गुरुवार, 29 मार्च 2018

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (अन्तिम भाग)

🔷 भावी जीवन की आपकी रूपरेखा क्या हो, आप केवल अपने ही लिए ही नहीं जिएँ, उसमें समाज की भी हिस्सेदारी है, लोगों की भी हिस्सेदारी है, भगवान की भी हिस्सेदारी है, आदर्शों की भी हिस्सेदारी है, धर्म और संस्कृति की भी हिस्सेदारी है—उस हिस्सेदारी को आप कैसे निभा पायेंगे? उसके बारे में शिक्षण, आपका सायंकाल का शिक्षण इस उद्देश्य के लिए है, आप इस उद्देश्य को समझिये। आप घटना को देखेंगे और यहाँ के क्रम को देखेंगे, तो ऊपर ही दृष्टि रह जाएगी। दृष्टि को भीतर ले जाइए, दर्शन समझिये यहाँ के कल्प का और यह मानकर चलिए कि यहाँ कल्प का मतलब है—बदल डालना।

🔶 अब आपको यहाँ से बदलते हुए जाना है। घर जाकर आपको अपना बदला हुआ रूप दिखाना है। घर जाकर के आपके भावी जीवन में आपका क्रिया-कलाप और आपका उपक्रम ऐसा होना चाहिए, जिसमें पिछले जीवन से कोई संगति न हो। आप एक, आपका ईमान दो, आपका भगवान तीन, तीन तो आप ही के हैं सहपाठी। इन तीनों के साथ में तो आप सारे जीवन की मंजिल पूरी कर सकते हैं। जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों के बहकावे में आएँ? जरूरी क्या है कि आप दूसरों को प्रसन्न करने की कोशिश करें? अपने ईमान को प्रसन्न कर लीजिए, बहुत है—भगवान को प्रसन्न कर लीजिए बहुत है।

🔷 आत्मा और परमात्मा को जो आदमी प्रसन्न कर सकते हैं, सारी दुनिया उनसे प्रसन्न रहती है अथवा चलिए यह मान लें—सारी दुनिया प्रसन्न न भी है, नाराज बनी है, तो उस नाराजगी से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। आपकी आत्मा नाराज हो, आपका परमात्मा नाराज और सारी दुनिया आपसे प्रसन्न बनी रहे और आरती उतारती रहे, तो उससे कुछ बनने वाला भी नहीं है। यही चिन्तन है, जो आपको एक महीने लगातार अपने मनःक्षेत्र में घुमाते रहना चाहिए। मन को बदलिए, सोचने के तरीके बदलिए, जीवन की कार्य-पद्धति बदलिये। बहुत कुछ बदलना है आपको। अगर बदल डालेंगे, तो मजा आ जाएगा! बस, आज तो मुझे इतना ही कहना था आपसे।

॥ॐ शान्ति:॥

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

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