत तक शांतिकुंज अति प्यारा है।।  
लक्ष एक से कोटि कोटि तक अपना परिकर बढ़ा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है ।11

विश्व विद्यालय गुरुवर के, सपनों का विद्यालय  है।
देव संस्कृति जग में फैले, मानवता का आलय है।।
तकनीकों का प्रयोग हम, जन हित में ही करते है।
प्राचीन विद्या का प्रसार हम, तकनीकों  से करते हैं।।
एकहतर की छोटी बगिया, कोटि-कोटि फूल खिला रहा है।

शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है ।।12
संकट की घड़ियाँ है बीती, नया सूर्य अब चमक रहा है।
स्वर्णमयी आभा है इसकी, शांतिकुंज अब दमक रहा है ।।
स्वर्ण जयंती संग महाकुम्भ का, दिव्य संयोग सुहाना है।
धरती पर ही स्वर्ग सृजन में, जन-जन को लग जाना है।।
घर घर गंगा जल पहुचाकर, कुम्भ घरों में मना रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।13      

उमेश यादव

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

👉 बसंत पर्व


गुरुवर का शुभ जन्मदिवस है, शुभ  मंगल कर दे।
बसंत पर्व पर हम शिष्यों को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ गायत्री वर दे।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ भारती वर दे।।

ठिठुरन बीत गया है अब तो, मधुर मास है आया।
प्रकृति ने की नव श्रृंगार, सर्वत्र उल्लास है छाया।।
युग-निर्माण  को आतुर हैं हम, शक्ति सुधा भर दे।
बसंत पर्व पर हम शिष्यों को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ गायत्री वर दे।

पक्षियों का कलरव कहता है,नया समय अब आया।
पतझर बीता, पुष्प खिले, कोयल ने तान सुनाया।।
खुशियों की चल पड़े बयार अब,जग में सुख भर दे।
बसंत पर्व पर हम  शिष्यों  को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ गायत्री वर दे।

पीत पवित्र पुष्पों की चादर, मन हर्षित करता है।
भंवरों का गुंजार ह्रदय को, अभिमंत्रित करता है।।
माँ  शारदा दिव्य ज्ञान दे, वाणी को नव स्वर दे।
बसंत पर्व पर हम शिष्यों को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे,वर दे,वर दे, माँ गायत्री वर दे।

नव वसंत के, नयी उषा से, नया सूर्य चमकेगा।
नवयुग के इस नवल व्योम में,नव विहंग चहकेगा।।
हे युग ऋषि नव शक्ति भक्ति दे,मन निर्मल कर दे।
बसंत पर्व पर हम शिष्यों को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ गायत्री वर दे।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ भारती वर दे।

उमेश यादव

👉 ऋतु बसंत है आया



मधुमास बसंत है आया, प्रेरक उमंग है लाया।
नव्य शक्ति से, नवल प्राण ले, नव संकल्प जगाया।।

झूम रहा है रोम-रोम तन, मन भी आज हर्षित है।
कण कण में उल्लास भरा,जड़ चेतन आकर्षित है।।
शांतिकुंज के हर जन मन में, दिव्य भाव है छाया।
नव्य शक्ति से, नवल प्राण ले, नव संकल्प जगाया।।

थिरक रहा है अंग अंग सुन, थापें अब गुरुवर के।
मन कोकिला चहकती है बस,माताजी के स्वर से।।
साँसों में  प्रभु तुम्ही बसे हो, तुझमें प्राण समाया।
नव्य शक्ति से, नवल प्राण ले, नव संकल्प जगाया।।

सौरभ-सुरभित दसो दिशा में, रम्य अलौकिक पावन।
किसलय कोंपल पुष्पित-पल्लवित, नैसर्गिक मनभावन।।
ज्ञान,  कला, संगीत सुशोभित, रंग बासंती छाया।
नव्य शक्ति से, नवल प्राण ले, नव संकल्प जगाया।।

तेरे  स्वर को कर्ण आतुर  हैं, पंचम  सुर  में गाओ।
मन  मयूर  नर्तन  करता है, नट हो आप नचाओ।।
श्रधेय-द्वय  के स्नेह प्यार से, दिव्य उछाह है छाया।
नव्य शक्ति से, नवल प्राण ले, नव संकल्प जगाया।।

उमेश यादव

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

👉 जुट पड़ें निर्माण में



फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी,
जुट पड़ें निर्माण में अब छोड़कर आलस सभी।

पौष में हम जम गए थे, राह में हम थम गये थे,
बैठे थे खुद में सिमटकर, अपने में ही रम गए थे,
जो न अब भी जाग पाया, जाग पायेगा कभी?
फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी।

माघ है लाया नया संदेश  फिर  उत्साह का,
फिर उठो पाथेय ले चिंतन करो नव राह का,
जो समय आया है  दुर्लभ वो न आएगा कभी,
फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी।

ये न समझो है कठिन भव बंधनो को तोड़ना,
त्यागकर निज स्वार्थ सब जन-जन से खुद को जोड़ना,
फागुनी उल्लास में अब मन मुदित होंगे सभी,
फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी।

रंग बसंती है मिला गुरुवर से ये अनुदान में,
हम नहीं पीछे हटेंगे, त्याग में बलिदान में,
संकल्प पूरे होते हैं जब मिलके करते हैं सभी,
फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी।

~ सुधीर भारद्वाज

👉 तपोभूमि है गुरुवर की



तपोभूमि है गुरुवर की, यह जनजन  का गुरुधाम ।
शांतिकुंज  चैतन्य  तीर्थ  को,  बारम्बार  प्रणाम।।

गुरुकुल आरण्यक आश्रम है, होता जनकल्याण है। 
दिव्य प्रखर उर्जा गुरुवर की,संचारित अविराम है।। 
ऋषियों की यह दिव्य भूमि है, गंगा गोद ललाम। 
शांतिकुंज  चैतन्य  तीर्थ  को,  बारम्बार  प्रणाम।।

कठिन तपस्या से गुरुवर ने, जाग्रत तीर्थ बनाया।
गायत्री के महाशक्ति को,जन जन तक  पहुँचाया।।
स्वर्ण जयंती  है  शांतिकुंज की, माँ गायत्री धाम।
शांतिकुंज  चैतन्य  तीर्थ  को,  बारम्बार  प्रणाम।।

रोम रोम पुलकित हो जाता,शांतिकुंज में आने से।
अंतर्मन पुष्पित हो जाता, तीर्थ वास कर पाने से।।
जप ध्यान यज्ञ और योग यहाँ,होते रहते अविराम। 
शांतिकुंज  चैतन्य  तीर्थ  को,  बारम्बार  प्रणाम।।

उमेश यादव

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १११

बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य 

अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग से अन्तस् में आध्यात्मिक अनुभव पल्लवित होते हैं। चित्त शुद्घि के स्तर के अनुरूप इन अनुभवों की प्रगाढ़़ता, परिपक्वता एवं पूर्णता बढ़ती जाती है। सामान्य जानकारियों वाले ज्ञान से इनकी स्थिति एकदम अलग होती है। सामान्य जानकारियाँ या तो सुनने से मिलती हैं अथवा फिर बौद्घिक अनुमान से। ये कितनी भी सही हो, पर अपने अस्तित्व के लिए परायी ही होती हैं। इनके बारे में कई तरह की शंकाएँ एवं सवाल भी उठते रहते हैं। इनके बारे में एक बात और भी है, वह यह कि आज का सब कल गलत भी साबित होता रहता है। पर आध्यात्मिक अनुभवों के साथ ऐसी बात नहीं है। ये अन्तश्चेतना की सम्पूर्णता में घटित होते हैं। इनका आगमन किन्हीं ज्ञानेन्द्रियों के द्वारों से नहीं होता और न ही किन्हीं पुस्तकों में लिखे अक्षरों से इनका कोई सम्बन्ध है। ये तो अन्तर में अंकुुरित होकर चेतना के कण-कण में व्याप्त हो जाते है।

सामान्य क्रम में बुद्घि अस्थिर, भ्रमित एवं सन्देहों से चंचल रहती है। इसमें होने वाले अनुभव भी इसी कारण से आधे-अधूरे और सच-झूठ का मिश्रण बने रहते हैं। ज्ञानेन्द्रियों का झरोखा भी धोखे से भरा है, जो कुछ दिख रहा है, वह सही हो यह आवश्यक तो नहीं है। जो अभी है कल नहीं भी हो सकता है। इस तरह कई अर्थों में आध्यात्मिक अनुभव अनूठे और पूरे होते हैं। 

इसी सत्य को महर्षि ने अपने अगले सूत्र में कहा है-
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्॥ १/४९॥
शब्दार्थ-श्रु्रतानुमानप्रज्ञाभ्याम्= श्रवण और अनुमान से होने वाली बुद्घि की अपेक्षा; अन्यविषया= इस बुद्घि का विषय भिन्न है; विशेषार्थत्वात्= क्योंकि यह विशेष अर्थवाली है।
भावार्थ- निर्विचार समाधि की अवस्था में विषय वस्तु की अनुभूति होती है, उसकी पूरी सम्पूर्णता में। क्योंकि इस अवस्था में ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होता है, इन्द्रियों को प्रयुक्त किए बिना ही।
महर्षि पतंजलि के इस सूत्र में एक अपूर्व दृष्टि है। इस दृष्टि में आध्यात्मिक संपूर्णता है। जिसमें आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी स्वतः समावेशित हो जाता है। जिनकी दार्शनिक रुचियाँ गम्भीर हैं, जो आध्यात्मिक तत्त्वचर्चा में रुचि रखते हैं उन्हें यह सच भी मालूम होगा कि आध्यात्मिकता का एक अर्थ अस्तित्व की सम्पूणर््ाता भी है। बाकी जहाँ-कहीं जो भी है, वह सापेक्ष एवं अपूर्ण है। विज्ञान ने बीते दशकों में सामान्य सापेक्षिता सिद्घांत एवं क्वाण्टम् सिद्घांत की खोज की है। ये खोजें आध्यात्मिक अनुभवों को समझने के लिए बड़ी महत्वपूर्ण हैं। सामान्य सापेक्षिता सिद्घांत का प्रवर्तन करने वाले आइन्सटीन का कहना है-वस्तु, व्यक्ति अथवा पदार्थ का सच उसकी देश- काल की सीमाओं से बँधा है। जो एक स्थल और एक समय सच है, वही दूसरे स्थल और समय में गलत भी हो सकता है। इस सृष्टि अथवा ब्रह्माण्ड के सभी सच इस सिद्घांत के अनुसार आधे अधूरे और काल सापेक्ष है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Gita Sutra No 9 गीता सूत्र नं० 9

👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

श्लोक-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

अर्थ-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

सूत्र –
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

👉 जनजन का गुरुधाम












दिव्य-तीर्थ यह शांतिकुंज है,जनजन का गुरुधाम है।
माँ गायत्री सुरसरि संगम, पावन तीर्थ स्थान है।।  

गंगा के पावन जल से नर,मोक्ष मुक्ति पा जाता है। 
गायत्री की जप करने से, मन निर्मल हो जाता है।।
गंगा  गायत्री  दोनों   ही, करते  जन  कल्याण  है। 
दिव्य-तीर्थ यह शांतिकुंज है,जनजन का गुरुधाम है।।

शांतिकुंज का स्वर्ण जयंती है,कुम्भ पर्व भी आया है। 
शांतिकुंज चैतन्य तीर्थ में, दिव्य उल्लास समाया है।।
प्रखर-प्रज्ञा व सजल-श्रधामय,युगऋषि का तपधाम है।
दिव्य-तीर्थ यह शांतिकुंज है,जनजन का गुरुधाम है।।

शांतिकुंज के दिव्यांगन में, यज्ञ योग और जाप करें। 
पूर्ण  करें  शुभ  मनोकमना, जीवन  के संताप हरें।। 
माँ गंगा  गायत्री  गुरुवर से प्राणित तीर्थ  महान है।
दिव्य-तीर्थ यह शांतिकुंज है,जनजन का गुरुधाम है।।

-उमेश यादव

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११०)

निर्मल मन को प्राप्त होती है—ऋतम्भरा प्रज्ञा

यहाँ पहुँचते ही जीवन चेतना शिकायतों-सन्देहों, उलझनों, भ्रमों से मुक्त हो जाती है। सब कुछ समझ में आने लगता है, एकदम साफ-साफ और सुस्पष्ट। प्रत्येक तत्त्व की स्थिति ही नहीं, उसका औचित्य भी स्पष्ट हो जाता है। और तब पता चलता है कि यथार्थ में परेशान होने का कोई कारण ही नहीं है। यही विशेषता है—इस भावदशा का।

ऋतम्भरा में सर्वत्र सम्पूर्णता ही है। और इस सम्पूर्ण में सभी कुछ इतनी समस्वरता एवं संगीत लिए है कि बस माधुर्य के अलावा कुछ बचता ही नहीं। यहाँ केवल जीवन ही नहीं, मृत्यु का भी अपूर्व सौन्दर्य है। हर वस्तु नए प्रकाश में आलोकित होता है। पीड़ा भी, दुःख भी एक नए गुणवत्ता के साथ स्वयं को प्रकट करते हैं। यहाँ असुन्दर भी सुन्दर हो जाता है, क्योंकि तब पहली बार समझ में आता है कि विपरीतता, विषमता क्यों आवश्यक है। और तब ये सब और इनमें से कुछ भी असुविधाजनक नहीं रहता। सब का सब एक दूसरे के सम्पूरक हो जाता है। यह बड़ा ही स्पष्ट अनुभव होता है-ये सभी तत्त्व एक दूसरे की मदद के लिए हैं।

सामान्य बोलचाल में- जिसे हम सब कहते-सुनते हैं, भगवान् का प्रत्येक विधान मंगलमय है। उसकी सही समझ चेतना की इसी अवस्था में समझ आती है। प्रज्ञा के ऋतम्भरा होने पर ही भगवान् के मंगलमय विधान का बोध होता है। अभी वर्तमान में एक कोरा कथन है- जिसमें शब्द तो बोले जाते हैं, परन्तु उनमें कोई अर्थ नहीं होता। बस एक ध्वनि बनकर कानों में गूँज जाती है। इसमें अस्तित्व के प्राण नहीं बसते। परन्तु प्रज्ञा के ऋतम्भरा होने पर इस मंगलमयता की प्रतिपल प्रतिक्षण अनुभूति होती रहती है। और योगी बन जाता है—मीरा की तरह, सुकरात की भाँति। उसे प्राप्त होती है महात्मा ईसा की अवस्था, जिसमें विष का प्याला, सूली की चुभन भी मंगलमय नजर आती है; क्योंकि तब इसकी बहुमूल्यता अनुभूत होने लगती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Jeev Ke Char Prakar जीव के चार प्रकार

जीव चार प्रकार के कहे गए हैं – बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य। संसार मानो जाल है और जीव मछली। ईश्वर, यह संसार जिनकी माया है, मछुए हैं। जब मछुए के जाल में मछलियाँ पड़ती हैं, तब कुछ मछलियाँ जाल चीरकर भागने की अर्थात् मुक्त होने की कोशिश करती हैं। उन्हें मुमुक्षु जीव कहना चाहिए।

जो भागने की चेष्टा करती हैं, उनमें से सभी नहीं भाग सकतीं। दो-चार मछलियाँ ही धड़ाम से कूदकर भाग जाती हैं। तब लोग कहते हैं, वह बड़ी मछली निकल गयी। ऐसे ही दो-चार मनुष्य मुक्त जीव हैं। कुछ मछलियाँ स्वभावत: ऐसी सावधानी से रहती हैं कि कभी जाल-सहित इधर से उधर भागती हैं, और सीधे कीच में घुसकर देह छिपाना चाहती हैं। भागने की कोई चेष्टा नहीं, बल्कि कीच में और गड़ जाती हैं। ये ही बद्ध जीव हैं। बद्ध जीव संसार में अर्थात् कामिनी कांचन में फँसे हुए हैं, कलंकसागर में मग्न हैं, पर सोचते हैं कि बड़े आनन्द में हैं !

जो मुमुक्षु या मुक्त हैं, संसार उन्हें कूप जान पड़ता है, अच्छा नहीं लगता। इसीलिए कोई-कोई ज्ञान-लाभ, ईश्वरलाभ हो जाने पर शरीर छोड़ देते हैं, परन्तु इस तरह का शरीरत्याग बड़ी दूर की बात है।

‘‘बद्ध जीवों – संसारी जीवों को किसी तरह होश नहीं होता। कितना दुख पाते हैं, कितना धोखा खाते हैं, कितनी विपदाएँ झेलते हैं, फिर भी बुद्धि ठिकाने नहीं आती। ऊँट कटीली घास को बहुत चाव से खाता है। परन्तु जितना ही खाता है उतना ही मुँह से धर-धर खून गिरता है, फिर भी कँटीली घास को खाना नहीं छोड़ता! संसारी मनुष्यों को इतना शोकताप मिलता है, किन्तु कुछ दिन बीते कि सब भूल गए।

राम कृष्ण परमहंस

👉 Gita Sutra No 8 गीता सूत्र नं० 8

👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

श्लोक-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।


अर्थ-
हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

सूत्र-
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

👉 Shantikunj Swarn Jayanti स्वर्ण जयंती के क्षण में



गुरुवर आपकी सांस बसी है, शांतिकुंज के कण कण में
एक बार आ जाओ फिर से, स्वर्ण जयंती के क्षण में।
नयन हमारे राह तक रहे, कर्तव्यों के इस रण में,
एक बार आ जाओ फिर से, स्वर्ण जयंती के क्षण में।

ज्योति अखंड आवाहन करती, गुरुवर तुम्हें बुलाती है,
सजल नयन के अश्रु पोंछकर, प्रखरतम उन्हें बनाती है।
शीतलता का भान करा दो, दावानल से इस वन में,
एक बार आ जाओ फिर से, स्वर्ण जयंती के क्षण में।

युवाओं की आस तुम्हीं से, नवयुग का विश्वास है,
हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, बस इतना ही प्रयास है।
कायाकल्प फिर आज करा दो, इस मानवीय जीवन में,
एक बार आ जाओ फिर से, स्वर्ण जयंती के क्षण में।

गंगा की धारा तुम ही हो, विचार क्रांति अभियान तुम,
मात-पिता और बंधु-सखा तुम, मेरे तो भगवान तुम,
हर पल तुमको देखा मैंने, उज्ज्वल भविष्य आश्वासन में,
एक बार आ जाओ फिर से, स्वर्ण जयंती के क्षण में।

✍🏻 डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०९)

निर्मल मन को प्राप्त होती है—ऋतम्भरा प्रज्ञा

अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग- विशेष तौर पर ध्यान की प्रणालियाँ, बुद्धि के इस कल्मष को दूर करती है। इस कल्मष के दूर होने से इसमें सहज निर्मलता आती है। इसके विकार दूर होने से इसमें न केवल सत्य का आकलन करने की योग्यता विकसित होती है, बल्कि इसमें ऋत् दर्शन की दृष्टि भी पनपती है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव अपनी आध्यात्मिक चर्चाओं में सत्य के दो रूपों की चर्चा किया करते थे। एक वह जो सामान्य इन्द्रियों एवं साधारण बौद्धिक समझ से देखा व जाना जाता है। जिसके रूप काल एवं परिस्थिति के हिसाब से बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए टेबिल में पुस्तक रखी है। यह सत्य है, किन्तु यह सत्य एक सीमित स्थान एवं सीमित समय के लिए है। समय एवं स्थान के परिवर्तन के साथ ही यह सत्य- सत्य नहीं रह जाएगा।

सत्य के इस सामान्य रूप के अलावा एक अन्य रूप है, जो सर्वकालिकम एवं सार्वभौमिक है। यह अपरिवर्तनीय है। क्योंकि यह किसी एक स्थान से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व से जुड़ा है। यह सत्य अस्तित्व के नियमों का है। भौतिक ही नहीं, अभौतिक या पराभौतिक प्रकृति इस दायरे में आते हैं। यह न बदलता है और न मिटता है। इसे जानने वाला सृष्टि एवं स्रष्टा के नियमों से परिचित हो जाता है। इसकी प्राप्ति किसी तार्किक अवधारणा या फिर किसी विवेचन, विश्लेषण से नहीं होती। बल्कि इसके लिए सम्पूर्ण अस्तित्व से एक रस होना पड़ता है। और ऐसा तभी होता है, जब योग साधक के चित्त को निर्विकार की भावदशा प्राप्त हो।

ऋत् में सत्य की शाश्वतता के साथ परमात्मा की सरसता है। रसौ वैः सः की दिव्य अनुभूति इसमें जुड़ी है। यथार्थ में ऋत् है अन्तरतम अस्तित्व, जो हमारा अन्तरतम होने के साथ सभी का अन्तरतम है। जब योगी को निर्विचार समाधि की अवस्था प्राप्त होती है, तो उसकी प्रज्ञा ऋतम्भरा से आलोकित-आपूरित हो जाती है। उसमें ब्रह्माण्ड की समस्वरता स्पन्दित होने लगती है। यहाँ न कोई द्वन्द्व है और न किसी अव्यवस्था की उलझन। जहाँ कहीं जो भी न कारात्मक है, जो भी विषैला है, वह सबका सब विलीन, विसर्जित हो जाता है। ध्यान रहे कि यहाँ किसी को निकाल फेंकने की जरूरत नहीं रहती, क्योंकि सम्पूर्णता में सबको जीवन के सभी तत्त्वों को उनका अपना स्थान मिल जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Gita Sutra No 7 गीता सूत्र नं० 7

👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

श्लोक-
 न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।


अर्थ-
ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही करावे।

सूत्र –
ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

Gita Sutra No 6 गीता सूत्र नं० 6

👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

श्लोक-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।

अर्थ-  
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।

सूत्र-
यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०८)

निर्मल मन को प्राप्त होती है—ऋतम्भरा प्रज्ञा

अन्तःस्थल को निर्मल कर देने वाले अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग चित्त पर अपना प्रभाव डालते हैं। इन प्रयोगों से चित्त की अवस्थाओं में परिवर्तन आते हैं- एक रूपान्तरण की प्रक्रिया घटित होती है। इस प्रक्रिया की तीव्रता के अनुरूप ही परिवर्तित होता है जीवन। चित्त में संस्कार एवं कर्मबीजों की परतों के अनुसार ही जीवन का स्वरूप विकसित होता है। ये विविध संस्कार एवं कर्मबीज काल क्रम में अपनी परिपक्वता के अनुसार ही प्रकट होते हैं। इनके प्रकट होने की अवस्था के अनुरूप ही जीवन की दशा व दिशा बदल जाती है। शुभ संस्कार एवं पुण्य कर्म के प्रकट होने से जहाँ जीवन शुभ व प्रकाश से पूरित होता है, वहीं अशुभ संस्कार एवं पाप कर्म के प्रकट होने से जीवन अशुभ एवं अंधेरे से भर जाता है। योग की वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ- ध्यान के प्रयोग चित्त को उत्तरोत्तर निर्मल बनाते हैं। इससे संस्कारों एवं कर्म बीजों का नाश होने से चित्त आध्यात्मिक ज्योति से ज्योतित होता है व जीवन में आध्यात्मिक वातावरण की सृष्टि होती है।

अन्तस् में आया बदलाव जीवन के समूचे कलेवर एवं परिवेश को बदल देता है। संत कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि- 
जाको विधि दारुन दुःख देही, ताकी मति पहिले हर लेहीं। 

अर्थात् जिसको विधाता दारुण दुःख देना चाहते हैं, उसकी मति का हरण पहले ही कर लेते हैं। स्थिति उलटी भी है- 
जाको विधि पूरन सुख देहीं, ताकी मति निर्मल कर देहीं
अर्थात् जिसको विधाता पूर्ण सुख देना चाहते हैं, उसकी मति को निर्मल बना देते हैं।
इस निर्मलता के यौगिक महत्त्व को अगले सूत्र में बतलाते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं- 
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा॥ १/४८॥
शब्दार्थ- तत्र= उस समय (योगी की); प्रज्ञा= बुद्धि; ऋतम्भरा= ऋतम्भरा होती है।
भावार्थ- निर्विचार समाधि में प्रज्ञा ऋतम्भरा से सम्पूरित होती है। 

महर्षि पतंजलि अपने योग सूत्रों में योग साधना की जिन उपलब्धियों की चर्चा करते हैं, उनमें यह उपलब्धि विशेष है। प्रज्ञा या बौद्धिक चेतना हमारे जीवन रथ की संचालक है। इसकी अवस्था ही जीवन की दिशा का निर्धारण करती है। सामान्य क्रम में बुद्धि सन्देह, भ्रम की वजह से चंचल रहती है। इस चंचलता की वजह से ही इसकी निर्णय क्षमता एवं विश्लेषण क्षमता पर असर पड़ता है। बौद्धिक दिशाभ्रम के कारणों में पूर्वाग्रहों, स्वार्थपरता एवं हठधर्मिता का भारी हाथ रहता है। इनके कारण बुद्धि में वह समझदारी नहीं पनप पाती, जिसकी आवश्यकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद...