आत्मनिरीक्षण एवं दोष दर्शन में दूसरे लोगों से भी काफी लाभ उठाया जा सकता है। उदाहरणार्थ अन्य लोगों से घृणा करने, फटकारने, विश्वास न करने, व्यक्तित्व का कुछ भी मूल्य न समझने, तरह-तरह के दोष लाँछन लगने पर नाराज एवं उत्तेजित न होकर यदि यह देखने की कोशिश की जाय कि आखिर लोग ऐसा क्यों करते हैं । कहीं वास्तव में तो इनकी जड़ें स्वयं में नहीं जमी हुई हैं। इस प्रकार दूसरे लोगों की निगाह के अनुसार अपने अन्तर को टटोलना चाहिए। इससे अपने कई दोषों का पता लग जायगा। मनुष्य के फूहड़पन से ही लोग उससे घृणा करने लगते हैं, स्वान वृत्ति होने के कारण ही फटकार मिलती है। अपनी बेईमानी एवं स्वार्थ परायणता के कारण ही दूसरे अविश्वास करते हैं । अपनी अयोग्यता एवं व्यक्तित्व के प्रति सजग नहीं रहने पर ही दूसरों द्वारा तिरस्कार मिलता है। इस प्रकार दूसरों के अपने प्रति विचार, दृष्टिकोण आदि से लाभ उठाकर भी आत्मनिरीक्षण में सफलता मिल सकती है और अपने दोष बुराइयां आदि समझ में आ जाती है। निन्दा करने वाले से स्वदोष दर्शन में आत्म निरीक्षण में काफी सहयोग मिलता है। निन्दक की उपयोगिता एवं उसे हितकारी बताते हुये रहीम जी ने ठीक ही कहा है।
“निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।
इस प्रकार नित्य आत्मनिरीक्षण का अभ्यास डाल लेने पर अपनी बुराइयां दोष अशुद्धियाँ, विकार समझ में आने लगते हैं। मनुष्य एक सुयोग्य सर्जन की भाँति आत्मनिरीक्षण रूपी सूक्ष्म दर्शक यंत्र द्वारा अपने अन्तर में छिपे हुये उन दूषित तत्वों को सरलता से देख सकता है जिनकी शिकायत अक्सर बाह्य वातावरण के सम्बन्ध में की जाती है। सूक्ष्म निरीक्षण करने पर अन्तर में आत्म प्रवंचना, आत्म क्षुद्रता, व्यग्रता, अव्यवहारिकता, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अन्धविश्वास, आलस्य, उदासीनता, फूहड़पन, कटुभाषण, मिथ्या आश्वासन देना, चाटुकारिता, हठ, दुराग्रहता, खीजना, व्यवहार का खोखलापन, अनुचित साहस, असावधानी, फैशन आदि अनेकों दोष विकार, अशुद्धियाँ नजर आयेंगी। आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी से ये दूषित तत्व अलग-2 दिखाई दें जिनसे मनुष्य का जीवन असफल हो जाता है और उसका कारण दूसरों को बताया जाता है।
जब आत्मनिरीक्षण द्वारा अपनी बुराइयां, दोष विकार समझ में आ जायँ तो उन्हें विवेक बुद्धि, आत्मबल से दूर करने के लिए ठीक उसी प्रकार प्रयत्न करना चाहिए जिस प्रकार एक शल्य चिकित्सक तटस्थ भाव से रोगी के शरीर के दूषित तत्वों को बाहर निकाल फेंकता है उनसे उसका निजी कोई सम्बन्ध नहीं होता । अक्सर कई व्यक्ति अपनी बुराइयों को जानकर भी दूर करने का प्रयत्न नहीं करते क्योंकि उनसे वे अपना मोह द्वारा सम्बन्ध बनाये रखते हैं। इसलिए तटस्थ और निष्पक्ष भाव से अपनी बुराइयों, दोषों को दूर करना चाहिए, आखिर बुराइयां तो बुराइयां ही हैं उनसे लगाव रखना सभी तरह अहितकर होता है।
महापुरुषों की जीवन गाथाओं से पता चलता है कि उनमें जो भी कमजोरियाँ थीं उन्हें स्वयं ही नहीं देखा वरन् जन साधारण के समक्ष भी अपनी वास्तविक स्थिति को रखा, फलतः एक दिन वे पूर्ण निर्विकार एवं शुद्ध हृदय बन गये। अपनी बुराइयों को छुटाने का सरल मार्ग यह भी है कि अपने वास्तविक स्वरूप को जन साधारण के समक्ष रखना चाहिए ऊपर से कलई चमक-दमक, विज्ञापन बाजी से अपने असली रूप को छिपाना नहीं चाहिए। इससे अपनी बुराइयों को छिपाने की आदत पड़ जाती है और वे बुराइयाँ चिपकी ही रहती हैं। यदि सच्चे हृदय से अपनी बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया जाय तो एक दिन उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। सूर, तुलसी, महात्मा गाँधी आदि महापुरुषों का जीवन हमारे समक्ष है। अपनी बुराइयों को समझते हुए उन्हें दूर करने का विनम्र प्रयत्न करते रहने से उन्होंने एक दिन पूर्ण रूपेण इनसे छुटकारा पाया और शुद्ध परिष्कृत स्वरूप प्राप्त किया।
.....क्रमशः जारी
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