बुधवार, 6 दिसंबर 2017

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 4)

🔶 एक-दूसरे का सहयोग करने की वृत्तियाँ हर एक के मन में बसी हुई थीं। अपने आप स्वयं कष्ट उठा लेना और दूसरे की सेवा करना हर आदमी के सामने लक्ष्य था। यही कारण था कि आदमी थोड़ी-सी वस्तुओं में, साधारण वस्तुओं में भी सुखी रहते थे और दुनिया में जगद्गुरु कहलाते थे, चक्रवर्ती शासन व्यवस्था को सँभालते थे। यहाँ सुख-सम्पदाओं के थोड़े-से किफायतसारी मितव्ययता के आधार जो कुछ भी सम्पदा थी, उसी के इस्तेमाल करने और कुछ बचत करने का था। यहाँ हर घर में सोना-चाँदी था, हर घर में लक्ष्मी का निवास था, क्योंकि आदमियों ने मितव्ययता से उपयोग किया हुआ था।
                
🔷 अपव्ययता का दौर जो आजकल चारों ओर फैला हुआ है, उस जमाने में नहीं था। उस जमाने की परिस्थितियाँ और आज की परिस्थितियों में हम जब तुलनात्मक दृष्टियों से देखते हैं तो पाते हैं कि जो सम्पन्नता आज हमारे पास ज्यादा है, शिक्षा हमारे पास ज्यादा है, विज्ञान के साधन हमारे पास ज्यादा हैं, चिकित्सा के माध्यम हमारे पास ज्यादा है, असंख्य माध्यम और साधन ज्यादा हैं, फिर भी हम असन्तुष्ट होकर कहीं अधिक दुःखी, कहीं अधिक दीन, कहीं अधिक उलझे हुए, कहीं अधिक व्याधियों से त्रस्त हैं। इसका कारण भावनात्मक स्तर का निकृष्ट हो जाना ही है।
    
🔶 युग निर्माण योजना का आविर्भाव केवल इसी समस्या का समाधान करने के लिए हुआ था। दूसरे शब्दों में इसको हम यों कह सकते हैं कि विश्व की जितनी भी समस्याएँ, कठिनाइयाँ और गुत्थियाँ हैं, उन सबका समाधान एक ही उपाय से करने के लिए जो हल ढूँढ़ा गया था, वह नवनिर्माण आन्दोलन का अर्थ भावनात्मक नवनिर्माण है। मनुष्य की विचारणाएँ, भावनाएँ और दृष्टिकोण को बदल देना यही हमारा उद्देश्य है, उसके बदल देने के पश्चात् सारी परिस्थितियाँ स्वयं ही बदल जाती है। एक-एक चीज को हम बदलना चाहें तो बहुत मुश्किल है। हजारों समस्याएँ सामने हैं, उनको अलग-अलग तरीके से हल करना असम्भव है क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्यों की आमदनी बढ़ती चली जाएगी, उसमें ही आदमी का खर्च बढ़ता चला जाएगा। आमदनी की अपेक्षा खर्च ज्यादा किया तो दर्द कैसे दूर हो जाएगा? अपव्यय अगर मनुष्य के काबू से बाहर है तो चाहे कितनी ही आमदनी क्यों न बढ़े, हमेशा कर्जदारी की समस्या बनी रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

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