शनिवार, 20 मई 2017

👉 शांतिकुंज का वातावरण -- अमृत, पारस और कल्पवृक्ष

🔴 आप कैसे सौभाग्यशाली हैं? आपको तो सहारा भी मिल गया। आमतौर से लोग अकेले ही मंजिल पार करते हैं, अकेले ही चलते हैं; पर आपको तो अकेले चलने के साथ लाठी का सहारा भी है, आप उस सहारे का क्यों नहीं लाभ उठाते? आप लोग पैदल सफर करते हैं, आपके लिए तो यहाँ सवारी भी तैयार खड़ी है, फिर आप लाभ क्यों नहीं उठाते? शान्तिकुञ्ज के वातावरण को केवल यह आप मत मानिये कि यहाँ दीवारें ही खड़ी हुईं हैं, आप यह मत सोचिये कि यहाँ शिक्षण का कुछ क्रम ही चलता रहता है, यह मत सोचिये कि यहाँ कुछ व्यक्ति विशेष ही रहते हैं।

🔵 आप यह भी मानकर चलिये कि यहाँ एक ऐसा वातावरण आपके पीछे-पीछे लगा हुआ है, जो आपकी बेहद सहायता कर सकता है। उस वातावरण से निकली प्राण की कुछ धाराओं को, जिसने खींचकर आपको यहाँ बुलाया है और आप जिसके सहारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, उस वातावरण, प्रेरणा और प्रकाश को चाहें तो आप एक नाम यह भी दे सकते हैं—पारस।

🔴 पारस उस चीज का नाम है, जिसको छू करके लोहा भी सोना बन जाता है। आप लोहा रहे हों, पहले से; आपके पास एक पारस है, जिसको आप छुएँ, तो देख सकते हैं किस तरीके से काया बदलती है? आप अभावग्रस्त दुनिया में भले ही रहे हों पहले से, आपको सारी जिंदगी यह कहते रहना पड़ा हो कि हमारे पास कमियाँ बहुत हैं, अभाव बहुत हैं, कठिनाइयाँ बहुत हैं; लेकिन यहाँ एक ऐसा कल्पवृक्ष विद्यमान है कि जिसका आप सच्चे अर्थों में सहारा लें, तो आपकी कमियाँ, अभावों और कठिनाइयों में से एक भी जिंदा रहने वाला नहीं हैं, उसका नाम कल्पवृक्ष है। कल्पवृक्ष कोई पेड़ होता है कि नहीं, मैं नहीं जानता।

🔵 न मैंने कल्पवृक्ष देखा है और न मैं आपको कल्पवृक्ष के सपने दिखाना चाहता हूँ; लेकिन अध्यात्म के बारे में मैं यकीनन कह सकता हूँ कि वह एक कल्पवृक्ष है। अध्यात्म कर्मकाण्डों को नहीं, दर्शन को कहते हैं, चिंतन को कहते हैं। जीवन में हेर-फेर कर सके, ऐसी प्रेरणा और ऐसे प्रकाश का नाम अध्यात्म है। ऐसा अध्यात्म अगर आपको मिल रहा हो तो यहाँ मिल जाए या मिलने की जो संभावनाएँ हैं, उससे आप लाभ उठा लें, तो आप यह कह सकेंगे कि हमको कल्पवृक्ष के नीचे बैठने का मौका मिल गया है। यहाँ का वातावरण कल्पवृक्ष भी है, यहाँ का वातावरण-पारस भी है और यहाँ का वातावरण अमृत भी है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 वांग्मय न. 68 पृष्ट 3.12  

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