सोमवार, 4 मई 2026

👉 संकल्प बल कैसे बढ़ाएं? ( भाग 2)

मन की शक्ति को बढ़ाकर संकल्पों को जोरदार बनाने का दूसरा साधन है चित्त की एकाग्रता। हम ऊपर इस बात को दिखला चुकें हैं कि जिन विषयों की ओर वृत्ति लगाई जाती है, उन्हीं के रूप को मानसिक देह ग्रहण कर लेती है। पातंजलि योग सूत्र में “चित्तवृत्ति के निरोध” का यही अभिप्राय है कि बाह्य सृष्टि के मनोरम प्रतिबिंबों को जो प्रतिक्षण पलटते रहते हैं रोका जावे। मानसिक देह की निरन्तर चंचल वृत्तियों को रोकना, और नियत विशेष ध्येय के आकार में उनको संलग्न अथवा स्थित करना, एकाग्रता का प्रथम अंग है। यह एकाग्रता जड़रूप (मानसिक) देह से सम्बन्ध रखती है। उसको चित्तवृत्ति के साथ इतना संयुक्त करना चाहिये कि वह हमारे अन्तर में उतर जावें। यह एकाग्रता का दूसरा अंग होता है।

एकाग्रता के अभ्यास में अपने चित्त को केवल एक ही मूर्ति (रूप) पर टिकाया जाता है। अभ्यास करने वाले (ज्ञाता) का पूरा ध्यान एक ही लक्ष्य पर बिना हल चल के दृढ़ता पूर्वक स्थिर किया जाता है। बाह्य विषयों से आकर्षित होकर चित्त को निरन्तर इधर उधर जाने और भिन्न भिन्न बातों की चिन्ता करने से रोका जाता है। इसके लिये इच्छा शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है कि वह मन के अन्यत्र भटकते ही उसे पुनः खींच कर लक्ष्य पर ले आवे।

जब चित्त एक मूर्ति को स्थिरता से धारण कर लेता है, और ज्ञाता (अभ्यास) एकाग्र भाव से उसका ध्यान करता है, तो उसको ध्येय वस्तु का इतना ज्ञान हो जाता है जितना किसी अन्य वाचिक वर्णन (बातचीत) से नहीं हो सकता। किसी चित्र या प्राकृतिक दृश्य का जितना साँगोपाँग ज्ञान उसके प्रत्यक्ष दर्शक से होता है उतना उसके वर्णन को पढ़ने अथवा सुनने से नहीं हो सकता। पर यदि हम ऐसे वर्णन पर चित्त को एकाग्र कर लें तो उसका चित्र मानसिक देह पर बन जायेगा, और तब हमको जितना लाभ होगा उतना केवल शब्दों का पाठ करने से नहीं हो सकता। शब्द तो किसी विषय के संकेत मात्र हैं और उन पर मनन करने से उनकी मूर्ति हमारे मन में उत्पन्न हो सकती है। अगर हम उस पर बराबर ध्यान लगाते रहें तो वैसे वैसे ही उसका रूप हमारे मन में अधिकाधिक स्पष्ट होता जायेगा और हम उसके विषय में कही अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेंगे।

संकल्प शक्ति का विकास करने के जो अनेक मार्ग हैं उनमें सत्संग अथवा स्वाध्याय तथा चित्त को एकाग्र बनाना मुख्य है, क्योंकि उनको मनुष्य थोड़े प्रयत्न से कहीं भी प्राप्त कर सकता है। चित्त के एकाग्र होने से प्रत्येक प्रकार के जप और भजन का फल स्पष्ट देखने में आता है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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