बुधवार, 24 जनवरी 2018

👉 संत की वाणी

🔷 किसी नगर में एक बूढ़ा चोर रहता था। सोलह वर्षीय उसका एक लड़का भी था। चोर जब ज्यादा बूढ़ा हो गया तो अपने बेटे को चोरी की विद्या सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में वह लड़का चोरी विद्या में प्रवीण हो गया !.दोनों बाप बेटा आराम से जीवन व्यतीत करने लगे!

🔶 एक दिन चोर ने अपने बेटे से कहा -- ”देखो बेटा, साधु-संतों की बात कभी नहीं सुननी चाहिए। अगर कहीं कोई महात्मा उपदेश देता हो तो अपने कानों में उंगली डालकर वहां से भाग जाना, समझे !

🔷 ”हां बापू, समझ गया !“ एक दिन लड़के ने सोचा, क्यों न आज राजा के घर पर ही हाथ साफ कर दूं। ऐसा सोचकर उधर ही चल पड़ा। थोड़ी दूर जाने के बाद उसने देखा कि रास्ते में बगल में कुछ लोग एकत्र होकर खड़े हैं। उसने एक आते हुए व्यक्ति से पूछा, -- ”उस स्थान पर इतने लोग क्यों एकत्र हुए हैं ?“

🔶 उस आदमी ने उत्तर दिया --”वहां एक महात्मा उपदेश दे रहे हैं! “

🔷 यह सुनकर उसका माथा ठनका। ‘इसका उपदेश नहीं सुनूंगा ऐसा सोचकर अपने कानों में उंगली डालकर वह वहां से भाग निकला!

🔶 जैसे ही वह भीड़ के निकट पहुंचा एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर गया। उस समय महात्मा जी कह रहे थे, ”कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। जिसका नमक खाएं उसका कभी बुरा नहीं सोचना चाहिए। ऐसा करने वाले को भगवान सदा सुखी बनाए रखते हैं!“

🔷 ये दो बातें उसके कान में पड़ीं। वह झटपट उठा और कान बंद कर राजा के महल की ओर चल दिया। वहां पहुंचकर जैसे ही अंदर जाना चाहा कि उसे वहां बैठे पहरेदार ने टोका, -- ”अरे कहां जाते हो? तुम कौन हो?“

🔶 उसे महात्मा का उपदेश याद आया, ‘झूठ नहीं बोलना चाहिए।’ चोर ने सोचा, आज सच ही बोल कर देखें। उसने उत्तर दिया -- ”मैं चोर हूं, चोरी करने जा रहा हूं!“

🔷 ”अच्छा जाओ।“ उसने सोचा राजमहल का नौकर होगा! मजाक कर रहा है। चोर सच बोलकर राजमहल में प्रवेश कर गया। एक कमरे में घुसा। वहां ढेर सारा पैसा तथा जेवर देख उसका मन खुशी से भर गया!

🔶 एक थैले में सब धन भर लिया और दूसरे कमरे में घुसा! वहां रसोई घर था। अनेक प्रकार का भोजन वहां रखा था। वह खाना खाने लगा!

🔷 खाना खाने के बाद वह थैला उठाकर चलने लगा कि तभी फिर महात्मा का उपदेश याद आया, ‘जिसका नमक खाओ, उसका बुरा मत सोचो।’ उसने अपने मन में कहा, ‘खाना खाया उसमें नमक भी था। इसका बुरा नहीं सोचना चाहिए।’ इतना सोचकर, थैला वहीं रख वह वापस चल पड़ा!

🔶 पहरेदार ने फिर पूछा -- ”क्या हुआ, चोरी क्यों नहीं की?“

🔷 देखिए जिसका नमक खाया है, उसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। मैंने राजा का नमक खाया है, इसलिए चोरी का माल नहीं लाया। वहीं रसोई घर में छोड़ आया!“ इतना कहकर वह वहां से चल पड़ा !

🔷 उधर रसोइए ने शोर मचाया --”पकड़ो, पकड़ों चोर भागा जा रहा है !“ पहरेदार ने चोर को पकड़कर दरबार में उपस्थित किया!

🔶 राजा के पूछने पर उसने बताया कि एक महात्मा के द्धारा दिए गए उपदेश के मुताबिक मैंने पहरेदार के पूछने पर अपने को चोर बताया क्योंकि मैं चोरी करने आया था!

🔷 आपका धन चुराया लेकिन आपका खाना भी खाया, जिसमें नमक मिला था। इसीलिए आपके प्रति बुरा व्यवहार नहीं किया और धन छोड़कर भागा।

🔶 उसके उत्तर पर राजा बहुत खुश हुआ और उसे अपने दरबार में नौकरी दे दी !

🔷 वह दो-चार दिन घर नहीं गया तो उसके बाप को चिंता हुई कि बेटा पकड़ लिया गया- लेकिन चार दिन के बाद लड़का आया तो बाप अचंभित रह गया अपने बेटे को अच्छे वस्त्रों में देखकर !

🔶 लड़का बोला --”बापू जी, आप तो कहते थे कि किसी साधु संत की बात मत सुनो! लेकिन मैंने एक महात्मा के दो शब्द सुने और उसी के मुताबिक काम किया तो देखिए सच्चाई का फल !

🔷 सच्चे संत की वाणी में अमृत बरसता है, आवश्यकता आचरण में उतारने की है ....!!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 Jan 2018


👉 ईमानदारी का व्यवहार

🔶 ईमानदार जीवन हजार मनकों में अलग चमकता हीरा होता है। ईमानदारी यश, धन, समृद्धि का आधार होती है। इसके बावजूद लोग कहते सुने जाते हैं कि व्यापार में बेईमानी बिना काम नहीं चलता, ईमानदारी से रहने में गुजारा नहीं हो सकता, वास्तव में यह गलत है।
  
🔷 वस्तुत: जो समझते हैं कि हमने बेईमानी से पैसा कमाया है। वे गलत समझते हैं, असल में उन्होंने ईमानदारी की ओट लेकर ही अनुचित लाभ उठाया होता है। कोई व्यक्ति साफ-साफ यह घोषणा कर दे कि ‘मैं बेईमान हूँ और धोखेबाजी का कारोबार करता हूँ,’ तब फिर अपने व्यापार में लाभ करके दिखावे तो यह समझा जा सकता है कि हाँ, बेईमानी की आड़ लेना कोई लाभदायक नीति है। जिस दिन उसका पर्दाफाश हो जाएगा कि भलमनसाहत की आड़ में बदमाशी हो रही है उस दिन ‘कालनेमी माया’ का अंत ही समझिये।
  
🔶 आप धोखेबाज मत बनिए, ओछे मत बनिये, गलत मत बनिए अपने लिए प्रतिष्ठा की भावनाएँ फैलने दीजिए। यह सब होना ईमानदारी पर निर्भर है। छोटा काम, कम पूँजी का, कम लाभ का, अधिक परिश्रम का इत्यादि जो भी काम आपके हाथ में है, उसी में अपना गौरव प्रकट होने दीजिए। यदि आप दुकानदार हैं, तो पूरा तौलिए, नियत कीमत रखिए, जो चीजें जैसी है, उसे वैसी ही कह कर बेचिए। इन तीन नियमों पर अपने काम को अवलम्बित कर दीजिए। मत डरिए कि ऐसा करने से हानि होगी। कम तोलकर या कीमत ठहराने में अपना और ग्राहक का बहुत सा समय बर्बाद करके जो लाभ कमाया जाता है, असल में वह हानि के बराबर है।

🔷 दुकानदार के प्रति ग्राहक के मन में सन्देह उत्पन्न हुआ, तो समझ लीजिए कि उसके दुबारा आने की तीन चौथाई आशा चली गयी। इसी प्रकार मोलभाव करने में यदि बहुत मगज पच्ची की गयी है, पहिली बार माँगे गये दामों को घटाया गया है, तो उस समय भले ही वह ग्राहक पट जाय पर मन में यही धकपक करता रहेगा कि कहीं इसमें भी अधिक दाम तो नहीं चले गये हैं। ऐसे संकल्प-विकल्प शंका-संदेह लेकर जो ग्राहक गया है, उसके दुबारा आने की आशा कौन कर सकता है? जिस दुकानदार के स्थायी और विश्वासी ग्राहक नहीं भला उसका काम कितने दिन चल सकता है?
  
🔶 कुछ बताकर कुछ चीज देना एक गलत बात है, जिससे सारी प्रतिष्ठा धूलि में मिल जाती है। दूध में पानी, घी में वेजीटेबिल, अनाज में कंकड, आटे में मिट्टी मिलाकर देना, आज कल खूब चला है। असली कहकर नकली और खराब चीजें बेची जाती हैं। खाद्य पदार्थों और औषधियों तक की प्रामाणिकता नष्ट हो गयी है। मनमाने दाम वसूल करना और नकली चीजें देना यह बहुत बड़ी धोखाधड़ी है। यदि यह प्रामाणित किया जा सके कि वस्तु असली है, तो ग्राहक उसको कुछ अधिक पैसे देकर भी खरीद सकता है। सदियों का पराधीनता ने हमारे चरित्र बल को नष्ट कर डाला है। तदनुसार हमारे कारोबार झूठे,नकल, दगाफरेव से भरे हुए होने लगे हैं। गलत बात से न तो बड़े पैमाने पर लाभ ही उठाया जा सकता और न प्रतिष्ठा ही प्राप्त की जा सकती है। व्यापार में धोखेबाजी की नीति बहुत ही बुरी नीति है। इस क्षेत्र में कायरों और गलत स्वभाव के लोगों के घुस पडऩे के कारण भारतीय उद्योग धन्धे, व्यापार नष्ट हो गये।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अहिंसा और हिंसा (भाग 2)

🔶 बड़े बुद्धिमान, ज्ञानवान, शरीरधारी प्राणियों को दुख देने, दण्ड देने या मार डालने या हिंसा करने के समय यह विचारना आवश्यक है। कि यह दुख किस लिए दिया जा रहा है। सब प्रकार के दुख को पाप और सब प्रकार के सुख को पुण्य नहीं कहा जा सकता। गरीब भेड़ों के खून के प्यासे भेड़ियों को मार डालना न तो पाप है और न सर्प को दूध पिलाना पुण्य है। हिंसा अहिंसा की परिभाषा कष्ट या आराम के आधार पर करना एक बड़ा घातक भ्रम है। जिसके कारण केवल पाप का विकास और धर्म का नाश होता है।
एक आप्त वचन है कि- वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति अर्थात्- विवेकपूर्वक की गई हिंसा हिंसा नहीं है।

🔷 अविवेकपूर्वक दूसरों को जो कष्ट दिया गया है वह हिंसा है। जिह्वा की चटोरेपन के लोभ में निरपराध और उपयोगी पशु पक्षियों का माँस खाने के लिए उनकी गरदन पर छुरी चलाना पातक है, अपने अनुचित स्वार्थ की साधना के लिए निर्दोष व्यक्तियों की दुख देना हिंसा है। किन्तु निस्वार्थ भाव से लोक कल्याण के लिए तथा उसी प्राणी के उपकार के लिए यदि उसे कष्ट दिया जाय, तो वह हिंसा नहीं, वरन्, अहिंसा ही होगी। डॉक्टर निस्वार्थ भाव से रोगी की वास्तविक सेवा करने के लिए फोड़े को चीरता है, एक न्यायमूर्ति जज समाज की व्यवस्था कायम रखने के लिए डाकू को फाँसी की सजा का हुक्म देता है, एक धर्म प्रचारक अपने जिज्ञासु साधक आत्म कल्याण के लिए तपस्या करने के मार्ग पर प्रवृत्त करता है। मोटी दृष्टि से देखा जाय तो डॉक्टर का फोड़ा चीरना जज का फाँसी देना, गुरु का शिष्य को कष्ट में डालना, हिंसा और अधर्म जैसा प्रतीत होता है। पर असल में यह सच्ची अहिंसा है।

🔶 गुण्डे बदमाशों को क्षमा कर देने वाला हरामखोरों का दान देन वाला दुष्टता को सहन करने वाला, देखने में अहिंसक प्रतीत होता है। पर असल में वह घोर पातकी हिंसक और हत्यारा है। क्योंकि अपनी बुज़दिली और हीनता को अहिंसा की बेड़ी में छिपाता हुआ असल में वह पाजीपन की मदद करता है। एक प्रकार से अनजाने में दुष्टता की जहरीली बेल को सींचकर दुनिया के लिए प्राणघातक फल उत्पन्न करने में सहायक बनता है। ऐसी अहिंसा को जड़बुद्धि के अज्ञानी ही अहिंसा कह सकते है असल में तो वह प्रथम श्रेणी की हिंसा है।

📖 अखण्ड ज्योति 1942 जुलाई

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/July/v2.14

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 1)

🔷 जीवन यदि शरीर मात्र ही हो और प्रसव के समय उसका आदि और चिता के साथ अन्त माना जाय, तो फिर कृमि-कीटकों की तरह पेट प्रजनन की उधेड़ बुन में लगे रहना भी पर्याप्त हो सकता है। मनःसंस्थान अधिक विकसित होने के कारण इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित रूप में, लोभ-मोह में भी चरितार्थ होते रहने दिया जा सकता है। उद्धत अहंकारिता का त्रिदोष इसमें और मिल सके तो फिर प्रेत-पिशाचों जैसी स्थिति में भी रहा जा सकता है। वे खाते कम और खुतराते अधिक हैं। उपभोग उतना नहीं कर पाते जितना विनाश करते हैं। उनकी प्रसन्नता ध्वंस, पतन और दुर्गति के दृश्य देखने पर अवलम्बित रहती है। जलते और जलाते, कुढ़ते और कुढ़ाते दिन बिताते हैं। इन्हीं वर्ग समुदायों में से किसी में रहना जिन्हें भाया, सुहाया हो उनसे कोई क्या कहे? किन्तु जिन्हें कुछ आगे की बात सोचनी आती है, उनसे तो कहने सुनने जैसी ढेरों बातें हैं। उनमें से कुछ तो ऐसी हैं जिन्हें हीरे मोतियों से तोला जा सकता है।

🔶 किसी को यदि यह आभास हो कि हम मात्र शरीर नहीं है। आत्मा नाम की किसी वस्तु का भी अस्तित्व है और उसका थोड़ा बहुत सम्बन्ध आत्मा से भी है, तो ढेरों ऐसे प्रश्न उभर कर आते हैं जिनका स्वरूप और समाधान ढ़ूँढे बिना गति नहीं। कुछ ऐसे ज्वलन्त प्रश्न हैं जिनकी उपेक्षा वही कर सकता है, जिसे लोक-परलोक से, आत्मा-परमात्मा से, उत्थान-पतन से, कर्म-अकर्म से कुछ लेना-देना न हो। जिनकी दृष्टि लोभ और मोह से एक कदम भी आगे को नहीं जाती। जिसे तत्काल की सुख-सुविधा, आत्मश्लाघा, सस्ती वाहवाही के अतिरिक्त और कुछ सुहाता न हो। जिसे न भूत का स्मरण हो और न भविष्य के भले बुरे होने का अनुमान। ऐसे परमहंस, जड़ भरत या अतिशय चतुर व्यक्ति ही इस स्थिति में रहते पाये गये हैं। जिन्हें तत्काल से आगे-पीछे की कोई बात सोचने की न फुरसत मिले न आवश्यकता लगे।

🔷 यदि गहरी न छानी हो और अपना अस्तित्व शरीर से भिन्न भी प्रतीत होता हो, तो फिर सोचना होगा कि सृष्टा ने जो सुविधाएँ किसी भी जीवधारी को नहीं दी है वे मात्र मनुष्य को ही क्यों प्रदान कर दी? जबकि उसे समदर्शी न्यायकारी और परमपिता कहा जाता है। इन तीनों विशेषताओं का तब खण्डन हो जाता है, जब अन्य प्राणियों को वंचित रखकर कुछ असाधारण सुविधाएँ मनुष्य को ही देने की बात सामने आती हैं। सबको समान या किसी को नहीं, इसी में प्राणियों का पिता कहलाने वाले परमात्मा की न्यायप्रियता एवं समदर्शिता सिद्ध होती है। न्यूनाधिक वितरण करने पर तो उस पर पक्षपात का लांछन लगता है। ऐसा हो नहीं सकता। परमात्मा ही जब ऐसी अनीति बरतेगा तो उसकी सृष्टि में न्याय नीति का अस्तित्व किस प्रकार बना रह सकेगा?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 25 Jan

🔷 Every man in his pains or disgrace condition need love and sympathy to stand in life. Man who knows the value of those virtues will not remain a silent observer, but engage himself for the service he can impart. Such help, guidance or encouragement gives a strong boost up in life. One should never miss such chances to give proper stand to the down-trodden.
 
🔶 To be dutiful in life covers a great aspect of successful life. A man in a society is expected to fulfill his duties for his own body maintainance, for the members of his family and also a full flazed responsibility for the society and country he lives in every man is expected to prove himself dutiful in all above dimensions of life.

🔷 One who knows the value of time management and economy; that will achieve at least half of the royal road of success in life. Other virtues of life like simplicity hard labour. Restrained life and kindness and loving nature are very valuable achievement for progress both in material life and spiritual progress.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 5)

🔷 मित्रो! मनुष्यों को मनुष्यता का शिक्षण करना हमारा और आपका सबसे बड़ा काम है। हमारा काम वह नहीं है जो लोग हमसे उम्मीद करते हैं। लोग हमसे यह उम्मीद करते हैं कि हम दुनिया की आर्थिक समस्या को कैसे सुधार पायेंगे? लोगों को मालदार कैसे बना पायेंगे? और लोगों की आर्थिक व्यवस्था कैसे बना पायेंगे। मित्रो! हम आर्थिक व्यवस्था की बात तो नहीं करते, परन्तु उसका मजबूत आधार हम बनाकर देंगे। जहाँ परिश्रमी और पुरुषार्थी लोग रहते हैं, वहाँ मालदारों की कमी नहीं रहती है। जापान छोटा सा द्वीपों वाला देश है, जहाँ बराबर भूकम्प आते रहते हैं। जहाँ बराबर तूफान आते रहते हैं और जहाँ बराबर तबाही आती रहती है।

🔶 जरा-सा देश है जापान, लेकिन वहाँ के नागरिक कैसे श्रमपरायण एवं पुरुषार्थी होते हैं। छोटी-सी जमीन में इतनी पैदावार कर ली कि किसी जमाने में विश्व में पहले नम्बर का देश था। आज तो नहीं रहा। एटमबम गिरने के बाद में कुछ परिवर्तन तो हुए, लेकिन अभी भी उसके मुकाबले का देश दुनिया में तलाश करें, तो उसके मुकाबले का कोई दूसरा देश दिखाई नहीं पड़ता। एकदम कम साधन, इतनी कम जमीन, इतनी कम व्यवस्था में रहकर भी उसने सारी दुनिया को चैलेंज किया। कभी चीन पर हावी हुआ था, तो कभी अमेरिका को चैलेंज किया था। आर्थिक दृष्टि से अपने समान देशों से वह कहाँ-से चला गया।

🔷 मित्रो! यह क्या है? यह सम्पदा कहाँ से आती है? यह सम्पदा मनुष्य के शरीर में भरी पड़ी है और भीतर दबी पड़ी है। यदि हम आदमी को पुरुषार्थवान बना दें और कम्युनिस्ट बना दें, तो? आपने देखा नहीं, थोड़े दिन पहले जो लोग पाकिस्तान से आये थे, अपनी सारी-की चीजों को गवाँ कर आये थे। वे यहाँ हिन्दुस्तान में आ गये और भिक्षा माँगने की अपेक्षा लेमनजूस बेचना शुरू कर दिया। टॉफी बेचना शुरू कर दिया, पापड़ बेचना शुरू कर दिया और खिलौना बेचना शुरू कर दिया। आप देखिए न, पंजाब से आया आदमी कोई भिखारी मालूम पड़ता है क्या? सब मालदार हो गये और वे पैसे के मालिक बने बैठे हैं।

🔶 सारे-के आदमी दुकान चला रहे हैं। आप सबको उनने चैलेंज कर दिया और जाने वे कहाँ-से चले गये। आप तो यह चाहते हैं कि गुरुजी, हमें आप लक्ष्मी का मंत्र बता दीजिए, हमारी नौकरी लगवा दीजिए। हम तो मैट्रिक पास हैं और मारे-मारे फिरते हैं। हमें कहीं काम पर लगा दीजिए, नौकरी लगवा दीजिए। पागल कहीं का, भूखा मरेगा। जो आदमी पुरुषार्थी नहीं है, जिसके अन्दर परिश्रम का माद्दा नहीं है और जो मेहनतकश नहीं है और जिस आदमी को मेहनत करने में मजा नहीं आता, वह आदमी मित्रो! ऐसे ही पैदा हुआ है और उसे ऐसे ही मरना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 22)

👉 सब कुछ गुरु को अर्पित हो

🔷 इन महामंत्रों का प्रत्येक अक्षर साधक के साधना पथ का प्रदीप है। इससे निकलने वाली प्रत्येक किरण के प्रकाश में साधक का साधनामय जीवन उज्ज्वल होता है। गुरु तत्त्व जितना श्रेष्ठ है, उतना ही श्रेष्ठ गुरु का कार्य है। तात्त्विक दृष्टि से दोनों एक ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी शिवानन्द जी महाराज कहते थे- ‘डिवोशन टू संघ इज़ डिवोशन टू ठाकुर’ यानि कि मिशन-मठ के संगठन के प्रति भक्ति ठाकुर के प्रति भक्ति है। सद्गुरु का कार्य सद्गुरु की चेतना का ही विस्तार है। जो शिष्य अपने सद्गुरु के कार्य के प्रति समर्पित है, यथार्थ में वही सद्गुरु के प्रति समर्पित है। जो सद्गुरु के कार्य के लिए अपने समय, श्रम एवं धन का नियोजन करते हैं, वही अपने गुरु की सच्ची आराधना करते हैं।
  
🔶 सद्गुरु की आराधना के लिए गुरु कार्य हेतु अपने साधन एवं समय का एक महत्त्वपूर्ण अंश लगाना चाहिए। गुरु कार्य छोटा हो या बड़ा उसे करने में किसी भी तरह की लज्जा नहीं होनी चाहिए। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि लोगों को जिन कार्यों के लिए लज्जित होना चाहिए, उन्हें करने में वे लज्जित नहीं होते। बड़े मजे से झूठ, छल, कपट करते हैं, धोखाधड़ी करते हैं। इन कार्यों में उन्हें लज्जा नहीं आती है; पर गुरु की आज्ञा का पालन करने में वे शर्माते हैं। सद्गुरु का कार्य जो भी है, उसे भक्तिपूर्ण रीति से करना चाहिए। इसके लिए लज्जा का त्याग करने में भी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 42

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८१)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि...