मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

👉 पाप से सावधान! (अंतिम भाग)

व्यभिचार के दोनों−रूप परस्त्री गमन तथा परपुरुष गमन त्याज्य हैं। सावधान! यह मन में चिन्ता, अधैर्य, अविश्वास, ग्लानि का सृष्टा महा राक्षस है। यह पाप समाज से चोरी चोरी किया जाता है अतः मन छल कपट, धूर्तता, मायाचार, प्रपञ्च आदि से भर जाता है। ये कुवासनाएँ कुछ समय लगातार मन में प्रविष्ट होने से अंतर्मन में गहरी मानसिक ग्रन्थियों की सृष्टि कर देती हैं। ऐसे व्यक्ति मौन सम्बन्धी बातों में निरन्तर दिलचस्पी, गन्दे शब्दों का प्रयोग, बात बात में गाली देना, गुह्य अंगों का पुनःपुनः स्पर्श, पराई स्त्रियों को वासनामय कुदृष्टि से देखना, मन में गन्दे विचारों—पापमयी कल्पनाओं के कारण खींचतान अस्थिरता, आकर्षण−निकर्षण आदि मनः संघर्ष निरन्तर चलते रहते हैं। यही कारण है कि विकारी पुरुष प्रायः चोर निर्लज्ज, दुस्साहसी, कायर, झूठे और ठग होते हैं, अपने व्यापार तथा व्यवहार में समय समय पर अपनी इस कुप्रवृत्ति का परिचय देते रहते हैं। लोगों के मन में उनके लिए विश्वास, प्रतिष्ठा, आदर की भावना नहीं रहती, समाज से उन्हें सच्चा सहयोग प्राप्त नहीं होता और फलस्वरूप जीवन−विकास के महत्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।

व्यभिचार की मनःस्थिति अशान्त, सलज्ज, दुःख पूर्ण होती है। उसमें द्वन्द्व चलता रहता है, अन्तःकरण कलुषित हो जाता है। मनुष्य की प्रतिष्ठा एवं विश्वस्तता स्वयं अपनी ही नजरों में कम हो जाती है प्रत्येक क्षेत्र में सच्ची मैत्री या सहयोग भावना का अभाव मिलता है। ये सब मानसिक दुःख नर्क की दारुण यातना के समान कष्टकर हैं। व्यभिचारी को निज कुकर्म का दुष्परिणाम रोग−व्याधि सामाजिक बहिष्कार के रूप से इसी जीवन में भुगतना पड़ता है।

मन में पापमय विचार रखना घातक है। आपका मन तो निर्मल शुद्ध देव मन्दिर स्वरूप होना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, चिन्ता आदि वे दुष्ट मनोभाव हैं, जो मनुष्य का प्रत्यक्ष नाश करने वाले हैं!

महर्षि जैमिनी के अनुसार जो द्विज लोभ से मोहित हो पावन ब्राह्मणत्व का परित्याग कर कुकर्म से जीविका चलाते हैं, वे नर्कगामी होते हैं।

जो नास्तिक हैं, जिन्होंने धर्म की मर्यादा भंग की है, जो काम भोग के लिए उत्कण्ठित, दाम्भिक और कृतघ्न हैं, जो ब्राह्मणों को धन देने की प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, चुगली खाते, अभिमान रखते और झूठ बोलते हैं, जिनकी बातें परस्पर विरुद्ध होती हैं, जो दूसरों का धन हड़प लेते हैं, दूसरों पर कलंक लगाने के लिए उत्सुक रहते हैं और पराई सम्पत्ति देखकर जलते हैं, वे नर्क में जाते हैं।

जो मनुष्य सदा प्राणियों के प्राण लेने में लगे रहते हैं, पराई निन्दा के प्रवृत्त होते हैं, कुँए, बगीचे, पोखर आदि को दूषित करते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं।

वाणी से कुशब्दों, गाली, अपमान जनक, कटु वचन उच्चारण करना भी पाप है। आपको चाहिए कि शरीर मन वाणी को सहज सात्विक कार्यों में लीन रखें, शुभ सोचें, शुभ उच्चारण करें।

*.....समाप्त*
📖 *अखण्ड ज्योति मार्च 1955*

👉 आचरण और व्यवहार में सत्य का प्रयोग (भाग २)

जो लोग अभी इतनी मानसिक उन्नति नहीं कर सके हैं कि दूसरों की मूर्खतापूर्ण भूलों को क्षमा कर दें, उनको कम से कम क्रोध और असत्य के बदले तुरंत वैसा ही व्यवहार करने के बजाय कुछ देर ठहर कर समस्त परिस्थिति पर शाँतचित्त से विचार करना चाहिए। ऐसा होने से वे कम से कम वैसी मूर्खता से बच जायेंगे जैसी पहला व्यक्ति कर चुका है।

दूसरों के उद्देश्य के विषय में शंका करना अच्छा कार्य नहीं है। केवल उसकी अन्तरात्मा ही उसके विचारों को जानती है। हो सकता है कि वह कुछ ऐसे उद्देश्यों से प्रेरित होकर कोई कार्य कर रहा हो जो तुम्हारे मस्तिष्क में आ ही नहीं सकते। यदि तुम किसी के विरुद्ध कोई बात सुनते हो, तो तुम इसको दोहराओ मत। संभव है वह सत्य न हो और यदि हो भी, तो उसके विषय में मौन रहना ही अधिक दयालुता होगी।

बोलने से पहले सोच लो अन्याय असत्य भाषण से दोष-भागी बनोगे। कार्यों में भी सत्य का पालन करो, अपना मिथ्या प्रदर्शन मत करो, क्योंकि प्रत्येक दल सत्य के उस स्वच्छ प्रकाश में बाधा है जिसे तुम्हारे द्वारा उसी प्रकार प्रकाशित होना चाहिये जैसे सिर्फ शीशे के द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रकाशित होता है।

अहंकार नाश ही करता है | Ahankar Nash Hi Karta Hai | Dr Chinmay Pandya, https://youtu.be/vSKChpugH14?si=M9jnwKP58NH40az5

आचरण और व्यवहार में सत्य का पालन वास्तव में कठिन है, इसका अर्थ यह है कि दूसरों के सामने कोई कार्य इस उद्देश्य से न करना चाहिए कि उसके मन में हमारे लिये उच्च-धारणा बैठ जाये। साथ ही जिस कार्य के करने में दूसरों के सामने लज्जित ना होना पड़े ऐसा कार्य छुपकर भी नहीं करना चाहिए। लोगों को आप अपना सच्चा स्वरूप देखने दीजिये और जो कुछ आप नहीं हैं वैसा बनने का ढोंग मत कीजिये। बहुत लोगों का ऐसा उद्देश्य रहता है कि हमारे प्रति दूसरों की धारणा हमारी रुचि के अनुकूल ही होनी चाहिये। फलतः ऐसी अनेक प्रकार की छोटी बातें होती हैं, जिन्हें हम एकान्त में तो कर लें, परन्तु दूसरों के सामने नहीं करेंगे, क्योंकि हम सोचते हैं कि लोग हम से ऐसी बातों के करने की आशा नहीं करते।

यह बात सत्य है कि हमें कभी अपना झूठा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रत्येक प्रकार का झूठा प्रदर्शन पतनकारी होता है। परन्तु यह भी ध्यान रखिये कि उस झूठे प्रदर्शन को टालने के लिये कहीं आप उसकी प्रतिकूल पराकाष्ठा तक न पहुँच जायें लोग कभी-कभी ऐसा कहते हैं कि “मैं तो अपने प्राकृतिक रूप में ही लोगों के सामने अपने को प्रकट करना चाहता हूँ।” और ऐसा कहकर वे अपना अत्यन्त निकृष्ट, अशिष्ट और असभ्य रूप लोगों को दिखलाना आरम्भ करते हैं। किन्तु ऐसा करके वे अपना प्राकृतिक स्वरूप जैसा होना चाहिये वह नहीं दिखलाते, वरन् इसके विपरीत अपने हीन, तुच्छ और निकृष्ट रूप का प्रदर्शन करते हैं। क्योंकि मनुष्य में जो कुछ उच्चतम, सर्वोत्तम एवं सर्वश्रेष्ठ गुण हैं, वे ही आत्मा से निकट सम्बन्ध रखते हैं, अतः अपने-आत्मा के प्राकृतिक स्वरूप को प्रकट करने के लिये हमें यथाशक्ति सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

*धार्मिक पाखण्ड भी असत्य का ही एक रूप है। यदि कोई मनुष्य अपने आपको आध्यात्मज्ञानी प्रकट करता है, साथ ही अपनी उन्नति एवं सिद्धियों का वर्णन करके पाखंडी लोगों की तरह भोले-भाले व्यक्ति यों की प्रशंसा प्राप्त करने का यत्न करता है तो यह समझ लेना चाहिए कि वह सत्य का वास्तविक अनुयायी नहीं है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जून 1957

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👉 पाप से सावधान! (भाग 3)

आपका जीवन सदा सबके लिए हितकारी हो, सेवा करें, आस पास के सब व्यक्ति आपसे प्रेरणा और बल प्राप्त करें, आप मृदु वचनों का उच्चारण करें, तो आपके लिए सुखदायिनी मुक्ति दूर नहीं है।

चोरी करना कायिक पाप है। चोरी का अर्थ भी बड़ा व्यापक है। किसी के माल को हड़पना, डकैती रिश्वत, आदि तो स्थूल रूप में चोरी हैं ही, पूरा पैसा पाकर अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से न करना, भी चोरी का ही एक रूप है। किसी को धन, सहायता या वस्तु देने का आश्वासन देकर, बाद में सहायता प्रदान न करना भी चोरी का एक रूप है। फलतः अनिष्टकारी एवं त्याज्य है।

व्यभिचार मानवता का सबसे घिनौना निकृष्टतम कायिक पाप है। जो व्यक्ति व्यभिचार जैसे निंद्य पाप−पंक में डूबते हैं, वे मानवता के लिए कलंक स्वरूप हैं। आये दिन समाज में इस पाप की शर्माने वाली गन्दी कहानियाँ और दुर्घटनाएँ सुनने में आती रहती हैं। यह ऐसा पाप है, जिसमें प्रवृत्त होने से हमारी आत्मा को महान दुःख होता है। मनुष्य आत्म ग्लानि का रोगी बन जाता है, जिससे आत्म हत्या तक की दुष्प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। पारिवारिक साँख्य, बाल बच्चों, पत्नी का पवित्र प्रेम, समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अन्धकार मन वाणी और शरीर पर छा जाता है।

Gayatri Mantra Rules | गायत्री मंत्र जप के आवश्यक नियम शर्तें व अनुशासन | https://youtu.be/xx0vKHJGVOo?si=qT-brDFCt_gUsMIG

शरीर में होने वाले व्यभिचार जनित रोगों की संख्या सर्वाधिक है। अप्राकृतिक तथा अति वीर्यपात सू मूत्र नलिका सम्बन्धी गुप्त रोग उत्पन्न होते हैं, जिन्हें न डाक्टर ठीक कर सकता है, न रुपया पैसा इत्यादि ही सहायक हो सकता है। वेश्यागमन के पास से मानव−शरीर अशक्त हो जाता है और स्थायी रूप से निर्बलता, सिरदर्द, बदहजमी, रीढ़ का दुखना मिर्गी, नेत्रों की कमजोरी, हृदय की धड़कन, बहुमूत्र पक्षाघात, प्रमेह, नपुंसकता, क्षय और पागलपन आदि शारीरिक रोग उत्पन्न होकर जीवितावस्था में ही नर्क के दर्शन करा देते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 April 2026


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👉 पाप से सावधान! (अंतिम भाग)

व्यभिचार के दोनों−रूप परस्त्री गमन तथा परपुरुष गमन त्याज्य हैं। सावधान! यह मन में चिन्ता, अधैर्य, अविश्वास, ग्लानि का सृष्टा महा राक्षस है। ...