मंगलवार, 13 जून 2017

👉 तेरे नाम का आधार

🔵 मनुष्य की दुर्बलता का अनुभव करके हमारे परम कारुणिक साधु संतों ने उद्धार के बहुत से रास्ते ढूँढ़े। अन्त में उन्हें भगवान का नाम मिला। इससे उन्होंने गाया कि-राम नाम ही हमारा आधार है। सब तरह से हारे हुए मनुष्य के लिए बस, राम नाम ही एक तारक मंत्र है। राम नाम यानी श्रद्धा-ईश्वर की मंगलमयता पर श्रद्धा। युक्ति, बुद्धि, कर्म, पुरुषार्थ, सब सत्य हैं, परन्तु अन्त में तो राम नाम ही हमारा आधार है।

🔴 लेकिन आजकल का जमाना तो बुद्धि का जमाना कहलाता है। इस तार्किक युग में श्रद्धा का नाम ही कैसे लिया जाए? सच है कि दुनिया में अबुद्धि और अन्धश्रद्धा का साम्राज्य छाया है। तर्क, युक्ति और बुद्धि की मदद के बिना एक कदम भी नहीं चला जा सकता। बुद्धि की लकड़ी हाथ में लिए बिना छुटकारा ही नहीं। परन्तु बुद्धि अपंगु है। जीवन यात्रा में आखिरी मुकाम तक बुद्धि साथ नहीं देती। बुद्धि में इतनी शक्ति होती तो पण्डित लोग कभी के मोक्ष धाम तक पहुँच चुके होते। जो चीज बुद्धि की कसौटी पर खरी न उतरे, उसे फेंक देना चाहिये।

🔵 बुद्धि जैसी स्थूल वस्तु के सामने भी जो टिक सके उसकी कीमत ही क्या है? परन्तु जहाँ बुद्धि अपना सर्वस्व खर्च करके थक जाती हैं और कहती है-’न एतदशकं विज्ञातुँ यदेतद्यक्षमिति।’ वहाँ श्रद्धा क्षेत्र शुरू हो जाता है। बुद्धि की मदद से कायर भी मुसाफिरी के लिए निकल पड़ता है। परन्तु जहाँ बुद्धि रुक जाती है, वहाँ आगे पैर कैसे रखा जाय? जो वीर होता है, वही श्रद्धा के पीछे-2 अज्ञान की अंधेरी गुफा में प्रवेश करके उस ‘पुराणह्वरेष्ठ’ को प्राप्त कर सकता है।

🔴 बालक की तरह मनुष्य अनुभव की बातें करता है। माना कि, अनुभव कीमती वस्तु है, परन्तु मनुष्य का अनुभव है ही कितना? क्या मनुष्य भूत भविष्य को पार पा चुका है? आत्मा की शक्ति अनन्त है। कुदरत का उत्साह भी अथाह है। केवल अनुभव की पूँजी पर जीवन का जहाज भविष्य में नहीं चलाया जा सकता। प्रेरणा और प्राचीन खोज हमें जहाँ ले जायं, वहाँ जाने की कला हमें सीखनी चाहिए। जल जाय वह अनुभव, धूल पड़े उस अनुभव पर जो हमारी दृष्टि के सामने से श्रद्धा को हटा देता है।

🔵 दुनिया यदि आज तक बढ़ सकी है तो वह अनुभव या बुद्धि के आधार पर नहीं, परन्तु श्रद्धा के आधार पर ही। इस श्रद्धा का माथा जब तक खाली नहीं होता, जब तक यात्रा में पैर आगे पड़ते ही रहेंगे, तभी तक हमारी दृष्टि अगला रास्ता देख सकेगी और तभी तक दिन के अन्त होने पर आने वाली रात्रि की तरह बार-बार आने वाली निराशा की थकान अपने आप ही उतरती जायगी। इस श्रद्धा को जाग्रत रखने का-इस श्रद्धा की आग पर से राख उड़ाकर इसे हमेशा प्रदीप्त रखने का-एकमात्र उपाय है राम-नाम।

🔴 राम-नाम ही हमारे जीवन का साथी और हमारा हाथ पकड़ने वाला परम गुरु है।

🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/March/v1.21

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 110)

🌹 ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵 जमदग्नि पुत्र परशुराम के फरसे ने अनेक उद्धत उच्छृंखलों के सिर काटे थे। यह वर्णन अलंकारिक भी हो सकता है। उन्होंने यमुनोत्री में तपश्चर्या कर प्रखरता की साधना की एवं सृजनात्मक क्रांति का मोर्चा संभाला। जो व्यक्ति तत्कालीन समाज निर्माण में बाधक, अनीति में लिप्त थे, उनकी वृत्तियों का उन्होंने उन्मूलन किया। दुष्ट और भ्रष्ट जनमानस के प्रवाह को उलट कर सीधा करने का पुरुषार्थ उन्होंने निभाया। इसी आधार पर उन्हें भगवान् शिव से ‘‘परशु (फरसा)’’ प्राप्त हुआ। उत्तरार्द्ध में उन्होंने फरसा फेंककर फावड़ा थामा एवं स्थूल दृष्टि से वृक्षारोपण एवं सूक्ष्मतः रचनात्मक सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण किया। शान्तिकुञ्ज से चलने वाली लेखनी ने, वाणी ने उसी परशु की भूमिका निभाई एवं असंख्यों की मान्यताओं, भावनाओं, विचारणाओं एवं गतिविधियों में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया है।  

🔴 भागीरथ ने जल दुर्भिक्ष के निवारण हेतु कठोर तप करके स्वर्ग से गंगा को धरती पर लाने में सफलता प्राप्त की थी। भागीरथ शिला गंगोत्री के समीपस्थ है। गंगा उन्हीं के तप पुरुषार्थ से अवतरित हुईं। इसीलिए भागीरथी कहलाईं। लोक मंगल के प्रयोजन हेतु प्रचण्ड पुरुषार्थ करके भागीरथ दैवी कसौटी पर खरे उतरे एवं भगवान् शिव के कृपा पात्र बने। आज आस्थाओं का दुर्भिक्ष चारों ओर संव्याप्त है। इसे दिव्य ज्ञान की धारा गंगा से ही मिटाया जा सकता है। बौद्धिक और भावनात्मक अकाल निवारणार्थ शान्तिकुञ्ज से ज्ञान गंगा का जो अविरल प्रवाह बहा है, उससे आशा बँधती है कि दुर्भिक्ष मिटेगा, सद्भावना का विस्तार चहुँ ओर होगा।

🔵 चरक ऋषि ने केदारनाथ क्षेत्र के दुर्गम क्षेत्रों में वनौषधियों की शोध करके रोग ग्रस्तों को निरोग करने वाली संजीवनी खोज निकाली थी। शास्त्र कथन है कि ऋषि चरक औषधियों से वार्ता करके गुण पूछते और उन्हें एकत्र कर उन पर अनुसंधान करते थे। जीवनीशक्ति सम्वर्धन, मनोविकार शमन एवं व्यवहारिक गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तन करने वाले गुण रखने वाली अनके औषधियाँ इसी अनुसंधान की देन हैं। शान्तिकुञ्ज में दुर्लभ औषधियों को खोज निकालने, उनके गुण प्रभाव को आधुनिक वैज्ञानिक यंत्रों से जाँचने का जो प्रयोग चलता है, उसने आयुर्वेद को एक प्रकार से पुनर्जीवित किया है। सही औषधि के एकाकी प्रयोग से कैसे निरोग रहकर दीर्घायुष्य बना जा सकता है, यह अनुसंधान इस ऋषि परम्परा के पुनर्जीवन हेतु किए जा रहे प्रयासों की एक कड़ी है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman.2

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 14 Jun 2017


👉 सच्ची उपासना

🔴 संत एकनाथ महाराष्ट्र के विख्यात संत थे। स्वभाव से अत्यंत सरल और परोपकारी संत एकनाथ के मन में एक दिन विचार आया कि प्रयाग पहुंचकर त्रिवेणी में स्नान करें और फिर त्रिवेणी से पवित्र जल भरकर रामेश्वरम में चढ़ाएं। उन्होंने अन्य संतों के समक्ष अपनी यह इच्छा व्यक्त की। सभी ने हर्ष जताते हुए सामूहिक यात्रा का निर्णय लिया।

🔵 एकनाथ सभी संतों के साथ प्रयाग पहुंचे। वहां त्रिवेणी में सभी ने स्नान किया। तत्पश्चात अपनी-अपनी कावड़ में त्रिवेणी का पवित्र जल भर लिया। पूजा-पाठ से निवृत्त हो सबने भोजन किया, फिर रामेश्वरम की यात्रा पर निकल गए। जब संतों का यह समूह यात्रा के मध्य में ही था, तभी मार्ग में सभी को एक प्यासा गधा दिखाई दिया। वह प्यास से तड़प रहा था और चल भी नहीं पा रहा था।

🔴 सभी के मन में दया उपजी, किंतु कावड़ का जल तो रामेश्वरम के निमित्त था, इसलिए सभी संतों ने मन कड़ा कर लिया। किंतु एकनाथ ने तत्काल अपनी कावड़ से पानी निकालकर गधे को पिला दिया।

🔵 प्यास बुझने के बाद गधे को मानो नवजीवन प्राप्त हो गया और वह उठकर सामने घास चरने लगा।

🔴 संतों ने एकनाथ से कहा- "आप तो रामेश्वरम जाकर तीर्थ जल चढ़ाने से वंचित हो गए।"

🔵 एकनाथ बोले- "ईश्वर तो सभी जीवों में व्याप्त है। मैंने अपनी कावड़ से एक प्यासे जीव को पानी पिलाकर उसकी प्राण रक्षा की। इसी से मुझे रामेश्वरम जाने का पुण्य मिल गया।"

🔴 वस्तुत: धार्मिक विधि-विधानों के पालन से बढ़कर मानवीयता का पालन है। जिसके निर्वाह पर ही सच्चा पुण्य प्राप्त होता है। सभी धर्मग्रंथों में परोपकार को श्रेष्ठ धर्म माना गया है। अत: वही पुण्यदायी भी है।

🔵 सच्ची उपासना भी यही है कि... ईश्वर को कण-कण का वासी मान प्राणी मात्र की सेवा में तत्पर रहा जाय।

🔴 "जेती देखौ आत्मा, तेता सालीग्राम।
साधू प्रतषी देव है, नहि पाथर सूं काम॥"

🔵 अर्थात संसार में जितनी आत्माएँ है वे सब शालिग्राम के समान हैं। और सभी सज्जन आत्माएँ साक्षात देव प्रतिमाएँ हैं ऐसे में पत्थर की मूर्तियों का कितनी आवश्यकता है॥

👉 युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति (भाग 4)

🌹 खरे खोटे की कसौटी
 
🔵 जिनकी दृष्टि से विराट् ब्रह्म की उपासना का वास्तविक स्वरूप विश्व-मानव की सेवा के रूप में आ गया हों वे हमारी कसौटी पर खरे उतरेंगे। जिनके मन में अपनी शक्ति सामर्थ्य का एक अंश पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिये लगाने की भावना उठने लगी हो उन्हीं के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है कि मानवीय श्रेष्ठता की एक किरण उनके भीतर जगमगाई है। ऐसे ही प्रकाश पुँज व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते हैं। उन्हीं के व्यक्तित्व का प्रकाश मानव-जाति के लिये मार्ग-दर्शक बनता हैं। उन्हीं का नाम इतिहास के पृष्ठों पर अजर अमर बना हुआ हैं।

🔴 प्रतिनिधियों के चुनाव में हम अपने परिवार में से इन्हीं विशेषताओं से युक्त आत्माओं की खोज कर रहे हैं। हमारे गुरुदेव ने हमें इसी कसौटी पर कसा और जब यह विश्वास कर लिया कि प्राप्त हुई आध्यात्मिक उपलब्धियों का उपयोग यह व्यक्ति लोक कल्याण में ही करेगा तब उन्होंने अपनी अजस्र ममता हमारे ऊपर उड़ेली और अपनी गाढ़ी कमाई का एक अंश प्रदान किया। वैसा ही पात्रत्व का अंश उन लोगों में होना चाहिए जो हमारे उत्तराधिकारी का भार ग्रहण करें।

🌹 उपहासास्पद ओछे दृष्टिकोण-
 
🔵 यों ऐसे भी लोग हमारे संपर्क में आते हैं जो ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए कुण्डलिनी जागरण, चक्र जागरण और न जाने क्या-क्या आध्यात्मिक लाभ चुटकी मारते प्राप्त करने के लिए अपनी अधीरता व्यक्त करते हैं। ऐसे लोग भी कम नहीं जो ईश्वर दर्शन से कम तो कुछ चाहते ही नहीं और वह भी चन्द घण्टों या मिनटों में। भौतिक दृष्टि से अगणित प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित, अपनी दरिद्रता और विपन्न स्थिति से छुटकारा पाने की कामना से इधर-उधर भटकते लोग भी कभी-कभी मन्त्र-तन्त्र की तलाश में इधर आ निकलते हैं। इन दीन दुखियों की जो सहायता बन पड़ती है वह होती भी है। इस कटौती पर इस प्रकार के लोग खोटे सिक्के ही माने जा सकते है। अध्यात्म की चर्चा वे करते हैं पर पृष्ठभूमि तो उसकी होती नहीं।

🔴 ऐसी स्थिति में कोई काम की वस्तु उनके हाथ लग भी नहीं पाती, पवित्रता रहित लालची व्यक्ति जैसे अनेक मनोरथों का पोट सिर पर बाँधे यहाँ वहाँ भटकते रहते हैं, ठीक वही स्थिति उनकी भी होती है। मोती वाली सीप में ही स्वाति बूँद का पड़ना मोती उत्पन्न करता है। अन्य सीपें स्वाति बूँदों का कोई लाभ नहीं उठा पातीं। उदात्त आत्माएँ ही अध्यात्म का लाभ लेती हैं। उन्हें ही ईश्वर का अनुग्रह उपलब्ध होता हैं। और उस उदात्त अधिकारी मनो-भूमि की एकमात्र परख है मनुष्यत्त्व में करुणा विगलित एवं परमार्थी होना। जिसके अंतःकरण में यह तत्व नहीं जगा, उसे कोल्हू के बैल तरह साधना पथ का पथिक तो कहा जा सकता है पर उसे मिलने वाली उपलब्धियों के बारे में निराशा ही व्यक्त की जा सकती है।

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार में पचास सौ ऐसे व्यक्ति भी आ फँसते है जो पत्रिका को कोई जादू, मनोरंजन आदि समझते हैं, कोई आचार्यजी को प्रसन्न करने के लिए दान स्वरूप खर्च करके उसे मँगा लेते हैं। विचारों की श्रेष्ठता और शक्ति की महत्ता से अपरिचित होने के कारण वे उसे पढ़ते भी नहीं। ऐसे ही लोग आर्थिक तंगी, पढ़ने की फुरसत न मिलने आदि का बहाना बना कर उसे मँगाना बन्द करते रहते है। यह वर्ग बहुत ही छोटा होता हैं, इसलिए उसे एक कौतूहल की वस्तु मात्र ही समझ लिया जाता है। अधिकाँश पाठक ऐसे है जो विचारों की शक्ति को समझते हैं और एक दो दिन भी पत्रिका लेट पहुँचे तो विचलित हो उठते हैं। न पहुँचने की शिकायत तार से देते हैं। ऐसे लोगों को ही हम अपना सच्चा परिजन समझते हैं। जिनने विचारों का मूल समझ लिया केवल वे ही लोग इस कठिन पथ पर बढ़ चलने में समर्थ हो सकेंगे। जिन्हें विचार व्यर्थ मालूम पड़ते हैं और एक-दो माला फेर कर आकाश के तारे तोड़ना चाहते हैं उनकी बाल-बुद्धि पर खेद ही अनुभव किया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 52 

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 June

🔴 आत्म-विश्वासी भाग्य को अपने पुरुषार्थ का दास समझता है तथा उसे अपना इच्छानुवर्ती बना लेता है। इसके लिए आवश्यकता केवल इस बात की है कि उचित मूल्याँकन किया जाए और आत्मविश्वास को सुदृढ़। यदि अपना उचित मूल्याँकन किया जाये तो वह निष्कर्ष अपनी प्रतिभा का स्पर्श पाते ही जीवन्त हो उठता है तथा व्यक्ति बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को लाँघ सकता है। नैपोलियन को अपने विजय अभियान में जब आल्पस् पर्वत पार करने का अवसर आया तो लोगों ने उसे बहुत समझाया कि आज तक आल्पस् पर्वत कोई भी पार नहीं कर सका है और इस तरह की चेष्टा करने वाले को मौत के मुँह में जाना पड़ा है। उन व्यक्तियों को नैपोलियन ने यही उत्तर दिया था कि मुझे मौत के मुंह में जाना मंजूर है, पर आल्पस् से हार मानना नहीं और इस निश्चय के सामने आल्पस् को झुकना ही पड़ा।

🔵 स्मरण रखा जाना चाहिए और विश्वास किया जाना चाहिए कि इस संसार में मनुष्य के लिए न तो कोई वस्तु या उपलब्धि अलभ्य है तथा न ही कोई व्यक्ति किसी प्रकार अयोग्य है। अयोग्यता एक ही है और वह है अपने आपको प्रति अविश्वास। यदि अपना उचित मूल्याँकन किया जाये तो कोई भी बाधा मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।  
                                              
🔴 अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, नौकरी से हटा तो नहीं दिया जायगा, अधिकारी नाराज तो नहीं हो जाएंगे जैसी चिन्ताएँ लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी होने लगती हैं तो वह जो काम हाथ में होता है उसे भी सहज ढंग से नहीं कर पता। इन अशुभ आशंकाओं के करते रहने से मन में जो स्थाई गाँठ पड़ जाती है उसकी का नाम भय है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी जागरण की दूरगामी सम्भावनाएँ (भाग 2)

🔵 पिछड़े वर्ग को ऊँचा उठाने की इन दिनों प्रबल माँग है। इस के लिए अनुसूचित जातियों, जनजातियों को समर्थ बनाने के प्रयत्न चल रहे है। इस औचित्य में एक कड़ी और जुड़नी चाहिए कि हर दृष्टि में हेय स्थिति में पड़ी हुई, दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा जीवन जीने वाली अनेकानेक सामाजिक प्रतिबन्धों में जकड़ी हुई नारी को भी एकता और समा का लाभ मिले। इस ओर से आँखें बन्द किए रहना सम्भवतः प्रगति में चट्टान बनकर अड़ा ही रहेगा।

🔴 अपंग स्तर का व्यक्ति स्वयं कुछ नहीं कर पाता, दूसरों की अनुकम्पा पर जीता है। पर यदि उसकी स्थिति अन्य समर्थों जैसी हो जाय तो किसी के अनुग्रह पर रहने की अपेक्षा वह अपने परिकर को अपनी उपलब्धियों से लाद सकता है। जब लेने वाला देने वाले में बदल जाय तो समझना चाहिए कि खाई पटी और उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी हो गई। आधी जनसंख्या तक स्वतंत्रता का आलोक पहुँचाना और उसे अपने पैरों खड़ा हो सकने योग्य बनाना उस पुरुष वर्ग का विशेष रूप से कर्तव्य बनता है, जिसने पिछले दिनों अपनी अहमन्यता उत्पन्न की। पाप का प्रायश्चित तो करना ही चाहिए। खोदी गई खाई को पाटकर समतल भूमि बननी ही चाहिए ताकि उसका उपयुक्त उपयोग हो सके।

🔵 नारी जागरण आन्दोलन इसी पुण्य प्रयास के लिए उभारा गया है। इसके लिए लैटरपैड, साइनबोर्ड, मजलिस, भाषण, लेखन, उद्घाटन समारोह तो आए दिन होते रहते है पर उस प्रचार प्रक्रिया भर से उतनी गहराई तक नहीं पहुँचा जा सकता जितनी कि इस बड़ी समस्या के समाधान हेतु आवश्यक है। इसके लिए व्यापक जनसंपर्क साधने और प्रचलित मान्यताओं को बदलने की सर्वप्रथम आवश्यकता है। कारण कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक के मन में यह मान्यता गहराई तक जड़ जमा चुकी है कि नारी का स्तर दासी स्तर का ही रहना चाहिए। यही परम्परा है, वही शास्त्र वचन। स्वयं नारी तक ने अपना मानस इसी ढाँचे में ढाल लिया है। चिरकाल तक अन्धेरे में बंद रहने वाले कैदियों की तरह उसके मन में भी प्रकाश के संपर्क में आने का साहस टूट गया है। आवश्यकता प्रस्तुत समूचे वातावरण को बदलने की है। ताकि सुधार प्रक्रिया की लीपा-पोती न करके उसकी जड़ तक पहुँचने और वहाँ अभीष्ट परिवर्तन कर सकना सम्भव हो सके।

🔴 देखा गया है कि नारी उत्थान के नाम पर प्रौढ़ शिक्षा, कुटीर उद्योग, शिशु पालन, पाकविद्या, गृह व्यवस्था जैसी जानकारियाँ कराने में कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाती है। यों यह सभी बातें भी आवश्यक हैं और किया इन्हें भी जाना चाहिए। पर मूल प्रश्न उस मान्यता को बदलने का है। जिसके आधार पर नारी को पिछड़ेपन में बाँधें रहने वाली व्यापक मान्यता में कारगर परिवर्तन सम्भव हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1988 पृष्ठ 58

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 11)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 शारीरिक आरोग्य के मुख्य आधार आत्म संयम एवं नियमितता ही हैं। इनकी उपेक्षा करके मात्र औषधियों के सहारे आरोग्य लाभ का प्रयास मृग मरीचिका के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर औषधियों का सहारा लाठी की तरह लिया तो जा सकता है, किंतु चलना तो पैरों से ही पड़ता है। शारीरिक आरोग्य एवं सशक्तता जिस जीवनी शक्ति के ऊपर आधारित है, उसे बनाए रखना इन्हीं माध्यमों से संभव है। शरीर को प्रभु मंदिर की तरह ही महत्त्व दें। बचकाने, छिछोरे बनाव शृंगार से उसे दूर रखें। उसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं सक्षम बनाना अपना पुण्य कर्तव्य मानें।

🔴 उपवास द्वारा स्वाद एवं अति आहार की दुष्प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाने का प्रयास करें। मौन एवं ब्रह्मचर्य साधना द्वारा जीवनी शक्ति क्षीण न होने दें। उसे अंतर्मुखी होने का अभ्यास करें। श्रमशीलता को दिनचर्या में स्थान मिले। जीवन के महत्त्वपूर्ण क्रमों को नियमितता के शिकंजे में ऐसा कद दिया जाए कि कहीं विशृंखलता न आने पाए। थोड़ी-सी तत्परता बरत कर यह साधा जाना संभव है। ऐसा करके इस शरीर से वे लाभ पाए जा सकते हैं, जिनकी संभावना शास्त्रकारों से लेकर वैज्ञानिकों तक ने स्वीकार की है।   

🔵 तक बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थीं। उन दिनों की बात है, एक किसान को जमीन की कमी महसूस हुई, अतएव उसने पहाड़ काटना शुरू कर दिया। पहाड़ बड़ा घबराया। उसने बीमारियों को आज्ञा दी-बेटियों टूट पड़ो इस किसान पर और इसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालो। बीमारियाँ दंड-बैठक लगाकर आगे बढ़ी और किसान पर चढ़ बैठीं। किसान ने किसी की परवाह नहीं की, डटा रहा अपने काम में। शरीर से पसीने की धार निकली और उसी में लिपटी हुई बीमारियाँ भी बह गईं। पहाड़ ने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया-मेरी बेटी होकर तुमने हमारा इतना काम नहीं किया, अब जहाँ हो वहीं पड़ी रहो। तब से बीमारियाँ परिश्रमी लोगों पर असर नहीं कर पातीं, आलसी लोग ही उनके शिकार होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.17

👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...