प्रगति और उन्नति का उत्साह मन में उत्पन्न होता है। बुद्धि उसकी योजना बनाती है और शरीर उसकी कार्यान्वित करता हैं जिसका मन और मस्तिष्क चिन्ता से तप रहा हो, शारीरिक स्वास्थ्य उसकी आग में आहुति वन रहा हो, ऐसे व्यक्ति के हृदय में उत्साह का जन्म होना असम्भव है। बुद्धि का कुण्ठित तथा कलुषित हो जाना स्वाभाविक है। और अस्वस्थ शरीर तो किसी योग्य रह ही नहीं सकता। इस प्रकार जिस मनुष्य की यह तीनों शक्तियों बेकार हो जाएँ, उसे प्रगति और उन्नति के शब्द अपने शब्द-कोष से निकाल ही देने चाहिये।
असन्तोष भी एक प्रकार की मानसिक व्याधि ही होती हैं। यह मनुष्य की सुख-शान्ति की हरण कर लेता है। संतोषी सदा सुखी-की तरह करना होगा-असन्तोषी सदा दुःखी’। यह गलत भी नहीं है। असन्तोष का जन्म अभाव से बतलाया गया है। जिसके पास काम न हो, भोजन-वस्त्र का अभाव हो, जीवन यापन के सामान्य साधनों की कमी हो। उसे असन्तोष होना स्वाभाविक है। किन्तु यह असन्तोष वह असन्तोष नहीं होता, जिसको मानसिक व्याधि कहकर निन्दा की जाती है। इस प्रकार का अभाव जन्य असन्तोष वास्तव में असन्तोष न होकर आवश्यक का दबाव होता है। यह बुरा नहीं। यदि आवश्यकताओं का दबाव अकारण सह लेने का अभ्यास बना लिया जाये तो मनुष्य सामान्य स्थिति से भी नीचे गिरकर दीन और दरिद्री ही बन जाए। कहीं से कुछ मिल गया खा लिया, नहीं तो भूखे पड़े तरह रहे हैं। कपड़ों के स्थान पर चीथड़ों को ही लपेटे है। इस प्रकार की विवशतापूर्वक जीवन मनुष्य के योग्य नहीं। वह तो बुद्धि एवं पुरुषार्थ से वंचित पशुओं का जीवन हैं। आवश्यकतायें मनुष्य को पुरुषार्थ एवं परिश्रम को प्रेरणा देती हैं। उनकी माँग का उचित उत्तर दिया ही जाना चाहिये।
मानसिक व्याधि वाला असंतोष दूसरी चीज है। उसका जन्म अभाव अथवा आवश्यकता से नहीं, बल्कि लोभ और तृष्णा से होता हैं यह एक असात्विक स्वभाव और आसुरी वृत्ति होती है। जो अकारण ही यातना दिया करती है। इस वृत्ति का व्यक्ति सब कुछ होने पर भी उसके सुख से वंचित ही रहता है। असंतोष की पीड़ा उसे घेरे ही रहती है। लोभ के कारण असंतोषी व्यक्ति सम्पत्ति एवं सम्पन्नता की दशा में भी अपने को अभावग्रस्त अनुभव किया करता है। लक्ष्मी का भंडार, पृथ्वी की वसुधा और कुबेर का कोष क्यों न दे दिया जाए। किन्तु असंतोष का रोगी तब भी संतुष्ट न होगा। तब भी उसे अभाव और आवश्यकता अनुभव होती रहेगी। ऐसा वितृष्णा व्यक्ति सम्पन्नता में भी विपन्नता का दुःख भोगने पर मजबूर रहता है।
उद्वेग एक तरह का पागलपन होता है। उत्तेजना, आवेग और आवेश आदि के सारे उन्माद इसी के अंतर्गत आते है। उद्वेग दूषित व्यक्ति अकारण ही आने भीतर तना-तना-सा रहता है। वह किसी बात अथवा काम के विषय में पहले तो मौन रहता है, किन्तु जब खुलता है तो विस्फोट की तरह। इससे उसकी बात अथवा काम बिगड़ जाती है। उद्वेग मानसिक न्यूनता का लक्षण है। जो अन्दर से गम्भीर और सम्पन्न होते है। वे सब कुछ शाँति पूर्वक सोचते और सरलतापूर्वक करते है, इसलिये उनके सारे काम बनते चले जाते है, किसी अभाव अथवा आवश्यकता से दुःखी होकर उद्वेग व्यक्ति या तो अपने आप पर खीजते रहते है अथवा दूसरों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लड़ते-झगड़ते रहते है। जिस काम में हाथ डालते है, उसको सुचारु रूप से करने के बजाय उससे झगड़ते से रहते है। जो काम करेंगे बेगार की तरह। उनका चंचल तथा क्षुब्ध मन काम में तन्मयता आने ही नहीं देता। किन्हीं अभावों अथवा कमियों को दूर करने की उत्सुकता में उद्वेग का प्रयोग करने से अपकृत्यता के सिवाय कृतकृत्वता प्राप्त नहीं होती।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969
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