शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 4)

🔶 कहा जाता है कि शरीर बल, सूझ-बूझ, साधन और सहयोग से कठिनाइयों का हल निकलता है और प्रगति का द्वार खुलता है। यह कथन जितना सही है उससे भी अधिक सही यह है कि मनोबल बाजी जीतता है। वही सबसे बड़ा बल है। शरीर से दुर्बल और साधनों की दृष्टि से अभावग्रस्त होते हुए भी कितने ही व्यक्ति महत्त्वपूर्ण सफलतायें प्राप्त कर सकने में समर्थ हुए हैं। इसमें उनके मनोबल ने ही प्रमुख भूमिका निभाई है। मनोबल को बढ़ाने और अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक है कि सदा आशा भरे सपने देखे जायें। रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर वर्तमान परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का, ऊँचा उठने का ढाँचा खड़ा किया जा सकता है और उस उत्साह भरे पराक्रम के सहारे सफलता के स्तर तक पहुँचा जा सकता है।

🔷 कल क्या होने जा रहा है यह किसी को भी विदित नहीं है। न वैसा कुछ नियति निर्धारण है। मनुष्य स्वयं ही किसी रास्ते का चयन करते हैं, अपने ही पैरों चलते हैं और अपनाये गये मनोरथ के अनुरूप किसी लक्ष्य तक पहुँचते हैं। कौन किस स्तर का चयन करे? किसके पैर किस राह पर चलें, यह उसका अपना फैसला है। दूसरे तो हर बुरे-भले काम में साथ देते और रोक-टोक करते देखे गये हैं। उनमें से किन्हें महत्त्व दिया जाय, किन्हें न दिया जाय, यह फैसला अपना ही होता है।

🔶 यह सोचना व्यर्थ है कि परिस्थितियों या सम्बन्धियों ने उन्हें दबाया और ऐसा करने को विवश किया जैसा कि मन नहीं था। यह बात मात्र दुर्बल मनोबल वालों पर ही लागू होती है। मनस्वी जानते हैं कि कोई किसी को बाधित नहीं कर सकता। मनुष्य की संरचना इतनी दुर्बल नहीं है कि उस पर दूसरों के फैसले लद सकें और अपरिहार्य बन सकें। एक समय की भूल दूसरे समय सुधर भी सकती है। आज की सहमति को कल की असहमति में भी बदला जा सकता है। परिवर्तन काल की उथल-पुथल में कुछ अड़चन असुविधा तो होती है, पर नया रास्ता बन जाने की भी संगति मुड़-तुड़ कर बैठ ही जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

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