व्यभिचार के दोनों−रूप परस्त्री गमन तथा परपुरुष गमन त्याज्य हैं। सावधान! यह मन में चिन्ता, अधैर्य, अविश्वास, ग्लानि का सृष्टा महा राक्षस है। यह पाप समाज से चोरी चोरी किया जाता है अतः मन छल कपट, धूर्तता, मायाचार, प्रपञ्च आदि से भर जाता है। ये कुवासनाएँ कुछ समय लगातार मन में प्रविष्ट होने से अंतर्मन में गहरी मानसिक ग्रन्थियों की सृष्टि कर देती हैं। ऐसे व्यक्ति मौन सम्बन्धी बातों में निरन्तर दिलचस्पी, गन्दे शब्दों का प्रयोग, बात बात में गाली देना, गुह्य अंगों का पुनःपुनः स्पर्श, पराई स्त्रियों को वासनामय कुदृष्टि से देखना, मन में गन्दे विचारों—पापमयी कल्पनाओं के कारण खींचतान अस्थिरता, आकर्षण−निकर्षण आदि मनः संघर्ष निरन्तर चलते रहते हैं। यही कारण है कि विकारी पुरुष प्रायः चोर निर्लज्ज, दुस्साहसी, कायर, झूठे और ठग होते हैं, अपने व्यापार तथा व्यवहार में समय समय पर अपनी इस कुप्रवृत्ति का परिचय देते रहते हैं। लोगों के मन में उनके लिए विश्वास, प्रतिष्ठा, आदर की भावना नहीं रहती, समाज से उन्हें सच्चा सहयोग प्राप्त नहीं होता और फलस्वरूप जीवन−विकास के महत्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।
व्यभिचार की मनःस्थिति अशान्त, सलज्ज, दुःख पूर्ण होती है। उसमें द्वन्द्व चलता रहता है, अन्तःकरण कलुषित हो जाता है। मनुष्य की प्रतिष्ठा एवं विश्वस्तता स्वयं अपनी ही नजरों में कम हो जाती है प्रत्येक क्षेत्र में सच्ची मैत्री या सहयोग भावना का अभाव मिलता है। ये सब मानसिक दुःख नर्क की दारुण यातना के समान कष्टकर हैं। व्यभिचारी को निज कुकर्म का दुष्परिणाम रोग−व्याधि सामाजिक बहिष्कार के रूप से इसी जीवन में भुगतना पड़ता है।
मन में पापमय विचार रखना घातक है। आपका मन तो निर्मल शुद्ध देव मन्दिर स्वरूप होना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, चिन्ता आदि वे दुष्ट मनोभाव हैं, जो मनुष्य का प्रत्यक्ष नाश करने वाले हैं!
महर्षि जैमिनी के अनुसार जो द्विज लोभ से मोहित हो पावन ब्राह्मणत्व का परित्याग कर कुकर्म से जीविका चलाते हैं, वे नर्कगामी होते हैं।
जो नास्तिक हैं, जिन्होंने धर्म की मर्यादा भंग की है, जो काम भोग के लिए उत्कण्ठित, दाम्भिक और कृतघ्न हैं, जो ब्राह्मणों को धन देने की प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, चुगली खाते, अभिमान रखते और झूठ बोलते हैं, जिनकी बातें परस्पर विरुद्ध होती हैं, जो दूसरों का धन हड़प लेते हैं, दूसरों पर कलंक लगाने के लिए उत्सुक रहते हैं और पराई सम्पत्ति देखकर जलते हैं, वे नर्क में जाते हैं।
जो मनुष्य सदा प्राणियों के प्राण लेने में लगे रहते हैं, पराई निन्दा के प्रवृत्त होते हैं, कुँए, बगीचे, पोखर आदि को दूषित करते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं।
वाणी से कुशब्दों, गाली, अपमान जनक, कटु वचन उच्चारण करना भी पाप है। आपको चाहिए कि शरीर मन वाणी को सहज सात्विक कार्यों में लीन रखें, शुभ सोचें, शुभ उच्चारण करें।
*.....समाप्त*
📖 *अखण्ड ज्योति मार्च 1955*


