मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

👉 अपना स्वर्ग, स्वयं बनायें (भाग 2)

🔶 स्वर्ग संसार से अलग बसा हुआ कोई देश अथवा स्थल नहीं है। जहां संसार समर जीतने वाले लोग जाकर रहते हैं। वास्तव में स्वर्ग मानव-जीवन की एक स्थिति है, जो इसी भूमि और इसी जीवन में पाई जा सकती है। जो इसी जीवन में उस स्थिति को नहीं पा सकता, वह लोकान्तर में, यदि कोई है भी, तो उस स्वर्ग को पा सकता है, यह सर्वथा संदिग्ध है। इस जीवन में भूमि का स्वर्ग पाने वाले ही उस स्वर्ग को पा सकने के अधिकारी हो सकते हैं। यदि वह स्वर्ग प्राप्ति है तो उनकी पात्रता इसी भूमि और इसी जीवन में उपार्जित करनी होती है।
     
🔷 स्वर्ग क्या है? स्वर्ग वह स्थिति है, जिसमें मनुष्य के आस-पास आनन्ददायक प्रियता ही प्रियता बनी रहे। संसार के सारे धर्म साहित्य में स्वर्ग का वर्णन आता है। उसके सम्बन्ध में न जाने कितनी कथायें पढ़ने को मिलती हैं। लोगों का स्वर्ग के लिये लालायित रहना, उसको पाने के लिये पुण्य तथा पुरुषार्थ का उपक्रम करना, परमार्थ तथा अध्यात्म का अनुसरण करना आदि पढ़ने को मिलता है। किसी धर्म अथवा मत सम्प्रदाय में स्वर्ग के स्वरूप और उसकी विशेषताओं के विषय में कोई भी मान्यता अथवा धारणा क्यों न रही हो, लेकिन उस सबका सार यही है कि वहां सब कुछ प्रिय तथा आनन्ददायक ही है।

🔶 वहां पर ऐसे कारण नहीं हैं, जिनसे मनुष्य को कष्ट, क्लेश अथवा दुःख प्राप्त हो। ऐसा स्वर्ग जिसकी विशेषता आनन्द तथा प्रियता है, मनुष्य स्वयं अपने लिये इस पृथ्वी और इस जीवन में जी रच सकते हैं। अपने अन्दर तथा बाहर की परिस्थितियां इस प्रकार से निर्मित करली जायं, जिससे न तो प्रतिकूलता का जन्म हो और न दुःख अथवा शोक-संताप का। वरन् इसके विपरीत प्रियता तथा आनन्द की अवस्थायें बनी रहें। यह मनुष्य के अपने वश की बात है। वह इस प्रकार का वांछित स्वर्ग अपने लिये यहीं पर बना सकता है और निश्चित रूप से बना सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1968 पृष्ठ 7
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/December/v1.7

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति भाग ३

👉 *जीवन का लक्ष्य भी निर्धारित करें * 🔹 जीवन-यापन और जीवन-लक्ष्य दो भिन्न बातें हैं। प्रायः सामान्य लोगों का लक्ष्य जीवन यापन ही रहता है। ...