मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

👉 अन्न का प्रभाव

🔷 शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह मृत्यु से पूर्व आवश्यक उपदेश पाण्डवों को दे रहे थे। उन्हें इस प्रकार धर्मोपदेश देते देखकर द्रौपदी के मन में आया कि जब दुर्योधन मेरी इज्जत उतार रहा था तब इनने उसे कुछ उपदेश नहीं किया और आज धर्म की इतनी लम्बी-चौड़ी बातें कर रहे है। द्रौपदी इन मनोभावों के साथ हंस पड़ी।

🔶 द्रौपदी के मनोभाव भीष्म ने जान लिये। उनने कहा-बेटी उस समय मेरे शरीर में कौरवों का अन्न भरा हुआ था जिसके कारण मेरी बुद्धि वैसी ही अधर्मयुक्त हो रही थी। अब युद्ध में वह रक्त निकल गया, कई दिन से मैंने भोजन भी नहीं किये इससे मेरे पेट में कोई अन्न न होने से मेरे विचार शुद्ध है और अब मैं धर्मोपदेश देने की स्थिति में होने के कारण उत्तम शिक्षाऐं आप लोगों को दे रहा हूँ।

🔷 दुष्टों का अन्न खाने से सत्पुरुषों की भी बुद्धि दूषित हो जाती है अन्न का मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 150)

🌹  ‘‘विनाश नहीं सृजन’’ हमारा भविष्य कथन

🔷 अगला समय संकटों से भरा-पूरा है, इस बात को विभिन्न मूर्धन्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न प्रकार के जोरदार शब्दों में कहा। ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल में जिस ‘‘सेविन टाइम्स’’ में प्रलय काल जैसी विपत्ति आने का उल्लेख किया है, उसका ठीक समय यही है। इस्लाम धर्म में चौदहवीं सदी के महान संकट का उल्लेख है। भविष्य पुराण में इन्हीं दिनों महती विपत्ति टूट पड़ने का संकेत है। सिखों के गुरु ग्रंथसाहिब में भी ऐसी ही अनेक भविष्यवाणियाँ हैं। कवि सूरदास ने इन्हीं दिनों विपत्ति आने का इशारा किया था। मिस्र के पिरामिडों में भी ऐसे ही शिलालेख पाए गए हैं। अनेक भारतीय भविष्यवक्ताओं ने इन दिनों भयंकर उथल-पुथल के कारण अध्यात्म आधार पर और दृश्य गणित ज्योतिष के सहारे ऐसी ही सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं।

🔶 पाश्चात्य देशों में जिन भविष्य वक्ताओं की धाक है और जिनकी भविष्यवाणियाँ ९९ प्रतिशत सही निकलती रही हैं, उनमें जीन डिक्शन, प्रो०हरार, एंडरशन, जॉनबावेरी, कीरो, आर्थर क्लार्क, नोस्ट्राडेमस, मदर शिम्टन, आनंदाचार्य आदि ने इस समय के सम्बन्ध में जो सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं, वे भयावह हैं। कोरिया में पिछले दिनों समस्त संसार के दैवज्ञों का एक सम्मेलन हुआ था, उसमें भी डरावनी सम्भावनाओं की ही आगाही व्यक्त की गई थी। टोरंटो-कनाडा में, संसार भर के भविष्य विज्ञान विशेषज्ञों (फ्यूचराण्टालाजिस्टा) का एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें वर्तमान परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करते हुए कहा था कि बुरे दिन अति समीप आ गए हैं। ग्रह-नक्षत्रों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने वालों ने इन दिनों सूर्य पर बढ़ते धब्बों और लगातार पड़ने वाले सूर्यग्रहणों को धरती निवासियों के लिए हानिकारक बताया है। इन दिनों सन् ८५ के प्रारम्भ में उदय हुआ ‘‘हैली धूमकेतु’’ की विषैली गैसों का परिणाम पृथ्वीवासियों के लिए हानिकारक बताया गया है।

🔷 सामान्य बुद्धि के लोग भी जानते हैं कि अंधा-धुंध बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अगले दिनों अन्न-जल तो क्या सड़कों पर चलने का रास्ता तक न मिलेगा। औद्योगीकरण-मशीनीकरण की भरमार से हवा और पानी भी कम पड़ रहा है और विषाक्त हो चला है। खनिज तेल और धातुएँ, कोयला, पचास वर्ष तक के लिए नहीं है। अणु परीक्षणों से उत्पन्न विकिरण से अगली पीढ़ी और वर्तमान जन समुदाय को कैंसर जैसे भयानक रोगों की भरमार होने का भय है। कहीं अणु युद्ध हो गया तो इससे न केवल मनुष्य, वरन् अन्य प्राणियों और वनस्पतियों का भी सफाया हो जाएगा। असंतुलित हुए तापमान से ध्रुवों की बर्फ पिघल पड़ने, समुद्र में तूफान आने और हिमयुग के लौट पड़ने की सम्भावना बताई जा रही है और अनेक प्रकार के संकटों के अनेकानेक कारण विद्यमान हैं। इस संदर्भ में साहित्य इकट्ठा करना हो, तो उनसे ऐसी सम्भावनाएँ सुनिश्चित दिखाई पड़ती हैं, जिनके कारण इन वर्षों में भयानक उथल-पुथल हो। सन् २००० में युग परिवर्तन की घोषणा है, ऐसे समय में भी विकास से पूर्व विनाश की, ढलाई से पूर्व गलाई की सम्भावना का अनुमान लगाया जा सकता है। किसी भी पहलू से विचार किया जाए, प्रत्यक्षदर्शी और भावनाशील मनीषी-भविष्यवक्ता इन दिनों  विश्व संकट को अधिकाधिक गहरा होता देखते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.170

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 9)

🔶 हर रोज चिट्ठियाँ आती हैं, हर शाखाओं में मारकाट-मारकाट मुझे मैनेजर बनाइये, इस मैनेजर को निकालिये। हमने शाखा तथा शक्तिपीठें इसलिए नहीं बनाई थीं, देवता को इसलिए नहीं बैठाया था कि लोगों का अहंकार बढ़े। हमने ट्रस्टी इसलिए नहीं बनाया था कि इसे बरबाद करो। हमने स्वयं गलती की इन लोगों को मालिक, ट्रस्टी बनाकर, इनके अहंकार एवं स्वार्थपरता को आगे बढ़ाकर। अब पंचायत समितियों में जिस प्रकार झगड़ा होते हैं, हमारे शक्तिपीठों में भी हर जगह चाण्डालपन है, हमें क्या दिखता नहीं? क्या हमने शक्तिपीठें इसीलिए बनाई थीं, पूजा इसीलिए प्रारम्भ की थी, इसीलिए संगठन बनाया था कि आप लोग अहंकारी बन जाइये और आपस में ही एक-दूसरे की टाँग-खिचाई कीजिये, आप ऐसी पूजा को बंद कीजिए, पूजा मत कीजिये, पर यह घटियापन बन्द कीजिये। आप नास्तिक हो जाइये, भले ही पर आप इसी तरह के संगठन बनाना बन्द कर दीजिए। आप शक्तिपीठों को बनाना बन्द कर दीजिये।
        
🔷 यहाँ हम एक बात अवश्य कहेंगे कि आप आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिये। पूजा को पीछे हटाइए, आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिये। आप यह मत सोचिये कि गुरुजी ने चौबीस-चौबीस लाख का जप किया था। नहीं, हम और चौबीस लाख के जप करने वालों का नाम बता सकते हैं जो आज बिलकुल खाली एवं छूँछ हैं। जप करने वाले कुछ नहीं कर सकते हैं, हम ब्राह्मण की शक्ति, सन्त की शक्ति जगाना चाहते हैं। आप राम का नाम लें या न लें। अब तो मैं यहाँ तक कहता हूँ कि अब माला जप करें या न करें, एक माला जप करें या ८१ माला जप करें, परन्तु मुख्य बात यह है कि आप अपने ब्राह्मणत्व को जगाइए। प्याऊ को कौन चलाएगा। हनुमान चालीसा पाठ करने वालों ने कितनों का भला किया है? ब्राह्मणों ने भला किया है, सन्तों ने भला किया है? ब्राह्मणों की वाणी में, सन्तों की तपस्या में बल होता है। आपको इसी प्रकार कोई मिल जाएगा तो आप नास्तिक हो जाएँगे। आप पूजा का महत्त्व बढ़ाइये। अध्यात्म इन लोगों के द्वारा ही टिका हुआ है।

🔶 आपके पास बैंक में धन जमा नहीं है, तो चैक कैसे काट सकते हैं। आपकी बैंक में पूँजी होनी चाहिए। पहले जमा तो कीजिए कुछ। केवल पूजा से ही काम चलने वाला नहीं है। हमारी सबसे बड़ी पूजा समाज की सेवा है। हमने लाखों आदमियों की ही नहीं, वरन् सारे विश्व की सेवा की है। हमने अपनी अक्ल, धन, अनुष्ठान, वर्चस् सभी इसी में लगाया है। हमने खेती करने वालों, मकान बनाने वालों को देखा है कि सेवा के नाम पर नगण्य हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 31 Oct 2017

🔶 सत्य का सज्जनता से अनन्य सम्बन्ध है। सत्यनिष्ठा उसी की निभेगी जो सज्जन होगा। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि सत्यनिष्ठा से सज्जनता के सभी आवश्यक गुण उत्पन्न हो जायेंगे। एक के बिना दूसरी बात निभ ही नहीं सकेगी। तामसी राजसी इच्छाओं और आवश्यकताओं वाला व्यक्ति सत्यनिष्ठ रह सके यह कठिन है। सत्य केवल सच बोलने तक ही सीमित नहीं है। वरन् वह एक सर्वांगीण सर्वतोमुखी जीवन साधना है। वैसी ही साधना जैसी अन्यान्य कष्ट साध्य योग साधनाएँ परमात्मा को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। सत्य पालन की साधना से भी जीवात्मा परमात्मा तक इसी प्रकार पहुँच सकती है जैसे अन्यान्य योगों के साधक तपस्वी लोग ब्रह्म सायुज्य की स्थिति तक पहुँचते हैं। जिस प्रकार सभी साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।

🔷 सफलता क्षेत्र में सत्य का भी वही स्थान है जो ईश्वर का। जिस प्रकार शिव, विष्णु आदि की उपासना की जाती है उसी प्रकार ही सत्य की भी आराधना है। सिद्ध हुआ सत्य भी साधक को वैसे ही वरदान दे सकता है जैसे कोई अन्य देवता या साक्षात् परमात्मा प्रसन्न होने पर अपने आराधक को प्रदान करते हैं।
पातञ्जलि योगदर्शन साधन पाद के सूत्र 36 में कहा गया है—
सत्य प्रतिष्ठायाँ क्रिया फलाश्रित्वम्।
अर्थात्—सत्य में स्थिति दृढ़ हो जाने पर क्रिया फल का आश्रय बन जाती है।

🔶 सत्यनिष्ठ की वाणी के द्वारा जो क्रिया होती है अर्थात् जो कुछ वह कहता है सो फलीभूत सफल होता है। उसकी वाणी कभी असत्य नहीं होती। अनेकों पुण्य कार्य करने से जो फल अन्य लोगों को मिलते हैं वह फल सत्यनिष्ठ को अपनी वाणी साधना से ही मिल जाते हैं। यदि वह किसी को शाप या वरदान दे तो पूर्ण सफल होता है। किसी ने जो शुभ नहीं किया है उसका सत्परिणाम उपस्थित कर देने की शक्ति उसमें उत्पन्न हो जाती है। यह तो एक प्रत्यक्ष एवं प्रकट सिद्धि है। इसके अतिरिक्त भी सत्यनिष्ठ अनेक आध्यात्मिक सफलताओं से सम्पन्न हो जाता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 रोते क्यों हो?

🔸 तुम उदास क्यों हो? इसलिए कि तुम गरीब हो। तुम्हारे पास रुपया नहीं है।

🔹 इसलिए कि तुम्हारी ख्वाहिशें दिल ही दिल में घुटकर रह जाती हैं।


🔸 इसलिए कि दिली हसरतों को पूरा करने के लिए तुम्हारे पास दौलत नहीं है।


🔹 मगर क्या तुम नहीं देखते कि गुलाब का फूल कैसा मुस्करा रहा है।


🔷 तुम क्यों रोते हो?
इसलिए कि तुम दुनिया में अकेले हो, मगर क्या तुम नहीं देखते कि घास का सर सब्ज तिनका मैदान में अकेला खड़ा है लेकिन वह कभी सर्द आहें नहीं भरता-किसी से शिकायत नहीं करता, बल्कि जिस उद्देश्य को पूरा करने के लिए परमात्मा ने उसे पैदा किया है। वह उसी को पूरा करने में लगा है।

🔶 क्या तुम इसलिए रोते हो कि तुम्हारा अजीज बेटा या प्यारी बीबी तुमसे जुदा हो गयी? मगर क्या तुमने इस बात पर भी कभी गौर किया है कि तुम्हारी जिन्दगी का सुतहला हिस्सा वह था जब कि तुम ‘बच्चे’ थे। न तुम्हारे कोई चाँद सा बेटा था और न अप्सराओं को मात करने वाली कोई बीबी ही थी, उस वक्त तुम स्वयं बादशाह थे।

🔷 क्या तुमने नहीं पढ़ा कि बुद्ध देव के जब पुत्र हुआ, तो उन्होंने एक ठंडी साँस ली और कहा- ‘आज एक बंधन और बढ़ गया।’ वे उसी रात अपनी बीबी और बच्चे को छोड़कर जंगल की ओर चल दिये।

🔶 याद रखो जिस चीज के आने पर खुशी होती है, उस चीज के जाने पर तुम्हें जरूर रंज होगा। अगर तुम अपनी ऐसी जिन्दगी बना लो कि न तुमको किसी के आने पर खुशी हो, तो तुमको किसी के जाने पर रंज भी न होगा। यही खुशी हासिल करने की कुँजी है। विद्वानों का कथन है-

🔷 जो मनुष्य अपने आपको सब में और सबको अपने आप में देखता है, उसको न आने की खुशी, न जाने का रंज होता है।

🔶 अगर तुम घास के तिनके की तरह केवल अपना कर्त्तव्य पूरा करते रहो- माने तूफान में हवा के साथ मिलकर झोंके खाओ, माने वक्त मुसीबत भी खुशी से झूमते रहो।

🔷 बरसात के वक्त अपने बाजू फैलाकर आसमान को दुआएं दो। गरीब घसियारे के लिए अपने नाजुक बदन को कलम कराने के लिए तैयार रहो।

🔶 बेजुबान जानवरों को- भूख से तड़पते हुए गरीब पशुओं को अपनी जात से खाना पहुँचाओ तो मैं यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हें कभी रंज न होगा कभी तकलीफ न होगी। सुबह उठने पर शबनम (ओंस) तुम्हारा मुँह धुलायेगी। जमीन तुम्हारे लिए खाने का प्रबन्ध कर देगी। तुम हमेशा हरे-भरे रहोगे। जमाना तुम्हें देखकर खुश होगा, बल्कि तुम्हारे न रहने पर या मुरझा जाने पर दुनिया तुम्हारे लिए मातम करेगी।

🔷 वह बेवकूफ है। जो दुनिया और दुनिया की चीजों के लिए रोता है हालाँकि वह जानता है कि इन दोनों में से न मैं किसी चीज को अपने साथ लाया था और न किसी चीज को अपने साथ ले जाऊँगा।

🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 12

👉 आज का सद्चिंतन 31 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Oct 2017


सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 8)

🔶 क्या हम जिन्दगी भर, अपने बीबी-बच्चों को ही खिलाते रहेंगे? जिस पर मनुष्य का भविष्य टिका है, क्या उसके लिए कुछ नहीं कर सकेंगे? अपने लिये अधिक, समाज के लिए इतना कम। यह कैसे होगा? मेरे गुरु ने दुखियारों की सेवा, समाज की सेवा कम की है, परन्तु उसने सारे विश्व को हिला दिया है। दूसरों के दुःखों को देखकर यह सोचते हैं कि इसके लिए हम क्या करें? उस समय मैं रो पड़ता हूँ तथा उसे सहायता किये बिना मेरा मन नहीं मानता है। यह क्रम चलेगा ही। परन्तु एक काम और है, इनसान को ऊँचा उठाने का। हम सोचते हैं कि और यदि यह काम भी किया होता तो मजा आ जाता। आप जितने लोग बैठे हैं, अगर आपको हम फुटबॉल की तरह ऊँचे उछाल दिये होते तो मजा आ जाता।
       
🔷 आप लोगों को उछाल दें तो आप में से हर एक आदमी हनुमान, ऋषि विवेकानन्द दिखाई पड़ेगा। आप लोगों में से एक भी आदमी ऐसा नहीं है, जो रैदास की तुलना में गरीब हो। परन्तु आप इतने भारी हैं कि आपके सेल्स काम नहीं कर रहे हैं, आपके हाथ उठ नहीं पा रहे हैं। मानसिक दृष्टि से एक-एक बेड़ियाँ इतनी भारी हैं जैसे हजार मन की हों। ऐसे में आपको कैसे उठाऊँ? आपकी बेड़ियों को मैं काटूँगा क्योंकि हमारे बाद इन बच्चों को खिलाने वाला, नर्सिंगहोम चलाने वाला कहाँ से लायेंगे? यह अस्पताल बन्द हो जाने पर आपके अनुभव के बिना इनका ऑपरेशन कौन करेगा? इनसान को उठाया नहीं जा सका तो बात कैसे बनेगी?

🔶 इसी काम के लिए हम समय लगाना चाहते हैं। सवाल हमारे समय का है, आप तो केवल पूजा के पीछे पड़े हैं। देवी-देवता के पीछे लगे हैं कि मनोकामना पूरी हो जाए। किसी दिन मेरे दिमाग में गुस्सा आ गया तो पूजा को ही बन्द कर दूँगा और कहूँगा कि इसी के पीछे पड़ा है। पूजा के चक्कर में पड़ा है। पूजा से आज्ञाचक्र जगेगा। सुन लेना एक दिन मैं पूजा को गालियाँ दूँगा, यदि यही रटता रहा कि सब कुछ पूजा से मिल जाएगा और यही समझता रहा कि माला घुमाने को पूजा कहते हैं। देवी-देवता को पकड़ने का नाम पूजा है। अज्ञानी लोग, भ्रमित लोग मनुष्य को दबाने तथा चक्कर में डालने के नाम को पूजा कहते हैं।

🔷 देवी-देवताओं को पकड़ने के लिए, मनोकामना पूर्ण करने के लिए जो आपने पूजा का स्वरूप बना रखा है, वह बहुत ही घटिया रूप है। पूजा ऐसी नहीं हो सकती, ध्यान ऐसा नहीं हो सकता, जैसा कि आप लोगों ने समझ रखा है कि अगरबत्तियाँ चढ़ाएँगे, चावल चढ़ाएँगे, शक्कर की गोली चढ़ाएँगे और मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। इतना घटिया अध्यात्म नहीं हो सकता है जैसा कि आप लोगों ने सोच रखा है। आपकी पूजा घटिया, आपके देवता घटिया सब घटिया हैं। इसको समझना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Elephant and the Five Blind Men

🔶 Someone said to five blind men, "There is an elephant in front of you, can you guess how it looks like?" The first blind men caught the elephant's tail, the second its ears, the third its legs, the fourth its tusks, and the fifth one touched its back. Based on their experience they all came up with radically different answers. The first blind man who had caught the elephant's tail concluded, "The elephant is definitely like a rope."

🔷 The second one, who had caught its ears strongly disagreed and said, "No! It's like a saucepan." The third blind man who had caught its leg concluded that an elephant is like fat pole. The fourth one, who had caught the tusk, thought it was like a stick, and the fifth one, who touched the back was absolutely sure it was like a rock. They all started quarreling over the matter and never reached a conclusion.

🔶 Telling this story to his disciples, a holy man said, "Just like the five blind men, most people have only partially experienced God, and useless quarrels take place in religious discourses."

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Oct 2017

🔶 आत्मा के विकास को सीधा उठते चलते, उर्ध्वगामी होने में सबसे बड़ी बाधा असत्य की ही है। छल, कपट, दुराव, छिपाव के कारण अंतर्मन में अनेक प्रकार के असमंजस पैदा होते हैं, आगा पीछा सोचना पड़ता है। झूठ खुलने का भय उत्पन्न होता है, असत्यभाषी कपटी ठहराये जाने पर जो निन्दा घृणा और अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है उसके भय से अन्तःकरण निरन्तर संत्रस्त रहता है। इन विकृतियों के रहते हुए आध्यात्मिक विकास में बाधा पड़ती है। जिस पौधे का जन्म किसी भारी पत्थर के नीचे हुआ हो उसे ऊपर उठने में बहुत असुविधा होती है, टेढ़ा तिरछा होकर वह मुश्किल से ही उस पत्थर के नीचे से बाहर निकल पाता है। निकल कर भी धीरे धीरे बढ़ता है और फिर भी टेढ़ा कुबड़ा कुरूप ही रहता है। जीव के विकास मार्ग में भी प्रधान बाधा यही है।

🔷 सरलता ही साधुता का चिन्ह है। जो जितना सीधा भोला भाला है जिसमें जितनी है निश्छलता, और सद्भावना है वह उतना ही बड़ा सन्त कहा जा सकता है। धर्म कर्तव्यों में सत्य की गणना सर्व प्रथम सर्वोपरि तत्वों में की गई है। इसलिए श्रेयार्थी को ईश्वर की ही भाँति सत्य का भी उपासक बनना पड़ता है। कोई व्यक्ति उपासना को प्रेम पूर्वक करता है किन्तु उसका मन असत्याचरण में अभिप्रेत है तो उसकी साधना अपूर्ण एवं अधूरी ही मानी जाएगी। उसे बहुत श्रम करने पर भी वह लाभ न मिल सकेगा जो सत्य निष्ठ-शुद्ध आचरण और सद्विचारों वाला व्यक्ति थोड़ी सी ही साधना से प्राप्त कर सकता है।

🔶 विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए सच्चे सत्य प्रेमी को उन कष्टों को सहने के लिए तैयार रहना चाहिए जो इस मार्ग के पथिक की परीक्षा करने के लिए आती हैं। यदि साधक डरे नहीं, असुविधाओं और विरोधों से घबराये नहीं, अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं को सीमित रखे, कष्ट सहिष्णुता का विपत्ति में हँसते रहने का और विरोधी के प्रति सद्भाव रखने का स्वभाव बना ले तो उसकी सत्यनिष्ठा आसानी से निभ सकती है। जो लोग सत्य पालन के महान लाभों से लाभान्वित होना चाहते हैं उन्हें उसके लिए अपने स्वभाव में इन आवश्यक गुणों को भी उत्पन्न करना ही पड़ेगा। सत्य सेवी का श्रेय तो प्राप्त हो जाए पर विरोध, हानि, अपमान, असुविधा एवं आपत्ति का सामना न करना पड़े ऐसा नहीं हो सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्म पथ की ओर (भाग 2)

🔷 परिस्थितियों का मुकाबला मनुष्य कर सकता है। वह अपना पथ खुद निर्माण कर सकता है। दुख में से सुख खोज सकता है और अपने जीवन में नरक तुल्य दिखाई देने वाली वेदनाओं से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। तीन चौथाई दुख तो उसके अपने पैदा किये हुए होते है। अपने को ठीक जगह पर खड़ा कर दिया जाय तो अधिकाँश दुखों से अपने आप छुटकारा मिल जाता है। कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जो संसार क्रम के साथ सम्बन्धित हैं, उनको सहन करने की शक्ति विवेक द्वारा प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार अपने को विवेकपूर्वक ठीक स्थिति पर रख कर हम संसार के समस्त दुखों से छुटकारा पा सकते हैं। यही आध्यात्म पथ है। बाहरी परिस्थितियाँ आदमी को सुख या दुख नहीं दे सकतीं। यदि ऐसा होता तो समस्त धनी सुखी और सब गरीब दुखी हुए होते, परन्तु वास्तव में बात इससे उलटी है। निकट से परीक्षा करने पर अधिकाँश गरीब सुखी और अधिकाँश धनी दुखी मिलेंगे।
  
🔶 मनुष्य स्वभावतः आनन्द प्रिय है, उसे हर घड़ी आनन्द की तलाश रहती है और जो कुछ सोचता विचारता या करता धरता है वह इसीलिये कि सुख मिले। परन्तु वह अज्ञान में भटक जाता है, ऊंट को घड़े में तलाश करता है। धन और भोगों के पीछे दुनिया पागल है। दाद को खुजलाने में लोग बुरी तरह लगे हुए हैं कि शायद यही सुख है। परन्तु यह कैसा सुख जिसकी खुजली बढ़ती ही जाती है और अन्त में चमड़ी छील जाने पर दुखदायी घाव उत्पन्न हो जाते हैं। दाद के घावों में भी खुजली उठती है। उन घावों को खुजाने में जैसा सुख दुख मिलता है वैसा ही आम तौर पर सब भोगते हैं। खुजली का सुख लूटने के लिये प्रयत्न करते हैं, पर घाव दूना बढ़ कर असह्य वेदना उत्पन्न कर देता है।

🔷 इस अज्ञान से छुटकारा पाने के लिये आध्यात्म पथ पर अग्रसर होना ही एक मात्र उपाय है। अज्ञान के अन्धकार से छुटकारा पाने के लिये प्रकाश की ओर चलना चाहिये। माया से बच कर ईश्वर की ओर मुँह करना चाहिये। तभी वास्तविकता का ज्ञान होगा और तभी सब वस्तुओं का यथार्थ स्वरूप समझ में आवेगा। अँधेरे में पानी के धोखे दवात की स्याही पी जाने से कडुआ मुँह हो जाता है, इस कडुए पन को दूर करने का उपाय नहीं है, कि उस स्याही को मीठा मिला कर पीने का प्रयत्न करो, वरन् उचित यह है कि प्रकाश जलाओ और देखो कि जिन वस्तुओं से हम उलझे हुए थे, वे वास्तव में क्या हैं?

🔶 इसी प्रकाश द्वारा तुम्हें पता चलेगा कि पानी कहाँ रखा हुआ है। शीतल जल पीने से ही प्यास बुझेगी। यह अन्धकार में नहीं, प्रकाश में ही हो सकता है। आध्यात्म पथ प्रकाश का मार्ग है। वास्तविकता प्रकाश में ही मालूम हो सकती है। प्रकाश की जड़ें आत्मा में हैं। आत्मस्वरूप का दर्शन करके ही सारे दुख शोकों को जाना और त्यागा जा सकता है। आत्मा सुखों का मूल है। जीवन का वास्तविक आनन्द उसी से प्राप्त हो सकता है। श्रुति कहती है-तमसो मा ज्योतिर्गमय, अन्धकार से प्रकाश की ओर चलो। पाठको, आध्यात्म पथ की ओर चलो।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1941पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1941/February/v1.5

👉 आज का सद्चिंतन 30 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Oct 2017


👉 बेटे के जन्मदिन पर .....

🔷 रात के 1:30 बजे फोन आता है, बेटा फोन उठाता है तो माँ बोलती है....
"जन्म दिन मुबारक लल्ला"

🔶 बेटा गुस्सा हो जाता है और माँ से कहता है - सुबह फोन करती। इतनी रात को नींद खराब क्यों की? कह कर फोन रख देता है।

🔷 थोडी देर बाद पिता का फोन आता है। बेटा पिता पर गुस्सा नहीं करता, बल्कि कहता है ..." सुबह फोन करते "

🔶 फिर पिता ने कहा - मैनें तुम्हे इसलिए फोन किया है कि तुम्हारी माँ पागल है, जो तुम्हे इतनी रात को फोन किया।

🔷 वो तो आज से 25 साल पहले ही पागल हो गई थी। जब उसे डॉक्टर ने ऑपरेशन करने को कहा और उसने मना किया था। वो मरने के लिए तैयार हो गई, पर ऑपरेशन नहीं करवाया।

🔶 रात के 1:30 को तुम्हारा जन्म हुआ। शाम 6 बजे से रात 1:30 तक वो प्रसव पीड़ा से परेशान थी ।

🔷 लेकिन तुम्हारा जन्म होते ही वो सारी पीड़ा भूल गय ।उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । तुम्हारे जन्म से पहले डॉक्टर ने दस्तखत करवाये थे, कि अगर कुछ हो जाये, तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे।

🔶 तुम्हे साल में एक दिन फोन किया, तो तुम्हारी नींद खराब हो गई......मुझे तो रोज रात को 25 साल से, रात के 1:30 बजे उठाती है और कहती है, देखो हमारे लल्ला का जन्म इसी वक्त हुआ था।

🔷 बस यही कहने के लिए तुम्हे फोन किया था। इतना कहके पिता फोन रख देते हैं।

🔶 बेटा सुन्न हो जाता है। सुबह माँ के घर जा कर माँ के पैर पकड़कर माफी मांगता है....तब माँ कहती है, देखो जी मेरा लाल आ गया।

🔷 फिर पिता से माफी मांगता है, तब पिता कहते हैं .....आज तक ये कहती थी, कि हमे कोई चिन्ता नहीं; हमारी चिन्ता करने वाला हमारा लाल है।

🔶 पर अब तुम चले जाओ, मैं तुम्हारी माँ से कहूंगा कि चिन्ता मत करो।

🔷 मैं तुम्हारा हमेशा की तरह आगे भी ध्यान रखुंगा।

🔶 तब माँ कहती है -माफ कर दो, बेटा है।

🔷 सब जानते हैं दुनियाँ में एक माँ ही है, जिसे जैसा चाहे कहो, फिर भी वो गाल पर प्यार से हाथ फेरेगी।

🔶 पिता अगर तमाचा न मारे, तो बेटा सर पर बैठ जाये। इसलिए पिता का सख्त होना भी जरुरी है।

🔷 माता पिता को आपकी दौलत नही, बल्कि आपका प्यार और वक्त चाहिए। उन्हें प्यार दीजिए। माँ की ममता तो अनमोल है।

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 7 )

🔶 हमारे मरने के बाद आप देखेंगे कि गुरुजी के मरने के बाद उनका समय, धन, श्रम किस काम में खर्च हुआ है। हमारी शक्ति एवं सामर्थ्य बच्चों को खिलाने में, अस्पताल खोलकर मरीजों की सेवा में खर्च हुई हैं। हमने अभी तक समाज को चालीस प्रतिशत दिया है और लोगों को, दुखियारे को पाँच प्रतिशत दिया है। अब हमारा मन है कि इसका हिस्सा बढ़ाया जा सके। जब हम मौन धारण कर लेंगे तो हमारा ब्राह्मण और जाग जाएगा, उस समय हम व्यक्तियों की भी ज्यादा सेवा कर सकेंगे। ठोस सेवा कर सकेंगे। अभी तक हमारी सहानुभूति का अंश ज्यादा रहा है, सेवा का हिस्सा कम रहा है। हमने सहानुभूति दी है तथा पायी है।
      
🔷 अगर हमने किसी की एक किलोग्राम सेवा की है तो उसमें पाँच सौ ग्राम सहानुभूति भी है। उस समय हम साधन सम्पन्न एवं समर्थ थे। पर अगले दिनों जब जीवात्मा को हम और ऊपर उठा लेंगे तब हम अधिक सेवा कर सकेंगे। आपके लिए हमने कुछ किया है या नहीं? इसका सबूत देखना हो तो दृष्टि पसारकर देखिये कि कुछ हुआ है, तो आप पायेंगे कि इसी कारण से यह पचास लाख आदमी हमसे जुड़े हैं, अन्यथा इतने आदमी कहाँ से आते? यह हम कहाँ कहते हैं कि कुछ नहीं हुआ। ५० लाख आदमी हमारे एक इशारे पर खड़े हो सकते हैं। इतने शक्तिपीठ कहाँ से बन गये? ५० लाख मुट्ठियाँ ५० लाख लोगों का एक घण्टे का समयदान कुछ मायने रखता है।

🔶 हम अपने ब्राह्मण को फिर जिन्दा करेंगे। सन्त दानी होता है। आदमी को दानी बनने के लिए सन्त बनना होगा। हम ब्राह्मण और सन्त को पुनः जिन्दा करेंगे। ब्राह्मण जमा करता है, सन्त उसे खर्च कर देता है। हमने निश्चय किया है, विचार किया है कि जिन्दगी के इन आखिरी क्षणों में अपने ब्राह्मण एवं सन्त को साधकर सबके लिए एक मिसाल स्थापित कर दूँ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आध्यात्म पथ की ओर

🔷 जीवन वृक्ष की जड़ मन के अन्दर है। अक्सर बाहर की परिस्थितियाँ जीवन से मेल नहीं रखतीं, तब बड़ा दुख होता है। पिता की मृत्यु हो गई, हम बालकों की तरह फट-फट कर रोते हैं। धन चोरी चला गया, हम दुख से व्याकुल हो जाते हैं। शरीर अस्वस्थ हो गया, हमें चारों ओर मृत्यु ही नाचती नजर आती है। कार्य में सफलता नहीं मिली, हम चिन्ता की चिता में जल उठते हैं। दूसरे लोग कहना नहीं मानते, हम क्रोध से क्षुब्ध हो जाते हैं। इनमें से एक ही परिस्थिति जीवन को दुखमय बना देने के लिये पर्याप्त है, फिर यदि कई घटनायें एक साथ मिलें तो कहना ही क्या, जीवन में दुख शोकों की भट्टी जलने लगती है।
  
🔶 कई बार ऐसी कोई परिस्थिति नहीं आती, फिर भी हम उनकी कल्पना करके अपने को दुखी बनाते रहते हैं। मेरे एक ही पुत्र है, वह मर गया तो? घर में अकेला कमाने वाला हूँ, मेरी मृत्यु हो गई तो? पशुओं को कोई चुरा ले गया तो? कोई झूठा मुकदमा लग गया तो? इस प्रकार की आशंकाएं कल्पित होती हैं। जितना भय होता है, वास्तव उसका चौथाई भी नहीं आता। हम देखते हैं कि कई धनवान और बलवान अपने घर में डाका पड़ जाने, अपने कत्ल हो जाने की आशंका से रात भर चैन की नींद नहीं लेते। हर घड़ी भय उन्हें सताता रहता है, यद्यपि जैसा वे सोचते हैं, वैसी घटना जीवन भर नहीं होती और अपनी इन्द्रियों का तो कहना ही क्या ? वे यदि काबू में न हों तो हिरन की तरह चौकड़ी मारती हैं। तृप्ति उन्हें होती ही नहीं। अपने भोगों के लिये उनकी सदा ‘और लाओ और लाओ’ की रट लगी रहती है।

🔷 दैनिक जीवन की यह अवस्थाएं मनुष्य को एक बड़ी उलझन में डाल देती हैं। दुख, शोक, तृष्णा, चिन्ता, भय, क्रोध, लोभ, द्वेष की भावनाएं उसके मस्तिष्क पर अधिकार जमा कर उसे बड़ी दयनीय दशा में असहाय छोड़ देती हैं। वह शान्ति के लिये प्यासे मृग की तरह चारों ओर दौड़ता है परन्तु दृष्टि दोष के कारण सफेद भूमि ही जल दिखाई पड़ती है, दौड़ कर वहाँ तक पहुँचता है, परन्तु वहाँ धरा ही क्या था? दौड़ने के श्रम से पहले की अपेक्षा भी अधिक अशान्ति हो जाती है। धन कमाने के लिए अधर्म करते हैं, इन्द्रिय तृप्ति के लिये पाप करते हैं, सुख के लिये मायाचार करते हैं परन्तु हाथ कुछ नहीं आता।

🔶 जितना चाहते हैं जितनी तृष्णा होती है, उसका शताँश भी प्राप्त नहीं हुआ तो ओस चाटने पर तृप्ति कैसे हो सकती है। एक कामी पुरुष रात दिन सैकड़ों सुन्दरियों का चिन्तन करता रहता है, कितना ही प्रयत्न करने पर भी उसे उतनी स्त्रियाँ भोग के लिये नहीं मिल सकती। यदि नहीं मिलीं तो शान्ति कहाँ? संसार के निर्बाधित क्रम के अनुसार जो घटनाएं घटित होती रहती हैं, उनसे हम बच नहीं सकते। हम कितना हो प्रयत्न क्यों न करें, प्रियजनों की मृत्यु होगी ही, दान, भोग के बाद बचा हुआ धन नष्ट होगा ही। बेशक मनुष्य बहुत शक्तिशाली है, प्रयत्न करने पर परिस्थितियों को बहुत कुछ अपने अनुकूल कर सकता है, परन्तु यह न भूलना चाहिये कि मनुष्य-मनुष्य ही है। आज की परिस्थिति में वह ईश्वर नहीं है। घटनाएं संसार के क्रम के साथ है वह होती है और होंगी। उनके प्रवाह से भगवान् राम और योगिराज कृष्ण भी नहीं बच सके। परिस्थितियों से कोई नहीं बच सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1941पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1941/February/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 28 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Oct 2017


शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 6 )

🔶 साथियों! हमारे मौन धारण करने का एक और कारण है। आप यह मत सोचिये कि मैं अपना प्याऊ बन्द करने जा रहा हूँ। हमें बच्चों को खिलाने का शौक है। हमें बच्चों को प्यार करना, उन्हें गुब्बारा देना बहुत प्यारा लगता है। स्वयं घोड़ा बन जाना तथा बच्चों को पीठ पर बैठा लेना तथा घुमाना बहुत प्यारा लगता है।
      
🔷 हम जो भी सहायता आपकी कर सकते हैं, वह अवश्य करेंगे, परन्तु आपको भी स्वयं में संवेदना पैदा करनी होगी। हमने कहा है कि आप उपासना करिये, जप करिये ताकि आपको उस समय परा एवं पश्यन्ति वाणी से दिशा दे सकूँ, अन्यथा मैं अपने मौन की शक्ति प्रेषित करूँगा और आपको नुकसान होगा।

🔶 मेरे गुरु के व्याख्यान देने का कार्य बन्द हो गया तो क्या उनकी शक्ति कम हो गई? हम नहीं बोल रहे हैं, हमारा गुरु बोल रहा है। आप भी उनकी शक्ति से बोलेंगे। प्रज्ञापुराण जब आप पढ़ेंगे और लोगों को सुनाएँगे तब वह आपकी वाणी में नहीं, बल्कि मेरे गुरु की वाणी में होगा, जिसमें अधिक ताकत होगी। आपकी वाणी में कोई ताकत नहीं होगी, आप ऐसे ही बकवास करते रहेंगे। हम मौन हो जाएँगे तो हमारी शक्ति बढ़ जाएगी। हमारी परा एवं पश्यन्ति वाणी की ताकत बढ़ जाएगी। आप मेरी उस वाणी को सुनेंगे तो आपके आँखों में पानी आएगा, भाव-संवेदना जगेगी। इससे हम आपकी सहायता ज्यादा कर सकेंगे।

🔷 आप क्या सोचते हैं कि आप लोगों के ऊपर हमारा कोई असर नहीं पड़ता है। यह हमारा मौन ब्राह्मणत्व है। यह तपस्वी की वाणी है। हमने सेवा करने में सन्त की प्रवृत्ति को जिन्दा रखा है कि हम समाज की सेवा करेंगे। आज व्यक्ति की सेवा ज्यादा है, समाज की सेवा गौण हो गयी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Oct 2017

🔶 यदि विघ्न बाधाएँ आती हैं, आपको झटका-मारती हैं, तो आप गिर जाते हैं हिम्मत पस्त हो जाते हैं किन्तु इससे काम नहीं चलेगा। गिरकर भी उठिये फिर चलने का प्रयास कीजिए। एक बार नहीं अनेकों बार आपको गिरना पड़े किन्तु गिर कर भी उठिये और आगे बढ़िये। उस छोटे बालक को देखिये जो बार-बार गिरता है किन्तु फिर उठने का प्रयत्न करता है और एक दिन चलना सीख जाता है। आप की सफलता, विकास, उत्थान भी उतना ही सुनिश्चित है। अतः रुकिए नहीं, उठिए। ठोकरें खा कर भी आगे बढ़िये, सफलता एक दिन आपका स्वागत करने को तैयार मिलेगी।

🔷 आने वाले विघ्नों, कठिनाइयों में भी अपना धर्म न छोड़ें। स्मरण रखिये प्रत्येक विघ्न-बाधा का सर्व प्रथम आघात आपके उत्साह आशा और भविष्य के प्रति आकर्षण पर होता है। इनका सीधा वार आपके हृदय पर होता है किन्तु कहीं आपका हृदय टूट नहीं पाये, इसके लिए यह सोच लीजिए कि जिस प्रकार घोर अन्धकार के बाद सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है उसी प्रकार आपका उज्ज्वल भविष्य प्रकाशित होने वाला है। अमावस की काली रात के पश्चात् चन्द्रमा की चाँदनी सहज ही फूट पड़ती है। आज का कठिन समय भी गुजर जाएगा, इसे हृदयंगम कर लीजिए। अपने आशावादी दृष्टिकोण, आकाँक्षाओं, उत्साह की सम्पत्ति को यों ही न खोइये। उनका बचाव कीजिए और प्रगति के पथ पर आशा और उत्साह के साथ आगे बढ़ते ही जाइये।

🔶 मनुष्य दूसरों की दृष्टि में कैसा जँचता है, इसका बहुत कुछ आधार उसके अपने व्यक्तित्व पर निर्भर रहता है। लोग विद्या पढ़ने, धन कमाने, पोशाक और साज सज्जा बनाने पर तो ध्यान देते हैं, पर अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने की दिशा में उपेक्षा ही बरतते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जितना महत्व योग्यता और सम्पदा का है उससे कम मूल्य व्यक्तित्व का नहीं है। व्यक्तित्व का प्रभावशाली होना बड़ी से बड़ी सम्पदा या योग्यता से कम मूल्य का नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को किसी से विशेष स्वार्थ या लगाव है तो बात दूसरी है, नहीं तो यदि कोई किसी से प्रभावित होता है तो उसका मूल आधार उसका व्यक्तित्व ही होता है। शरीर का सुडौल या रूपवान् होना, दूसरों को कुछ हद तक प्रभावित करता है, वस्तुतः सच्चा प्रभाव तो उसके उन लक्षणों का पड़ता है जो उसके मन की भीतरी स्थिति के अनुरूप क्रिया और चेष्टाओं से पल-पल पर झलकते रहते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यथार्थता को समझें—आग्रह न थोपें

🔷 संसार जैसा कुछ है हमें उसे उसी रूप में समझना चाहिए और प्रस्तुत यथार्थता के अनुरूप अपने को ढालना चाहिए। संसार केवल हमारे लिए ही नहीं बना हैं ओर उसके समस्त पदार्थों एवं प्राणियों का हमारी मनमर्जी के अनुरूप बन या बदल जाना सम्भव नहीं है। तालमेल बिठा कर समन्वय की गति पर चलने से ही हम संतोष पूर्वक रह सकते हैं और शान्ति पूर्वक रहने दे सकते हैं।
  
🔶 यहां रात भी होती है और दिन भी रहता हैं। स्वजन परिवार में जन्म भी होते हैं और मरण भी। सदा दिन ही रहे कभी रात न हो। परिवार में जन्म संख्या ही बढ़ती रहे मरण कभी किसी का न हो। ऐसी शुभेच्छा तो उचित हैं पर वैसी इच्छा पूर्ण नहीं हो सकती। रात को रात के ढंग से और दिन को दिन के ढंग से प्रयोग करके हम सुखी रह सकते हैं ओर दोनों स्थितियों के साथ जुड़े हुए लाभों का आनन्द ले सकते हैं। जीवन को अपनी उपयोगिता है और मरण को अपनी। दोनों का संतुलन मिलाकर सोचा जा सकेगा। तो हर्ष एवं उद्वेग के उन्मत्त विक्षिप्त बना देने वाले आवेशों से हम बचे रह सकते हैं।

🔷 हर मनुष्य की आकृति भिन्न है, किसी की शकल किसी से नहीं मिलती। इसी प्रकार प्रकृति भी भिन्न हैं। हर मनुष्य का व्यक्तित्व अपने ढंग से विकसित हुआ है। उसमंस सुधार परिवर्तन की एक सीमा तक ही सम्भावना है। जितना सम्भव हो उतना सुधार का प्रयत्न किया जाय पर यह आग्रह न रहे कि दुनिया को वैसा ही बना लेंगे जैसा हम चाहते हैं। तालमेल बिठाकर चलना ही व्यवहार कौशल हैं। उसी को अपना कर सुख से रहना ओर शान्ति से रहने देना सम्भव हो सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- मई 1974 पृष्ठ 1

👉 आज का सद्चिंतन 28 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Oct 2017


👉 दो की लड़ाई तीसरे का लाभ

🔷 एक बार एक सिंह और एक भालू जंगल में अपने शिकार की तलाश में घूम रहे थे। दोनों ही भूख से व्याकुल थे। अचानक उन्हें एक हिरन का बच्चा दिखाई दिया। दोनों ने एक ही बार आक्रमण कर उस हिरन के बच्चे को मार दिया। परंतु बच्चा इतना छोटा था कि वह दोनों में से किसी के लिए भी पर्याप्त भोजन नहीं था।

🔶 बस, फिर क्या था, सिहं और भालू आपस में बुरी तरह लड़ने लगे। दोनों का क्रोध इतना बढ़ा कि बुरी तरह एक दूसरे को नोचने खसोटने लगे। दोनों ही शिकार को अकेले खाना चाहते थे। बंटवारा उन्हें कुबूल नहीं था। इस झगड़े में वे बुरी तरह घायल हो गए और लहूलुहान होकर अपनी-अपनी पीठ के बल लेट गए और एक दूसरे पर गुर्राने लगे। वे इतनी बुरी तरह घायल हो गए थे कि अब उनमें उठने की शक्ति भी नहीं रह गई थी।

🔷 तभी एक होशियार लोमड़ी उधर से गुजरी। उसने उन दोनों को घायल अवस्था में पड़े हुए देखा। उनके बीच एक मरे हुए हिरन के बच्चे को देखकर लोमड़ी सब कुछ समझ गई।

🔶 बस, उसने सीधे उन दोनों के बीच घुस कर हिरन के बच्चे को खींच लिया और झाडि़यों के पीछे चली गई।

🔷 सिंह और भालू तो इतनी दयनीय स्थिति में थे कि अपने हाथ-पैर भी नहीं हिला सकते थे। वे दोनों लाचार से लोमड़ी को अपना शिकार ले जाते देखते रहे।

🔶 अंत में सिंह ने कहा- ”इतनी छोटी सी बात पर इतनी बुरी तरह लड़ना हमारी मूर्खता थी। यदि हमारे भीतर जरा भी बुद्धि होती तो हम समझौता कर लेते। हम चाहते तो शिकार का बंटवारा भी कर सकते थे। लेकिन यह हमारे लालच का परिणाम है कि हम आज इस स्थिति में पहुंच गए हैं कि एक लोमड़ी हमारे शिकार को खींच ले गई।“

🔷 यह सुनकर भालू ने भी सिर हिलाया -”हां दोस्त, तुम ठीक कह रहे हो।“

🔶 निष्कर्ष- दो की लड़ाई का लाभ सदा तीसरा कोई और ही उठाता है।

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

👉 समाज सेवी की योग्यता

🔷 भगवान बुद्ध के एक शिष्य ने कहा- मैं धर्मोपदेश के लिए देश भ्रमण करना चाहता हूँ, आज्ञा दीजिए। इस पर बुद्ध ने कहा- धर्मप्रचार की पुनीत सेवा को भी अधर्मी और ईर्ष्यालु सहन नहीं कर पाते। वे तरह-तरह के मिथ्या लांछन लगाते हैं, बदनाम करते तथा सताते हैं। तुम्हें उनका सामना करना पड़ेगा तो अपना मानसिक सन्तुलन किस प्रकार ठीक रख पाओगे?

🔶 शिष्य ने कहा- मैं किसी के अपकारों के प्रति मन में दुर्भाव न रखूँगा। जो मुझे गालियाँ देगा समझूँगा इसने मारा नहीं इतनी दया की। जो कोई मारेगा तो समझूँगा इसने जीवित छोड़कर उदारता दिखाई। यदि कोई मार भी डालेगा तो समझूँगा इस भव बंधन (संसार) में अधिक कष्ट भोगने से छुटकारा दिलाकर इसने उपकार ही किया।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 148)

🌹  इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है

🔷 कार्लमार्क्स ने सारे अभावों में जीवन जीते हुए अर्थशास्त्र रूपी ऐसे दर्शन को जन्म दिया जिसने समाज में क्रांति ला दी। पूँजीवादी किले ढहते चले गए एवं साम्राज्यवाद दो तिहाई धरती से समाप्त हो गया। ‘‘दास कैपीटल’’ रूपी इस रचना ने एक नवयुग का शुभारम्भ किया जिसमें श्रमिकों को अपने अधिकार मिले एवं पूँजी के समान वितरण का यह अध्याय खुला जिसमें करोड़ों व्यक्तियों को सुख-चैन की, स्वावलंबन प्रधान जिंदगी जी सकने की स्वतंत्रता मिली। रूसो ने जिस प्रजातंत्र की नींव डाली थी, उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद के पक्षधर शोषकों की रीति-नीति ही उसकी प्रेरणा स्त्रोत होगी।

🔶 मताधिकार की स्वतंत्रता बहुमत के आधार पर प्रतिनिधित्व का दर्शन विकसित न हुआ होता, यदि रूसो की विचारधारा ने व्यापक प्रभाव जनसमुदाय पर न डाला होता तो। जिसकी लाठी उसकी भैंस, की नीति ही सब जगह चलती, कोई विरोध तक न कर पाता। जागीरदारों एवं उत्तराधिकार के आधार पर राजा बनने वाले अनगढ़ों का ही वर्चस्व होता है। इसे एक प्रकार की मनीषा प्रेरित क्रांति कहना चाहिए कि देखते-देखते उपनिवेश समाप्त हो गए, शोषक वर्ग का सफाया हो गया। इसी संदर्भ में हम कितनी ही बार लिंकन एवं लूथर किंग के साथ-साथ उस महिला हैरियट स्टो का उल्लेख करते रहे हैं, जिसकी कलम ने कालों को गुलामी के चंगुल से मुक्त कराया। प्रत्यक्षतः यह युग मनीषा की भूमिका है।

🔷 बुद्ध की विवेक एवं नीतिमत्ता पर आधारित विचार क्रांति एवं गाँधी पटेल, नेहरू द्वारा पैदा की गई स्वातन्त्र्य आंदोलन की आँधी उस परोक्ष मनीषा की प्रतीक है, जिसने अपने समय में ऐसा प्रचण्ड प्रवाह उत्पन्न किया कि युग बदलता चला गया। उन्होंने कोई विचारोत्तेजक साहित्य रचा हो, यह भी नहीं। फिर यह सब कैसे सम्भव हुआ। यह तभी हो पाया जब उन्होंने मुनि स्तर की भूमिका निभाई, स्वयं को तपाया विचारों में शक्ति पैदा की एवं उससे वातावरण को प्रभावित किया।

🔶 परिस्थितियाँ आज भी विषम हैं। वैभव और विनाश के झूले में झूल रही मानव जाति को उबारने के लिए आस्थाओं के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा और मानवी गरिमा को उभारने, दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाने वाला प्रचण्ड पुरुषार्थ करना होगा। साधन इस कार्य में कोई योगदान दे सकते हैं, यह सोचना भ्रांतिपूर्ण है। दुर्बल आस्था अंतराल को तत्त्वदर्शन और साधना प्रयोग के उर्वरक की आवश्यकता है। आध्यात्म वेत्ता इस मरुस्थल की देख−भाल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते व समय-समय पर संव्याप्त भ्रांतियों से मानवता को उबारते हैं। अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से भी बड़ी हैं। अध्यात्म ही व्यक्ति के अंतराल में विकृतियों के माहौल से लड़ सकने-निरस्त कर पाने वाले सक्षम तत्त्वों की प्रतिष्ठापना कर पाता है। हमने व्यक्तित्वों में पवित्रता व प्रखरता का समावेश करने के लिए मनीषा को ही अपना माध्यम बनाया एवं उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 5)

🔶 एक हमारा प्याऊ है जो कभी सूखेगा नहीं। जो पसीने से लथपथ हो गये हैं, थक गये हैं, हमारे प्याऊ पानी, हमारी तपस्या में से उनको देते रहेंगे, उन्हें हरा-भरा बनाये रखेंगे। आप सब लोग हमारे प्याऊ से पानी पी सकते हैं। ब्राह्मण, सन्त का जीवन चलता रहेगा। हम प्याऊ बन्द नहीं कर सकते हैं। हमने एक चिकित्सालय-डिस्पेन्सरी खोला है। जो भी दुःखी हमारे पास आये, हमने उसे छाती से लगाया। उसकी बीमारी का, दुःख का बराबर ख्याल रखा है। सन्त का काम भाव-संवेदना का है। हमें अपने बच्चे को खिलाना है, बच्चों की देख−भाल करनी है, बच्चों को गुब्बारा बाँटना है, बच्चों के चेहरे पर मुसकराहट देखनी है। ये चीजें देखकर हमको खुशी होती है। हम बच्चों के स्कूल चलाते हैं। इसका मतलब क्या है? हमारा अस्पताल चलता है, डिस्पेन्सरी चलती है। प्याऊ चलाने से क्या मतलब है? यह आध्यात्मिक बात है। यह सन्त की बातें हैं। तो क्या आप सन्त की दुकान बन्द कर देंगे? नहीं, बन्द नहीं करेंगे, जब तक हम जिन्दा हैं। आगे भी चलता रहेगा।
      
🔷 आप लोगों को हमने कई बार कहा है, हजार बार कहा है कि आपकी जो समस्याएँ हैं, उसे आप लिखकर देवें। आप आधा घण्टे भी भगवान का नाम नहीं ले सकते हैं। आप कहते हैं कि हम आपके रास्ते पर चल सकते हैं। बेकार की बातें मत कीजिये। तराजू हमारे पास है। हम जानते हैं, हमारा भगवान जानता है कि आप क्या हैं? इसलिए हमने इस बार यह कहना शुरू कर दिया है कि आप हमारा समय नष्ट करने के बजाय लिखकर दे जाइये।

🔶 आप यहाँ न ध्यान करने आते हैं, न पूजा करने आते हैं, न मतलब की बात करने आते हैं, केवल घूमने आते हैं, किराया खर्च करते हैं। आप हमें बेअकल समझते हैं। हम आपकी नस-नस जानते हैं। इसलिए हमने बैखरी वाणी से बोलना बन्द कर दिया है। हमारे गुरु हम से बैखरी वाणी से नहीं बोलते, पश्यन्ति वाणी से बोलते हैं, परावाणी से बोलते हैं। आपकी बातों को हमने सुन लिया है और कहा है कि बेकार की रामकहानी कहकर हमारा समय क्यों खराब करते हैं? हमें राम कहानी से क्या मतलब है, आप मतलब की बात कहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Benevolence Brought Ganga to Earth

🔶 King Bhagirath's ancestors were suffering unbearable miseries due to wrath of a Rishi. Bhagirath knew very well that if the divine river Ganga could be requested to descent from the heaven to Earth, it would end the miseries of his ancestors, as well as quench the thirst of innumerable flora and fauna.

🔷 With this noble cause in mind he left the comfortable life of his palaces and performed great penance in the Himalayas. After a very long time, considering the generous and selfless objectives of Bhagirath, Ganga was ready to descend upon Earth. Lord Shaker controlled the force of the river Ganga as it descended from the heaven and the divine river since flows through the great plains of India benefiting millions of people.

🔶 King Bhagirath's own powers were far from sufficient to achieve such an extraordinary feat. It was his benevolent objectives that attracted the divine blessings and cooperation from Lord Shanker. His ancestors were freed from the dreadful curse, Bhagirath became famous for ever, and most of all millions people benefit from this great river even today.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 26 Oct 2017

🔶 हर परिस्थिति, हर घटना, हर वस्तु के लिए कुछ बातें अनुकूल हैं तो कुछ प्रतिकूल पड़ती हैं। उनका विशेष प्रभाव अनुकूलों पर ही होता है, प्रतिकूलों पर या तो वह प्रभाव होता ही नहीं, होता भी है तो बहुत कम। आग का विशेष प्रभाव सूखी लकड़ी पर जितना होता है उतना गीली पर नहीं, पानी को जितना रेतीली जमीन सोखती है उतना पथरीली जमीन नहीं, बीमारी का आक्रमण जितना अशुद्ध रक्त वालों पर होता है उतना शुद्ध रक्त वालों पर नहीं, रंग जितना साफ कपड़े पर चढ़ता है, उतना गंदे पर नहीं, इसी प्रकार बुरी परिस्थितियों, बुरे तत्वों और बुरे व्यक्तियों का प्रभाव भी हलके दर्जे की मनोभूमि के लोगों पर ही पड़ता है। ऊंची और सुसंस्कृत मनोभूमि के लोग उससे बहुत कम ही प्रभावित होते हैं।

🔷 कुमार्ग पर ले जाने वाली अनेकों बुराइयाँ जगह-जगह मौजूद हैं और वे अपना क्षेत्र बढ़ाने के लिये भी सक्रिय रहती हैं। अनेकों व्यक्ति उनके चंगुल में फंसते हैं और अपने आपको उस रंग में इतना रंग लेते हैं कि फिर इस जाल से निकल सकना कठिन हो जाता है। जुए बाजी के, शराब खोरी के, सिनेमाबाजी के, व्यभिचार के, आवारागर्दी के, शैतानी के अड्डे हर जगह पाये जाते हैं, उनके जाल में अनेक लोग रोज ही फंसते हैं और अपना समय, स्वास्थ्य, धन लोक परलोक सभी कुछ गंवा कर छूँछ हो जाते हैं। इससे उन बुराइयों की शक्ति और सफलता का अन्दाज सहज ही लगाया जा सकता है। पर यह प्रभाव एक खास तरह की उथली मनोभूमि के लोगों पर ही पड़ता है, वे ही इनके चंगुल में फंसते और बर्बाद होते हैं।

🔶 ठगों के जाल में अनेक लोग फंस जाते हैं और उनके द्वारा बहुत ही हानि उठाते हैं पर उन समस्त लोगों में अधिकतर ऐसी मनोवृत्ति के लोग होते हैं जो बहुत सस्ते में, बहुत सा लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। जिन्हें अपनी योग्यता एवं श्रम के आधार पर परिश्रम की कमाई पर संतोष है जो केवल नीतिपूर्वक उचित तरीके से जितना प्राप्त हो सकता है उससे काम चलाते हैं और प्रसन्न रहते हैं उन्हें कोई ठग नहीं ठग सकता। यों ठगी के अनेकों तरीके हैं पर उनमें सिद्धान्त एक ही काम करता है कि ठग लोग यह सोचते हैं कि शिकार में लालच पर्याप्त है कि नहीं, वह योग्यता और श्रम की बात को भुलाकर जैसे बने वैसे अधिक लाभ प्राप्त करने का इच्छुक है कि नहीं? यदि है तो ठग समझ लेते हैं कि यह हमारा पक्का शिकार है। इसे ठगा जा सकता है। नोट दूना कराने, ताँबे से सोना बनाने, जमीन में से गढ़ा धन निकालने कोई बड़ा लाभ करा देने आदि के प्रलोभन देकर लोगों को लालायित करते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 चालीस दिन की गायत्री साधना (अन्तिम भाग)

🔷 लगभग तीन साढ़े तीन घंटे में अट्ठाईस मालाएं आसानी से जपी जा सकती हैं। यह प्रातः काल का साधन है। इसे करने के पश्चात अन्य कोई काम करना चाहिए। दिन में शयन करना, नीचे लोगों का स्पर्श, पराये घर का अन्न इन दिनों वर्जित है। जल अपने हाथ से नदी या कुँए में से लाना चाहिये और उसे अपने लिये अलग से सुरक्षित रखना चाहिए। पीने के लिए यही जल काम में लाया जाय। तीसरे पहर गीता का कुछ स्वाध्याय करना चाहिए। संध्या समय भगवत् स्मरण, संध्यावन्दन करना चाहिए। रात को जल्दी सोने का प्रयत्न करना उचित है जिस से प्रातः काल जल्दी उठने में सुविधा रहे। सोते समय गायत्री माता का ध्यान करना चाहिए और जब तक नींद न आवे मन ही मन बिना होठ हिलाये मन्त्र का जप करते रहना चाहिये। दोनों एकादशियों को और अमावस्या पूर्णमासी को केवल थोड़े फलाहार के साथ उपवास करना चाहिए।
  
🔶 पूर्णमासी से आरंभ करके पूरा एक मास और आगे के मास में कृष्ण पक्ष की दशमी या एकादशी को पूरे चालीस दिन होंगे जिस दिन यह अनुष्ठान समाप्त हो उस दिन गायत्री मन्त्र से कम से कम 108 आहुतियों का हवन कराना चाहिए और यथाशक्ति सदाचारी विद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। गौओं को आटा और गुड़ मिले हुए गोले खिलाने चाहिए। साधना के दिनों में तुलसी दल को जल के साथ दिन में दो तीन बार नित्य लेते रहें।

🔷 इस चालीस दिनों में दिव्य तेज युक्त गायत्री माता के स्वप्नावस्था में किसी न किसी रूप में दर्शन होते हैं। यदि उनकी आकृति प्रसन्नता सूचक हो तो सफलता हुई ऐसा अनुभव करना चाहिए यदि उनकी भ्रू-भंगी अप्रसन्नता सूचक, नाराजी से भरी हुई, क्रुद्ध प्रतीत हो तो साधना में कुछ त्रुटि समझनी चाहिए और बारीकी से अपने कार्यक्रम का अवलोकन करके अपने अभ्यास को अधिक सावधानी के साथ चलाने का प्रयत्न करना चाहिए। नेत्र बन्द करके ध्यान करते समय, मन्त्र जपते समय मानसिक नेत्रों के आगे कुछ चमकदार गोलाकार प्रकाश पुँज से दृष्टिगोचर हो तो उन्हें जप द्वारा प्राप्त हुई आत्मशक्ति का प्रतीक समझना चाहिए।

🔶 चालीस दिन की यह साधना अपने को दिव्य शक्ति से सम्पन्न करने के लिए है। साधना के दिनों में मनुष्य कुश होता है उसका वजन घट जाता है परन्तु दो बातें बढ़ जाती हैं एक तो शरीर की त्वचा पर पहले की अपेक्षा कुछ-कुछ चमकदार तेज दिखाई पड़ने लगता है, दूसरे एक विशेष प्रकार की गंध आने लगती है। जिसमें यह दोनों लक्षण प्रकट होने लगे समझना चाहिए कि उस साधक ने गायत्री के द्वारा अपने अन्दर दिव्य शक्ति का संचय किया है। इस शक्ति को वह अपने और दूसरों के अनिष्टों को दूर करने एवं कई प्रकार के लाभ उठाने में खर्च कर सकता है। अच्छा तो यही है कि इस शक्ति को अपने अन्दर छिपा कर रखा जाय और साँसारिक सुखों की अपेक्षा आध्यात्मिक, पारलौकिक आनन्द प्राप्त किया जाय।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1944 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/December/v1.14

👉 आज का सद्चिंतन 27 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Oct 2017


गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 4)

🔴 एक प्रयोग वाणी के संयम का हम सुनाते हैं आपको। हम चाहते थे कि हम मौन धारण कर लें तथा बैखरी वाणी का प्रयोग कम करें। हमने जितना व्याख्यान दिया है, दुनिया में शायद ही किसी व्यक्ति ने व्याख्यान दिये होंगे। हमारे व्याख्यानों में लोगों के कायाकल्प हो गये जैसे रामकृष्ण परमहंस के व्याख्यान से हुआ था। लेकिन जो लोग रीछ का तमाशा, रीछ का व्याख्यान सुनने आये, उनको कोई फायदा नहीं हुआ। जिन लोगों को हम व्याख्यान देते हैं, उसे सूँघकर जब देखते हैं, चखकर के देखते हैं कि आदमी कैसा है? घटिया है या वजनदार? तो वे हमें छोटे-छोटे आदमी घटिया आदमी दिखाई पड़ते हैं। हमें वजनदार आदमी दिखाई नहीं पड़ते हैं। वजनदार आदमी माने सिद्धान्तों के आदमी। सिद्धान्तों को सुनने वाले, मानने वाले, उस पर चलने वाले, सिद्धान्तों को जीवन में उतारने वाले कोई नहीं दिखाई पड़ते हैं।
      
🔵 लोगों पर गुस्सा न करके अपने पर गुस्सा न करूँ तो क्या करूँ? आपको मालूम है, जब आदमी मरने को होता है तो बहुत-से आदमी मिलने आते हैं। बहुत-सी शक्ति खर्च होती है। कोई कहता है ताऊ जी अच्छे हैं, कोई कहता है कि हमें आशीर्वाद दे दीजिये। इससे बातें करने में बहुत शक्ति खर्च होती है। इसमें भीतरी शक्ति बेहद खर्च होती है इसलिए हमने विचार किया है हम मिलना बन्द कर देंगे। हम अपनी वैखरी वाणी को दूसरे काम में खर्च करेंगे। वैखरी वाणी कम हो जाएगी, तब पश्यन्ति वाणी, मध्यमा वाणी का उपयोग करेंगे ताकि हम ज्यादा काम कर सकें? बिना बातचीत किये ही ज्यादा काम कर सकते हैं तथा वातावरण को गर्म कर सकते हैं। बेटे! अरविन्द घोष ने, महर्षि रमण ने इस प्रकार का प्रयोग किया था और सारा हिन्दुस्तान गर्म हो गया था।

🔴 बैखरी वाणी के माध्यम से अनावश्यक शक्तियाँ खर्च होती चली जाती हैं। इसलिए मैंने विचार किया कि अब इसका खर्च कम करेंगे। भगवान की शक्ति बहुत है, अबकी बार मैंने प्रयोग किया। अब बोलने की बात कम करता जाऊँगा। इस काम में समय को कम खर्च करता जाऊँगा और लोगों से बातें कम करता जाऊँगा। कारण, अधिकांश लोग अपनी राम कहानी लेकर आते हैं। अनावश्यक भीड़ आ जाती है और कहती है कि हमारा मन नहीं लगता, ध्यान नहीं लगता। बेकार की बातें लोग करते हैं, यह नहीं कि मतलब की बातें करें। बेकार की बातें करने में अब हम समय खर्च नहीं करेंगे। वाणी से बात नहीं होगी तो क्या आप निष्ठुर हो जाएँगे। नहीं बेटे, हमने ब्राह्मण के बाद सन्त के रूप में कदम बढ़ाया है। सन्त उसे कहते हैं, जिसका मन करुणा से लबालब भरा हुआ होता है। जो दाढ़ी बढ़ा लेता है, रँगा हुआ कपड़ा पहन लेता है, ध्यान कर लेता है, उसे सन्त नहीं कहते हैं। करुणा से भरा हुआ व्यक्ति ही सन्त कहलाता है। जब तक हम हैं तब तक हम समाज के लिए काम करते रहेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 चालीस दिन की गायत्री साधना (भाग 1)

🔷 गायत्री मंत्र के द्वारा जीवन की प्रत्येक दशा में आश्चर्यजनक मनोवाञ्छा फल किस प्रकार प्राप्त हुए हैं और होते हैं। यह मंत्र अपनी आश्चर्यजनक शक्तियों के कारण ही हिन्दू धर्म जैसे वैज्ञानिक धर्म में प्रमुख स्थान प्राप्त कर सका है। गंगा, गीता , गौ, गायत्री, गोविन्द, यह पाँच हिन्दू धर्म के केन्द्र हैं। गुरु शिष्य की वैदिक दीक्षा गायत्री मंत्र द्वारा ही होती है।
  
🔶 नित्य प्रति की साधारण साधना और सवालक्ष अनुष्ठान की विधियाँ पिछले अंकों में पाठक पढ़ चुके हैं। इस अंक में चालीस दिन की एक तीसरी साधना उपस्थित की जा रही है। शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से इस साधना को आरम्भ करना चाहिये। साधक को निम्न नियमों का पालन करना उचित है (1) ब्रह्मचर्य से रहे (2) शय्या पर न शयन करे (3) अन्न का आहार केवल एक समय करें (4) सेंधा नमक और कालीमिर्च के अतिरिक्त अन्य सब मसाले त्याग दें (5) लकड़ी के खड़ाऊ या चट्टी पहने, बिना बिछाये हुए, जमीन पर न बैठे। इन पाँच नियमों का पालन करते हुए गायत्री की उपासना करनी चाहिये।

🔷 प्रातःकाल सूर्योदय से कम से कम एक घंटा पूर्व उठकर शौच स्नान से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख होकर कुश आसन पर किसी स्वच्छ एकान्त स्थान में जप के लिये बैठना चाहिये। जल का भरा हुआ पात्र पास में रखा रहे। घी का दीपक तथा धूप बत्ती जलाकर दाहिनी ओर रख लेनी चाहिए। प्राणायाम तथा ध्यान उसी प्रकार करना चाहिये जैसा कि अक्टूबर के अंक में सवालक्ष अनुष्ठान के संबंध में बताया गया है। इसके बाद तुलसी की माला से जप आरम्भ करना चाहिए। एक सौ आठ मन्त्रों की माला अट्ठाईस बार नित्य जपनी चाहिये। इस प्रकार प्रतिदिन 3024 मंत्र होते हैं। एक मंत्र आरंभ में और एक अन्त में दो मंत्र नियत मालाओं के अतिरिक्त अधिक जपने चाहिये। इस प्रकार 40 दिन में सवालाख मंत्र पूरे हो जाते हैं।

🔶 गायत्री मंत्र में ऐसा उल्लेख है कि ब्राह्मण को तीन प्रणव युक्त, क्षत्रिय को दो प्रणव युक्त, वैश्य को एक प्रणव युक्त मंत्र जपना चाहिए। गायत्री में सब से प्रथम अक्षर है उसे ब्राह्मण तीन बार क्षत्रिय दो बार और वैश्य एक बार उच्चारण करें। तदुपरान्त ‘भूर्भुवः स्वः तत्सवितु... “ आगे का मन्त्र पढ़ें। इस रीति से मन्त्र की शक्ति और भी अधिक बढ़ जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1944 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/December/v1.14

👉 आज का सद्चिंतन 26 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Oct 2017

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 3)

🔴 दूसरा वाला प्रयोग हमने किया- साधु का। जिसका नाम तपस्वी है। हमने अपने सारे छिद्रों को बन्द कर दिया। यह दूसरा कदम है। काँटे पर चलने वाले का नाम तपस्वी नहीं है। ठण्डे पानी से नहाने वाले का नाम तपस्वी नहीं है। उस आदमी का नाम साधु और तपस्वी है, जिसने अपने आप का तपाया, उसका नाम तपस्वी है, उसका नाम साधु है। हमने अपने आप को तपाया है। अक्ल की दृष्टि से आदमी से ज्यादा बेईमान, बहुरूपिया कोई नहीं है। हमने अपनी अक्ल को ठीक कर लिया है। आप भी मारे डण्डों से अपनी अक्ल को ठीक करें। हमने अपनी हर चीज को तपाया, भीतर वाले हिस्से को भी तपाया। हमने अपने मन को, बुद्धि को तपाया है, पर आपकी बुद्धि तो ऐसी चाण्डाल है, ऐसी पिशाचिनी है कि क्या कहें?
      
🔵 किसी के जिन्दगी की समस्या को हल करने का सवाल था तो आपकी अक्ल, आपकी बुद्धि ने ऐसी मक्कारी की कि क्या कहना? पैसे से लेकर समय तक हमने केवल समाज के लिए खर्च किया। यह कसा हुआ जीवन हमारा तपस्वी का जीवन है। मन्त्रों में शक्ति है, गलत बात नहीं है। देवताओं में शक्ति है, यह भी गलत नहीं है, किन्तु, अगर कोई आदमी तपस्वी है तो वह हर काम को कर सकता है। अपने अनुष्ठान काल में हमने किसी से बात नहीं की, कोई भी अन्य चीज नहीं खायी। जौ की रोटी एवं छाछ, बस यही दो चीजें हम खाते रहे।

🔴 जैसे हमने अनुष्ठान खत्म किया कि एक व्यक्ति आये जो नकली रेशम बनाते थे, उन्होंने कहा कि हम आपको गुरु बनायेंगे। उन्होंने सवा रुपया हमारे हाथ पर रखा। इस पर हमने सोचा कि तब तो हम ब्राह्मण नहीं हो सकते हैं, हम मजदूर हैं। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण को तो लेना चाहिए। यह आज से लगभग ३५-४० साल पहले सन् १९४५-४६ की बात है, उस सज्जन को लेकर हम बाजार गये। उस जमाने में ठण्डी में बिछाने के लिए पुराने कपड़ों के तथा रूई की हाथ से बनी दरियाँ दो रुपये में मिलती थीं। उससे वहीं चीजें खरीदकर जरूरतमन्दों में बाँट दी, पर अपने लिए हमने उसे स्वीकार नहीं किया। हमारी अक्ल एवं जो भी चीज हमारे पास थी, उसे हम हमेशा बाँटते चले गये। उस आदमी ने कुछ दिनों के बाद हमारे पास दो सौ रुपये भेजे। हमने उसे गायत्री तपोभूमि के मन्दिर बनाने में लगा दिया। यह वह पहला आदमी था जिसने हमें पैसा भेजा था। यह घटनाएँ सुना रहा हूँ मैं आपको अपने तपस्वी जीवन की। इसी तरह हमारे सारे कार्य होते चले गये। कोई काम हमारा रुका नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 King Raghu's Sarva-Medh Yagya

🔶 This is a story about how God showers his blessings upon those who take up a good cause for the benefit of the society, even though they may be lacking in means.

🔷 A long time ago there ruled a very powerful king in India who was known as Raghu. King Raghu had decided to perform a Sarva-Medh Yagya, which involved donating all his wealth for the benefit of his citizens. After giving away the last penny in his treasure and all his possessions, the only things that were left with the King were an earthen jug and a grass carpet.

🔶 At this juncture a saint called Kautsya arrived at the King's door and expected some donation from the king. The saints in ancient India relied on the patronage of Kings to run their monasteries, which were great centers of learning and spiritual pursuits. However, when saint Kautsya realized that the King has already given away all his possessions for the benefit of the society, he turned back without uttering a single word. King Raghu was quick to realize that the saint had come with a very important mission of collecting funds for his monastery. King Raghu requested the saint to wait for a while so that he may arrange for the donation. The saint stayed back wondering how the King would honor his words.

🔷 Raghu invoked Kuber - the divine treasurer with Vedic mantras. And behold! Gold coins started raining from the sky. Raghu thus satisfied Kautsya with ample donation. Saint Kautsya was astonished how a small prayer by a King resulted in such a miracle. Kuber explained to him, "O saint! It is a Divine law that a person who believes in the Almighty and dedicates himself whole heartedly for the benefit of the society shall never face scarcity."

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Oct 2017

🔵 यदि भीतर की मानसिक स्थिति दुर्बल, अपरिपक्व एवं हीन है तो उसका परिचय स्वभाव एवं आदतों में तुरन्त दिखाई देगा। जरा-जरा सी बात पर उत्तेजित हो उठना, लाल-पीला हो जाना, कटु वाक्य कहने लगना या दूसरों पर उग्र शब्दों में दोषारोपण करने लगना, इस बात का चिन्ह है कि यह मनुष्य बहुत उथला और ओछा है। जीवन में प्रिय और अप्रिय प्रसंग आते रहते हैं, संसार में भले और बुरे सभी तरह के लोग हैं, हर आदमी के अन्दर कुछ बुराई और कुछ अच्छाई है, यह समझते हुए जो लोग अपने मस्तिष्क को सन्तुलित रखते हैं वे ही बुद्धिमान हैं।

🔴 जो लोग छोटी-छोटी बातों को बहुत बड़ी मान बैठते हैं वे ही अधीर और उत्तेजित होते हैं। खिन्नता, निराशा, आवेश या उत्तेजना उन्हें ही आती है। यदि हमारा मानसिक स्तर उथला न हो, उसमें आवश्यक संजीदगी और गंभीरता हो तो आवेश आने का कोई कारण नहीं, वह हर अप्रिय परिस्थिति का भी मूल्याँकन करेगा। वह इस विविध विचित्रता युक्त विश्व की अनेक विचित्रताओं में अपने सामने उपस्थित विपन्न परिस्थिति को भी एक मामूली बात मानेगा ओर परेशान होने की अपेक्षा उसका कोई शान्तिमय समाधान ढूंढ़ेगा। ऐसे लोग बहुधा गम्भीर देखे जाते हैं। गम्भीरता एवं शास्त्रीयता प्रभावशाली व्यक्तित्व का सबसे बड़ा आधार है। जो लोग आवेश में नहीं आते, गम्भीर रहते हैं उनकी संजीदगी दूसरों की दृष्टि में उनका मूल्य बढ़ा देती है।

🔵 जल्दबाजी, क्षणिक विचार, अभी यह, अभी वह, अभी क्रोध, अभी प्यार, अभी प्रशंसा, अभी निन्दा, अभी विरोध, अभी समर्थन, ऐसे अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त स्वभाव का होना इस तथ्य का द्योतक है कि यह व्यक्ति भीतर से पोला है, इसका कोई सिद्धान्त नहीं, अपनी कोई निर्णय शक्ति नहीं, जब जो बात समझ में आ जाती है तब वही कहने या करने लगता है। इस प्रकार के ओछे व्यक्ति दूसरों की आँखों में अपना कोई स्थान नहीं बना सकते।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 महान कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द (अंतिम भाग)

🔷 स्वामी जी यद्यपि एक बहुत बड़े योगी थे और उन्होंने राजयोग की शिक्षा के लिए अमरीका में जो विद्यालय खोला था, उसमें शिक्षा पाकर कितने ही व्यक्ति प्रसिद्ध योगी बन गये हैं, पर उन्होंने कभी योग की सिद्धियों या अद्भुत शक्तियों की तरफ ध्यान नहीं दिया। उनकी सबसे बड़ी सिद्धि यही थी कि उन्होंने भिक्षुक के रूप में रहते हुए जिस सेवा संस्था का संकल्प किया उस राम-कृष्ण मिशन’ की शाखाऐं आज देश भर में फैली हैं और उसकी तरफ से सैंकड़ों बड़े-बड़े अस्पताल, स्कूल और अन्य सेवा कार्य संचालित हो रहे है। इसी प्रकार जब ये अमरीका की सर्वधर्म महासभा में भाग लेने पहुँचे तो न तो उनके पास प्रतिनिधि का टिकिट था, और न कहीं ठहरने का ठिकाना था। एक दिन तो उनको स्टेशन के बाहर पड़े खाली बक्स में घुसकर रात व्यतीत करनी पड़ी पर उनको एक एक करके अपने आप सहायता मिलती गई और वे सभा में व्याख्यान देने को पहुँच गये।
 
🔶 उस समय तक अव्यवस्थित दशा रहने के कारण उन्होंने अपने भाषण की कुछ भी तैयारी नहीं की थी और न उस सम्बन्ध में कुछ विचार ही किया था, जब कि अन्य धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि महीनों से अपने भाषणों को तैयार करके और उनमें बहुत कुछ सुधार करके रट चुके थे। इसलिए अध्यक्ष के बार-बार कहने पर बहुत याद व्याख्यान मंच पर गये और विचार करने लगे कि ऐसी संसार प्रसिद्ध सभा के सामने क्या कहूँ। पर जैसे ही वे भाषण देने के स्थान पर खड़े हुए कि उनको अनुभव हुआ कि गुरुदेव श्रीराम कृष्ण पीछे खड़े उनको आशीर्वाद दे रहे है। बस उनका आत्मतेज जागृत हो उठा और उनका भाषण संसार के चुने हुए उन समस्त विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ माना गया।

🔷 इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द का लक्ष्य सदैव व्यवहारिक रूप में दीन जनों की सेवा उनका उद्धार रहा और इसी को उन्होंने सबसे बड़ा योग तथा परमात्मा का ध्यान जप, तप, माना। कलकत्ते में सन 1898 में जौन प्लेग का प्रकोप हुआ और सब जनता घबड़ा कर वहाँ से भागने को उद्यत हो गई, तो स्वामी जी ने नोटिस बँटवाकर लोगों को आश्वासन दिया और अपनी तरफ से सेवा योजना तैयार की। कई गुरु भाइयों ने शंका की कि इसके लिए धन कहाँ से आयेगा? स्वामी जी ने तुरन्त उत्तर दिया कि ‘यदि आवश्यकता होगी तो हमने अपने मठ के लिए जो स्थान खरीदा है उसे बेच देंगे। जब संन्यास लिया है तो हमें सदैव भिक्षा माँगकर खाने और पेड़ के नीचे रहने को तैयार रहना ही चाहिए।”

🔶 स्वामीजी का जीवन अन्त तक कर्ममय रहा। उनको बहुत अस्वस्थ देखकर एक दिन नाग महाशय ने विश्राम करने की सलाह दी तो उन्होंने कहा कि “गुरु महाराज मेरे भीतर जो शक्ति स्थापन कर गये हैं वह मुझे शान्त बैठने ही नहीं देती, निरन्तर कर्म के लिए ही प्रेरित करती रहती है। “यही कारण था कि जीवन के अन्तिम दिन (4 जुलाई 1902) को भी उन्होंने वेदान्त कालेज की योजना बनाकर उसे स्वामी प्रेमानन्द को समझाया। उस दिन उन्होंने अस्वस्थता का ध्यान न करके सब कार्य अपने हाथ से बड़े मनोयोग के साथ किया। पूजा मंदिर का दरवाजा बन्द करके तीन घण्टा तक वह ध्यान में बैठे रहे। उसमें सम्भवतः उनको अपने गुरुदेव और जगज्जननी का साक्षात्कार हुआ क्योंकि ध्यान से उठकर वे धीरे धीरे एक गीत गुनगुनाने लगे ‘चल मन निज निकेतन’ उसी रात्रि को लगभग नौ बजे उन्होंने एकान्त कमरे में लेटकर योग विधि से ब्रह्माण्ड को भेदकर प्राण त्याग दिया।

🌹 समाप्त
🌹 श्री भारतीय योगी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.29

👉 आज का सद्चिंतन 25 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Oct 2017


👉 बुद्धिमान

🔷 राजा सन्यासी के पास गया उसने उस सन्यासी की बहुत ख्याति सुनी थी। पास जाकर उसने वंदना की। उसने बहुत निकटता से देखा कि सन्यासी बहुत बड़ा तपस्वी हैं, तेजस्वी हैं। हाथ जोड़कर राजा बोला, ‘धन्य हैं आप। धन्य हैं आपका संयम और त्याग। धन्य हैं आपकी तपस्या। कितना बड़ा त्याग हैं आपका। घर छोड़ दिया, परिवार का त्याग कर दिया, सारी संपदा को ठोकर मार दी, कितना महान् त्याग! राजा स्तुति करता रहा।

🔶 सन्यासी बोला, ‘महाराज! व्यर्थ ही स्तुति मत करो। त्यागी मैं हूं या तुम? त्याग मेरा बड़ा हैं या तुम्हारा? तुम्हारा त्याग बड़ा हैं।’ राजा आश्चर्य में पड़ गया। बोला, ‘महाराज मैं कैसा त्यागी? इतने वैभव, इतनी संपदा और सुख को मैं भोग कर रहा हूं। निरंतर भोग में बैठा हूं। कहां हैं मेरा त्याग? कैसा हैं मेरा त्याग ?

🔷 सन्यासी ने कहा, ‘ मैने जो कहा वह सच हैं। तुम्हारा त्याग मेरे त्याग से बड़ा हैं मेरे सामने मोक्ष का सुख हैं सबसे महान् सुख हैं। इस सुख की प्राप्ति के लिए मैंने थोड़ा-सा धन का सुख छोड़ा, परिवार और संपदा का सुख छोड़ा हैं। किन्तु तुम बड़े त्यागी हो। उस महान मोक्ष और परमात्मा के सुख को छोड़कर पदार्थ के सुख में फंसे हो। अब बताओ, बड़े सुख को तुमने छोड़ा हैं या मैने? बताओ बड़े त्यागी तुम हो या मैं? थोड़ा रूककर सन्यासी ने कहा, ‘छोटे सुख के लिए बड़ा त्याग बुद्धिमानी नहीं हैं। इसलिए मैं बुद्धिमान हूं।

🔶 वास्तव में वही व्यक्ति बुद्धिमान होता हैं, जो थोड़े के लिए बहुत को नहीं छोड़ता।

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 2)

🔴 दूसरा वाला प्रयोग हमने किया- साधु का। जिसका नाम तपस्वी है। हमने अपने सारे छिद्रों को बन्द कर दिया। यह दूसरा कदम है। काँटे पर चलने वाले का नाम तपस्वी नहीं है। ठण्डे पानी से नहाने वाले का नाम तपस्वी नहीं है। उस आदमी का नाम साधु और तपस्वी है, जिसने अपने आप का तपाया, उसका नाम तपस्वी है, उसका नाम साधु है। हमने अपने आप को तपाया है। अक्ल की दृष्टि से आदमी से ज्यादा बेईमान, बहुरूपिया कोई नहीं है। हमने अपनी अक्ल को ठीक कर लिया है। आप भी मारे डण्डों से अपनी अक्ल को ठीक करें। हमने अपनी हर चीज को तपाया, भीतर वाले हिस्से को भी तपाया। हमने अपने मन को, बुद्धि को तपाया है, पर आपकी बुद्धि तो ऐसी चाण्डाल है, ऐसी पिशाचिनी है कि क्या कहें?
      
🔵 किसी के जिन्दगी की समस्या को हल करने का सवाल था तो आपकी अक्ल, आपकी बुद्धि ने ऐसी मक्कारी की कि क्या कहना? पैसे से लेकर समय तक हमने केवल समाज के लिए खर्च किया। यह कसा हुआ जीवन हमारा तपस्वी का जीवन है। मन्त्रों में शक्ति है, गलत बात नहीं है। देवताओं में शक्ति है, यह भी गलत नहीं है, किन्तु, अगर कोई आदमी तपस्वी है तो वह हर काम को कर सकता है। अपने अनुष्ठान काल में हमने किसी से बात नहीं की, कोई भी अन्य चीज नहीं खायी। जौ की रोटी एवं छाछ, बस यही दो चीजें हम खाते रहे।

🔴 जैसे हमने अनुष्ठान खत्म किया कि एक व्यक्ति आये जो नकली रेशम बनाते थे, उन्होंने कहा कि हम आपको गुरु बनायेंगे। उन्होंने सवा रुपया हमारे हाथ पर रखा। इस पर हमने सोचा कि तब तो हम ब्राह्मण नहीं हो सकते हैं, हम मजदूर हैं। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण को तो लेना चाहिए। यह आज से लगभग ३५-४० साल पहले सन् १९४५-४६ की बात है, उस सज्जन को लेकर हम बाजार गये। उस जमाने में ठण्डी में बिछाने के लिए पुराने कपड़ों के तथा रूई की हाथ से बनी दरियाँ दो रुपये में मिलती थीं। उससे वहीं चीजें खरीदकर जरूरतमन्दों में बाँट दी, पर अपने लिए हमने उसे स्वीकार नहीं किया। हमारी अक्ल एवं जो भी चीज हमारे पास थी, उसे हम हमेशा बाँटते चले गये। उस आदमी ने कुछ दिनों के बाद हमारे पास दो सौ रुपये भेजे। हमने उसे गायत्री तपोभूमि के मन्दिर बनाने में लगा दिया। यह वह पहला आदमी था जिसने हमें पैसा भेजा था। यह घटनाएँ सुना रहा हूँ मैं आपको अपने तपस्वी जीवन की। इसी तरह हमारे सारे कार्य होते चले गये। कोई काम हमारा रुका नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Oct 2017

🔵 अपनी आदतों का सुधार, स्वभाव का निर्माण, दृष्टिकोण का परिष्कार करना जीवन विद्या का आवश्यक अंग है। ओछी आदतें, कमीने स्वभाव, और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला कोई व्यक्ति सभ्य नहीं गिना जा सकता। उसे किसी का सच्चा प्रेम और गहरा विश्वास प्राप्त नहीं हो सकता। कोई बड़ी सफलता उसे कभी न मिल सकेगी। कहते है कि बड़े आदमी सदा चौड़े दिल और ऊँचे दिमाग के होते है।” यहाँ लम्बाई चौड़ाई से मतलब नहीं वरन् दृष्टिकोण की ऊँचाई का ही अभिप्राय है।

🔴 वचन का पालन, समय की पाबन्दी, नियमित दिनचर्या, शिष्टाचार, आहार विहार की नियमितता, सफाई व्यवस्था आदि कितनी ही बातें ऐसी है जो सामान्य प्रतीत होते हुए भी जीवन की सुव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पाश्चात्य देशों में इन छोटी बातों पर बहुत ध्यान दिया जाता है, फलस्वरूप भौतिक उन्नति के रूप में उन्हें उसका लाभ भी प्रत्यक्ष मिल रहा है। स्वास्थ्य, समृद्धि और ज्ञान की दृष्टि से पाश्चात्य देशों ने जो उन्नति की है उसमें इन छोटी बातों का बड़ा योग है। इन बातों के साथ-साथ यदि आध्यात्मिक सद्गुणों का समन्वय भी हो जाय तो फिर सोना और सुगन्धि वाली कहावत ही चरितार्थ हो जाती है।

🔵 आज चारों ओर अगणित कठिनाइयाँ, परेशानियाँ और उलझने दिखाई पड़ती है उनका कारण एक ही है- अनैतिक, असंस्कृत जीवन। समस्याओं को ऊपर-ऊपर से सुलझाने से काम न चलेगा वरन् भूल कारण का समाधान करना पड़ेगा मनुष्य के जीवन दिव्य देवालयों की तरह पवित्र, ऊँचे और शानदार हों तभी क्लेश और कलह से, शोक और संताप से, अभाव और आपत्ति से छुटकारा मिलेगा। व्यक्ति यदि भगवान के दिव्य वरदान मानव जीवन का समुचित लाभ उठाना चाहता हो तो उसे जिन्दगी जीने की समस्याओं पर विचार करना होगा और सुलझे हुए दृष्टिकोण से अपनी गति विधियों का निर्माण करना होगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 महान कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द (भाग 3)

🔴 अपनी इस भावना को कार्य रूप में परिणित करने के लिये स्वामी जी सन् 1893 में, जब कि उन की आयु केवल 30 वर्ष की थी, और बहुत थोड़े साधन उनको प्राप्त थे, अमरीका जा पहुँचे। वहाँ कुछ ही दिनों में हजारों व्यक्तियों को हिन्दू-धर्म का प्रेमी बना दिया और सैंकड़ों ही उनके पास रह कर भारतीय साधन प्रणाली का अनुसरण करके आध्यात्मिक प्रगति में दत्तचित्त हो गये। स्वामी जी लगातार कई वर्ष तक अमरीका में और इंग्लैण्ड में धर्म-प्रचार करते रहे और फिर अपने निश्चय के अनुसार वहाँ के अनेक सुयोग्य तथा साधन सम्पन्न व्यक्तियों को लेकर भारतवर्ष वापस आये। पहले उन्होंने देश भर का दौरा करके जनता को जागृति का सन्देश सुनाया, मुक्ति का मार्ग दिखलाया और फिर अपने गुरु के नाम पर राम कृष्ण मिशन’ की स्थापना की जिसका एकमात्र लक्ष स्वामी जी की भावना के अनुसार भारतीय जनता की हर प्रकार से सहायता और उन्नति का प्रयत्न करना था।
 
🔵 स्वामी जी संकीर्णता की भावना से भी बहुत परे थे और वास्तव जिस किसी को धर्म के सत्य स्वरूप के दर्शन हुये है, वह चाहे किसी भी महत्व का अनुयायी क्यों न हो उसमें सब के प्रति सहिष्णुता, उदारता, प्रेम की भावना अवश्य पाई जाएगी। अमरीका की ‘सर्वधर्म महासभा’ में स्वामी जी ने सबसे पहले दिन जो संक्षिप्त भाषण दिया उसमें उन्होंने अपनी इस भावना को पूर्ण रूप से व्यक्त कर दिया। उन्होंने कहा कि “मुझे यह कहते गर्व होता है कि मैं जिस सनातन हिन्दू धर्म का अनुयायी हूँ उसने जगत को उदारता और विश्व को अपना समझने की उच्च भावना सिखाई है। इतना ही नहीं हम सब धर्मों को सच्चा मानते है और हमने प्राचीन काल में यहूदी और पारसी जैसे भिन्न धर्म वालों को भी अपने यहाँ आश्रय दिया था। मैं छोटेपन से नित्य कुछ श्लोकों का पाठ करता रहा हूँ और अन्य लाखों हिन्दू भी उनका पाठ करते है।

🔴 उनका आशय यही है कि- “जिस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों से उत्पन्न होने वाली नदियाँ अन्त में एक ही समुद्र में इकट्ठी हो जाती है, इसी प्रकार हे प्रभु! मनुष्य अपनी भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुकूल पृथक्-पृथक् धर्म-मार्गों से अन्त में तेरे ही पास पहुँचते है” इसी प्रकार गीता में भी भगवान ने यही कहा है कि “मेरे पास कोई भी व्यक्ति चाहे जिस तरह का आये, तो भी मैं उसे मिलता हूँ। लोग जिन भिन्न-भिन्न मार्गों से अग्रसर होने का प्रयत्न करते है, वे सब रास्ते अन्त में मुझ में ही मिल जाते है।” पंथ-द्वेष धर्मान्धता और इनसे उत्पन्न क्रूरतापूर्ण पागलपन के जोश ने इस सुन्दर धरती को दीर्घकाल से नष्ट कर रखा है; बार-बार भूमि को मानव रक्त से तर कर दिया है, और संस्कृति को छार-छार कर दिया है। पर अब इन बातों का समय पूरा हो चुका है और मैं आशा करता हूँ कि आज प्रातः इस सभा को आरम्भ करने का जो घण्टा बजाया गया था वह सब प्रकार की अनुदारता, संकीर्णता और तलवार तथा कलम द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का अन्त करने वाला ‘मृत्यु घण्टा’ सिद्ध होगा।”

🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्री भारतीय योगी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.28

👉 आज का सद्चिंतन 24 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Oct 2017


👉 साफ नीयत

🔵 एक नगर में रहने वाले एक पंडित जी की ख्याति दूर-दूर तक थी। पास ही के गाँव में स्थित मंदिर के पुजारी का आकस्मिक निधन होने की वजह से, उन्हें वहाँ का पुजारी नियुक्त किया गया था। एक बार वे अपने गंतव्य की और जाने के लिए बस में चढ़े, उन्होंने कंडक्टर को किराए के रुपये दिए और सीट पर जाकर बैठ गए। कंडक्टर ने जब किराया काटकर उन्हें रुपये वापस दिए तो पंडित जी ने पाया कि कंडक्टर ने दस रुपये ज्यादा दे दिए हैं।

🔴 पंडित जी ने सोचा कि थोड़ी देर बाद कंडक्टर को रुपये वापस कर दूंगा। कुछ देर बाद मन में विचार आया कि बेवजह दस रुपये जैसी मामूली रकम को लेकर परेशान हो रहे है, आखिर ये बस कंपनी वाले भी तो लाखों कमाते हैं, बेहतर है इन रूपयों को भगवान की भेंट समझकर अपने पास ही रख लिया जाए। वह इनका सदुपयोग ही करेंगे।

🔵 मन में चल रहे विचारों के बीच उनका गंतव्य स्थल आ गया. बस से उतरते ही उनके कदम अचानक ठिठके, उन्होंने जेब मे हाथ डाला और दस का नोट निकाल कर कंडक्टर को देते हुए कहा, भाई तुमने मुझे किराया काटने के बाद भी दस रुपये ज्यादा दे दिए थे। कंडक्टर मुस्कराते हुए बोला, क्या आप ही गाँव के मंदिर के नए पुजारी है?

🔴 पंडित जी के हामी भरने पर कंडक्टर बोला, मेरे मन में कई दिनों से आपके प्रवचन सुनने की इच्छा थी, आपको बस में देखा तो ख्याल आया कि चलो देखते है कि मैं अगर ज्यादा पैसे दूँ तो आप क्या करते हो..!

🔵 अब मुझे विश्वास हो गया कि आपके प्रवचन जैसा ही आपका आचरण है। जिससे सभी को सीख लेनी चाहिए" बोलते हुए, कंडक्टर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। पंडितजी बस से उतरकर पसीना-पसीना थे।

🔴 उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान का आभार व्यक्त किया कि हे प्रभु आपका लाख-लाख शुक्र है जो आपने मुझे बचा लिया, मैने तो दस रुपये के लालच में आपकी शिक्षाओं की बोली लगा दी थी। पर आपने सही समय पर मुझे सम्हलने का अवसर दे दिया। कभी कभी हम भी तुच्छ से प्रलोभन में, अपने जीवन भर की चरित्र पूँजी दाँव पर लगा देते हैं।

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

👉 क्रोध पर अक्रोध की विजय

🔴 एक बार सन्त तुकाराम अपने खेत से गन्ने का गट्ठा लेकर घर आ रहे थे। रास्ते में उनकी उदारता से परिचित बच्चे उनसे गन्ने माँगते तो उन्हें एक-एक बाँटते घर पहुँचे। तब केवल एक ही गन्ना उनके हाथ में था। उनकी स्त्री बड़ी क्रोधी स्वभाव की थी। उसने पूछा शेष गट्ठा कहाँ गया? उत्तर मिला बच्चों को बाँट दिया। इस पर वह और भी क्रुद्ध हुई और उस गन्ने को तुकाराम की पीठ पर जोर से दे मारा। गन्ने के दो टुकड़े हो गये।

🔵 बहुत चोट लगी। फिर भी वे क्रुद्ध न हुए और हँसते हुए बड़े स्नेह से बोले- तुमने अच्छा किया, टुकड़े करने का मेरा श्रम बचा दिया। लो एक टुकड़ा तुम खाओ, एक मैं लिये लेता हूँ। उनकी इस सहनशीलता को देखकर स्त्री पानी-पानी हो गई और चरणों पर गिर कर अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगी।

🔴 ईश्वर भक्त सब में अपनी ही आत्मा देखते है, इसलिये वे किसी पर क्रोध नहीं करते अपनी सज्जनता के प्रभाव से दूसरों के हृदय परिवर्तन का कार्य करते रहते है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०३)

ध्यान की अनुभूतियों द्वारा ऊर्जा स्नान अंतर्यात्रा के पथ पर चलने वाले योग साधक में सतत सूक्ष्म परिवर्तन घटित होते हैं। उसका अस्तित्व सूक्ष्म...