मंगलवार, 9 जून 2026

👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (भाग २)

सत्यनिष्ठ व्यक्ति अपने एक स्वरूप में स्थिर रह कर आत्म-लाभ जैसा सुख भोगता है। उसका अन्तःकरण दर्पण की तरह स्वच्छ और मस्तिष्क प्रज्ञा की तरह संतुलित रहता है। उसे न तो मानसिक द्वन्द्वों से त्रस्त होना पड़ता है और न निरर्थक वितर्कों से अस्त व्यस्त। वह जो कुछ सोचता है सारपूर्ण सोचता है और जो कुछ करता है कल्याणकारी करता है। मिथ्यात्व के दोष से मुक्त सत्यनिष्ठ व्यक्ति के पास कुकल्पनाओं का रोग नहीं आता। वह तो अपनी सीमा, अपनी सामर्थ्य और अपने साधनों के अनुरूप ही जीवन की कल्पनाएं किया करता है और अधिक से अधिक यथार्थ के धरातल पर ही विचरण किया करता है।

सत्य प्रिय व्यक्ति मिथ्यावादियों की तरह कल्पना की न तो ऊँची-ऊँची उड़ानें भरता है और न अनहोनी कामनाएं करता है। वह जानता है कि ऐसा करने से महत्वाकाँक्षाओं में, ऐसी महत्वाकाँक्षाओं में फैलना पड़ेगा जो उसकी स्थिति से बाहर की होंगी और तब हो सकता है कि किन्हीं कामनाओं अथवा वांछाओं के दबाव में आकर उनकी पूर्ति के लिए ऐसा काम करना पड़े जो असत्य के दोष से दूषित हो। सत्यनिष्ठ व्यक्ति जीवन में आकाँक्षाओं के पथ पर बड़ा सावधान होकर चलता है।

राग-द्वेष, लोभ, मोह और मद, मत्सर आदि दुर्गुणों से सत्यनिष्ठ व्यक्ति की कोई मित्रता नहीं होती। वह जानता है कि इन विकारों को प्रश्रय देना अपनी सत्यनिष्ठा के लिये खतरा पैदा करना है। यह विकार ही व्यक्ति के वे शत्रु हैं, जो उसे जीवन के पावन पथ से गिरा देते हैं। जिसके प्रति राग होगा उसके प्रति निष्पक्ष न रहा जायेगा। उसकी प्रसन्नता के लिये कुछ भी करना पड़ सकता है। जिससे द्वेष होगा उसका अनिष्ट चिन्तन का प्रेम पकड़ सकता है। लोभ तो सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। जिसे लोभ के पिशाच ने पकड़ लिया उसके सत्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। लोभ सदैव ही अपने अधिकार से अधिक पाने की लिप्सा किया करता है। अधिकार से अधिक पाने के लिए छल-कपट और असत्य आदि अपकर्मों को ग्रहण करना पड़ता है।

इसी प्रकार मोह तो स्पष्ट अज्ञान ही है। अज्ञान से दूषित व्यक्ति जीवन में किसी भी व्रत का पालन ही कर पाता। मोहग्रस्त व्यक्ति अनिष्ट में इष्ट, हानि में लाभ और असत्य में सत्य का आभास पाने लगता है। मद और मत्सर अहंकार के ही दो प्रचंड प्रकार होते हैं। इनका प्रकोप व्यक्ति को कर्तव्य भ्रष्ट बना देता है। अहंकारी व्यक्ति स्वयं ही अपने की संसार में दूसरों से श्रेष्ठ मान बैठता है। अपनी बात मनवाना और दूसरे की बात न मानना उसका सहज स्वभाव होता है।

अपने दम्भ की रक्षा में उसके लिए कोई भी कार्य अकरणीय नहीं होता। इस प्रकार मद और मत्सर सत्य पालन में बहुत बड़ी बाधाएं हैं। सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन विकारों से सदा सावधान रहता है। ऐसे विचार मुक्त व्यक्ति और एक देवता में क्या अन्तर रहा जाता है? सत्याश्रमी व्यक्ति को यदि देवता कहा दिया जाय तो भी कोई अतिशयोक्ति न होगी। निश्चय ही सत्यनिष्ठ व्यक्ति देवता ही होते हैं। धरती के देवता।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968

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👉 वैभव खोकर भी सत्यनिष्ठ बनें रहें (अंतिम भाग)

संसार की हर चीज अस्थिर है वह अपने रूप,रंग और स्तर निरन्तर बदलती है, इतना ही नहीं अपना मन भी तो एक जैसी स्थिति में नहीं रहता। उसे अभी एक वस्तु एक दृष्टिकोण के कारण प्रिय लगती है। आवश्यक नहीं कि वह दृष्टिकोण सदा ही बना रहे। आज का कामातुर व्यक्ति कल संन्यास धारण करने के लिए व्यग्र हो सकता है, तब जो कुछ प्रथम आवेश में प्राणप्रिय लगता था वह द्वितीय आवेश चढ़ आने के कारण निस्सार एवं घिनौना प्रतीत हो सकता है। यही बात उन व्यक्तियों पर भी लागू होती है जिन्हें हम अपना समझते है या प्यार करते हैं। वे हमें इस समय प्यार देते हैं, पर कल उनकी रुझान दूसरी ओर मुड़ सकती है और उपेक्षा अवज्ञा से उनका व्यवहार बदला हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है। संसार की यही घोर अस्थिर स्थिति है। पानी की लहरों की तरह यहाँ सब कुछ बदल रहा है। ऐसी दशा में जिस आकर्षक पर मुग्ध होकर आज हम सत्य जैसे शाश्वत तत्व की उपेक्षा करने को उद्यत हुए हैं और प्रिय पदार्थ स्वाद अथवा व्यक्ति के लिए बेतरह मर खप रहे हैं, नशा उतरने पर वह सारा आवेश मूर्खता पूर्ण ही प्रतीत होगा।

अनीति का समर्थन करते हुए सरलता पूर्वक उपार्जन किया जा सकता हो तो भी छोड़ देने में ही कल्याण है। सरलता,सुविधा और प्रचुरता की ललक में हम उन तरीकों को अपना लेते है जिनसे जल्दी सफलता मिल सके। ऐसे तरीके अनैतिक ही हो सकते हैं। सत्य के मार्ग पर चलने से कठोर परिश्रम के साथ स्वल्प उपार्जन ही सम्भव है। नीति पूर्वक तो उचित ही कमाया जा सकेगा और उसके लिए उचित पुरुषार्थ करना पड़ेगा। इसके लिए जिनमें साहस और धैर्य नहीं वे अनीति पर उतारू होते हैं या फिर अनीति वालों के सहायक होकर सरलता पूर्वक सुविधायें पाने के लिए सहमत होते हैं। यह स्थिति नितान्त दयनीय है। शरीरगत सुविधाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य की आत्मा का हनन करना पड़े तो यह इतनी बड़ी क्षति होगी जिसकी पूर्ति किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगी।

मानवी गरिमा की रक्षा कर सकना जीवन सफलता की दृष्टि से उच्चकोटि की उपलब्धि है। यदि आत्मा का —आदर्शों का— आत्म−सन्तोष का—कोई महत्व या स्थान हो सकता है तो उन्हें सँजोये रहने के लिए भी हमारी चेष्टाएँ होनी चाहिए। इस दिशा में बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि नीति पूर्ण उपार्जन से सन्तुष्ट रहने—उपभोग के स्वल्प साधन से काम चलाने और कठोर कष्ट साध्य जीवन क्रम का स्वागत कर सकने वाला अभ्यास डाला जाय। तप इसी का नाम है। तितीक्षा इसी को कहते हैं। धर्म और अध्यात्म की संरचना इसी स्तर की मनोभूमि को विनिर्मित एवं परिपक्व करने के लिए किया गया है। आस्तिकता की धुरी इसी केन्द्र पर घूमती है कि व्यक्ति आदर्शवादी और सत्यनिष्ठ जीवन पद्धति अपनाने के लिए अभीष्ट शौर्य साहस का सम्पादन कर सकें। किसी भी प्रकार—सुगमता पूर्वक प्रचुर सुख साधन संग्रह करने की—किसी भी मार्ग से अपनी अहंता का उद्धत प्रदर्शन कर सकने की ललक मनुष्य को कुपथगामी बनाती है और दुष्कर्म करने के लिए अग्रसर करती है। इसी आवेश में पतनोन्मुख एवं कलंक कालिमा से भरी रीति−नीति अपनानी पड़ती है। इतने पर भी जो पाया जाता है वह क्षणिक रहता है। जिस सरसता और सुविधा की आशा की गई थी वह भी तो दुराशा मात्र ही रहती है। बिजली की कौंध की तरह सुख शान्ति के सपने कुछ विलीन हो जाते हैं। मृग तृष्णा में व्यग्र हिरन की तरह एक के बाद दूसरी दिशा में प्यास बुझाने के लिए घोर प्रयत्न करते रहने पर भी अन्ततः गहरी निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

मनुष्यता की आत्मा सत्यनिष्ठा के साथ जुड़ी हुई है। यह मन्द अथवा तीव्र स्वर में एक ही घोषणा करेगी—भले ही समस्त सुविधाएँ छिन जाँय और समस्त प्रियजनों का विरोध सहना पड़े तो भी यथार्थता को—न्याय नीति को −विवेक औचित्य को तिलाँजलि नहीं दी जानी चाहिए। गरीबी की अभावग्रस्त रीति−नीति अपनाकर इस संसार में असंख्यों मनुष्य जीवित है फिर हर भी वैसा क्यों नहीं कर सकते?

मित्रताएँ टूटती हों—प्रियजन विमुख होते हों—गरीबी को सहचरी बनाना पड़ता हो—असुविधाओं का वरण करना पड़ता हो तो इन सबका सम्मिलित कष्ट इतना बड़ा नहीं हो सकता जितना कि सत्य के परित्याग का। सचाई की राह पर चलने वालों को अक्सर दुनिया वाले मूर्ख कहते हैं और व्यंग करते हैं कि सन्त बनकर क्या पा लिया? इतना ही नहीं—कई बार तो दुष्ट लोग ऐसे व्यक्ति को अपने भंडाफोड़ का भय दिखाकर दूर भगाने या हानि पहुँचाने से भी नहीं चूकते और उसे अकारण कष्ट जाल में फँसना पड़ता है। इन अग्नि परीक्षाओं से गुजरते हुए भी यदि प्रहलाद की तरह कोई सत्यनिष्ठ बन सके तो समझना चाहिए कि मनुष्य का महान गौरव और उत्तरदायित्व सँजोये रखने में उसने वह सफलता प्राप्त करली, जिसका उपहार सत्यनिष्ठ महामानव बनने के रूप में प्राप्त होता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 09 June 2026


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