शनिवार, 23 मई 2026

👉 प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (अंतिम भाग)

देवता और असुर भावनात्मक उभार के दो सिरे हैं। मध्यवर्ती स्थान शान्त और सन्तुलित रहता है। सामान्य मनुष्य हर किसी से मानवोचित सद्व्यवहार करते है और अपने कर्त्तव्य धर्म पर आरूढ़ रहकर मध्यवर्ती गतिविधियाँ चलाते हुए जीवन−क्रम पूरा करते हैं। न उन्हें किन्हीं से अत्यधिक घनिष्टता होती है और न रोष, विद्वेष ही सताता है। वे जानते हैं मनुष्यों की पारस्परिक, सहिष्णुता और सद्व्यवहार के आधार पर ही गुजर करनी पड़ती है इसलिए सम्बन्धों का सन्तुलित निर्वाह करते हुए गुजर करनी चाहिए। न अति की सीमा तक मैत्री बढ़ानी चाहिए न घृणा द्वेष की आग में जलना चाहिए। लोग जैसे भी हैं बने रहे−हमें अपना कर्त्तव्य भर पालन करते रहना है यह मानकर चलते रहना सरल पड़ता है और सुलभ भी है। इस नीति से जिन्दगी आसानी के साथ कट जाती है और सम्बन्धित लोगों के रिश्ते का देर तक ठीक प्रकार निर्वाह होता रहता है।

इससे आगे की भावुक स्थिति को असामान्य या अतिवादी कह सकते हैं। वह इस छोर पर पहुँचेगी या उस छोर पर। या तो आदर्शवादी व्यक्तित्वों के साथ सघन होकर उच्चस्तरीय आत्मिक विकास की भूमिका बनायेगी या फिर लोभ और मोह में उलझकर उन्माद जैसी स्थिति उत्पन्न करेगी। उसमें रुझान ही प्रधान रहता है। दुष्ट और दुर्गुणी भी प्रिय लगने लगता है यहाँ तक कि उस तथाकथित प्रेमी की प्रसन्नता के लिए स्वयं का भी दुष्ट कर्मों में सहयोग समर्थन चल पड़ता है। तब प्रिय पात्र को आदर्श की ओर ले चलने का उत्साह समाप्त हो जाता है और मित्र को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को मन रहता है, भले ही वह कर गुजरना कितना ही अनैतिक या अवाँछनीय क्यों न हो। यह पतन का अन्तिम छोर है। प्रेम का विकृत स्वरूप कितना विघातक हो सकता है उसका परिचय इस मोह ग्रस्त उन्मादी आवेश की स्थिति वाले वातावरण में कहीं भी देखा जा सकता है।

प्रेम का उज्ज्वल पक्ष ऐसा है जिसमें उस पवित्र सूत्र में बँधे दोनों पक्षों का केवल उत्कर्ष और कल्याण ही होता है। ऐसी मित्रता एक आदर्शवादी अन्तःकरण को दूसरे परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ बाँधती है। एक ओर एक मिलकर ग्यारह बनने की उक्ति उन पर लागू होती है। उनका भावनात्मक आदान−प्रदान परस्पर एक दूसरे को ऊँचा उठाता है और आगे बढ़ाता है ऐसी मित्रता का आरम्भ सदुद्देश्य के लिए होता है इसलिए उसका अन्त भी सुखद सन्तोषजनक ही रहता है। परिस्थितियाँ इन मित्रों को दूर−दूर रहने के लिए विवश कर दें तो भी उनकी सद्भावना और घनिष्टता में कोई अन्तर नहीं आता। जब कि मोहग्रस्त लोग जब तक सामने रहते है तब तक देख देखकर जीने की बात करते हैं कि पर जब विलग हो जाते हैं तो कुछ ही समय में उनकी स्थिति अपरिचितों जैसी हो जाती है।

मोह में आदान के साथ प्रदान की शर्त जुड़ी रहती है। हमने उसके लिए यह किया इसलिए उसे हमारे लिए यह करना चाहा ऐसा लेखा−जोखा जहाँ भी लिया जा रहा होगा वहाँ लाभ हानि के आधार पर सन्तोष अथवा आक्रोश भी व्यक्त किया जा रहा होगा। अपेक्षा पूरी होने पर वह आतुर प्रेम भयंकर प्रतिशोध भी बन जाता है। और आज दाँत काटी रोटी वाले मित्रकल ‘जान के ग्राहक’ बने दिखाई पड़ते हैं। प्रेमोन्माद में यह ज्वार−भाटे जैसी उठक−पटक स्वाभाविक भी है। सच्चे प्रेम में ऐसे आँधी तूफान नहीं आते उसमें एक रस शीतल भर सुगन्ध पवन बहता रहता है। प्रेम देने के लिए किया जाता है लेने के लिए नहीं। देते रहने में कोई बाधा नहीं। झंझट तो तब खड़ा होगा जब लेने की अपेक्षा की जायगी और वह जो चाहा था सो मिल नहीं सकेगा। प्रेम इसी चट्टान से टकरा कर नष्ट भ्रष्ट होता है। अनुदान अपने हाथ की बात है प्रतिदान दूसरे के हाथ की। प्रतिदान का अभिलाषी मोह है और अनुदान के लिए समुन्नत प्रेम। मोहग्रस्त को पग−पग पर खोज का, जलन का, उलाहने का, पश्चाताप का, अनुभव होता है। किन्तु जहाँ प्रेम है वहाँ शान्ति−स्थिरता और प्रसन्नता की स्थिति में कमी परिवर्तन दृष्टिगोचर ही न होगा। ऐसा परिष्कृत प्रेम ही आत्मा की उच्चस्तरीय आवश्यकता है। उसे पाकर मनुष्य इतना ही आनन्द पाता है जितना ईश्वर को अपनी गोदी में बिठाकर अथवा स्वयं उसकी गोदी में बैठकर पाया जा सकता है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

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👉 बड़े उद्घोष ना करें बड़े कार्य करें (अंतिम भाग)

सुविकसित व्यक्तित्व वाले प्रौढ़ व्यक्तित्व को न तो बूढ़ों की तरह भूत उपासक होना चाहिए ओर न बालकों की तरह भविष्य वक्त बनने का उपहासात्मक उपक्रम बनाना चाहिए। यथार्थवादी होना चाहिए और वर्तमान पर सारा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। प्रौढ़ता में ही वह साहस होता है जो वर्तमान की कठिन चुनौती को स्वीकार कर सके।

वर्तमान,आज की जटिल समस्याओं को लेकर सामने आता है और सामाधान के ऐसे हल चाहता है जो प्रबल पुरुषार्थ और प्रखर मनोबल के आधार पर ही ढूंढ़े निकाले जा सकते है पौरुष जितना गौरवशाली है उतना ही उन उत्तरदायित्वों से लदा हुआ भी है जो मनस्वी एवं दूरदर्शी आन्तरिक स्थिति होने पर ही निबाहे जा सकते हैं।

कल क्या करना है − इसकी रूपरेखा सामने रहनी चाहिए ताकि उस आधार पर वर्तमान प्रयासों को अग्रसर किया जा सके। किन्तु भविष्य को सुनिश्चित मानकर नहीं चला जाना चाहिए। मनुष्य की अकेली इच्छा ही सब कुछ नहीं है −परिस्थिति कल बदल सकती है और आज की इच्छा भी कल किसी कारण शिथिल हो सकती है। ऐसी दशा में दूसरों को आकर्षक आश्वासन देने या आशान्वित करने का मूल्य ही कितना रह जाता है।

भविष्य में यह करने की इच्छा है इस प्रकार विचार व्यक्त करने में और उस संदर्भ में दूसरे से परामर्श लेने में हर्ज नहीं। भावी योजनाएँ बनती है और बनाई जाती हैं सो उचित भी हैं और आवश्यक भी। पर मैं यह कर ही लूँगा ऐसा उद्घोष नहीं करना चाहिए। हाँ वैसा करने के लिए शक्ति भर और पूरी ईमानदारी से प्रयत्न करने का संकल्प किया जा सकता है और उस निश्चय को कार्यान्वित करने में तत्परता पूर्वक जुटा जा सकता है। ऐसे साहसिक प्रयत्नशीलता सम्भवतः अपने आज के संकल्प को बहुत हद तक पूरी भी रह सकती है। तब सफलता जितनी भी मिल सकी वह प्रशंसनीय कही जा सकता। इसके विपरीत यदि लम्बी−चौड़ी उद्घोष किये गये हैं और वे आवेश मात्र सिद्ध हुए तो इससे अपना शिर लज्जा से नीचा होगा और दूसरों को व्यंग करने का अवसर मिलेगा।

उचित यही है कि हम आज की बात सोचे ओर आज के काम आज ही निपटाने क प्रयत्न करें। आज के उत्तरदायित्व भी इतने बड़े और इतने अधिक हैं कि उनकी पूर्ति सही रीति से कर सकने में बढ़े चढ़े प्रयास, साहस, साधन, और बुद्धिबल को नियोजित करने ही कुछ काम चलता है हमें इसी केन्द्र पर अपने को केन्द्रित करना चाहिए।,कोई सत्कर्म करना है तो आज ही करना चाहिए। महा प्रभु ईसा कहते थे कि जो सत्कर्म करना है सो आज ही कर। बांये हाथ में जो दान के लिए है उसे दाहिने हाथ मत लेजा। ऐसा न हो कि इस फेर बदल में तेरा मन बदल जाय और जो देना चाहता है वह न दे सके।’ बुद्धि मान सदा से यही कहते रहे है कि −सौ मन कथनी की अपेक्षा एक सेर ‘करनी’ का महत्व अधिक है। घोषणाएँ करते फिरने की अपेक्षा यह अच्छा है कि हम अपनी सदाशयता का परिचय आज की कर्मनिष्ठा द्वारा व्यक्त करें।’

जीभ छोटी बनाई गई है हाथ बड़े। जीभ एक है और हाथ दो। यह अनुपात इसलिए रखा गया है कि हम कहें कम, करें अधिक। क्रिया ही किसी की सद्भावना का सच्चा प्रमाण है जीभ तो भावावेश में कुछ भी कह सकती है। जीभ तो भावावेश में कुछ भी कह सकती है और वह उन्माद उतरते ही पिछली बात को बदल भी सकती है पर क्रिया तो क्रिया ही रहेगी। संकल्प में जितना अन्तर हैं उतना घोषणा और क्रिया में भी रहता है आमतौर पर लम्बी चौड़ी घोषणाएँ आवेशग्रस्त ही करते है अत्युत्साह की मनः स्थिति में प्रायः स्थिति में प्राय यह स्मरण नहीं रहता कि जो कहा जा रहा है उसे कल कार्यान्वित किया भी जा सकेगा या नहीं। जो न किया जा सके उनके कहने से क्या लाभ? जो कहने को जी चाहती ही उसके पीछे दूरगामी चिन्तन −उपयुक्त साधन ओर अविचल संकल्प −बल हो तो ही घोषणा के लिए कदम बढ़ाना चाहिए, अन्यथा जो बन पड़ेगा वह अधिक से अधिक तत्परता एवं सदाशयता के साथ करते इतना कथन ही पर्याप्त हैं।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

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