शनिवार, 9 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 3)

आत्मनिरीक्षण एवं दोष दर्शन में दूसरे लोगों से भी काफी लाभ उठाया जा सकता है। उदाहरणार्थ अन्य लोगों से घृणा करने, फटकारने, विश्वास न करने, व्यक्तित्व का कुछ भी मूल्य न समझने, तरह-तरह के दोष लाँछन लगने पर नाराज एवं उत्तेजित न होकर यदि यह देखने की कोशिश की जाय कि आखिर लोग ऐसा क्यों करते हैं । कहीं वास्तव में तो इनकी जड़ें स्वयं में नहीं जमी हुई हैं। इस प्रकार दूसरे लोगों की निगाह के अनुसार अपने अन्तर को टटोलना चाहिए। इससे अपने कई दोषों का पता लग जायगा। मनुष्य के फूहड़पन से ही लोग उससे घृणा करने लगते हैं, स्वान वृत्ति होने के कारण ही फटकार मिलती है। अपनी बेईमानी एवं स्वार्थ परायणता के कारण ही दूसरे अविश्वास करते हैं । अपनी अयोग्यता एवं व्यक्तित्व के प्रति सजग नहीं रहने पर ही दूसरों द्वारा तिरस्कार मिलता है। इस प्रकार दूसरों के अपने प्रति विचार, दृष्टिकोण आदि से लाभ उठाकर भी आत्मनिरीक्षण में सफलता मिल सकती है और अपने दोष बुराइयां आदि समझ में आ जाती है। निन्दा करने वाले से स्वदोष दर्शन में आत्म निरीक्षण में काफी सहयोग मिलता है। निन्दक की उपयोगिता एवं उसे हितकारी बताते हुये रहीम जी ने ठीक ही कहा है।

“निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।
इस प्रकार नित्य आत्मनिरीक्षण का अभ्यास डाल लेने पर अपनी बुराइयां दोष अशुद्धियाँ, विकार समझ में आने लगते हैं। मनुष्य एक सुयोग्य सर्जन की भाँति आत्मनिरीक्षण रूपी सूक्ष्म दर्शक यंत्र द्वारा अपने अन्तर में छिपे हुये उन दूषित तत्वों को सरलता से देख सकता है जिनकी शिकायत अक्सर बाह्य वातावरण के सम्बन्ध में की जाती है। सूक्ष्म निरीक्षण करने पर अन्तर में आत्म प्रवंचना, आत्म क्षुद्रता, व्यग्रता, अव्यवहारिकता, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अन्धविश्वास, आलस्य, उदासीनता, फूहड़पन, कटुभाषण, मिथ्या आश्वासन देना, चाटुकारिता, हठ, दुराग्रहता, खीजना, व्यवहार का खोखलापन, अनुचित साहस, असावधानी, फैशन आदि अनेकों दोष विकार, अशुद्धियाँ नजर आयेंगी। आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी से ये दूषित तत्व अलग-2 दिखाई दें जिनसे मनुष्य का जीवन असफल हो जाता है और उसका कारण दूसरों को बताया जाता है।

जब आत्मनिरीक्षण द्वारा अपनी बुराइयां, दोष विकार समझ में आ जायँ तो उन्हें विवेक बुद्धि, आत्मबल से दूर करने के लिए ठीक उसी प्रकार प्रयत्न करना चाहिए जिस प्रकार एक शल्य चिकित्सक तटस्थ भाव से रोगी के शरीर के दूषित तत्वों को बाहर निकाल फेंकता है उनसे उसका निजी कोई सम्बन्ध नहीं होता । अक्सर कई व्यक्ति अपनी बुराइयों को जानकर भी दूर करने का प्रयत्न नहीं करते क्योंकि उनसे वे अपना मोह द्वारा सम्बन्ध बनाये रखते हैं। इसलिए तटस्थ और निष्पक्ष भाव से अपनी बुराइयों, दोषों को दूर करना चाहिए, आखिर बुराइयां तो बुराइयां ही हैं उनसे लगाव रखना सभी तरह अहितकर होता है। 

महापुरुषों की जीवन गाथाओं से पता चलता है कि उनमें जो भी कमजोरियाँ थीं उन्हें स्वयं ही नहीं देखा वरन् जन साधारण के समक्ष भी अपनी वास्तविक स्थिति को रखा, फलतः एक दिन वे पूर्ण निर्विकार एवं शुद्ध हृदय बन गये। अपनी बुराइयों को छुटाने का सरल मार्ग यह भी है कि अपने वास्तविक स्वरूप को जन साधारण के समक्ष रखना चाहिए ऊपर से कलई चमक-दमक, विज्ञापन बाजी से अपने असली रूप को छिपाना नहीं चाहिए। इससे अपनी बुराइयों को छिपाने की आदत पड़ जाती है और वे बुराइयाँ चिपकी ही रहती हैं। यदि सच्चे हृदय से अपनी बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया जाय तो एक दिन उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। सूर, तुलसी, महात्मा गाँधी आदि महापुरुषों का जीवन हमारे समक्ष है। अपनी बुराइयों को समझते हुए उन्हें दूर करने का विनम्र प्रयत्न करते रहने से उन्होंने एक दिन पूर्ण रूपेण इनसे छुटकारा पाया और शुद्ध परिष्कृत स्वरूप प्राप्त किया।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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‼️ यह सौभाग्य हर विवेकवान को मिल सकता है (भाग 2) ‼️

थोड़ी दूरदर्शिता और थोड़ी साहसिकता अपनाने पर उन तथाकथित परिस्थितियों का स्वरुप ही बदल सकता है जो लक्ष्य पथ पर चल सकने की असमर्थता विवशता बनकर सामने आती रहती है। मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसमें फंसकर छटपटाती और जिस-तिस को दोष है। किन्तु जब अपना चिन्तन उलटती है तो अपने बुने जाले के धागो को समेटती, निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बन्धन देखते-देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।

सामान्यता मनुष्य जीवन की गरिमा का समुचित उपयोग विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने में योग दान देकर इस सुअवसर को सार्थक बनाने में ही है। पेट प्रजनन तक अन्यान्य प्राणियों को सीमित रहना शोभा देता है, मनुष्य को नहीं। अन्य प्रणियों को साधन समिति मिले हैं। उनकी शरीर संरचना और बौद्धिक क्षमता इतनी ही है कि अपना निर्वाह भर चला सकें। किन्तु मनुष्य तो सृष्टा का युवराज है उसे इतना मिला है कि अपनी विशेषताओं के सहारे उसे तनिक-सा श्रम मनोयोग लगाकर चुटकी बजाते उपार्जित कर सकता है और शेष विभूतियों से आत्म-कल्याण और लाक-कल्याण जैसे उच्च उद्दयश्यों की पूर्ति कर सकता है।

अमृतवाणी:- गुरुदेव का दिव्य संदेश भक्ति नहीं, समर्पण चाहिए । पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी, https://youtu.be/SNV7PbxNCGI?si=5Yv6DHVs6v2ealjZ

इस सुअवसर को ठुकरा कर जो तृष्णा, वासना का लोभ-मोह का अनावश्यक भार संजोते और ढोते है, उनकी समझदारी को किस तरह सराहा जाये? दल-दल में घुमते जाना और उसकी सड़न से खीझते ओर जक्ड़न से चीखते जाना, किसी का लादा हुआ नहीं, स्वयं ही अपनाया हुआ दुर्भाग्य है। यह अनिवार्य नहीं, अपना ही चयन है। कोई चाहे तो स्थिति को किसी भी समय बदल भी सकता है। इसके लिए बहुत करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मात्र दृष्टिकोण उलटना और कार्यक्रम बदलना पड़ता है। इस परिवर्तन से व्यवस्था बिगड़ती नहीं, वरन् और भी अच्छी बन जाती है। किन्तु उस अदूरदर्शिता को क्या कहा जाये जो अभ्यस्त ढर्रें के रुप में सिर से पैर तक लद गई है। कोई चाहे तो उसे सहज ही उतार भी सकता है।

माया छाया की तरह है वह आगे-आगे चलती और नेतृत्व करती है। किन्तु जब प्रकाश की ओर पीठ किये रहने की प्रक्रिया बदली जाती है, दिशा को उलट दिया जाता है तो सूर्य के सम्मुख होते ही छाया पीछे दौडने लगती है। परिस्थितियों की विवशता के सम्बन्ध में ऐसा ही सोचा जाता है कि वही बाधक हो रहा है। किन्तु ऐसा है नहीं। चिन्तन प्रतिगामी ढर्रा ही बसधक है। यदि आदर्शवादी आधार अपनाकर नये ढंग से सोचना और गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण कर सकना सम्भव हो सके तो प्रती होगा कि समस्त गुत्थ्याँ सुलझ गई। ऐसा मार्ग निकल आया जिस पर चलते हुए लोक और परलोक का सुव्यवस्थित रीति से सध सकना सम्भव ही नहीं सरल भी है। इस आन्तरिक परिवर्तन के लिए गतिविधियों के अमिट निर्धारण के लिए जो साहस जुटा लेते है वे देखते हैं प्रगति पथ पर बढ चलने की कितनी सहज सुविधा उपलब्ध थी। अदूरदर्शी आदतों ने ही उस सौभाग्य से मुँह मोड़ा था जो ईश्वर ने हर किसी को जीवन लक्ष्य पूरा कर सकने के निमित उदारता पूर्वक प्रदान की है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1980 अप्रैल

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