सोमवार, 2 जनवरी 2017

👉 आज का सद्चिंतन 3 Jan 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Jan 2017


👉 सतयुग की वापसी (भाग 27) 2 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें

🔴 सृजन और विनाश की, उत्थान और पतन की शक्तियाँ इस संसार में निरन्तर अपने-अपने काम कराती रहती हैं। इन्हीं को देव और दानव के नाम से जाना और उनकी प्रतिक्रियाओं को स्वर्ग-नरक भी कहा जाता है। मनुष्य को यह छूट है कि दोनों में से किसी का भी वरण अपनी समझदारी के आधार पर कर ले और तदनुरूप उत्पन्न होने वाली सुख-शान्ति अथवा पतन-पराभव की प्रतिक्रिया सहन करे। उठने या गिरने का निश्चय कर लेने पर तदनुरूप सहायता-सुविधा भी इसी संसार में यत्र-तत्र बिखरी मिल जाती है, इच्छानुसार उन्हें बीना-बटोरा अथवा धकेला-भगाया भी जा सकता है। इसी विभूति के कारण मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता एवं भविष्य का अधिष्ठाता भी कहा जाता है। अपने या अपने समुदाय, संसार के लिए विपन्नता अथवा सुसम्पन्नता अर्जित कर लेना उसकी अपनी इच्छा-आकांक्षा पर निर्भर है।       

🔵 आम आदत पाई जाती है कि मनुष्य सफलताओं का श्रेय स्वयं ले, किन्तु हानि या अपयश का दोषारोपण किन्हीं दूसरों पर मढ़ दे। इतने पर भी यथार्थता तो अपनी जगह पर अटल ही रहती है। यह आत्म प्रवंचना भर कहला सकती है, पर सुधार-परिवर्तन कर सकने जैसी क्षमता उसमें है नहीं। 

🔴 प्रसंग इन दिनों की परिस्थितियों के सन्दर्भ में उनका कारण जानना और समाधान निकालने का है। गहरी खोजबीन इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि जनमानस ही है जो अपने लिए इच्छित स्तर की परिस्थितियाँ न्यौत बुलाता है। कोई क्या कर सकता है, यदि हानि को लाभ और लाभ को हानि समझ बैठने की मान्यता बना ली जाए? कुरूप चेहरा दर्शाने के लिए दर्पण को आक्रोश का भाजन बनाया जा सकता है, पर इससे चेहरे पर छाई कुरूपता या कालिख को भगाया नहीं जा सकता। अच्छा हो, हम कठिनाइयों के कारण-समाधान अपने भीतर खोजें और यदि उत्कर्ष अभीष्ट हो, तो इसकी तैयारी के रूप में आत्मसत्ता को तदनुरूप बनाने के लिए अपने पुरुषार्थ नियोजित करें।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रगति के पाँच आधार

अरस्तू ने एक शिष्य द्वारा उन्नति का मार्ग पूछे जाने पर उसे पाँच बातें बताई।

🔵 (1) अपना दायरा बढ़ाओ, संकीर्ण स्वार्थ परता से आगे बढ़कर सामाजिक बनो।

🔴 (2) आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और भावी प्रगति की आशा करो।

🔵 (3) दूसरों के दोष ढूँढ़ने में शक्ति खर्च न करके अपने को ऊँचा उठाने के प्रयास में लगे रहो।

🔴 (4) कठिनाई को देख कर न चिन्ता करो न निराश होओ वरन् धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ।

🔵 (5) हर किसी में अच्छाई खोजो और उससे कुछ सीख कर अपना ज्ञान और अनुभव बढ़ाओ। इन पाँच आधारों पर ही कोई व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1973 पृष्ठ 1

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 Jan 2017

🔴 संसार में जितने भी सफल और समुन्नत व्यक्ति हुए हैं उनकी सफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण उनके सहायक भी हैं। कोई व्यक्ति चाहे कितना ही विद्वान्, बुद्धिमान्, चतुर, शक्तिवान् क्यों न हो, पर सहयोग के अभाव में लुंज-पुंज ही रहेगा। उससे कोई महत्त्वपूर्ण कार्य न बन सकेगा। असहयोग भले ही द्वेष के बराबर हानिकारक न हो, पर वह भी जीवन की प्रगति को रोक देने में एक विशालकाय पर्वत की तरह अड़कर खड़ा हो जाता है।

🔵 अपनी मनोदशा मिशन को आगे बढ़ते देखकर प्रसन्न और संतुष्ट होने की है। अब उसी में अपना सारा आनंद, उल्लास केन्द्रीभूत हो गया है। सो जो कोई उस दिशा में आगे बढ़ता दीखता है तो लगता है अपने कर्त्तव्य के लिए ही नहीं हमारे लिए भी बहुत कुछ करने में संलग्न है। ऐसे लोगों के प्रति हमारी श्रद्धा, कृतज्ञता, ममता और सहानुभूति का अंतःप्रवाह अनायास ही प्रवाहित होने लगता है। वस्तुतः शरीर की सेवा-समीपता से नहीं, भावना और आदर्शों की प्रखरता ही से अपने को शान्ति और संतुष्टि मिलती है।

🔴 यदि केवल हमारे व्यक्तित्व के प्रति ही श्रद्धा है, शरीर से ही मोह है और उसी की प्रशस्ति-पूजा की जाती है और मिशन की बात ताक पर उठाकर रख दी जाती है तो लगता है हमारे प्राण का तिरस्कार करते हुए केवल शरीर पर पंखा ढुलाया जा रहा हो।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 12) 3 Jan

🌹गायत्री का जातिगत अधिकार

🔴 जो हो आज वैसे सामाजिक दंड की व्यवस्था नहीं रही। फिर कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था का आधार भी नष्ट हो गया। ऐसी दशा में किसी वंश विशेष को अधिकारी—अनधिकारी ठहराने का कोई औचित्य नहीं हो सकता। सभी मनुष्य भगवान् के पुत्र हैं। सभी भाई-भाई हैं। जन्म के आधार पर कोई ऊंच-नीच नहीं हो सकता। उत्कृष्टता-निकृष्टता का एकमात्र आधार मनुष्य के सत्कर्म, दुष्कर्म ही हो सकते हैं। इन तथ्यों के रहते किसी वंश के ही लोगों को गायत्री का अधिकारी ठहराने की बात अनर्गल है। गायत्री उपासना सभी वर्णों के—सभी धर्म सम्प्रदायों के लोग बिना किसी भेदभाव के कर सकते हैं।

🔵 गायत्री को ब्राह्मण वर्ण तक सीमित करने वाली बात तो और भी अधिक उपहासास्पद है। गायत्री विनियोग में इस महामंत्र का ऋषि विश्वामित्र कहे गये हैं। विश्वामित्र जन्मतः क्षत्रिय थे। उन्हें ही इस महामन्त्र का साक्षात्कार और रहस्योद्घाटन करने का श्रेय प्राप्त है। यदि जाति-वंश की दावेदारी का झंझट खड़ा होता हो तो उसमें क्षत्रिय वर्ण के लोग अपने उत्तराधिकार का दावा कर सकते हैं। ब्राह्मण तो तब भी हार जायेंगे।

🔴 ब्रह्मपरायण—उत्कृष्ट व्यक्तित्व वाले साधक गायत्री उपासना से अधिक उच्चस्तरीय लाभ उठा सकते हैं। इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए गायत्री को ब्राह्मण की कामधेनु कहा गया है। इस प्रतिपादन में मात्र उत्कृष्टता की विशिष्टता को महत्व दिया गया है। अन्य वर्ग के लोगों को उससे वंचित करने जैसा प्रतिबन्ध उसमें भी नहीं है।

🔵 प्राचीन प्रचलन, शास्त्र का निर्देश और न्याय-नीति के आधार पर गायत्री उपासना सर्वजनीन ही ठहरती है। जाति, वंश, देश, सम्प्रदाय के कारण सार्वभौम उपासना पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता। हर कोई प्रसन्नतापूर्वक इस महाशक्ति का अंचल पकड़ कर ऊंचा उठने और आगे बढ़ने का लाभ प्राप्त कर सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 6) 3 Jan

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 अभाव, प्रतिकूलताएं, विपन्नताएं वस्तुतः अभिशाप उनके लिए हैं जो परिस्थितियों को ही सफलता असफलता का कारण मानते हैं। अन्यथा आत्म विश्वास एवं लगन के धनी ध्येय की प्रति दृढ़ व्यक्तियों के लिए तो वे वरदान सिद्ध होती हैं। भट्टी में तपने के बाद सोने में निखार आता है। प्रतिकूलताओं से जूझने से व्यक्तित्व निखरता और परिपक्व बनता है। गिने चुने अपवादों को छोड़कर विश्व के अधिकांशतः महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने पर यह पता चलता है कि वे अभावग्रस्त परिस्थितियों में पैदा हुए पले। पर उन्होंने जीवन की विषमताओं को वरदान माना संघर्षों को जीवन बनाने तथा पुरुषार्थ को जगाने का एक सशक्त माध्यम समझा, फलतः वे प्रतिकूलताओं को चीरते हुए सफलता के शिखर पर जा चढ़े। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि परिस्थितियां मानवी विकास में बाधक नहीं बन सकतीं अवरोध प्रचण्ड पुरुषार्थ के समक्ष टिक नहीं सकते।

🔴 दार्शनिक सुकरात का जन्म एक मूर्तिकार के घर हुआ। उसकी मां दाई का काम करती थी माता-पिता के अनवरत श्रम से किसी प्रकार घर का खर्च चल जाता था कुछ ही दिनों बाद पिता की छत्र छाया उठ गयी। मां के साथ गरीबी के दिन व्यतीत करते हुए भी वह अध्ययन में लगा रहा। मेहनत मजदूरी करते हुए भी वह अपने अध्यवसाय में निरत रहा। घर का खर्च चलाने का भी अतिरिक्त दायित्व बाल्यावस्था में ही उसके ऊपर आ गया पर गरीबी उसके विकास में बाधक नहीं बन सकी और अपने पुरुषार्थ एवं मनोयोग से एक दिन वह दर्शन शास्त्र का प्रकाण्ड विद्वान बना।

🔵 वियतनाम के राष्ट्रपिता ‘होचीमिन्ह’ को बचपन में ही अपने माता-पिता से अलग होना पड़ा। बचपन से लेकर युवावस्था तक वे संघर्ष करते रहे। फ्रांसीसी शासन का विरोध करने के अपराध में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जेल से निकलते ही वियतनाम की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने लगे। इसके लिए उन्हें जेल में ही कितनी बार कठोर यातनाएं सहनी पड़ी पर अन्ततः अपने  ध्येय में सफल हुए। देश भक्ति के अनुपम त्याग के कारण उन्हें महात्मा गांधी की भांति राष्ट्रपिता का सम्मान मिला। शेक्सपियर की तुलना संस्कृत के महाकवि कालिदास से की जाती है। वह एक कसाई का बेटा था। परिवार की गाड़ी चलाने के लिए आरम्भ में उसे भी यही धन्धा करना पड़ा पर अपने पुरुषार्थ के कारण वह अंग्रेजी का सर्वश्रेष्ठ कवि तथा नाटककार बना।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 11) 2 Jan

🌹गायत्री का जातिगत अधिकार

🔴 कहा जाता है कि गायत्री का अधिकार ब्राह्मण वर्ग को है। कहीं-कहीं उसके द्विजातियों तक सीमित होने का उल्लेख है। इससे लगता है कि ब्राह्मणेत्तर अथवा द्विज वर्ग से बाहर के लोगों को—अस्वर्णों को गायत्री का अधिकार नहीं है।

🔵 यह शंका सर्वथा निर्मूल है। एक कारण तो यह है कि गायत्री ब्राह्मी शक्ति होने के कारण, उसका उपयोग करने का अधिकार, सूर्य, जल, वायु, पृथ्वी आदि की तरह सभी को है। प्रतिबन्ध मनुष्यकृत वस्तुओं पर उसके मालिक लगा सकते हैं। ईश्वरीय निर्मित वस्तुएं सभी के लिए उपलब्ध रहती हैं। गायत्री सार्वभौम है—सर्वजनीन है। उस पर किसी धर्म, जाति, वंश, वर्ग का आधिपत्य नहीं है। हर वर्ग, वंश का व्यक्ति इस कल्पवृक्ष का आश्रय बिना किसी हिचक के ले सकता है।

🔴 गायत्री गुरु मन्त्र है। विद्याध्ययन के लिए छात्र जब गुरुकुल में प्रवेश करते थे, तो सर्व प्रथम उन्हीं गायत्री मन्त्र ही गुरु द्वारा दिया जाता था। विद्यार्थी सभी वर्णों के होते थे और सभी को गायत्री मन्त्र मिलता था। भारतीय संस्कृति का प्रधान प्रतीक शिखा है, जिसे बिना किसी वर्ण भेद के सभी हिन्दू समान रूप से धारण करते हैं। शिखा गायत्री का स्वरूप है। मस्तिष्क पर सद्विवेक का अनुशासन स्थापित करने वाली इस ध्वजा को गायत्री की प्रतिमा ही कह सकते हैं। शिखाधारी तो अनायास ही गायत्री का अधिकारी बना होता है।

🔵 प्राचीन काल में वर्ण-व्यवस्था जन्म, वंश पर नहीं गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित थी। वर्ण बदलते रहते थे। वंश और वर्ण का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था। उन दिनों की सामाजिक व्यवस्था में कुटिलता अपनाने और कुकर्म करने वालों का सामाजिक बहिष्कार होता होगा और उनके नागरिक अधिकार छिन जाते होंगे। ये बहिष्कृत लोग खुले हुए कैदियों की स्थिति में सुधरने तक अलग रखे, तिरष्कृत किये जाते होंगे। उसी सामाजिक वर्ण व्यवस्था में सम्भवतः उन अस्पृश्यों से गायत्री का अधिकार छिन जाता होगा। इसी स्थिति का उल्लेख अंत्यजों को गायत्री मन्त्र से वंचित करने के दंड-रूप में दिया जाता होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 5) 2 Jan

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 प्रख्यात विचारक ‘टाल्पेज’ कहा करता था ‘युवको! क्या तुम्हें कठिनाइयों को संघर्षों को देखकर डर लगता है? क्या गरीबी तुम्हारे विकास मार्ग में बाधक है? तुम्हारा यह सोचना गलत है। सफलताओं के शिखर पर जा चढ़ने वाले विद्वानों समृद्धों महापुरुषों के जीवन का अध्ययन करो। तुम पाओगे कि उनमें से अधिकांश तुमसे भी गई गुजरी स्थिति में थे किन्तु उन्होंने आत्म विश्वास नहीं खोया। अपने श्रम पुरुषार्थ एवं समय के सदुपयोग द्वारा वे असामान्य स्थिति में जा पहुंचे।

🔴 देखो सुनहरा दिन तुम्हारे अभिनन्दन के लिए सफलताओं का हार लिए खड़ा है। जड़ता छोड़ो चैतन्यता अपनाओ। तुम्हारा निराशावादी चिन्तन ही विकास के अवरोध उत्पन्न कर रहा और आगे बढ़ने से रोक रहा है। तुम गरीब नहीं समृद्ध हो। परमात्मा ने तुम्हें अद्भुत शरीर, विलक्षण मस्तिष्क एवं समय की अपार पूंजी दी है उसकी तुलना किसी भौतिक वस्तु से नहीं की जा सकती है। इसका सदुपयोग करो सफलताएं तुम्हारे चरणों में झुकेंगी।

🔵 लन्दन की एक गन्दी बस्ती में एक बालक रहता था। उसका अपना कोई नहीं था। अखबार बेचकर अपना गुजारा करता था। सात वर्ष की अल्पायु से ही एक जिल्द साज की दुकान में काम करने लगा। एक दिन एनसाइक्लोपीडिया ग्रन्थ की जिल्द बांधते समय उसकी निगाह विद्युत सम्बन्धी एक लेख पर पड़ी। मालिक से पुस्तक को पढ़ने की अनुमति मांगी। सम्बन्धित लेख को उसने एक ही रात में आद्योपान्त पढ़ डाला। जिज्ञासा बढ़ी। प्रयोग एवं परीक्षण के लिए उसने विद्युत की छोटी-मोटी आवश्यक वस्तुएं एकत्रित करनी आरम्भ कर दीं।

🔴 बालक की अभिरुचि का देखकर एक ग्राहक बहुत प्रभावित हुआ। उसने बताया कि भौतिक शास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान हम्फ्री डेवी का भाषण उसी दिन होने वाला है। दुकान के मालिक से छुट्टी मांगकर वह भाषण सुनने चल पड़ा। बालक ने ध्यान पूर्वक सारी बातें सुनी और आवश्यक नोट्स भी लिए उसने हम्फ्री डेवी के भाषण की समीक्षा करते हुए अपने परामर्श लिख भेजे। हम्फ्री डेवी अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने यन्त्रों को व्यवस्थित रूप से रखने के लिए बच्चे को नौकर के रूप में रख लिया। बालक नौकरी और सहयोगी वैज्ञानिक दोनों की ही भूमिका निभाता रहा। दिन भर कामों में व्यस्त रहता और रात को अध्ययन करता। यही बालक अपने मनोयोग अध्यवसाय एवं पुरुषार्थ के बलबूते प्रसिद्ध वैज्ञानिक बना। भौतिक विज्ञान के जगत में माइकेल फैराडे और उसके प्रसिद्ध आविष्कारों के विषय में आज सभी जानते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Jan 2017

🔴 ईमानदारी का तकाजा है कि देशवासियों के औसत वर्ग की तरह जिये और बचत को लोकमंगल के लिए लौटा दे। यदि ऐसा नहीं किया जाता, बढ़ी हुई कमाई को ऐय्याशी में, बड़प्पन के अहंकारी प्रदर्शन में खर्च किया जाता है अथवा बेटे पोतों के लिए जोड़ा-जमा किया जाता है, तो ऐसा कर्त्तव्य विचारशीलता की कसौटी पर अवांछनीय ही माना जाएगा।

🔵 हमारी अभिलाषा यह है कि अपने स्वजन-परिजनों को नव निर्माणों के लिए कुछ करने के लिए कहते-सुनते रहने का अभ्यस्त मात्र न बना दें, वरन् कुछ तो करने के लिए उनमें सक्रियता पैदा करें। थोड़े कदम तो उन्हें चलते-चलाते अपनी आँखों से देख लें। हमने अपना सारा जीवन जिस मिशन के लिए तिल-तिल जला दिया, जिसके लिए हम आजीवन प्रकाश-प्रेरणा देते रहे उसका कुछ तो सक्रिय स्वरूप दिखाई देना ही चाहिए। हमारे प्रति आस्था और श्रद्धा व्यक्त करने वाले क्या हमारे अनुरोध को भी अपना सकते हैं?

🔴 समय, साधन, सुविधा और सामर्थ्य होते हुए भी हम परमार्थ प्रयोजनों के लिए कुछ सोच और कर नहीं पाते यह अंतरंग की दुर्बलता ही सबसे बड़ा बंधन है। उसे तोड़कर फेंका जा सकता हो और उच्च विचारणा के अनुरूप आदर्शवादी परमार्थ परायण जीवन जिया जा सकता हो तो समझना चाहिए कि मुक्ति मिल गई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अनुशासन सीखिये

🔵 एक बार मेढ़कों को अपने समाज की अनुशासनहीनता पर बड़ा खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास एक राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे।

🔴 प्रार्थना स्वीकृत हो गई। कुछ समय बाद शिवजी ने अपना बैल मेढ़कों के लोक में शासन करने भेजा। मेढ़क इधर-उधर निःशंक भाव से घूमते फिरे सौ उसके पैरों के नीचे दब कर सैकड़ों मेढ़क ऐसे ही कुचल गये।

🔵 ऐसा राजा उन्हें पसंद नहीं आया मेढ़क फिर शिवलोक पहुँचे और पुराना हटा कर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे।

🔴 वह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। बैल वापिस बुला लिया गया। कुछ दिन बाद स्वर्गलोक  से एक भारी शिला मेढ़कों के ऊपर गिरी उससे हजारों की संख्या में वे कुचल कर मर गये।

🔵 इस नई विपत्ति से मेढ़कों को और भी अधिक दुःख हुआ और वे भगवान के पास फिर शिकायत करने पहुँचे।

🔴 शिवजी ने गंभीर होकर कहा-बच्चों पहले हमने अपना वाहन बैल भेजा था, दूसरी बार, हम जिस स्फटिक शिला पर बैठते हैं उसे भेजा। इसमें शासकों का दोष नहीं है। तुम लोग जब तक स्वयं अनुशासन में रहना न सीखोगे और मिल-जुलकर अपनी व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं तत्पर न होगे तब तक कोई भी शासन तुम्हारा भला न कर सकेगा। मेढ़कों ने अपनी भूल समझी और शासन से बड़ी आशायें रखने की अपेक्षा अपना प्रबंध करने में जुट गये।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 1

👉 आज का सद्चिंतन 2 Jan 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Jan 2017


👉 को धर्मानुद्धरिष्यसि?

हिमालय के हिमशिखरों से बहती हुई बासन्ती बयार हमारे दिलों को छूने आज फिर आ पहुँची है। इस बयार में दुर्गम हिमालय में महातप कर रहे महा-ऋषिय...