गुरुवार, 4 जून 2026

👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (अन्तिम भाग)

केवल पारमार्थिक विचार रखने अथवा परोपकार का म नहीं मन चिंतन करने से प्रयोजन पूर्ण न होगा। उसके लिये तदनुकूल सक्रियता की भी आवश्यकता है। भावनाओं को कार्य रूप में परिणित न करने से वे शीघ्र ही निष्क्रिय होकर मर जाती हैं और मनुष्य का मानसिक स्तर पुनः नीचे उतर जाता है। भावनाओं के परिपोषण के लिये उन्हें कार्यरूप में परिणित ही करते रहना चाहिये साथ ही केवल मनोरथ मात्र से ही तो किसी की सेवा सहायता नहीं हो सकती। जब तक किसी रोगी को दवा लाकर न दी जायेगी और यदि आवश्यक हो तो पिलाई न जायेगी, तब तक क्या तो उसकी सेवा होगी और क्या उसे सुख अथवा संतोष मिलेगा।

किसी असहाय को जब तक हाथ देकर नहीं उठाया जायेगा अथवा पदार्थ रूप में उसकी अपेक्षित सहायता न की जायेगी, तब तक उसका क्या दुःख दूर ही सकेगा। भूखे को रोटी, नंगे को वस्त्र, असहाय को हाथ, अज्ञानी को विद्या निरक्षर को अक्षर और रोगी को दवा देकर ही सुखी और शीतल बनाया जा सकता है। हमारी उदार, दयालु अथवा करुण भावनायें मात्र उसका न तो कोई हित कर सकती है और न हम ही परमार्थ पुण्य के अधिकारी बन सकते हैं।

मनुष्य की पूर्णता का चिन्ह यह हैं कि हममें कितनी उत्कृष्ट भावनाओं का विकास हुआ हैं और उन भावनाओं को यथार्थ रूप में परिणित करने की प्रेरणा कितनी प्रबल हुई है और हम परमार्थ कार्यों के लिये अपने कितने स्वार्थों और अधिकारों को त्याग करने में तत्पर होने लगे हैं और उस त्याग में हमें किस सीमा तक प्रसन्नता एवं सन्तोष मिलने लगा है। जिस दिन पूर्णरूप से हमारा स्वार्थ परमार्थ, हमारे अधिकार कर्तव्य और हमारा सुख दूसरों का सुख होकर सन्तुष्ट होने लगे, मानना चाहिये कि हम पूर्णता की परिधि में आ गये और अब उस भूमिका पर खड़े हुए हैं, जहाँ से देवत्व की ओर अभियान प्रारम्भ किया जा सकता है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 अकालमृत्यु और रुग्णता का कारण भ्रष्ट चिन्तन

स्वस्थ शरीर और दीर्घजीवन का सम्बन्ध साधारणतया खान-पान, व्यायाम आदि से माना जाता है, पर वस्तुतः समग्र आरोग्य मनुष्य की मनःस्थिति पर आधारित है।

जो मन से स्वस्थ है वह शरीर से भी स्वस्थ रह सकता है। यदि मनःक्षेत्र में उद्वेग और आवेश भरे हुए हैं तो रोग अकारण ही उत्पन्न होते रहेंगे और उनका निवारण पौष्टिक आहार एवं चिकित्सा उपचार से भी सम्भव न हो सकेगा।

यदि मन स्वस्थ हो तो बाह्य कारणों से उत्पन्न हुई रुग्णता अधिक समय न ठहर सकेगी उसका निराकरण जल्दी ही हो जायगा, शरीर संरचना में वे रोगों का समाधान स्वयमेव होता रहे।

मन में भरी दुर्भावनाएँ एवं दुष्प्रवृत्तियाँ मात्र मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहतीं उनकी प्रतिक्रिया ज्ञान तंतुओं के माध्यम हैं। इस अंतर्ग्रही विष को शरीर संरचना भी दूर नहीं कर सकती। सम्वेदनाएँ तो प्रकृति को ढालती हैं, मनोविकार धीरे-धीरे शरीर के समस्त अंगों को अपने दुष्प्रभाव से प्रभावित करते चले जाते हैं और उनका परिणाम शारीरिक रोगों के रूप में सामने आता है। निरोग और दीर्घजीवी बनने के लिए मनःक्षेत्र को पवित्र और प्रगतिशील बनाने की अपरिहार्य आवश्यकता है।

योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ और काकभुसुण्डि जी के सम्वाद का एक रोचक कथा प्रसंग आता है। वशिष्ठ जी पूछते हैं—हे काकभुसुण्डि आप इतने काल तक दीर्घजीवी और युवा किस कारण रहे हैं।

इसके उत्तर में काकभुसुण्डि कहते हैं—’मैं सदा आत्म-भाव में तन्मय रहता हूँ। मनोरथों में शक्ति नष्ट नहीं करता। चिन्ता और विषाद में नहीं फँसता। भविष्य के लिए आशंकाएँ नहीं करता। मन को आवेशग्रस्त नहीं होने देता। सबको समान मानता हूँ। मोह और प्रमाद से दूर रहता हूँ। बीती दुर्घटनाओं से दुखित नहीं रहता। दूसरों के सुख दुख में ही सुखी-दुखी होता हूँ। प्राणिमात्र के प्रति सुहृद सहायक रहता हूँ। विपत्ति में न धैर्य खोता हूँ और न सम्पत्ति से उन्मत्त बनता हूँ। यह मेरे दीर्घजीवन तथा अक्षययौवन का कारण है।

अकाल मृत्यु और रुग्णता का आधार शास्त्रकारों ने मानसिक असंतुलन को ही बताया है और कहा है जिसे दीर्घजीवन एवं समग्र आरोग्य अपेक्षित हो उन्हें अपने चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बनाने का पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। 

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1974

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‼️ पुरुषार्थ का पुरस्कार सम्पन्नता है ‼️

“पुरुषार्थ का पुरस्कार सम्पन्नता है-यह ए ईश्वरीय नियम है। परमात्मा का बनाया हुआ, उसी का प्रेरित किया हुआ नियम है। यदि वह स्वयं ही इस विषय में स्वेच्छाचारिता बरतें और उसका अपवाद करने लगे तो उसके विश्व-विधान का क्या महत्व रह जाये। एक नियम का भावुकता विधान के सारे नियमों को महत्व और भावहीन बना देता है। सृष्टि-चक्र नियम की धुरी पर ही घूम रही है। यदि ईश्वर स्वयं ही उसको भंग कर दे तो उसकी यह सृष्टि, उसकी यह लीला और उसका यह निर्माण ही न नष्ट हो जाय। जो पुरुषार्थी है-परिश्रमी है, उद्योग है, उस पर अपने नियमानुसार परमात्मा कृपा करता ही है, वह ऐसा करने को विवश है। सम्पन्नता और सफलता जो पुरुषार्थ का पुरस्कार है, मनुष्य का अपरिहार्य अधिकार है, कोई शक्ति अथवा कोई भी सत्ता उसे इससे वंचित नहीं कर सकेगी।

कोई जेठ परिश्रम का सहज फल है-यह एक निर्विवाद सत्य है। तथापि उसको परमात्मा की कृपा मानना पुरुषार्थी का एक विनम्र आस्तिक भाव है, जो बढ़ा शुभ है। इसलिये कि अपने पुरुषार्थ का श्रेय परमात्मा को दे देने से मनुष्य अहंकार के दोष से सुरक्षित रहता है। यह सब मैंने किया, यह सब मेरे बल-बूते का चमत्कार है-ऐसा अहंभाव लाने अथवा रखने से एक तो उपलब्धियों की सात्विकता नष्ट होती है, दूसरे विवेक भ्रष्ट होता है। इस विषय में आत्म-विश्वास तो ठीक है, किन्तु आत्म-अहंकार ठीक नहीं है। क्योंकि जहाँ आत्म-विश्वास का सृजनात्मक भाव है, वहाँ आत्म-अहंकार ध्वंसक वृति है।

अपने पुरुषार्थ का श्रेय परमात्मा को सौंप देने से और भी अनेक लाभ होते हैं। जैसे उदारता, त्याग और निस्पृहता का भाव विकसित होता है। स्वार्थ, लोभ और लिप्सा से रक्षा होती है। निष्काम कर्मभाव का विकास होता है और सफलता, असफलता में समभाव रहने से कर्मों में अखण्डता बनी रहती है। इसीलिये लाखों में अपने सब कर्म उनके फलों सहित परमात्मा को समर्पित कर देने का निर्देश किया गया है। निश्चय ही यह आस्तिक भाव बड़ा शुभ तथा सात्विक है। तथापि यह कभी न भूलना चाहिये कि श्रेय और सफलता मनुष्य को अपने पुरुषार्थ के बल पर ही प्राप्त होती है। इससे परमात्मा की अनायास कृपा का कोई सम्बन्ध नहीं है।

सिद्धियाँ कहाँ है और कैसे प्राप्त करें | Siddhiyan Kahan Aur Kaise Prapt Karen | https://youtu.be/VAuLh_IObak?si=lWEUN38jcBOJzX4E

बहुत बार लोगों को उत्तराधिकार में बहुत बड़ी सम्पत्ति मिल जाती है। इसे परमात्मा की अनायास कृपा कहा जा सकता है। बहुत बार लोग लाटरी आदि के आधार पर भी बिना किसी पुरुषार्थ के धनवान् बन जाते हैं और बहुत बार गुप्त धन मिल जाने से भी धनात्मक प्राप्त हो जाती है। स्थूलता यह परमात्मा की अनायास कृपा ही मालूम होती है। किन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो पता चलेगा कि उस धन के पीछे किसी न किसी का पुरुषार्थ छिपा रहता है। जो धन अनायास मिला होता है, वह उसके वर्तमान अधिकारी के पुरुषार्थ का न सही किसी न किसी विगत अधिकारी के पुरुषार्थ का फल तो होता ही है। बिना किसी के पुरुषार्थ अथवा परिश्रम के उस धन का आपसे आप अस्तित्व में आ जाना सम्भव हो ही नहीं सकता है। कोई भी धन, कोई भी सम्पत्ति और कोई भी साधन आत्मोत्कर्ष नहीं होते। उनके लिये किसी न किसी को उद्योग करना ही होता है।

सत्य बात तो यह है कि वह सम्पत्ति हो तो उसी की है, जिसने उसके लिये उद्योग किया होता है। अ*ब यह उसको चाहे दे जाये, दे दे अथवा किसी को पाने के लिये धरती में रख जाये। किन्तु पाने वाला उसका अधिकारी होने पर भी यथार्थ अधिकारी नहीं होता।* ऐसी आकस्मिक सम्पत्ति बहुधा लोगों के पास ठहरी नहीं। वह किसी न किसी बहाने से वह ही जाती है। इस प्रकार बहुत-सा धन पाकर यदि कोई आदमी उसका ढेर सामने रखकर बैठ जाये और बिना कुछ किये उसे व्यय करता रहे तो वह कितने दिन चल सकेगी? शीघ्र ही जल-तपकर समाप्त हो जायेगी।

इस प्रकार अकस्मात् मिली सम्पत्ति भी तभी उपयोगी होती है और तभी ठहरती है, जब मनुष्य अपना भी कुछ पुरुषार्थ करता चलता है और उस उपार्जन के अनुपात से व्यय करता है। इस प्रकार उसकी बनावटता की स्थिरता का आधार उसका अपना पुरुषार्थ ही होगा न कि वह आकस्मिक सम्पत्ति जो उसे उत्तराधिकार, लाटरी अथवा धरती आदि से अनायास मिल गई होती है। सफलता, श्रेय और सम्पन्नता का आधार मनुष्य का अपना पुरुषार्थ ही होता है। इस सत्य को कभी न भूलना चाहिये।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 June 2026


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