शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

👉 रिश्ते मृत्यु के साथ मिट जाते हैं

🔷 एक बार देवर्षि नारद अपने शिष्य तुम्बरू के साथ कहीं जा रहे थे गर्मियों के दिन थे। एक प्याऊ से उन्होंने पानी पिया और पीपल के पेड़ की छाया में जा बैठे। इतने में एक कसाई वहाँ से 25-30 बकरों को लेकर गुजरा। उसमें से एक बकरा एक दुकान पर चढ़कर मोठ खाने लपक पड़ा।

🔶 उस दुकान पर नाम लिखा था – ‘शगालचंद सेठ।’ दुकानदार का बकरे पर ध्यान जाते ही उसने बकरे के कान पकड़कर दो-चार घूँसे मार दिये बकरा ‘बैंऽऽऽ…. बैंऽऽऽ…’ करने लगा और उसके मुँह में से सारे मोठ गिर पड़े। फिर कसाई को बकरा पकड़ाते हुए कहाः “जब इस बकरे को तू हलाल करेगा तो इसकी मुंडी मेरे को देना क्योंकि यह मेरे मोठ खा गया है।

🔷 ”देवर्षि नारद ने जरा-सा ध्यान लगाकर देखा और जोर-से हँस पड़े। तुम्बरू पूछने लगाः “गुरुजी! आप क्यों हँसे? उस बकरे को जब घूँसे पड़ रहे थे तब तो आप दुःखी हो गये थे, किंतु ध्यान करने के बाद आप हँस पड़े। इसमें क्या रहस्य है?

🔶 ”नारद जी ने कहाः “छोड़ो भी…. यह तो सब कर्मों का फल है, छोड़ो। ”“नहीं गुरुजी! कृपा करके बताइये।”“ इस दुकान पर जो नाम लिखा है ‘शगालचंद सेठ’ – वह शगालचंद सेठ स्वयं यह बकरा होकर आया है। यह दुकानदार शगालचंद सेठ का ही पुत्र है। सेठ मरकर बकरा हुआ है और इस दुकान से अना पुराना सम्बन्ध समझकर इस पर मोठ खाने गया। उसके बेटे ने ही उसको मारकर भगा दिया।

🔷 मैंने देखा कि 30 बकरों में से कोई दुकान पर नहीं गया फिर यह क्यों गया कमबख्त? इसलिए ध्यान करके देखा तो पता चला कि इसका पुराना सम्बंध था। जिस बेटे के लिए शगालचंद सेठ ने इतना कमाया था, वही बेटा मोठ के चार दाने भी नहीं खाने देता और गलती से खा लिये हैं तो मुंडी माँग रहा है बाप की। इसलिए कर्म की गति और मनुष्य के मोह पर मुझे हँसी आ रही हैं कि अपने – अपने कर्मों का फल को प्रत्येक प्राणी को भोगना ही पड़ता है और इस जन्म के रिश्ते – नाते मृत्यु के साथ ही मिट जाते हैं, कोई काम नहीं आता।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 3 Feb 2018


👉 साधना ऐसी जो प्रत्यक्ष सिद्धि दात्री हो

🔶 व्यावहारिक जीवन में शालीनता, सज्जनता, सुव्यवस्था, संयमशीलता आदि सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठïापन और संवर्धन करने के उपरांत ही पूजा विधानों के सफल होने की आशा करनी चाहिए। गंदगी से सना बच्चा यदि माता की गोद में बैठने के लिए मचले, तो वह उसकी इच्छा पूरी नहीं करती, प्यारा लगते हुए भी उसके रोने की परवाह नहीं करती। पहला काम करती है- उसे धोना, नहलाना, गंदे कपड़े उतारकर नये स्वच्छ वस्त्र पहनाना। इतना कर चुकने के उपरांत वह उसे गोद में लेती, दुलार करती, खिलाती और दूध पिलाती है। बच्चों की उतावली सफल नहीं होती, माता की व्यवस्था बुद्धि ही कार्यान्वित होती है।
  
🔷 अध्यात्म क्षेत्र में इन दिनों एक भारी भ्रांति फैली हुई है कि पूजा परक कर्मकाण्डों के सहारे जादूगरों जैसे चमत्कारी प्रतिफल मिलने चाहिए। देवता को स्तवन पूजन के मनुहार, उपहार पर फुसलाया जाना चाहिए और उससे अपनी उचित-अनुचित मनोकामनाओं को पूरा कराया जाना चाहिए। यह स्थापना अनैतिक है, असंगत भी। यदि इतने सस्ते में मनोकामनाएँ पूरी होने लगे, तो सफलता के लिए कोई क्यों परिश्रम करेगा और क्यों पात्रता विकसित करेगा? फिर सभी उद्योग परायण व्यक्ति मूर्ख समझे जाएंगे और देवता की जेब काटकर उल्लू सीधा करने वाले चतुर। यह मान्यता यदि सही रही होती, तो देव पूजा में अधिकांश समय बिताने वाले पंडित, पुजारी, साधु, बाबाजी अब तक उच्चकोटि की उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने की स्थिति में पहुँच गये होते। जबकि उनमें से अधिकांश सामान्य जनों से भी गई गुजरी स्थिति में देखे जाते हैं। इसी प्रकार तंत्र-मंत्र के फेर में पड़े रहने वाले आतुर और भावुक व्यक्ति बड़ी-बड़ी आशा अभिलाषाएं संजोएँ रहते हैं। समय बीतता जाता है और सफलता के दर्शन नहीं होते, तो फिर वे निराश होने लगते हैं। प्रयास बंद कर देते हैं। अध्यात्म अवलम्बन का उलाहना देते हैं और लगभग नास्तिक स्तर के बन जाते हैं।
  
🔶 यह दु:खद परिस्थिति इसलिए उत्पन्न होती है कि उन्होंने आत्म-विज्ञान का तत्त्वदर्शन समझने से पूर्व आतुरता वश मात्र कर्मकाण्ड आरंभ कर दिये और बालू के महल बनाने लगे। जबकि होना यह चाहिए था कि बीज से वृक्ष उत्पन्न होने के सिद्धांत के साथ जुड़े हुए अन्य तथ्यों को भी समझते और उन पर समुचित ध्यान देते। बीज से वृक्ष बनने की बात सच है। साधना से सिद्धि मिलने की भी, परन्तु आदि और अंत को अपना लेना एवं बीच का विस्तार उपेक्षित कर देना सही नीति नहीं है। बीज को ऊर्वर भूमि, खाद और पानी तीनों का सुयोग मिलना चाहिए, वह अंकुरित होगा, बढ़ेगा और फूलेगा-फलेगा।

🔷 इतना किये बिना बीज से वृक्ष बना देने की जादूगरी कोई बाजीगर ही कर सकता है, यह उसी का काम है। हथेली पर सरसों जमाना। किसान वैसा नहीं करते। जादूगर रुपये बरसाकर दर्शकों को चकित कर सकते हैं, पर व्यवसायी जानते हैं कि यदि ऐसा संभव रहा होता, तो यह बाजीगर करोडग़ति हो गये होते और किसी को परिश्रम करके व्यवसाय संलग्ïन रहने की आवश्यकता न पड़ती। चलने पर ही रास्ता पूरा होता है। आत्मिक प्रगति, जिसे कोई चाहे तो देव अनुग्रह भी कह सकता है, जीवन को परिष्कृत करने की प्राथमिक आवश्यकता को पूरा किए बिना पकड़ में नहीं आ सकती।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समर्थ और प्रसन्न जीवन की कुँजी (भाग 1)

🔷 हर व्यक्ति अपनी स्वतंत्र ईकाई है। उसे अपनी समस्यायें सुलझाने और प्रगति की व्यवस्था बनाने का ताना बाना स्वयं ही बुनना पड़ता है। कठिनाइयाँ आती और चली जाती है। सफलता मिलती और प्रसन्नता की झलक झाँकी कर देने के उपरान्त स्मृतियाँ छोड़ जाती है। दिन और रात की तरह यह चक्र चलता ही रहता है। कोई जीवन ऐसा नहीं बना जिसमें ज्वार भाटे न आते हो। निष्क्रियता की तरह निश्चिंतता भी मरण का चिन्ह है। जीवन एक संग्राम है जिसमें एक एक कदम पर गुत्थियों को सुलझाते हुए चलना पड़ता है। पहाड़ों की चोटियों पर जम जाने के उपरान्त दूसरे के लिए जगह बनाने की सोचते है। नीचे कितनी गहरी खाई रह गई, इसे देखने से डर लग सकता है, ऊपर कितना चढ़ना बाकी है यह जानने के लिए चोटी की ऊंचाई आँकना हैरानी उत्पन्न करेगा।

🔶 इस यात्रा के लिए अटूट धैर्य और साहस की आवश्यकता है, इससे भी अधिक इस बात की कि हर हालत में सन्तुलन बना रहे। सन्तुलन डगमगा जाना आधी सफलता हाथ से गवाँ देना और वजन को दूना बढ़ा लेना है। हर समझदार आदमी को हर गाँठ बाँध रखनी चाहिए कि जन्म के समय वह अकेला आया था। मरने के समय भी चिता पर अकेले ही सोना है। अपना खाया ही अंग लगता है। अपने पढ़ने से ही शिक्षित बना जाता है। यह काम किसी और से नहीं कराये जा सकते।

🔷 अपने बदले में किसी और को सोने के लिए नौकर रखा जाए तो नींद की आवश्यकता पूरी नहीं हो सकती। रास्ता अपने पैरों ही चल कर पार करना पड़ता है। रोग की व्यथा स्वयं ही सहनी पड़ती है। पड़ोसी और संबंधी, सहायता करने के जो काम है।, उन्हें कर सकते है पर चढ़ी हुई बीमारी को सहन करने के लिए अपने ऊपर नहीं ले सकते। इसलिए स्वावलम्बी बनने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। स्वावलम्बन से ही स्वाभिमान की रक्षा होती हैं। नौकरों और सहायकों की बहुलता काम सरल तो बना सकती है पर उन पर सब कुछ छोड़कर निश्चित हो जाना भूल है। इंजन बुझा दिया जाए और डिब्बों को दौड़ते हुए आगे स्टेशन पर जा पहुँचने का हुक्म देना समझदारी नहीं है।

🔶 यों प्रत्यक्ष काम तो हाथ पैर ही करते है, पर वास्तविकता यह है कि उनके पीछे जुड़ी रहने वाली मन की शक्ति ही अधिकाँश जुगाड़ बिठाती है। इसलिए छोटा बड़ा जो भी काम करना हो उसमें मन को सही स्थिति में संलग्न होना आवश्यक है। मन डगमगाया तो समझना चाहिए कि नाव का संतुलन बिगड़ा। बुद्धिमान वे है जो अपने मन को सही स्थिति में रखे रहते है। सड़क पर मोटर के पहिये दौड़ते है और सवारियाँ सीटों पर बैठती है, पर ढक्कन के नीचे लिया हुआ इंजन ही यात्रा पूरी करता है। तेल पानी चुक जाए या गड़बड़ा जाए तो अच्छी तरह रंग रोगन की हुई गाड़ी भी मंजिल पार न कर सकेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988 पृष्ठ 56
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/March/v1.56

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 2)

🔷 इतना जानते हुए भी यदि कोई जान बूझकर अपने पैरों कुल्हाड़ी मारे, काँटों पर चले, गड्ढे में गिरे और बर्र के छत्ते में हाथ डाले तो कोई क्या करे? समझदारी का अभाव समझ में आता है। उसके लिए भाग्य-भगवान को दोष देकर भी जी हलका किया जा सकता है। किन्तु तब क्या किया जाय, जब समझदारी उलटे रास्ते चले? पैर ऊपर करके, हाथों के बल, धरती से सिर रगड़ते हुए चलने में विशिष्टता के अहंकार का प्रदर्शन करे।

🔶 मनुष्य की गतिविधियों को देखकर ऐसी ही स्थिति का अवलोकन करना पड़ता है। जब अपने परमप्रिय सेवक-सम्बन्धी के लिए नासमझी भरी अनीति अपनाते हुए देखा जाता है तब आश्चर्य होता है और असमंजस पड़ता है कि मनुष्य की समझदारी को सराहा जाय या उसकी उलटे पैरों चलने लौटने की विडम्बना को मूर्खतापूर्ण कहकर कोसा जाय।

🔷 शरीर के साथ जो व्यवहार किया जाता है उसे उलट-पुलट कर देखा जाय तो एक शब्द में विचित्र ही कहा जा सकता है। शरीर के साथ शत्रुता निबाही जाय, उसे तोड़-फोड़कर बर्बाद किया जाय ऐसा भी किसी का मन नहीं दीखता, यदि ऐसी बात रही होती तो उसे वस्त्र-आभूषणों से, श्रृंगार प्रसाधनों से क्यों सजाया जाता? केश-विन्यास बनाने जैसे अनेकों कामों मेंं कितना समय लगता है? सजधज में कितना धन व्यय होता है? वाहनों, सेवकों द्वारा उसके लिए कितनी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। विनोद के कितने ही साधन जुटाये जाते हैं? पौष्टिक आहार लेने का भी ध्यान रहता है। इन सब बातों को देखते हुए यह कैसे कहा जाय कि अपनी काया के प्रति किसी का मन शत्रुता निबाहने का है और उसे बर्बाद कर देने का इरादा बन गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Advantages of Worship-Intercession (Part 2)

🔷 I did PUJA-UPASANA (worship-intercession) but with aforesaid mentality. I never approached BHAGWAN with mentality of a beggar, poor, as happens to be generally the case with public-mentality. By today I have been taking the name of RAM as if I have been using soap or a scrub brush. I used RAM-NAM as stone of a washer man to wash my house; I used RAM-NAM as tool of a cotton-comber to thrash myself. Is not so that cotton is repeatedly thrashed at a single point?

🔶 Is not so that cotton-comber repeatedly strikes his hammer over a floor-mat? I used RAM-NAM as a cotton-comber uses his hammer, but how can a cunning fellow, a selfish fellow, a begging fellow, a cowardice fellow and a beseeching fellow get the love of BHAGWAN? How can such person save his grace before BHAGWAN? I think any person with such approach cannot save his faces.
                                             
🔷 I am a respected person before my BHAGWAN. He has saved my grace for I have saved his grace. I said to my BHAGWAN, ‘‘your grace and dignity depends on the dignified life your child lives. Your dignity is associated with my dignity.’’ I maintained the dignity of BHAGWAN to tell him that he has not committed any mistake by giving me the life of a human being. I got its results. BHAGWAN maintained  own as well as my dignity. BHAGWAN too assured me of no loss to my dignity. I am a magnificent person. No one can mark any blot over my dignity, so none did so. No one could point a censoring finger towards me nor did I allow that.
                                             
🔶 I continued to teach people about mechanics and process of spirituality that honesty, sincerity and dignity are the elements only with which one should approach the BHAGWAN. On doing so no deficiency will be left with that person and no objective in his life will be left uncompleted.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 11)

🔷 मित्रो! यदि उद्देश्य और दिशा सही होती, तो एक-एक संत एक-एक व्यक्ति को व्यक्तित्ववान बनाने में अपनी जिंदगी में समर्थ हो गया होता। हम छप्पन लाख संत-छप्पन लाख अच्छे व्यक्ति तैयार कर देते। फिर यह न कहना पड़ता कि यदि सौ आदमी हमारे पास होते, तो दुनिया को हम कष्टों से, दुखों से त्राण दिला देते। स्वामी विवेकानन्द दुनिया में चिल्ला-चिल्लाकर चले गये कि यदि सौ आदमी हमारे पास होते, जैसे कि मैं चाह रहा हूँ और जैसे की मैं तलाश कर रहा हूँ। मेरे हाथ में यदि सौ आदमी आ गये होते, तो सारी दुनिया में भारतीय संस्कृति की जड़ें जमा देता और भारतवर्ष में संस्कृति के प्रति जो अनास्था उत्पन्न हो गयी है, वह अनास्था उत्पन्न नहीं होने देता। विवेकानन्द की इच्छा पूरी न हो सकी। इसी तरह गाँधी जी की इच्छा पूरी न हो सकी और सौ आदमी उनको न मिल सके।

🔶 मित्रो! विवेकानन्द की इच्छा पूरी न हो सकी, क्योंकि उनको सौ आदमी न मिल सके और वे खाली हाथ चले गये। कैसे चले गये? क्योंकि उस तरह के आदमी तैयार न किये जा सके। अगर आदमी तैयार करने के साँचे हमारे पास होते, तो मित्रो! हम न जाने क्या से क्या करके दिखा देते और न जाने क्या से क्या हो जाता। मशीनें बनाना सरल है, पर मनुष्य को बनाना बहुत मुश्किल है। इन्सान अगर सही रूप में इंसान हो, तो उसके प्रभाव के बराबर किसी का प्रभाव नहीं हो सकता। अगर आप अपने आपमें सही हों तब और अपने आप में गलत हों, तब क्या हो सकता है? मित्रो! यदि आदमी अपने आप में गलत हो, तो उसके व्याख्यानों का किसी पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। ऐसा व्यक्ति किसी आदमी को पैदा करने में समर्थ हो सकता है? नहीं, किसी आदमी को पैदा नहीं कर सकता। क्यों नहीं पैदा कर सकता? क्योंकि उसके अंदर जो चुम्बकत्व होना चाहिए, मैग्नेट होना चाहिए, वह मैग्नेट उसके अंदर नहीं होता, आप इस बात पर ध्यान देना।

🔷 मित्रो! आप इस बात पर ध्यान देना कि जनता का स्वभाव इस तरह संभव हुआ कि नहीं। आपका चुम्बकत्व उन्हें प्रभावित कर सका कि नहीं कर सका। साथ ही इस बात पर भी ध्यान देना कि आपकी लगन और आपकी निष्ठा इस आस्था में लगी हुई है कि नहीं। अगर आपकी आस्था जमी हुई है, तो कोई चिन्ता की बात नहीं है कि कोई आदमी आपको सुनता है या नहीं और कोई आदमी आपको समझता है या नहीं और कोई आदमी आपकी ओर ध्यान देता है कि नहीं। आप अपने आपमें ही काफी हैं। आप स्वयं के द्वारा, अपने चरित्र के द्वारा, अपने क्रियाकलापों के द्वारा, अपनी भावना के द्वारा, अपने मस्तिष्क के द्वारा, अपने अन्तःकरण के द्वारा इस वायुमंडल में एक ऐसा वातावरण पैदा कर रहे होंगे, एक ऐसी हवा पैदा कर रहे होंगे और एक ऐसी फिजा पैदा कर रहे होंगे, जो आप चुपचाप रहते हुए भी न जाने क्या से क्या पैदा करके दिखा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 30)

👉 शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

🔷 गुरुगीता सद्गुरु की महिमा का गायन है। सद्गुरु ही वह परम ज्योति है, जो मानव जीवन के अन्धेरे को दूर करती है। इसी के दिव्य प्रकाश से मानव चेतना प्रकाशित होती है। मानव को महामानव, देवमानव बनाते हुए उसे अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति देने वाले कृपालु सद्गुरु ही हैं। उन्हें नमन प्रभु को नमन है। गुरु नमन की भाव भरी साधना से जीवन के सभी तत्त्व, सभी सत्य अनायास ही सहज सुलभ हो जाते हैं।

🔶 नमन-साधना की यह प्रक्रिया सहज-सुलभ होते हुए भी परम-दुर्लभ है। इसमें दुर्लभता उस गुरु तत्त्व के बोध की है, जो गहन-श्रद्धा से ही मिल पाता है। श्रद्धा परिपूर्ण और परिपक्व न हो, तो सद्गुरु को सामान्य मानव समझने की भूल होती रहती है। श्रद्धा और समर्पण की सघनता में ही यह रहस्य समझ में आता है कि गुरुदेव मूर्त महेश्वर हैं। गुरु चेतना को नमन ही ब्राह्मी चेतना को नमन है।
  
🔷 पूर्वोक्त मंत्रों में सद्गुरु के अनुरागी शिष्यों को इसकी अनुभूति कराने की चेष्टा की गई है। इसमें यह बोध कराया गया है कि गुरुतत्त्व, परमात्मतत्त्व एवं सृष्टि तत्त्व अलग-अलग नहीं हैं। जिस परम सत्य के कारण जगत सत्य भासता है, वह गुरुवर के सिवा अन्य कुछ भी नहीं है। जिनके आनन्द से जगत् आनन्द से आपूरित होता है- वे सच्चिदानन्द गुरुदेव ही हैं। जिनके प्रेम के कारण सभी में प्रीति की अनुभूति होती है, वे भावमय भगवान् सद्गुरु ही हैं।

🔶 जिनकी चेतना से विश्व चेतन है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाएँ जिनसे प्रकाशित हैं, सद्गुरु ही वह परम चेतन तत्त्व हैं। जिनके द्वारा ज्ञान मिलने से समस्त भेद दृष्टि समाप्त हो जाती है, वे सदाशिव गुरुदेव ही हैं। उनकी कृपा से ही ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति होती है। ऐसे सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, परम करुणामय सद्गुरु को छोड़कर भला और किसे नमन करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 52

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...