रविवार, 2 अगस्त 2026

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य की। महात्मा ने कहा- राज्य  आत्मा से बड़ा नहीं हो सकता। उनने राजा से पूछा-यदि तुम रेगिस्तान में घिर जाओ और प्यास से प्राण निकलें और उस समय कोई पानी के बदले आधा राज्य माँगें तो दोगे या नहीं ? राजा ने कहा-दूँगा फिर महात्मा ने पूछा-यदि तुम बीमार हो जाओ और रोग इतना बढ़े कि बचने की कोई आशा न रहे ऐसी दशा में यदि कोई वैध शर्त के साथ इलाज करे और अच्छा करने की कीमत आधा राज्य माँगे तो दोगे या नहीं ? राजा ने कहा-दूँगा

महात्मा जी खिलखिला कर हँस पड़े उनने कहा-जो राज्य एक लोटा पानी और एक शीशी दवा के बदले दिया जा सकता है उसका महत्व आत्मा से बढ़ कर किस प्रकार हो सकता है? जिस जीवन की रक्षा के लिए जब मनुष्य बड़े से बड़ा काम कर सकता है तो उस जीवन के उत्कर्ष के लिए तो उसे राजपाट से भी बड़ी चीज का त्याग करने को उद्धत होना चाहिए।

📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1961

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👉 सामयिक चेतावनी (भाग 1)

हमारा जीवन आत्मा के लिए या शरीर के लिए-इन दोनों बातों में से किसको प्रधानता देती इसका निर्माण हमें अब कर ही लेना चाहिए। सुर दुर्लभ मानव जीवन का अमूल्य अवसर एक-एक दिन करके यों ही बीतता जा रहा है और मृत्यु की बड़ी तेजी के साथ निकट दौड़ती चली आ रही हैं। कभी समय हैं कि हम कुछ सोच सकते हैं और कुछ कर सकते हैं। समय जीतने जाने पर एक दिन पैसा या जाएगा कि न कुछ सोचना बन पड़ेगा और न कुछ करना। तब केवल पश्चाताप ही हाथ पड़ेगा और न कुछ करना। तब केवल पश्चाताप ही हाथ रहेगा और बातों करोड़ों वर्ष का चौरासी लाख भ्रमण का अन्धकारमय भविष्य ही सामने उपस्थित होगा।

आज की सामयिक चेतावनी यही हैं कि हम समुचित रहते आगे और जो अवसर बाकी हैं उसका सदुपयोग कर लें। हो सकता हैं कि आज हम इन बातों का महत्व न समझें, उपेक्षा और उपहास के साथ उन्हें व्यर्थ मानें। पर यह आज की लापरवाही एक दिन हमें बहुत दुःख देगी। कीट पतंगों की तरह पेट पालने और बच्चे पैदा करने की तुच्छ प्रकृति को पूरा करते रहने के लिए यह मनुष्य शरीर नहीं मिला हैं, इसका उद्देश्य कुछ ऊँचा होगा, उस ऊँचाई को प्राप्त करने की बात यदि हमारी समझ में नहीं आती तो एक दिन यही ना-समझी हमारे लिए आत्महत्या जैसी दुःखदायक सिद्ध होगी। बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी बात यही हो सकती हैं कि हम जीवन लक्ष को समझें और उसे पूरा करने का प्रयत्न करें।

शरीर को सर्वस्व मानने वालों को आत्मा की अपेक्षा करनी पड़ती है? क्योंकि भौतिक जीवन में प्रत्यक्षवाद का आकर्षण बहुत हैं। आत्मिक लाभ समय बाध्य हैं। बालबुद्धि में प्रतीक्षा के लिए गुँजाइश नहीं रहती, बच्चों को धैर्य कहाँ होता हैं। वे आम की गुठली बोते है और क्षण भर बाद उसमें से पौधा उगने की आशा में उलट पलट करते हैं। दो चार घंटे बीत जाने पर भी जब उनके सपने का आम्र वृक्ष नहीं उगता तो वे निराश हो जाते हैं और गुठली को उखाड़ कर फेंक देते हैं। यदि यही दृष्टिकोण आत्मिक जीवन के बारे में भी रहा तो मनुष्य भौतिक लाभों को ही सब कुछ मान लेता हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष हैं। इन्द्रिय सुखों की वासना और धन, सत्ता एवं वैभव की तृष्णा की पूर्ति के लिए किये प्रयत्नों का फल इतना आकर्षण होता हैं कि वह छोड़ते नहीं बनता ।इस आकर्षण के मिठास में चाशनी चाटने वाली मक्खी की तरह जीव के पंख ऐसे चिपक जाते हैं कि फड़फड़ा ने पर भी उससे छुटकारे का कोई मार्ग नहीं मिलता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1961

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