रविवार, 24 नवंबर 2019

👉 सद्गुरु का द्वार

चाहत सच्ची हो तो गहरी होती है, और यदि गहरी हो तो पूरी होती है। एक बूढ़ा साधु-भीख मांगने निकला था। बूढ़े होने के कारण उसे आँख से कम नजर आता था। सो वह अनजाने ही एक आश्रम के पास जाकर खड़ा हो गया और आवाज लगायी। किसी ने उससे कहा; आगे बढ़। यह मकान नहीं, आश्रम है, सद्गुरु का द्वार है। और जिन सद्गुरु का यह द्वार है, उन्होंने भी स्थूल शरीर का त्याग कर दिया है।
  
साधु ने सिर उठाकर आश्रम पर एक नजर डाली। उसके हृदय में भक्ति की ज्वाला जल उठी। कोई उसके अन्तर्मन में बोला; देह त्यागने से क्या हुआ, सद्गुरु कभी मरा नहीं करते। उनकी अविनाशी चेतना सदा ही उनकी तपस्थली में व्याप्त रहती है। बस यही आखिरी द्वार है। सद्गुरु के द्वार पर आकर फिर अब कहाँ जाना?
  
उसके भीतर एक संकल्प सघन हो गया। अडिग चट्टान की भाँति उसके हृदय ने कहा; यहाँ से खाली हाथ वापस नहीं जाऊँगा। जो सद्गुरु के द्वार, देहरी तक आकर भी खाली हाथों लौट गए, उनके भरे हाथों का भी क्या मोल है? बस इन्हीं अविचलित भावों के साथ वह आश्रम के द्वार पर ठहर गया। उसने अपने खाली हाथों को आकाश की ओर फेंक दिया। उसके दिल की प्यास चरम पर पहुँच गयी। और उसका अन्तःकरण करुण रव में गा उठा- ‘एक तुम्हीं आधार सद्गुरु।’
  
सद्गुरु के द्वार आश्रम वालों के अपमान, तिरस्कार के झंझावातों को सहते हुए उसके दिन बीतने लगे। पखवाड़े-मास बीत गए। वर्ष भी बीते। इस तरह कितने साल गुजरे उसने गिनती भी नहीं की। अब तो उसके जीवन की मियाद भी पूरी हो गयी थी। पर अन्तिम क्षणों में उसे आश्रमवासियों ने नाचते देखा। उसकी आँखें ज्योति की स्रोत बन गयी थीं। उसके बूढ़े शरीर से प्रकाश झर रहा था। उसने मरने से पहले एक व्यक्ति को अपनी अनुभूति बतायी, सद्गुरु के द्वार से कोई खाली नहीं जाता। केवल अपने को मिटाने का साहस चाहिए। जो स्वयं को मिटा देता है, वह सद्गुरु के द्वार से सब कुछ पा लेता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३०

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