“लक्ष्मी उद्योगी पुरुष सिंहों को प्राप्त होती है”- वह केवल सूक्ति नहीं, बल्कि एक सिद्धान्त है। ऐसा सिद्धान्त जो युग-युग के अनुभव के बाद स्थिर किया गया है। उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एक मात्र आधार उद्योग अथवा पुरुषार्थ नहीं करेगा, परिश्रम में अपना पसीना नहीं बहाएगा तब तक किसी प्रकार के श्रेय का अधिकारी नहीं बन सका। लक्ष्मी श्रम और उद्योग की ही अनुगामिनी होती है।
कहा जाता है कि लक्ष्मी, श्रेय, सफलता और सम्पन्नता आदि उपलब्धियाँ भगवान् की कृपा से ही मिलती है। ऐसी मान्यता आस्तिकता की द्योतक है, अच्छी है। इस धारणा को बनाकर चलने में कोई हानि नहीं। किन्तु इसका रहस्य समझ लेना भी आवश्यक है।
संसार में चारों ओर जो सुख-सम्पन्नता के साधन और कारण बिखरे पड़े हैं, वह सब एकमात्र उस परमात्मा की ही कृपा है। सुख-दुःख और साधन सुविधा भी उसकी रचना के उसी प्रकार अंग है, जिस प्रकार मनुष्य स्वयं। किसी को मिलने वाली सम्पत्ति उसे तभी ही मिल सकती है, जब उसमें मूल स्वामी की सहमति तथा स्वीकृति सम्मिलित हो इस प्रकार निश्चय ही संसार के सुख-साधन और सम्पत्ति सम्पन्नता परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती है।
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किन्तु, इस विश्वास के साथ वह न भूल जाना चाहिये कि उसकी कृपा यों ही अनायास मिल जाती है। अथवा वह मनमौजी परमात्मा योंही बैठा-बैठा जिसे चाहता है सम्पन्नता अथवा सफलता वितरित करता रहता है और किसी को असफलता एवं विपन्नता, ऐसा नहीं है। उसके विधान में एक नियम और न्यायशीलता रहती है। वह किसी पर न तो अनायास नर अकारण कृपा करता है। और न कोप। सफलता और सम्पन्नता के लिये उस न्यायपरायणता की कृपा अर्जित करनी पड़ती है। जो व्यक्ति नियमपूर्वक उसकी पूजा नियमपूर्वक उसकी कृपा अर्जित कर लेते हैं, संसार में सब कुछ पा जाते हैं और जो इस विषय में प्रभारी अथवा अन्ध-विश्वासी बने रहते हैं, उन्हें खाली हाथ ही रहना पड़ता है।
सम्पन्नता के सम्बन्ध में परमात्मा की कृपा पाने का केवल एक ही आधार है और वह है पुरुषार्थ अथवा परिश्रम। जो व्यक्ति प्रमाद त्याग कर उद्योग परिश्रम अथवा पुरुषार्थ करते हैं, उन पर परमात्मा कृपा करता ही नहीं उसे करनी पड़ती है। वह अपने इस नियम को इस विषय में भंग करने के लिये सक्षम नहीं है। यह अक्षमता उसकी असमानता नहीं, महिमा है। जो व्यक्ति अपने बनाये नियमों के प्रति जितना भीरु और भावुक रहता है, वह उतना ही दृढ़ और महान माना जाता है। उसी व्यक्ति के बनाये विधान का मान तथा पालन होता है।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969
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