शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७३)

जहाँ भक्ति है, वहाँ भगवान हैं

देवर्षि के सूत्र सत्य में अपने शब्दप्रसूनों को पिरोते हुए ब्रह्मर्षि वसिष्ठ बोले- ‘‘सचमुच ही राजपरितोष तो राजा के सानिध्य में रहकर ही जाना जा सकता है। यह तब और भी सुखकर एवं प्रीतिकर होता है, जब राजा हमारे वत्स अम्बरीश की भाँति, तपस्वी, ब्राह्मणों एवं साधुओं को साक्षात साकार नारायण के रूप में पूज्य मानता हो। और रही बात भोजन की तो इसका स्वाद एवं सुख, चर्चा-चिन्तन में नहीं, इसे ग्रहण करने में है।’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का यह कथन कुछ इतना मधुर व लयपूर्ण था कि उनकी शब्दावली, एक नवीन दृश्यावली को साकार कर रही थी। एकबारगी सभी के अन्तर्भावों में भुवनमोहिनी अयोध्या, सरयू का तट, उस पावन नदी का नीर, उसमें मचलती लहरें और उन लहरों में अठखेलियाँ करती सूर्य रश्मियाँ और अवधवासियों पर, समस्त भक्तों और सन्तों पर अपनी स्वर्णिम कृपा बरसाते सूर्यदेव प्रकट हो उठे थे।

ये बड़े ही गहन समाधि के क्षण-पल थे। इन क्षणों में, इन पलों में हिमवान के आंगन में बैठे हुए सभी ने अयोध्या का सुखद अतीत निहारा। उन्होंने देखा कि राजर्षि अम्बरीश किस तरह तपोधन महर्षि विद्रुम एवं उनके शिष्य शील व सुभूति का सत्कार-सम्मान कर रहे हैं। किस तरह वह उन्हें बार-बार आग्रहपूर्वक भोजन ग्रहण करा रहे हैं। सबने यह भी देखा कि राजपरितोष एवं क्षुधाशान्ति के ये सुखद पल सरयू के तीर पर ही समाप्त न हुए बल्कि महाराज उन्हें आग्रहपूर्वक राजभवन में ले गए। भव्य राजप्रासाद में महारानी सहित सभी राजसेवकों व राजसेविकाओं ने इनका सम्मोहक सम्मान किया। आरती के थाल सजे, वन्दनवार टंगे, मंगलगीतों का गायन हुआ। इतने पर भी महाराज ने विराम न लिया, वह इन्हें आग्रहपूर्वक राजसभा में ले गए। जहाँ स्वागत-सम्मान के इस समारोह ने अपना चरम देखा।

राजर्षि अम्बरीश की भावनाओं में भीगे ऋषि विद्रुम इसे तितीक्षा के रूप में सहन करते रहे। परन्तु एक पल ऐसा भी आया जब उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की ओर सांकेतिक दृष्टि से देखा। अन्तर्ज्ञानी ब्रह्मर्षि परम तपस्वी का संकेत समझ गए। उन्होंने अम्बरीश को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘पुत्र! अब ऋषिश्रेष्ठ को तपोवन जाने की अनुमति दो क्योंकि ऋषिवर इस समय तुम्हारे भावों के वश में हैं। इसी वजह से वह तुम्हारे प्रत्येक आग्रह एवं अनुरोध को स्वीकार करते जा रहे हैं। परन्तु यह उनकी और उनके शिष्यों की प्रकृति के विपरीत है। उनकी प्रकृति के लिए तो तपोवन की कठोरता व दुष्कर-दुधर्ष साधनाएँ ही सहज हैं। इसलिए उन्हें अब तपोवन जाने दो वत्स!’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ महाराज अम्बरीश के  लिए ही नहीं बल्कि उनके समस्त कुल के आराध्य थे। उनका प्रत्येक वचन उन्हें सर्वथा शिरोधार्य था। इसलिए उन्होंने भीगे नयनों से, विगलित मन से ऋषि विद्रुम व शील एवं सुभूति को विदा दी। अतीत के इस अनूठे दृश्य को सभी ने अपने अन्तर्भावों में निहारा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३५

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