रविवार, 10 दिसंबर 2017

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 2)

🔶 यह ऐसा समय है जिसमें किसी को किसी पर विश्वास नहीं रह गया है। आतंक और आशंकाओं से वातावरण चारों ओर घिरा हुआ है। सड़क पर जब आप निकलते हैं तो मालूम नहीं कि आपके साथ पड़ोस में चलने वाला आपके चाकू भोंककर कब आपकी सम्पत्ति छीन लेगा, इसका क्या विश्वास है? इनसान का चाल-चलन, इनसान का विचार इतना गन्दा-घटिया हो गया है कि यह स्थिति अगर बनी रही तो कोई किसी पर विश्वास नहीं करेगा, न भाई-भाई पर विश्वास करेगा, न स्त्री पुरुष पर विश्वास करेगी, न पुरुष स्त्री पर विश्वास करेगा, ऐसा गन्दा, ऐसा वाहियात समय है यह।
                 
🔷 यह समय इसलिए भी घटिया और वाहियात है कि नेचर हमसे आप सबसे नाराज हो गई है। जब उसकी मौज आती है तो अन्धाधुन्ध पानी बरसा देती है और जब मूड आता है तो सूखा नजर आता है। कहीं मौसम का ठिकाना नहीं कि मौसम पर पानी बरसेगा कि नहीं, ठण्ड के समय ठण्ड ही पड़ेगी कि गर्मी पड़ेगी, कोई नहीं कह सकता। भूकम्प कब आ जाए, कोई नहीं कह सकता? बाढ़ कब आ जाए, कोई ठिकाना नहीं? प्रकृति हम सबसे बिल्कुल नाराज हो गई है, इसलिए उसने काम करना बन्द कर दिया है। यह ऐसा भयंकर समय है।
    
🔶 ऐसे भयंकर समय में आपके ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या आपके कोई कर्तव्य नहीं है? क्या आपके अन्दर भावनाएँ नहीं हैं? क्या आपका हृदय पत्थर और लोहे का हो गया है? नहीं, मेरा ख्याल है कि सब आदमियों का ऐसा नहीं हुआ होगा। ज्यादातर लोगों का तो ऐसा ही हुआ है कि वे घटते-घटते जानवर की तरीके से बनते चले जा रहे हैं। जवान आदमी जब ज्यादा बुड्ढा हो जाता है तो कमर झुकने लगती है, आँखें नीची हो जाती हैं, लाठी टेककर चलता है। इनसान की जवानी चली जाती है तो वह बौना हो जाता है, घटिया हो जाता है, कमर झुक जाती है, उसका आसमान की ओर देखने का न मन होता है, न उसकी बनावट ही ऐसी रह जाती है कि वह ऊपर देखे। अधिकांश आदमी आज ऐसे हो गए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

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