“पुरुषार्थ का पुरस्कार सम्पन्नता है-यह ए ईश्वरीय नियम है। परमात्मा का बनाया हुआ, उसी का प्रेरित किया हुआ नियम है। यदि वह स्वयं ही इस विषय में स्वेच्छाचारिता बरतें और उसका अपवाद करने लगे तो उसके विश्व-विधान का क्या महत्व रह जाये। एक नियम का भावुकता विधान के सारे नियमों को महत्व और भावहीन बना देता है। सृष्टि-चक्र नियम की धुरी पर ही घूम रही है। यदि ईश्वर स्वयं ही उसको भंग कर दे तो उसकी यह सृष्टि, उसकी यह लीला और उसका यह निर्माण ही न नष्ट हो जाय। जो पुरुषार्थी है-परिश्रमी है, उद्योग है, उस पर अपने नियमानुसार परमात्मा कृपा करता ही है, वह ऐसा करने को विवश है। सम्पन्नता और सफलता जो पुरुषार्थ का पुरस्कार है, मनुष्य का अपरिहार्य अधिकार है, कोई शक्ति अथवा कोई भी सत्ता उसे इससे वंचित नहीं कर सकेगी।
कोई जेठ परिश्रम का सहज फल है-यह एक निर्विवाद सत्य है। तथापि उसको परमात्मा की कृपा मानना पुरुषार्थी का एक विनम्र आस्तिक भाव है, जो बढ़ा शुभ है। इसलिये कि अपने पुरुषार्थ का श्रेय परमात्मा को दे देने से मनुष्य अहंकार के दोष से सुरक्षित रहता है। यह सब मैंने किया, यह सब मेरे बल-बूते का चमत्कार है-ऐसा अहंभाव लाने अथवा रखने से एक तो उपलब्धियों की सात्विकता नष्ट होती है, दूसरे विवेक भ्रष्ट होता है। इस विषय में आत्म-विश्वास तो ठीक है, किन्तु आत्म-अहंकार ठीक नहीं है। क्योंकि जहाँ आत्म-विश्वास का सृजनात्मक भाव है, वहाँ आत्म-अहंकार ध्वंसक वृति है।
अपने पुरुषार्थ का श्रेय परमात्मा को सौंप देने से और भी अनेक लाभ होते हैं। जैसे उदारता, त्याग और निस्पृहता का भाव विकसित होता है। स्वार्थ, लोभ और लिप्सा से रक्षा होती है। निष्काम कर्मभाव का विकास होता है और सफलता, असफलता में समभाव रहने से कर्मों में अखण्डता बनी रहती है। इसीलिये लाखों में अपने सब कर्म उनके फलों सहित परमात्मा को समर्पित कर देने का निर्देश किया गया है। निश्चय ही यह आस्तिक भाव बड़ा शुभ तथा सात्विक है। तथापि यह कभी न भूलना चाहिये कि श्रेय और सफलता मनुष्य को अपने पुरुषार्थ के बल पर ही प्राप्त होती है। इससे परमात्मा की अनायास कृपा का कोई सम्बन्ध नहीं है।
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बहुत बार लोगों को उत्तराधिकार में बहुत बड़ी सम्पत्ति मिल जाती है। इसे परमात्मा की अनायास कृपा कहा जा सकता है। बहुत बार लोग लाटरी आदि के आधार पर भी बिना किसी पुरुषार्थ के धनवान् बन जाते हैं और बहुत बार गुप्त धन मिल जाने से भी धनात्मक प्राप्त हो जाती है। स्थूलता यह परमात्मा की अनायास कृपा ही मालूम होती है। किन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो पता चलेगा कि उस धन के पीछे किसी न किसी का पुरुषार्थ छिपा रहता है। जो धन अनायास मिला होता है, वह उसके वर्तमान अधिकारी के पुरुषार्थ का न सही किसी न किसी विगत अधिकारी के पुरुषार्थ का फल तो होता ही है। बिना किसी के पुरुषार्थ अथवा परिश्रम के उस धन का आपसे आप अस्तित्व में आ जाना सम्भव हो ही नहीं सकता है। कोई भी धन, कोई भी सम्पत्ति और कोई भी साधन आत्मोत्कर्ष नहीं होते। उनके लिये किसी न किसी को उद्योग करना ही होता है।
सत्य बात तो यह है कि वह सम्पत्ति हो तो उसी की है, जिसने उसके लिये उद्योग किया होता है। अ*ब यह उसको चाहे दे जाये, दे दे अथवा किसी को पाने के लिये धरती में रख जाये। किन्तु पाने वाला उसका अधिकारी होने पर भी यथार्थ अधिकारी नहीं होता।* ऐसी आकस्मिक सम्पत्ति बहुधा लोगों के पास ठहरी नहीं। वह किसी न किसी बहाने से वह ही जाती है। इस प्रकार बहुत-सा धन पाकर यदि कोई आदमी उसका ढेर सामने रखकर बैठ जाये और बिना कुछ किये उसे व्यय करता रहे तो वह कितने दिन चल सकेगी? शीघ्र ही जल-तपकर समाप्त हो जायेगी।
इस प्रकार अकस्मात् मिली सम्पत्ति भी तभी उपयोगी होती है और तभी ठहरती है, जब मनुष्य अपना भी कुछ पुरुषार्थ करता चलता है और उस उपार्जन के अनुपात से व्यय करता है। इस प्रकार उसकी बनावटता की स्थिरता का आधार उसका अपना पुरुषार्थ ही होगा न कि वह आकस्मिक सम्पत्ति जो उसे उत्तराधिकार, लाटरी अथवा धरती आदि से अनायास मिल गई होती है। सफलता, श्रेय और सम्पन्नता का आधार मनुष्य का अपना पुरुषार्थ ही होता है। इस सत्य को कभी न भूलना चाहिये।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969
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