सोमवार, 30 अप्रैल 2018

👉 बोध कथा

👉 गुरु-कृपा

🔶 सन्तों की अपनी ही मौज होती है! एक संत अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुंचे। रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे। उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया। वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा - "मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है।

🔷 आप चाहें तो वहां रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा। " वह संत अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहां के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी संत को दीवार में एक दरार नजर आई।

🔶 संत उस दरार के पास पहुंचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए। शिष्य के कारण पूछने पर संत ने कहा-"चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। " अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।

🔷 किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए।

🔶 सवेरा होने पर संत व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मरा पड़ा था। यह देखकर शिष्य ने संत से कहा- 'गुरुदेव, आपके पास तो कई सिद्धियां हैं, फिर आपने यह क्यों होने दिया?

🔷 उस धनिक के पास सब कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी मदद की, जबकि इस गरीब ने कुछ ना होने के बाद भी हमें इतना सम्मान दिया फिर भी आपने उसके बैल को मरने दिया।

🔶 " संत फिर बोले-'चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। " उन्होंने आगे कहा- 'उस धनिक के तलघर में दरार से मैंने यह देखा कि उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था।

🔷 चूंकि उस घर का मालिक बेहद लोभी और कृपण था, इसलिए मैंने उस दरार को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण भंडार उसके हाथ ना लगे। इस किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर सोए थे। रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने रोक दिया।

🔶 चूंकि वे खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण ले जाने के लिए कहा। यह सुनकर शिष्य संत के समक्ष नतमस्तक हो गया।

🔷 ठीक इसी तरह गुरु की कृपा वह नहीं है जो हम चाहते बल्कि गुरु-कृपा तो वह है जो गुरुदेव चाहते हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 30 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30April 2018



👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 3)

👉 इन तीनों को त्याग दीजिए- कुढ़ना, बकझक और हँसी मजाक।

🔶 (1) कुढ़ना एक भयंकर मानसिक विकार है। इससे मनुष्य की शक्ति का ह्रास, चिंता और व्यग्रता में वृद्धि होती है। निश्चयबल का क्षय होता है और अपने प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। कुढ़ने का अभिप्राय है हीनत्व की भावना से ग्रसित होना। यह उसी की प्रतिक्रिया है। मनुष्य के किए जब कुछ नहीं होता, तो वह कुढ़ता है। यही मानसिक व्याधि विकसित होने पर नैराश्य का रूप धारण कर लेती है।

🔷 (2) व्यर्थ की बकझक से मनुष्य का थोथापन प्रकट होता है। बातूनी व्यक्ति जबानी जमा खर्च में चतुर होता है, ठोस कर्म कम करता है क्योंकि बकझक ही में शक्ति नष्ट हो जाती है।

🔶 (3) अनियंत्रित हँसी मजाक आत्मिक दृष्टि से गर्हित है। गन्दा हँसी मजाक कटुता का रूप धारण कर लेता है। इससे मनुष्य की गुप्त वासना का पर्दाफाश होता है। अतः इन तीनों को-कुढ़ना, व्यर्थ की बकझक और अनियंत्रित हँसी मजाक की अधिकतर आदतों को त्याग देना उचित है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

👉 Atma Sadhana

🔶 Musicians do not become expert in either vocal or instrumental music in a day. They have to make a persistent effort. In the absence of practice, the voice of a vocalist sounds erratic and jarring and the fingers of an instrumentalist lack coordination. A true artist remains indifferent both to the reaction of the audience and to the remuneration paid to him.  He feels contented with the joy derived from his daily sadhana of music.

🔷 A true devotee of art would maintain his inner peace even if he does not get any immediate and tangible reward or recognition for his art.  He would continue to do his sadhana of music without any lessening of interest, even though he may have to dwell in a hut in a remote forest. The mental make up of a person practicing Atma sadhana should have at least this much dedication and commitment. Dancers, actors, sculptors, etc. know the importance of daily practice to maintain their art. Soldiers participate compulsorily in routine parades to maintain their skills of marksmanship and fighting.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 जीवन में विकास कीजिए:-

🔶 आपका शरीर प्रतिदिन विकसित हो रहा है। प्रत्येक दिन शरीर में नए रक्त, मज्जा, तन्तुओं का विकास हो रहा है पर खेद है कि शारीरिक अनुपात में मानसिक और आध्यात्मिक विकास नहीं हो रहा। आपका शरीर बड़ा होता जा रहा है किन्तु मन बच्चों जैसा अविकसित ही पड़ा है। उसमें उन तत्वों का विकास नहीं हुआ, जिनसे मनुष्य पूर्णता प्राप्त करता है।

🔷 मन विकसित हुआ या नहीं, यह जानने के लिए निम्न प्रश्नों का उत्तर दीजिए:-

🔶 1. क्या आप आत्मनिर्भर हैं, या हीनता के भाव को, लोगों से बात करते या व्यवहार करते हुए अनुभव करते हैं?

🔷 2. मन की शान्ति या उत्साह के लिए आप दूसरों के विचारों और मन्तव्यों पर कहाँ तक निर्भर रहते हैं? दूसरों के कुत्सित संकेत क्या आपको पस्त हिम्मत कर देते हैं या आप बिना उनकी परवाह किए अविचल भाव से अपने कर्तव्य-पथ या निर्दिष्ट मार्ग पर आरुढ़ हैं?

🔶 3. क्या आप मिथ्या घमंड, अहंकार या दूसरों की तारीफ के आदी बन गये हैं? बच्चे प्रायः जरा सी तारीफ से प्रसन्न हो उठते हैं, तनिक सी कठोर बात से विक्षुब्ध हो उठते हैं। क्या आप भी अपने को इसी श्रेणी में रक्खे हुए है? क्या दूसरों की झूठी तारीफ का जादू आप पर चलता है? यदि चलता है तो आप अभी अविकसित ही हैं।

🔷 4. क्या आप अपनी पोशाक की बहुत देखभाल रखते हैं? बाहर से शृंगार बनाकर अंदर का खोखलापन छिपाना चाहते हैं? क्या आपको आभूषणों, फेस पाउडर, रोज हजामत, टीप-टाप का शौक अभी तक बना हुआ है? क्या आप बच्चों की तरह अब भी चटकीले, रंग बिरंगे वस्त्र पहनने के आदी हैं?

🔶 5. जिह्वा के स्वाद में, स्वादिष्ट मिष्ठान्न और मेवे पकवान चाट पकौड़ी बीड़ी पान क्या इनमें आपको रुचि है? यदि हाँ, तो आप अभी रुचि में परिष्कार नहीं हुआ है। परिपक्वता और विकास इस दिशा में नहीं हुए हैं।

🔷 ऊपर लिखे हुए प्रश्नों पर विचार कीजिए। इनसे आपको अपने रुचि परिष्कार एवं विकास का कुछ ज्ञान होगा।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 4)

🔶 The parjanya generated by Yajna augments the level of prana in the air. This effect is dense around the Yajnasala (the area where is Yajna performed) but is also prevalent in the wider space and continues to expand with the flow of air with the process of Yajna. If we pour some oil drops in a pot containing water, the oil separates itself from water and spreads on the surface of water. In a similar way, the energy of Yajna expands all around in the open space. Its prana, its essence, its energy, is also present in the water contained in the clouds.

🔷 This is showered in the form of rain and thus gets absorbed in the soil, crops and vegetation. The soil irrigated by it is found to be more fertile and the grains, fruits and vegetables grown there are tastier and have higher nutrition. The milk of the cows, which graze the grass grown on such lands, is also of excellent quality. Drinking the milk and eating the fruits and vegetables energized by Yajna increases our stamina, resistance against infections and diseases, and mental astuteness.

🔶 In fact the cosmic flow of prana is omnipresent in the subliminal realms of Nature. It enables all activities, movements and evolution of living beings. All creatures possess prana and therefore they are called prani. Prana is the source of our vital strength. If it were present in substantial amount in the body, a visibly lean and skinny person would be very strong and healthy (e.g. Mahatma Gandhi).

🔷 Its elevated levels are expressed in mental radiance, intellectual sharpness and talents. Its reduction on the contrary would turn a physically robust person rather weak, lethargic and dull. Reduction of this subtle energy in plants and trees would diminish the shining beauty of flowers, and nutrient quality of fruits, vegetables and grains. Decreased levels of prana in the air, despite the presence of substantial amounts of oxygen, would lessen its vitality. Even deep breathing of this otherwise ‘fresh’ air would not have the desired healthy effects. People living at such places are found to lack vital strength, immunity and mental sharpness. The parjanya extracted by Yajna compensates for these deficiencies.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 5)

🔶 यह नारकीय स्थिति है। भीतर से आत्म प्रताड़ना और बाहर से भर्त्सना जिस पर बरसती है उसे साक्षात् नरकवासी कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक रोगों से उद्विग्न रहने वाले नरक ही भोगते हैं। लोक-लोकांतरों में नरक है या नहीं। कुम्भीपाक, वैतरणी आदि का अस्तित्व है या नहीं। इस विवाद में पड़े बिना इतने से भी काम चल सकता है कि जो अपनी शांति और प्रतिष्ठा गँवा बैठा उसके लिए मानव जीवन की सरसता कोसों पीछे रह गयी।

🔷 सरकार को चकमा देकर राज दण्ड से बचा जा सकता है। समाज की आंखों में भी धूल झोंकी जा सकती है। पर आत्मा की अदालत ऐसी है जिसने सब कुछ देखा सुना है उसके दण्ड से छुटकारा पा सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। यहाँ देर तो है पर अन्धेर नहीं है। मनुष्य के लिए थोड़े से दिन का विलम्ब ही उसकी आस्था डगमगा देता है, पर तत्वज्ञानियों की दृष्टि से यह जीवन असीम और अनन्त है।

🔶 एक जन्म का समय बीतना उसके लिए एक रात की निद्रा लेकर नये प्रभात पर फिर उठने के समान है। आज का लिया कर्ज परसों चुकाने की शर्त पर मिल गया है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सदा के लिए मुफ्त में मिल गया और फिर कभी वह देना न पड़ेगा। बहुत से लोग जन्म से ही अन्धे, अपंग उत्पन्न होते हैं। कइयों की प्रतिभा जन्म से ही ऐसी अद्भुत होती है कि दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। इसे पूर्व संचित संस्कारों का प्रतिफल कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 34


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.34

👉 गुरुगीता (भाग 98)

👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है

🔶 गुरूगीता के महामंत्रों में साधक, साधना एवं सिद्धि तीनों का तत्त्वबोध पिरोया है। इन मंत्रों में बार- बार चेताया गया है कि शिष्य- साधक क्या करें? किसी मंत्र को दुहराने वाले अथवा ध्यान के लिए गुम- सुुम बैठे रहने वाले को न तो शिष्य कहते हैं और साधक। शिष्य और साधक तो किसी की समूची जीवनचर्या, जीवनशैली और जीवन दृष्टि का नाम है। यह सत्य जहाँ है, वहीं शिष्यत्व है। अपने कान में मंत्र सुनने वाले को शिष्य नहीं कहते। दीक्षा के कर्मकाण्ड भर से किसी को शिष्यत्व उपलब्ध नहीं होता। यह उपलब्धि तो बलिदानी भावना एवं समर्पण की सतत साधना से हुआ करती है, जिसके अन्तःकरण में यह घटना घट चुकी है अथवा घटित हो रही है- समझो वही शिष्यत्व का उदय हो रहा है। वहीं पर एक साधक का व्यक्तित्व अपना आकार पा रहा है।

🔷 यही स्थिति साधना की है। साधना मन अन्तःकरण एवं जीवन के परिष्कार का नाम है, फिर वह चाहे कैसे भी हो। चाहे इसके लिये कोई मंत्र जपना पड़े या फिर किसी सेवाकर्म में लगना पड़े। किस मंत्र का जप करना साधना है? अथवा ध्यान की किस प्रक्रिया को करना साधना है? ये सभी सवाल अर्थहीन हैं। सब सही है कि अपने सद्गुरू उपदेश के अनुसार, उनके आदेश के अनुसार जीवन जीने की साधना कहते हैं। फिर वह चाहे कितना ही अटपटा क्यों न हो। देवर्षि नारद के उपदेश से मरा- मरा जपने वाले क्रूरकर्मा रत्नाकर महर्षि वाल्मिकी ही गये। गुरू के आदेश के अनुसार जीवन जीने की परिणति उनके जीवन में साधना की चरम सफलता के रूप में साकार हुई।

🔶 इसी तरह से सिद्धि व्यक्तित्व की विराट् में विलीनता है। अहंता का, वैभव का अपने सद्गुरू में विसर्जन है। व्यक्तित्व की सर्वमयता ही साधक और उसकी साधना की चरम उपलब्धि है। जिसे यह स्थिति हासिल हो सकी- समझो उसी की साधना सफल हुई। उसी को सिद्धि ने दर्शन दिये। उसी को तत्त्वबोध प्राप्त हुआ, उसी को मुक्ति मिल सकी। गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी रहस्य को भगवान् भोले नाथ ने माँ जगदम्बा को समझाया है। इसमें उन्होंने कहा था- हे महादेवि! कुण्डलिनी शक्ति पिण्ड है। हंस पद है, बिन्दु ही रूप है तथा निरञ्जन, निराकार रूपातीत है ऐसा कहते हैं। जो पिण्ड से मुक्त हुआ और जो रूपातीत से मुक्त हुआ, उसी को मुक्त कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 150

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...