शनिवार, 29 मई 2021

👉 ईश्वर से डर

एक दिन सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है।
मैंने कहा, "जी कहिए.."
तो उसने कहा,अच्छा जी, आप तो  रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे?
मैंने  कहामाफ कीजिये, भाई साहब! मैंने पहचाना नहीं आपको..."

तो वह कहने लगे, "भाई साहब, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें साहेब बनाया है... अरे ईश्वर हूँ.., ईश्वर.. तुम हमेशा कहते थे न कि नज़र में बसे हो पर नज़र नहीं आते... लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"

मैंने चिढ़ते हुए कहा,"ये क्या मज़ाक है?" "अरे मज़ाक नहीं है, सच है। सिर्फ़ तुम्हें ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख-सुन नही पाएगा मुझे। "कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी.. "अकेला ख़ड़ा-खड़ा क्या कर रहा है यहाँ, चाय तैयार है, चल आजा अंदर.अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था.. मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था कि बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पीया कि मैं गुस्से से चिल्लाया,अरे मॉं, ये हर रोज इतनी चीनी? "इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नहीं आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी  दिया कि 'भई, तुम नज़र में हो आज... ज़रा ध्यान से!'

बस फिर मैं जहाँ-जहाँ... वह मेरे पीछे-पीछे पूरे घर में... थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला, तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..मैंने कहा, "प्रभु, यहाँ तो बख्श दो..."

खैर, नहाकर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया, क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी.. फिर आफिस के लिए निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल में  महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया, और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, 'तुम नज़र में हो।'

कार को साइड में रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते-करते कहने ही वाला था कि 'इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे' ...पर ये  तो गलत था, : पाप था, तो प्रभु के सामने ही कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया,"आप आ जाइये। आपका काम हो  जाएगा।"

फिर उस दिन आफिस में ना स्टॉफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की 25-50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जातीं थीं मुँह से, पर उस दिन सारी गालियाँ, 'कोई बात नहीं, इट्स ओके...'में तब्दील हो गयीं।

वह पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द, बेईमानी, झूंठ- ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बने।
शाम को ऑफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया...

"प्रभु सीट बेल्ट लगा लें, कुछ नियम तो आप भी निभाएं... उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी..."
घर पर रात्रि-भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला,
"प्रभु, पहले आप लीजिये।"

और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह मे रखा। भोजन के बाद माँ बोली, "पहली बार खाने में कोई कमी नहीं निकाली आज तूने। क्या बात है ? सूरज पश्चिम से निकला है क्या, आज?"

मैंने कहा माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है... रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ, और प्रसाद में कोई कमी नहीं होती।"

थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया, शांत मन और शांत दिमाग  के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा,
"आज तुम्हें नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।"

गहरी नींद गालों पे थपकी से उठी
कब तक सोयेगा .., जाग जा अब।
माँ की आवाज़ थी... सपना था शायद... हाँ, सपना ही था पर नीँद से जगा गया... अब समझ में आ गया उसका इशारा...

"तुम मेरी नज़र में हो...।"
जिस दिन ये समझ गए कि "वो" देख रहा है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। सपने में आया एक विचार भी आँखें खोल सकता है।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २४)

👉 दुखों का कारण

पूर्वोक्त लौकिक आनन्दों में यह विशेषताएं नहीं होतीं। उनकी प्राप्ति के लिये कारण और साधन की आवश्यकता होती है। वह किसी हेतु से उत्पन्न होता है और हेतु के मिट जाने पर नष्ट हो जाता है। इतना ही क्यों—यदि एक बार उसका आधार बना भी रहे तो भी उस आनन्द में जीर्णता, क्षीणता, प्राचीनता और अरुचिता आ जाती है। लौकिक आनन्दों की परि-समाप्ति दुःख में ही होती है। आज जो किसी कारण से प्रसन्न है, आनन्दित है वह कल किसी कारण से दुःखी होने लगता है। लौकिक आनन्द की कितनी ही मात्रा क्यों न मिलती जाय, तथापि और अधिक पाने की प्यास बनी रहती है। उससे न तृप्ति मिलती है और न सन्तोष। जिस अनुभूति में अतृप्ति, असन्तोष और तृष्णा बनी रहे वह आनन्द कैसा? लौकिक आनन्द के कितने ही सघन वातावरण में क्यों न बैठे हों एक छोटा-सा अप्रिय समाचार या छोटी-सी दुःखद बात उसे समूल नष्ट कर देती है। तब न किसी के मुख पर हंसी रह जाती है और न हृदय में पुलक! लौकिक आनन्द और मोक्षानन्द की परस्पर तुलना ही नहीं की जा सकती।

लौकिक आनन्दों में इस असफलता का कारण यह होता है कि वे असत्य एवं भ्रामक होते हैं। उनकी अनुभूति, प्रवंचना अथवा मृगतृष्णा के समान ही होती है। इस असत्यता का दोष ही लौकिक आनन्द को निकृष्ट एवं अग्राह्य बना देते हैं। आनन्द केवल आत्मिक आनन्द ही होता है। मोक्ष का आनन्द ही वास्तविक तथा अन्वेषणीय आनन्द है। लौकिक आनन्दों की अग्राह्यता का प्रतिपादन इसीलिये किया गया है कि जो व्यक्ति उसके झूंठे प्रवचनों में फंस जाता है, उन्हें पकड़ने, पाने के लिये दौड़ता रहता है, उनको स्थिर और स्थायी बनाने में लगता है, वह अपना सारा जीवन इसी मायाजाल में उलझकर खो देता है। भ्रम में पड़े रहने के कारण उसे वास्तविकता का ध्यान ही नहीं आता। लौकिक आनन्दों के फेर में पड़कर जिसे वास्तविक आनन्द का ध्यान ही न आयेगा वह उसको पाने के लिये प्रयत्नशील भी क्यों होगा। जिस हिरण को मरुमरीचिक जल भ्रम में भुला लेती है तन-मन से उसी को पकड़ने के पीछे पड़ा रहता है। अब पाया, अब पाया करता हुआ वह निःसार दुराशा का यन्त्र बना भटकता रहता है और इस प्रकार वास्तविक जल की खोज से वंचित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि भटक-भटक कर प्यासा ही मर जाता है। जिस जीवन में वह पानी और परितृप्ति दोनों को पाकर कृतार्थ हो सकता था वह जीवन यों ही चला जाता है, नष्ट हो जाता है। यही हाल लौकिक आनन्दवादियों का होता है। जिस जीवन में वे मोक्ष और उसका वास्तविक सुख प्राप्त कर सकते हैं वे उसे माया-छाया और भ्रामक सुख की मरीचिका में नष्ट कर अपनी अनन्त हानि कर लेते हैं। इसीलिये लौकिक सुखों को प्रबलता के साथ अग्राह्य एवं गर्हित बताया गया है। वास्तविक आनन्द लौकिक लिप्साओं और सांसारिक भोग-विलासों में नहीं है वह मोक्ष और मोक्ष की स्थिति में है। उसी को पाने का प्रयत्न करना चाहिये, वही मानव जीवन का लक्ष्य है, उसी में शांति और तृप्ति मिलेगी।

इस प्रकार स्पष्ट है कि दुःख तो दुःख ही है सांसारिक सुख भी दुःख का एक स्वरूप है। इनकी निवृत्ति से ही सच्चे सुख की प्राप्ति सम्भव है। किन्तु इनकी निवृत्ति का उपाय क्या है? इसके लिये पुनः योगवाशिष्ठ में कहा गया है—
‘‘ज्ञानान्निर्दुःखतामेति
ज्ञानादज्ञान संक्षयः ।
ज्ञानादेव परासिद्धि
नन्दियस्याद्राम वस्तुतः ।।’’

—हे राम! ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है, ज्ञान से ही परम सिद्धि होती है और किसी उपाय से नहीं।
और भी आगे बताया गया है—
‘‘प्रज्ञा विज्ञात विज्ञेय
सम्यग् दर्शन माधयः ।
न दहन्ति वनं वर्षा
सिक्तमग्निशिखा इव ।’’
—जिसने जानने योग्य को जान लिया है और विवेक दृष्टि प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी को दुःख उसी प्रकार त्रासक नहीं होते जिस प्रकार वर्षा से भीगे जंगल को अग्नि शिखा नहीं जा पाती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३७
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २४)

अन्य आश्रयों का त्याग ही है अनन्यता
    
भक्तों में अग्रणी प्रह्लाद। भावनाओं में परम अनन्यता की भावमयी मूर्ति प्रह्लाद। इन भक्तश्रेष्ठ के नाम में ही कुछ जादू था। सभी इनके स्मरण मात्र से भाव विह्वल हो गये। श्रवण की उत्सुकता जाग्रत हुई। हरिवाहन-विनितानन्दन गरुड़ कह रहे थे- ‘‘मैं भक्तश्रेष्ठ प्रह्लाद के भक्तिमय जीवन के कई पावन पलों का स्वयं साक्षी रहा हूँ। उन्होंने तो अपनी माँ के गर्भ में ही भक्ति का पाठ पढ़ा था। उस समय उनकी माता देवर्षि के सान्निध्य में रह रही थीं।’’
    
पक्षीराज गरुड़ के स्वरों ने देवर्षि की स्मृतियों को कुरेद दिया। उन्हें याद हो आये वे बीते दिन, जब वे अपनी भ्रमणकारी प्रवृत्ति के विपरीत एक स्थान पर स्थिर होकर रहे थे। प्रह्लाद की माता उनके आश्रम में प्रभु भक्ति में लीन रहती थीं। आश्रम के समीप का वह वनप्रान्त एक नवीन भावचेतना से पूरित हो गया था। अपनी माता के गर्भ में स्थित प्रह्लाद की चेतना चारों ओर एक दैवीभाव बिखेर रही थी। देवर्षि स्वयं उन्हें भक्ति के नवीन सूत्र सुनाया करते थे। उन्हीं दिनों उन्हें अनन्यता के उपदेश मिले थे।
    
अपनी स्मृतियों में विभोर देवर्षि को चेतन जब आया, जब गरुड़ जी के स्वर उनके कानों में पड़े। वह कह रहे थे कि ‘‘भक्त प्रह्लाद अपने गर्भकाल से ही असुरता के निशाने पर थे। उन्हें उस युग के सबसे महाशक्तिशाली जनों के कोप का भाजन बनना पड़ा। प्रह्लाद के पिता महाशक्तिशाली सम्राट हिरण्यकश्यपु एवं महान् तांत्रिक एवं यौगिक शक्तियों से सम्पन्न शुक्राचार्य। अपने युग की ये दो महान् शक्तियाँ प्रत्येक ढंग से प्रह्लाद का विनाश चाहती थीं। प्रह्लाद की मृत्यु ही इन दोनों का लक्ष्य थी। इनके पास अनेक साधन थे। अनेकों ढंग से ये हर दिन प्रह्लाद के विनाश की योजनाएँ रचते थे।
    
लेकिन प्रह्लाद को केवल नारायण के नाम का आश्रय था। नारायण के नाम और अपने नारायण की भक्ति के सिवा उन्होंने कभी किसी साधन या साधना के बारे में नहीं सोचा अन्यथा प्रतिभाशाली एवं असीम धैर्यवान् प्रह्लाद कभी भी किसी साधना में प्रवीण हो सकते थे। तंत्र एवं योग की सभी प्रक्रियाओं का ज्ञान उनके लिए सम्भव था। परन्तु इस अनूठे भक्त की अनन्य भक्ति तो केवल अपने भगवान के लिए थी। भगवान! भगवान!! और सिर्फ भगवान!!! अन्य कुछ भी नहीं।
    
सम्राट हिरण्यकश्यपु के प्रहार संघातक थे। कारागार की यातनाएँ, कभी पहाड़ से फिंकवाना तो कभी हाथी के नीचे कुचलवाने का आदेश देना, कभी उन्हें समुद्र में डुबा देने का आदेश। इतने पर भी जब उसे संतोष न हुआ तो अपनी वर प्राप्त बहन होलिका को प्रह्लाद को जला देने के लिए कहना। नित-नयी आपत्तियों को भक्त प्रह्लाद वरदान की तरह मानते थे। जब उन्हें होलिका ने जला देने का प्रयास किया तब इस घटना में होलिका की मृत्यु हो गयी। प्रह्लाद को उसकी मृत्यु पर सहज दुःख हुआ।
ऐसे में एक दिन उन्होंने देवर्षि से कहा था- ‘‘देवर्षि! मैं इतने लोगों के दुःख का कारण क्यों हूँ?’’ तब देवर्षि ने उनसे कहा- ‘‘पुत्र! तुम नहीं, उनकी प्रवृत्तियाँ उनके दुःखों का कारण हैं।’’ इसके बाद देवर्षि ने उनके मन को टटोलते हुए पूछा- ‘‘वत्स! क्या तुम्हें इन आपदाओं से कभी डर लगता है।’’ उत्तर में प्रह्लाद बड़े ही निश्छल भाव से हँसे और कहने लगे- ‘‘हे देवर्षि! मुझे तो आप ने ही यह पाठ पढ़ाया है कि भक्त के जीवन में आने वाली आपदाएँ, भक्त एवं भगवान दोनों की परीक्षा लेती हैं। भक्त की यह परीक्षा होती है कि उसकी प्रभुभक्ति कितनी प्रगाढ़ एवं अनन्य है और भगवान की परीक्षा कि वह अपने अनन्य भक्त की किस कुशलता से रक्षा करते हैं। साथ ही आपने यह भी बताया था कि भक्त से भले ही चूक हो जाये, परन्तु भगवान कभी भी नहीं चूकते। उनसे भक्त रक्षा में कभी प्रमाद नहीं होता।
    
और सचमुच ही भगवान नहीं चूके। उन्होंने अपने भक्त के लिए नृसिंह का रूप धरा। हिरण्यकश्यपु के घातक प्रहारों का उन्होंने संहार किया। भक्त प्रह्लाद की अनन्यता प्रभु भक्तों का अनुकरणीय आदर्श बनी।’’ गरुड़ के मुख से इस कथा को सुनकर महर्षियों के मुख पर प्रसन्नता के भाव छलके। उन्होंने हर्षित होकर कहा- ‘‘धन्य है भक्त प्रह्लाद, जिन्होंने भगवद्भक्ति की मर्यादाओं को परमोज्ज्वल रूप प्रदान दिया।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५०

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...