देवता और असुर भावनात्मक उभार के दो सिरे हैं। मध्यवर्ती स्थान शान्त और सन्तुलित रहता है। सामान्य मनुष्य हर किसी से मानवोचित सद्व्यवहार करते है और अपने कर्त्तव्य धर्म पर आरूढ़ रहकर मध्यवर्ती गतिविधियाँ चलाते हुए जीवन−क्रम पूरा करते हैं। न उन्हें किन्हीं से अत्यधिक घनिष्टता होती है और न रोष, विद्वेष ही सताता है। वे जानते हैं मनुष्यों की पारस्परिक, सहिष्णुता और सद्व्यवहार के आधार पर ही गुजर करनी पड़ती है इसलिए सम्बन्धों का सन्तुलित निर्वाह करते हुए गुजर करनी चाहिए। न अति की सीमा तक मैत्री बढ़ानी चाहिए न घृणा द्वेष की आग में जलना चाहिए। लोग जैसे भी हैं बने रहे−हमें अपना कर्त्तव्य भर पालन करते रहना है यह मानकर चलते रहना सरल पड़ता है और सुलभ भी है। इस नीति से जिन्दगी आसानी के साथ कट जाती है और सम्बन्धित लोगों के रिश्ते का देर तक ठीक प्रकार निर्वाह होता रहता है।
इससे आगे की भावुक स्थिति को असामान्य या अतिवादी कह सकते हैं। वह इस छोर पर पहुँचेगी या उस छोर पर। या तो आदर्शवादी व्यक्तित्वों के साथ सघन होकर उच्चस्तरीय आत्मिक विकास की भूमिका बनायेगी या फिर लोभ और मोह में उलझकर उन्माद जैसी स्थिति उत्पन्न करेगी। उसमें रुझान ही प्रधान रहता है। दुष्ट और दुर्गुणी भी प्रिय लगने लगता है यहाँ तक कि उस तथाकथित प्रेमी की प्रसन्नता के लिए स्वयं का भी दुष्ट कर्मों में सहयोग समर्थन चल पड़ता है। तब प्रिय पात्र को आदर्श की ओर ले चलने का उत्साह समाप्त हो जाता है और मित्र को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को मन रहता है, भले ही वह कर गुजरना कितना ही अनैतिक या अवाँछनीय क्यों न हो। यह पतन का अन्तिम छोर है। प्रेम का विकृत स्वरूप कितना विघातक हो सकता है उसका परिचय इस मोह ग्रस्त उन्मादी आवेश की स्थिति वाले वातावरण में कहीं भी देखा जा सकता है।
प्रेम का उज्ज्वल पक्ष ऐसा है जिसमें उस पवित्र सूत्र में बँधे दोनों पक्षों का केवल उत्कर्ष और कल्याण ही होता है। ऐसी मित्रता एक आदर्शवादी अन्तःकरण को दूसरे परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ बाँधती है। एक ओर एक मिलकर ग्यारह बनने की उक्ति उन पर लागू होती है। उनका भावनात्मक आदान−प्रदान परस्पर एक दूसरे को ऊँचा उठाता है और आगे बढ़ाता है ऐसी मित्रता का आरम्भ सदुद्देश्य के लिए होता है इसलिए उसका अन्त भी सुखद सन्तोषजनक ही रहता है। परिस्थितियाँ इन मित्रों को दूर−दूर रहने के लिए विवश कर दें तो भी उनकी सद्भावना और घनिष्टता में कोई अन्तर नहीं आता। जब कि मोहग्रस्त लोग जब तक सामने रहते है तब तक देख देखकर जीने की बात करते हैं कि पर जब विलग हो जाते हैं तो कुछ ही समय में उनकी स्थिति अपरिचितों जैसी हो जाती है।
मोह में आदान के साथ प्रदान की शर्त जुड़ी रहती है। हमने उसके लिए यह किया इसलिए उसे हमारे लिए यह करना चाहा ऐसा लेखा−जोखा जहाँ भी लिया जा रहा होगा वहाँ लाभ हानि के आधार पर सन्तोष अथवा आक्रोश भी व्यक्त किया जा रहा होगा। अपेक्षा पूरी होने पर वह आतुर प्रेम भयंकर प्रतिशोध भी बन जाता है। और आज दाँत काटी रोटी वाले मित्रकल ‘जान के ग्राहक’ बने दिखाई पड़ते हैं। प्रेमोन्माद में यह ज्वार−भाटे जैसी उठक−पटक स्वाभाविक भी है। सच्चे प्रेम में ऐसे आँधी तूफान नहीं आते उसमें एक रस शीतल भर सुगन्ध पवन बहता रहता है। प्रेम देने के लिए किया जाता है लेने के लिए नहीं। देते रहने में कोई बाधा नहीं। झंझट तो तब खड़ा होगा जब लेने की अपेक्षा की जायगी और वह जो चाहा था सो मिल नहीं सकेगा। प्रेम इसी चट्टान से टकरा कर नष्ट भ्रष्ट होता है। अनुदान अपने हाथ की बात है प्रतिदान दूसरे के हाथ की। प्रतिदान का अभिलाषी मोह है और अनुदान के लिए समुन्नत प्रेम। मोहग्रस्त को पग−पग पर खोज का, जलन का, उलाहने का, पश्चाताप का, अनुभव होता है। किन्तु जहाँ प्रेम है वहाँ शान्ति−स्थिरता और प्रसन्नता की स्थिति में कमी परिवर्तन दृष्टिगोचर ही न होगा। ऐसा परिष्कृत प्रेम ही आत्मा की उच्चस्तरीय आवश्यकता है। उसे पाकर मनुष्य इतना ही आनन्द पाता है जितना ईश्वर को अपनी गोदी में बिठाकर अथवा स्वयं उसकी गोदी में बैठकर पाया जा सकता है।
.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई
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