बुधवार, 25 जुलाई 2018

👉 जैसी करनी वैसी भरनी

🔷 जो लोग भले होते हैं, वे तो किसी प्रकार उबर आते है पर कुटिल चाल चलने वाले अन्तत : स्वयं गिरते हैं। ऐसे गीदड़ वेशधारी अनेक व्यक्ति समाज में बैठे हैं।

🔶 एक गीदड़ एक दिन गढ्डे में गिर गया। बहुत उछल-कूद की किन्तु बाहर न निकल सका। अन्त में हताश होकर सोचने लगा कि अब इसी गढ्डे में मेरा अन्त हो जाना है। तभी एक बकरी को मिमियाते सुना। तत्काल ही गीदड़ की कुटिलता जाग उठी। वह बकरी से बोला-' बहिन बकरी। यहाँ अन्दर खूब हरी-हरी घास और मीठा-मीठा पानी है। आओ जी भरकर खाओ और पानी पियो। " बकरी उसकी लुभावुनी बातों में आकर, गढ्डे में कूद गयी।

🔷 चालाक गीदड़ बकरी की पीठ पर चढ़कर गढ्डे से बाहर कूद गया और हँसकर बोला-"तुम बड़ी बेवकूफ हो, मेरी जगह खुंद मरने गट्टे में आ गई हो। " बकरी बड़े सरल भाव से बोली-"गीदड़ भाई, मेरी उपयोगितावश कोई न कोई मुझे निकाल ही लेगा किन्तु तुम अपने ही क्षणों के कारण विनाश के बीज वो लोगे।

🔶 थोड़ी देर में मालिक ढूँढ़ता हुआ बकरी को निकाल ले गया। रास्ते में जा रही बकरी ने देखा वही गीदड़ किसी के तीर से घायल हुआ झाड़ी में करहा रहा  है।

👉 आज का सद्चिंतन 25 July 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 July 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 12)

👉 विशिष्टता का नए सिरे से उभार

🔷 यहाँ परिजनों के पिछले दिनों के योगदान का मूल्यांकन घटाकर नहीं किया जा रहा है, पर इतने भर से बात तो नहीं बनती? महाकाल की अभिनव चुनौती स्वीकार करने के लिए उतने पर ही संतोष नहीं किया जा सकता, जो पिछले दिनों हो चुका है। यह लंबा संग्राम है- संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है। इस युगसंधि वेला में तो हम सबको, उस स्तर की तप साधना में संलग्न रहना है, जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा का अवतरण संभव कर दिखाया था।

🔶 महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरंतर अनवरत गति से, शरीर छूटने तक चलते ही जाते हैं। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरत रहने का संकल्प संजोए रहते हैं। इसी परंपरा का निर्वाह उन्हें भी करना है, जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी उपलब्धियाँ कमानी हों, जिन्हें प्रेरणाप्रद, अनुकरणीय, अभिनंदनीय एवं अविस्मरणीय कहा जा सके। अपने परिवार की प्रतिभाओं को उपेक्षित स्तर की नहीं रहना है। इनकी गणना उन लोगों में नहीं होनी चाहिए, जिन्हें परावलंबी या निर्वाह के लिए जीवित भर रहने वाला कहा जाता है।
  
🔷 कमल पुष्प, सामान्य तालाब में उगने पर भी अपनी पहचान अलग बनाते और दूर से देखने वाले के मन पर भी अपनी प्रफुल्लता की प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। अपना स्वरूप एवं स्तर ऐसा ही होना चाहिए।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 15

👉 The Light of Truth

🔷 I have seen wonderful things in this world and have experienced a log, but I have not yet found any thing, which is greater than “Truth”. So many sparkling lights are there in this world but the great savants regard only the Light of Truth as the true Light. If one follows the religion of truthfulness then he is truly religious; he does not need to adopt any other religion then… The physical body can be cleansed by water but the cleanliness and sanctity of mind is possible only by truthfulness. The heart, which is purified by truth, can rule over all hearts.

🔶 A truthful person is revered in the scriptures as the greatest ascetic devotee, supreme charitable person. Siddhis (supernatural successes) will lie under his feet. What else could be bigger glory for a person other than being known as “truthful”…

🔷 Speaking truth is not only the utterance of fact as it is, it should also be auspicious and should not hurt or insult anyone. It’s better to keep quite, rather than telling a truth that harms someone and does not help anybody’s welfare. Don’t tell a lie or anything, which is false, which is not acceptable to you from within or which is unwise or unnecessary. Remember that adoption of falsehood
hurts your inner self and invites your soul’s anger and curse.

🔶 Be truthful; don’t feel shy or scared in following the path of justice. Make sure that what you think as fair is truly so, then remain firm on it forever…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1942

👉 सेवा करना इनसे सीखो

🔷 क्या तुम सच्चे सेवक बनना चाहते हो? सच्ची समाज सेवा करने की इच्छा मन में है? तो आओ, आज हम कुछ ऐसे सच्चे सेवकों का परिचय आपसे करायें, जो हमारे लिए मार्ग दर्शक हो सकते है। संध्या समय पश्चिम आकाश में अस्त होने वाले सूर्य को देखो। बारह बारह घंटों तक पृथ्वी को प्रकाश देने के पश्चात् भी वह निश्चित होकर विश्राम लेने जाना नहीं चाहते हैं। मैं चला जाऊँगा फिर सृष्टि को प्रकाश कौन देगा? उसे अन्धकार से कौन उभारेगा? इस चिन्ता में देखो उनका मुख मंडल म्लान हो गया है। सच्चे सेवक की सेवा की भूख कभी शांत नहीं होती।

🔶 चन्द्र के पास स्वयं का प्रकाश नहीं है। फिर भी वह दूसरे का तेज उधार लेकर अपने को आलोकित करता है। सच्चे सेवक को साधन का अभाव कभी नहीं खटकता।

🔷 हमारी शक्ति बहुत थोड़ी है, इसलिए हमसे क्या सेवा हो सकेगी। क्या तुम ऐसा सोचते हो? नहीं, नहीं, ऐसा कभी मत सोचो। आकाश के तारों की ओर देखो। ब्रह्माण्ड की तुलना में कितने अल्प हैं, फिर भी यथाशक्ति सेवा करने- भूमण्डल को प्रकाशित करने - लाखों की संख्या में प्रकट होते है और अमावस्या की अँधेरी रात में अनेकों का पथ -प्रदर्शन करते हैं।

🔶 थक कर, ऊब कर सेवा क्षेत्र का त्याग करने का विचार कर रहे हो? तुम्हारे सामने बहने वाली इस सरिता को देखो। उद्गम से सागर तक संगम होने तक कभी मार्ग में वह रुकती है? ‘सतत कार्यशीलता’ यही उसका मूल मंत्र है। मार्ग में आने वाले विघ्नों से वह डरती नहीं तो तुम क्यों साधारण संकटों एवं अवरोधों से घबराते हो? वह नदी कभी ऊँच-नीच का भाव जानती ही नहीं। मनुष्य मात्र ही नहीं, पशु-पक्षी या वनस्पति सबकी निरपेक्ष सेवा करना ही वह अपना धर्म समझती है। सेवक के लिए कौन ऊँच और कौन नीच?

🔷 इन अज्ञानी लोगों की क्या सेवा करें? इनका सुधरना असम्भव है ऐसा मत सोचो। देखो कीचड़ में यह कैसा सुन्दर कमल खिला है? तुम भी अज्ञान के कीचड़ में कमल के समान खिलकर कीचड़ की सुरभि पैदा करो, सच्चे सेवक की यही कसौटी है।

✍🏻 ~स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1969 अप्रैल पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/April/v1

👉 आत्म-निरीक्षण

🔷 युग निर्माण परिवार के प्रत्येक परिजन को निरंतर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए और देखना चाहिए कि भारत के औसत नागरिक के स्तर से वह अपने ऊपर अधिक खर्च तो नहीं करता? यदि करता है तो आत्मा की, न्याय की, कर्त्तव्य की पुकार सुननी चाहिए और उस अतिरिक्त खर्च को तुरंत घटाना चाहिए। हमें अधिक कमाने की, अधिक बढ़ाने की, अधिक जोड़ने की ललक छोड़नी चाहिए और यह देखना चाहिए कि जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग क्या हो सकता है?

🔶 जो पास है उसी का ठीक उपयोग कर सकना जब संभव नहीं हो पा रहा है, तो अधिक उपार्जन से भी क्या बनने वाला है? उससे तो साँप के दूध पीने पर बढ़ने वाले विष की तरह अधिक तृष्णा-वासना प्रबल होगी और पतन का क्रम ही तीव्र होगा। हमें उपयोग करने की बात को उपार्जन की ललक से असंख्य गुना महत्त्व देना चाहिए। ऐसा साहस करना कुछ खोना, कुछ गँवाना नहीं है वरन् चक्र-वृद्धि ब्याज समेत अनेक गुना वापस करने वाले किसी प्रामाणिक बैंक में जमा करने की दूरदर्शिता दिखाना भर है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-६६ पृष्ठ-१.३२
http://awgpskj.blogspot.com/2016/12/blog-post_29.html

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...